मंगलवार, 25 जुलाई 2017

संजीव वर्मा 'सलिल' के नवगीत और दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेघ बजे..


नभ ठाकुर की ड्योढ़ी पर
फिर मेघ बजे
ठुमुक बिजुरिया
नचे बेड़नी बिना लजे

दादुर देते ताल,
पपीहा-प्यास बुझी
मिले मयूर-मयूरी
मन में छाई खुशी

तोड़ कूल-मरजाद
नदी उफनाई तो
बाबुल पर्वत रूठे
तनया तुरत तजे

पल्लव की करताल
बजाती नीम मुई
खेत कजलियाँ लिये
मेड़ छुईमुई हुई

जन्मे माखनचोर
हरीरा भक्त पिये
गणपति बप्पा, लाये
मोदक हुए मजे

टप-टप टपके टीन
चू गयी है बाखर
डूबी शाला हाय!
पढ़ाये को आखर?

डूबी गैल, बके गाली
अभियंता को
डुकरो काँपें, 'सलिल'
जोड़ कर राम भजे


नहा रहे हैं बरसातों में..


नहा रहे हैं
बरसातों में 
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़

सूर्य-बल्ब
जब होता रौशन
मेक'प करते बिना छिपे.
शाखाओं,
कलियों फूलों से
मिलते, नहीं लजाते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़

बऊ धरती
आँखें दिखलाये
बहिना हवा उड़ाये मजाक
पर्वत दद्दा
आँख झुकाये,
लता संग इतराते झाड़
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़

कमसिन सपने
देख थिरकते
डेटिंग करें बिना हिचके
बिना गये
कर रहे आउटिंग
कभी नहीं पछताते
नहा रहे हैं
बरसातों में
हरे-भरे बतियाते झाड़
अपनी जगह
हमेशा ठांड़े
झूम-झूम मस्ताते झाड़


कुछ दोहे बरसात के..


गरज नहीं बादल रहे, झलक दिखाकर मौन
बरस नहीं बादल रहे, क्यों? बतलाये कौन??

उमस-पसीने से हुआ, है जनगण हैरान
जल्द न देते जल तनिक, आफत में है जान

जो गरजे बरसे नहीं, हुई कहावत सत्य
बिन गरजे बरसे नहीं, पल में हुई असत्य

आँख और पानी सदृश, नभ-पानी अनुबंध
बन बरसे तड़पे जिया, बरसे छाये धुंध

पानी-पानी हैं सलिल, पानी खो घनश्याम
पानी-पानी हो रहे, दही चुरा घनश्याम

बरसे तो बरपा दिया, कहर न बाकी शांति
बरसे बिन बरपा दिया, कहर न बाकी कांति

धन-वितरण सम विषम क्यों, जल वितरण जगदीश?
कहीं बाढ़ सूखा कहीं,  पूछे क्षुब्ध गिरीश

अधिक बरस तांडव किया, जन-जीवन संत्रस्त
बिन बरसे तांडव किया, जन-जीवन अभिशप्त

महाकाल से माँगते, जल बरसे वरदान
वर देकर डूबे विवश, महाकाल हैरान


हाइकु


(एक)
भोर सुहानी
फूँक रही बेमोल
जान में जान। .


(दो)
जान में जान
आ गयी, झूमी-नाची 
बूँदों के साथ।


(तीन)
बूँदों के साथ
जी लिया बचपन
आज फिर से। 

(चार)
आज फिर से
मचेगा हुडदंग
संसद सत्र।

(पाँच)
संसद सत्र
दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध
फैलाओ इत्र।

(छह)
हाइकू लिखा
मन में झाँककर
अदेखा दिखा।

(सात)
पानी बरसा
तपिश शांत हुई
मन विहँसा।

(आठ)
दादुर कूदा
पोखर में झट से

छप - छपाक।

(नौ)
पतंग उड़ी
पवन बहकर
लगा डराने

(दस)
हाथ ले डोर
नचा रहा पतंग
दूसरी ओर


संजीव वर्मा 'सलिल'


204, विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मोबाइल: 9425183244 
ई-मेल: salil.sanjiv@gmail.com

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