मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

संतोष श्रीवास्तव की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


जंग जारी है..


डूबती नाव की तरह 
मैं ज़िन्दगी के समँदर में 
ऊबती,डूबती रही 
कभी कोनों को पकड कर 
डूबने से बचती 
कभी बेसहारा सी 
लहरों की मर्ज़ी का 
शिकार हो जाती 
कभी उत्ताल 
तरंग पर सवार हो
विजयी हो 
अपने ही कंधों पर 
बैठ इठलाती 
कभी तेज़ लहर 
पाताल तक 
खींच ले जाती 
मैं हाथ पैर मारकर 
ऊपर आ जाती 
इस जद्दोजहद में 
कितनी ही बार 
खुद को टूटा,बिखरा पाती 
सतह पर शाँत 
बहते रहने के लिये 
मुझे खुद को 
काठ करना पडेगा 
और मुझे काठ होने से 
इंकार है 
मेरी जंग अब भी जारी है


सरहदें


गुलाबी पँख की परवाज़ तारी
आसमाँ पे
लो फिर आये परिंदे 
दूर मुल्कों की हदों के 
फासलों से
रौनकें गुलज़ार हैं 
दरिया के दो बाजू
परिंदे देखते हैं
हवा,पानी,सब्ज़ हों बाजू
बसाते आशियाँ अपना
नहीं बँटते हैं मुल्कों में
नहीं करते हैं तारे 
आसमाँ पे कोई हदबंदी
नहीं घिरती घटाएँ
देखकर सरहद की चौबन्दी
हवाओं को नहीं एहसास
कितना और कहाँ बहना
तो फिर इंसा बँटा है क्यों
मज़हब और मुल्कों में
खिंची हैं सरहदें
हम बँट गये हैं
टुकडों टुकडों में
खुदाया किस तरह
हम मज़हबीं हैं
किस तरह?


बहुत करीब था मयखाना

                                                             
रात के खौफनाक सन्नाटे में
रह रह कर उभर आती
अजनबी चीखें
चौंकाती रहीं रात भर
सुबह के पास
कोई आवाज़ न थी
भोर होते ही ढ्ल गया सूरज
साँस रोके रही
हर एक रहगुज़र
कोई आहट, कोई कदमों के
निशाँ भी न थे बाकी उन पर
न कहकहों की गूँज
न मासूम हँसी के फूल
सब कहाँ दफ्न हुए
थी वहाँ लपटों की तपिश 
एक मजबूर खलिश 
मस्जिद से दूर न था बुतखाना 
बीच में था मयखाना 
जहाँ न तपिश थी न खलिश 
होठों से सटे जाम थे 
मुट्ठी में कायनात 
और पहरे पर सलीबें 
न जाने किसके हिस्से की


दौड़

                                                     
क्यों दौड रही है दुनिया
हर तरफ भागमभाग
किसी को फुरसत नहीं
कि रुककर जवाब दे
मेरे सवाल का
कहाँ किस हद तक
आखिर कोई तो मुकाम होगा
इस दौड का?
ताज्जुब है पृथ्वी नहीं दौडती
अपनी धुरी पर ही रहती है
उसे सौंपे हुए कालखँड में
पूरी निष्ठा से
इंसान का उठा हुआ हर कदम
उतनी ही दूरी नापता है
जितनी तय है
फिर दुनिया क्यों और कहाँ
दौड रही है
अगर पहियों पर सवार
इंसान की चाल आँकनी है
तो पैदल चलते पाँव
किस दुनिया में गिने जाएँगे
समय की गति से कई गुना ज्यादा
तेज़ रफ्तार से दौडते
इस कारवाँ के गुबार से भरी
ज़मीन पर
आँखे मलते मलते भी हवाओं को
अपने जायज़ सवालों से नहीं भर सकी
हवाओं के पास भी
इसका क्या जवाब होगा?
वे तो खुद अपनी शीतलता
खो चुकी हैं
फिज़ाओं में अब
परिन्दों की चहचहाहट नहीं है
भागती दौडती दुनिया का शोर है
इस दौड का कहाँ है अंत?
है भी?
इंसान दौड रहा है
इंसानियत पीछे छूट रही है
तारीख में
पहले दर्ज़ हर्फ से
पहले सफे से
उससे पहले की कहानी
गहरे अँधेरे में डूबी है
लेकिन वहाँ से भी
कदमों की बेसब्र आहट
सुनाई देती है
दौड वहाँ भी पडाव डाले है।
                       

गौतम से राम तक


गौतम ने तुम्हे पुत्रीवत
पाल पोसकर बडा किया
और अपनी अंकशायिनी बनाया
तुम चुप रहीं
मन ही मन जिसे (इन्द्र) प्रेम करती थीं
उसे पाने की लालसा के बावजूद
विरोध न कर सकीं
चुप रहीं
उस दिन इन्द्र को सामने पा
रुक नहीं पाई तुम
खुद को ढह जाने दिया
उसकी बाहों में
यह तुम्हारा अधिकार भी तो था
प्यार करने का अधिकार
पर इसके एवज
गौतम के आरोप,प्रत्यारोप
तिरस्कार,शाप?
तुम्हे नहीं लगा कि वह
गौतम का
तुम पर एकाधिकार की समाप्ति का
घायल अहंकार,कायरता और दुर्बलता थी?
तुम चुप रहीं
मूक पत्थर हो गईं
पत्थर बन तुम सहती रहीं
लाचारी,बेबसी,घुटन
बदन को गीली लकडी सा सुलगाती
अपमान की ज्वाला 
तुम्हारे पाषाण वास में 
तुम्हारी पीडा के हित 
न गौतम आये न इन्द्र 
राम ने तुम्हे पैरों से छुआ 
तुम पिघल गईं 
खामोशी से पदाघात सह गईं 
सोचो अहल्या 
गौतम से राम तक की 
तुम्हारी यात्रा 
पुरुष सत्ता की बिसात पर 
औरत को मोहरा नहीं बनाती?


संतोष श्रीवास्तव


  • जन्म-23 नवम्बर (जबलपुर)
  • शिक्षा-एम.ए(हिन्दी, इतिहास) बी.एड,.पत्रकारिता मेँ बी.ए।
  • प्रकाशित पुस्तके-बहके बसँत तुम,बहते ग्लेशियर,प्रेम सम्बन्धोँ की कहानियाँ आसमानी आँखों का मौसम (कथा सँग्रह) मालवगढ की मालविका.दबे पाँव प्यार,टेम्स की सरगम,हवा मे बँद मुट्ठियाँ,(उपन्यास) मुझे जन्म दो माँ (स्त्री विमर्श) फागुन का मन(ललित निबँध सँग्रह) नही अब और नही तथा बाबुल हम तोरे अँगना की चिडिया  (सँपादित सँग्रह) नीले पानियोँ की शायराना हरारत(यात्रा सँस्मरण)।
  • विभिन्न भाषाओ मेँ रचनाएँ अनूदित,पुस्तको पर एम फिल तथा शाह्जहाँपुर की छात्रा द्वारा पी.एच.डी,रचनाओ पर फिल्माँकन,कई पत्र पत्रिकाओ मेँ स्तम्भ लेखन व सामाजिक,मीडिया,महिला एवँ साहित्यिक सँस्थाओ से सँबध्द, प्रतिवर्ष हेमंत फाउँडेशन की ओर से हेमंत स्मृतिकविता सम्मान एवं विजय वर्मा कथा सम्मान का मुम्बई मे आयोजन,महिला सँस्था विश्व मैत्री मँच की संस्थापक,अध्यक्ष।
  • पुरस्कार-बारह राष्ट्रीय एवं दो अँतरराष्ट्रीय साहित्य एवँ पत्रकारिता पुरस्कार जिनमे महाराष्ट्र के गवर्नर के हाथो राजभवन मेँ लाइफ टाइम अचीव्हमेंट अवार्ड तथा म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा मध्य प्रदेश के गवर्नर के हाथों नारी लेखन पुरस्कार विशेष उल्लेखनीय है। 'मुझे जन्म दो माँ' पुस्तक पर राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा पी एच डी की मानद उपाधि।  महाराष्ट्र राज्य साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय हिन्दी सेवा सम्मान। भारत सरकार अंतरराष्टीय पत्रकार मित्रता सँघ की ओर से 20 देशो की प्रतिनिधि के रूप मेँ यात्रा।
  • सँपर्क-101 केदारनाथ को.हा.सोसाइटी, सैक्टर-7, निकट चारकोप बस डिपो, काँदिवली, पश्चिम मुम्बई-400067
  • फ़ोन-09769023188    
  • ईमेल:  kalamkar.santosh@gmail.com

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

राजेन्द्र तिवारी की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

             

             शह दी है पियादे ने..


शह दी है पियादे ने कोई बात नहीं है।
बाक़ी है अभी खेल अभी मात नहीं है।

फ़स्लें न उगेंगी न कभी प्यास बुझेगी,
ये ओस की बूँदें है ये बरसात नहीं है।

नन्हा सा दिया देख के घबराये जो सूरज ,
ये क़द की बुलन्दी है करामात नहीं है।

कहते हैं कोई शह्र में अब भी है वफ़ादार,
हालांकि मेरी उससे मुलाक़ात नहीं है।

मज़हब की सलाख़ों में मुझे क़ैद न करना,
इन्सान हूँ मैं कोई मेरी जात नहीं है।      


                                        

             भूल हमसे हो गई या..


चन्द दाने ढूंढ़ने बस्ती से वीराने गये।
हर सुबह घर से परिन्दे जि़न्दगी लाने गये।

साजि़शें नाकाम कर दीं ऐ हवाओं शुक्रिया,
उठ गईं रुख़ से नक़ाबें लोग पहचाने गये।

घायलों से कितनी हमदर्दी थी उनको दोस्तों,
थैलियाँ लेकर नमक की ज़ख़्म सहलाने गये  ।

भूल हमसे हो गई या तुमसे नादानी हुई,
वर्ना कैसे महफि़लों तक अपने अफ़साने गये।

यूँ न जाओ गाँव अपना छोड़कर पछताओगे,
लोग काफ़ी दूर तक हमको ये समझाने गये।


                                                   

             दिखती नहीं है आग..


समझे न उनकी बात इशारों के बावजूद।
डूबे हैं हम तो यार किनारों के बावजूद।

दिखती नहीं है आग शरारों के बावजूद।

काली है कितनी रात सितारों के बावजूद।

गुलशन को जाने किसकी नज़र लग गई है यार,

खिलते नहीं हैं फूल बहारों के बावजूद।

है रहबरों की भीड़ प’ मंजि़ल कोई नहीं,

दर-दर भटक रहे हैं सहारों के बावजूद।

टी.वी. को देख-देख के नस्लें बिगड़ गईं,

तहज़ीब के तमाम इदारों के बावजूद। 

चेहरों पे उनके शिकन भी नहीं दिखी,

इतनी तबाहियों के नज़ारों के बावजूद। 


                                                     

 आदमी में अब ये बीमारी..               


जि़न्दगी में यूँ तो  दुश्वारी बहुत है।
इसलिए जि़न्दा हूँ ख़ुद्दारी बहुत है।

आदमी में अब ये बीमारी बहुत है।
हौसला थोड़ा है हुशियारी बहुत है।

उसकी नासमझी का अंदाज़ा लगाओ,

कह रहा है ख़ुद समझदारी बहुत है।

बस ज़रा सा साथ मिल जाये हवा का,

आग भड़काने को चिन्गारी बहुत है।

काश होती ये वफ़ादारी की मूरत,

वैसे सूरत आपकी प्यारी बहुत है।

दिल हमें ‘राजेन्द्र’ समझाता है अक्सर,

कम करो इतनी रवादारी बहुत है।




राजेन्द्र तिवारी



  • जन्म- 02 मार्च-1960 (कानपुर)
  • शिक्षा- परास्नातक कानपुर विश्वविद्यालय
  • लेखन - तीन दशकों से अधिक समय से ग़ज़लों से गहरा जुड़ाव। यदा-कदा गीत, आलेख, समीक्षा आदि।
  • प्रकाशन - ‘‘संभाल कर रखना’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित 2012, ‘‘ज़बान काग़ज़ पर’’ ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन।
  • ‘समकालीन हिन्दी ग़ज़ल संग्रह’, ‘ग़ज़ल दुष्यन्त के बाद’, ‘हिन्दी के लोकप्रिय ग़ज़लकार’, ‘नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार’, ‘हिन्दी ग़ज़ल यानी...’, ग़ज़लें हिन्दुस्तानी’ इत्यादि अनेक समवेत ग़ज़ल संकलनों में शामिल। ग़ज़ल विश्वांकों, विशेषांकों ‘समकालीन भारतीय साहित्य’, ‘इन्द्रप्रस्थ भारती’, ‘हंस’, ‘नवनीत’, ‘कथन’, ‘कथादेश’ ‘गगनांचल’ आदि देश की सभी प्रमुख पत्रिकाओं समाचार पत्रों में प्रायः ग़ज़लों का प्रकाशन।
  • पुरस्कार - अली एवार्ड-2000  भोपाल। वाकि़फ़ रायबरेलवी सम्मान-2001 रायबरेली। ‘अनुरंजिका’, ‘सौरभ’, ‘मानस संगम’ इत्यादि विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
  • सम्प्रति - लेखाकार्य व स्वतंत्र लेखन।
  • सम्पर्क - ‘तपोवन’ 38-बी, गोविन्द नगर, कानपुर-208006 (उत्तर प्रदेश)।
  • मोबाइल- 09369810411
  • ईमेल- rajendratiwari121@gmail.com

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

पुस्तक समीक्षा: स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ नहीं मानतीं ‘सरहदें’-ऋषभदेव शर्मा




सुबोध श्रीवास्तव (1966) कविता, गीत, गज़ल, दोहे, मुक्तक, कहानी, व्यंग्य, निबंध, रिपोर्ताज और बाल साहित्य जैसी विविध साहित्यिक विधाओं में दखल रखने वाले बहुआयामी प्रतिभा के धनी कलमकार है। पत्रकारीय लेखन के अतिरिक्त वे अपने काव्य संग्रह ‘पीढ़ी का दर्द’, लघुकथा संग्रह ‘ईर्ष्या’, बालकथा संग्रह ‘शेरनी माँ’ और ई-पत्रिका ‘सुबोध सृजन’ के लिए पर्याप्त चर्चित हैं।‘सरहदें’ (2016) उनका दूसरा कविता संग्रह है।

‘सरहदें’ में सुबोध श्रीवास्तव की 51 कविताएँ हैं जिन्हें दो खंडों में रखा गया है – 42 ‘सरहदें’ खंड में और 9 ‘एहसास’ खंड में. ‘एहसास’ में सम्मिलित रचनाओं को ‘प्रेम कविताएँ’ कहा गया है। यह वर्गीकरण न किया जाए, तो सारी कविताएँ मिलकर स्वयं स्वतंत्र पाठ रचने में समर्थ हैं। यह पाठ सरहद के विभिन्न रूपों से संबंधित है। हदें और सरहदें मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक आचरण को नियंत्रित करती हैं। वैयक्तिकता जहाँ बे-हद और अन-हद की जिद करती है वहीं सामाजिकता सर्वत्र और सर्वदा हदों का निर्धारण करती चलती है। ‘सीमित’ और ‘सीमातीत’ के द्वंद्व में से उपजती है मनुष्यों, राष्ट्रों, समाजों और समस्त जगत के आपसी संबंधों की विडंबनाएँ। सुबोध श्रीवास्तव इन विडंबनाओं को पहचानते ही नहीं, जीते भी हैं। इस जीवंत अनुभूति से ही रची गई हैं ‘सरहदें’ की ये कविताएँ।

‘सरहदें’ हमारा समकाल या वर्तमान है। कविमन समकाल का अतिक्रमण करके कभी अतीत में जाता है तो कभी भविष्य में. अतीत स्मृतियों में वर्तमान रहता है तो भविष्य शुभेच्छा में वर्तमान रहता है। अभिप्राय यह है कि वर्तमान का सच होते हुए भी सरहदें स्मृतियों और शुभेच्छाओं को बाधित नहीं करतीं। स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ किसी सरहद को नहीं मानतीं। कविमन भी किसी सरहद को कब मानता है! सुबोध श्रीवास्तव की कविताओं में एक खास तरह का कथासूत्र विद्यमान रहता है जो कविताओं को संवाद की नाटकीयता प्रदान करता है। अपनी वैचारिकता को स्थापित करने के लिए कवि ने प्रश्नों, तर्कों और सीधे संबोधनों का अनेक स्थलों पर प्रयोग किया है। कवि की अपनी अभिप्रेत दुनिया की व्यवस्था का पता वे रचनाएँ देती हैं जो संभावनाओं और शुभेच्छाओं से भरी हुई हैं। 

सुबोध बच्चों को मनुष्य में विद्यमान सहजता और दिव्यता के अंश के रूप में देखते हैं और वह उनके लिए भविष्य का भी प्रतीक है। स्वार्थ, हिंसा और आतंक से भरी दुनिया में जहरीले कीड़े को बचाता नन्हा बच्चा अपनी निस्संगता में मानवता का संरक्षक बन जाता है. बच्चे और भी हैं। वर्षा के जल में खेलते अधनंगे बच्चे कवि को अतीत में ले जाते हैं – घर और बचपन की स्मृतियों में। ऐसा प्रतीत होता है कि कवि असमय इन दोनों से बिछुड़ गया है। घर, शायद इसीलिए इन कविताओं में पीड़ा और वेदना का स्रोत बनकर उभरा है। कवि की यह शुभेच्छा अनेक रूपों में व्यक्त हुई है कि एक दिन ‘टूटकर रहेंगी सरहदें’ और सरहद के इस पार के बच्चे जब उल्ल्हड़ मचाते सरहद के करीब से गुजरेंगे तो उस पार के बच्चे भी साथ खेलने को मचल उठेंगे – “फिर सब बच्चे/ हाथ थाम कर/ एक दूसरे का/ दूने उत्साह से/ निकल जाएँगे दूर/ खेलेंगे संग-संग/ गाएँगे गीत/ प्रेम के, बंधुत्व के/ तब/ न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें.” ‘सरहदें’ का विखंडन करने पर यही तथ्य सामने आता है कि कवि बात तो सरहदों की कर रहा है लेकिन सरहदों के ‘न होने’ का प्रबल हामी है। यह तथ्य कवि की मुक्ति चेतना का द्योतक है। यह मुक्ति चेतना हर सरहद को नकारती है, बावजूद इसके कि बार-बार सरहदों की स्वीकृति आ उपस्थित होती है। कवि जब आह्वान करता है – ‘निकलो/ देहरी के उस पार/ वंदन अभिनंदन में/ श्वेत अश्वों के रथ पर सवार/ नवजात सूर्य के’ ××× ‘उठो निकलो/ देहरी के उस पार/ इंतजार में है वक्त’ तो वह ऐसी बेहतर दुनिया का स्वप्न देख रहा होता है जहाँ सरहदें न हों। इसीलिए आतंक की खेती करने वालों को उनकी कविता सीधे संबोधित करते हुए कहती है – ‘तुम्हें/ भले ही भाती हो/ अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल/ लेकिन -/ मुझे आनंदित करती है/ पीली-पीली सरसों/ और/ दूर तक लहलहाती/ गेहूं की बालियों से  उपजता/ संगीत./ तुम्हारे बच्चों को/ शायद/ लोरियों सा सुख भी देती होगी/ गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/ सुनो..../ कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं/ बंदूकें,/ सिर्फ कोख उजाड़ती हैं’।

यादों में वह शक्ति है जिसके सामने सरहदें कायम नहीं रह पातीं। घर हो या समाज या देश या दुनिया – हृदय की रागात्मकता इनमें से किसी को भी हदों और सरहदों में बाँधने और बाँटने में यकीन नहीं रखती – ‘हमेशा/ कायम नहीं रहतीं/ सरहदें.../ याद है मुझे/ उस रोज/ जब/ अतीत की कड़वाहट/ भूलकर/ उसने/ भूले-बिसरे/ सपनों को फिर संजोया,/ यादों के घरौंदे में रखी/ प्यार की चादर ओढ़ी/ और/ उम्मीद की उंगली थामकर/चल  पड़ा/ ‘उसे’ मनाने./ तेज आवाज के साथ टूटीं/ सरहदें/ और/ रूठ कर गई जिंदगी/ वापस दौड़ी चली आई...।’ कवि को विश्वास है कि सरहदें टूटने से ही चुप्पी की दुनिया का विनाश संभव है क्योंकि इस चुप्पी ने ही ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न की है कि यादों को स्थगित करके कवि को नियतिवादी बनना पड़ा है – ‘हम सफर/ गुजरे वक्त को/ याद करके/ विचलित न करो मन को/ मेरा मुजरिम/ तू नहीं/ नियति है/ जिस पर किसी का जोर नहीं।’ सीमाओं और मर्यादाओं को स्वीकार करते हुए भी नियति और विवशता के बहाने हम उन्हें अस्वीकार और स्थगित ही तो करते हैं। अपनी-अपनी हदों में बंधे हम एक दूसरे की खुशी और मजबूरी की दुहाई देते रहते हैं – ‘सरहद, न तेरी थी कोई/ सरहद, न मेरी थी कोई/ वो खुशी थी कल की/ ये विवशता है आज की/ इक सरहद तेरी भी/ है इक सरहद मेरी भी...!’ 

कुलमिलाकर सरहदें हमें शिद्धत के साथ यह अहसास कराती हैं कि हमें उनका अतिक्रमण करने का पूरा हक है। इसीलिए कवि न तो चाँद को चाहता है, न सूरज को और न आकाश को। न वह चाँद, सूरज और आकाश जैसा होना चाहता है। वह तो अपने शाश्वत अस्तित्व की समस्त संभावनाओं के साथ बस हर सरहद का अतिक्रमण करना चाहता है। कुछ इस तरह कि..

मैं घुलना चाहता हूँ 
खेतों की सोंधी माटी में, 
गतिशील रहना चाहता हूँ 
किसान के हल में, 
खिलखिलाना चाहता हूँ 
दुनिया से अनजान 
खेलते बच्चों के साथ,
हाँ, मैं चहचहाना चाहता हूँ 
सांझ ढले/ घर लौटते 
पंछियों के संग-संग, 
चाहत है मेरी 
कि बस जाऊं/ वहाँ-वहाँ 
जहाँ –
सांस लेती है जिंदगी 
और/ यह तभी संभव है 
जबकि 
मेरे भीतर जिंदा रहे
एक आम आदमी!


  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन प्रकाशन,
  • 942 मुट्ठीगंज, इलाहाबाद,
  • उत्तर प्रदेश (भारत)
  • मोबाइल: +91-9453004398
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com

प्रो. ऋषभदेव शर्मा 


(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद)
208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर– 500013 
मोबाइल - 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com

डा० मंजु श्रीवास्तव की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरा आँगन रोज सौगात देता है..


न कोई मात देता है, न कोई घात देता है,
मुझे घर का मेरा आँगन,रोज सौगात देता है।

महल पत्थर का हो या हो ,घरौंदा ईंट माटी का,

मगर आँगन हर एक घर का, चाँदनी रात देता है ।

चतुर्दिक फैलतीं सुरभित, सुखद, शीतल हवायें जब,

मधुर संगीत मन में छेड़कर, आलाप देता है।

पसारे पंख बादल जब, उड़े जाते दिगंतों तक,

बिठा आगोश में अपने, नये जज्बात देता है।

सजी बारात तारों की,चाँद दूल्हा ठुनकता है,

सजा आकाश-गंगा नभ, खुशी,उल्लास देता है।


आकाश छूना चाहती हूँ..


कवि-हृदय हूं कल्पना के पंख लेकर
दूर तक आकाश छूना चाहती हूँ ।

नफरत ओ,आतंक की दूषित नदीसे
ऊबकर उस पार जाना चाहती हूँ ।

मैं रिवाजों,रूढियों की बेड़ि़यों से
मुक्त हो स्वच्छंद उड़ना चाहती हूँ।

दर्द की नगरी में भूखी प्राण गाथा
फलक पर दिल के मैं लिखना चाहती हूँ ।

बस्तियां जो फूस की जलने लगीं हैं
नेह के बादल घिरें मैं चाहती हूँ ।

शुष्क शाखों बीच नभ में चाँद दिखता
अक्स वो दिल में बसाना चाहती हूँ ।

हो न पाई साध पूरी इस हृदय की
जन्म मैं सौ बार लेना चाहती हूँ ।


अन्तर की उमड़ती 'नदी'


अन्तर की उमड़ती 'नदी'
हमारे तुम्हारे अस्तित्व- तट से 
टकरा कर और भी छलकी थी
वे पल भी जिये हैं हमने
जब, सावन की बौराई जलधार में 
तन-मन डूबा था ।
कोयल की कूक औ
पपीहे की 'पी कहाँ'
हमारी ही तो अनुकृति लगे थे,
कभी समाया था,
अन्तर में अनन्त आकाश 
और कभी सागर को भी 
चुनौती देने लगा
ये बौराया 'मन'
तब हमें मालूम नहीं था
नदी सूखती है भी है
अन्तर का आकाश 
सिमटने लगता है
और सागर का कोप 
प्रलय का कारण बन जाता है।


आकाश ! तुम कितने खाली हो?


आकाश ! तुम कितने खाली हो ?
शून्य,स्तब्ध,निर्विकार
एक अबोध बालक के
हृदय-पटल की तरह ।
अचानक उमड़ता-घुमड़ता
कहीं से आता है-
बादलों का एक 
मखमली 'रेला'
विभिन्न आकृतियाँ बनाता
मनमोहक अठखेलियाँ करता ,
चंचल,गतिशील,प्रवहवान ।
पल में विलीन होती -
ये आकृतियाँ,बताती हें-
साकार में निराकार का रहस्य
फिर अपनी सुखद अनुभूतियों को
बूँद-बूँद में अमृत सा बरसाकर,
चला जाता है ,विस्मृति की गोद में।
तुम फिर खाली के खाली रह जाते हो
नये बादल की प्रतीक्षा में,
शून्य,स्तब्ध,निर्विकार।


डॉ० मंजु लता श्रीवास्तव


(एसोसिएट प्रोफेसर,
डी०एस०एन०पी०जी० कालेज,
उन्नाव-उ०प्र०)
डी-108, श्याम नगर
कानपुर (उ०प्र०)
मो०09161999400

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

नाज़िम हिक़मत की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरी कविता के बारे में


मेरे पास सवारी करने के लिए
चाँदी की काठी वाला अश्व न था
रहने के लिए कोई पैतृक निवास न था
न धन दौलत थी और न ही अचल सम्पत्ति
एक प्याला शहद ही था जो मेरा अपना था
एक प्याला शहद
जो आग की तरह सुर्ख़ था !
मेरा शहद ही मेरे लिए सब कुछ था
मैनें अपनी धन दौलत
अपनी अचल सम्पदा की रखबाली की
हर क़िस्म के जीव-जन्तुओं से उसकी रक्षा की
मेरे सहोदर, तनिक प्रतीक्षा तो करो
यहाँ मेरा आशय
मेरे शहद भरे पात्र से ही है
जैसे ही मैं
अपना पात्र शहद से भर लूँगा
मक्खियाँ टिम्बकटू से चलकर
इस तक आएँगी !


कुछ सलाह उनके लिए जो उद्देश्य के लिए जेल में हैं


गर्दन पर फन्दा कसने के बजाय
यदि धकेल दिया जाए तुम्हें काल-कोठरी में
महज़ इसलिए
कि दुनिया के लिए, अपने देश के लिए,
अपनों के लिए उम्मीद नही छोड़ी तुमने
यदि ज़िन्दगी के बाक़ी बचे दस-पन्द्रह वर्षों में भी
तुम्हारे साथ यही सुलूक होता रहे
तो तुम यह भी नही कह पाओगे कि अच्छा होता
जो मुझे रस्सी के छोर पर एक झण्डे की तरह टाँग दिया जाता
किन्तु तुम्हें डटे रहना होगा और जीना होगा
वास्तव में यह तुम्हें ख़ुशी नही दे सकता
लेकिन तुम्हारा यह परम कर्तव्य है
दुश्मन का विरोध करने के लिए तुम
एक दिन और जियो
मुमकिन है कि
कुएँ के तल से आती आवाज़ की तरह
तुम्हारा अन्तर्मन भी अकेलेपन से भर उठे
किन्तु दूसरी ओर
दुनिया की हड़बड़ी देख
भीतर ही भीतर सिहर उठोगे तुम
बाह्य जगत में एक पत्ती भी
चालीस दिनों के अन्तराल पर निकलती है
अन्तर्घट से आती आवाज़ के लिए प्रतीक्षा करना
दुःख भरे गीत गाना
या पूरी रात छत ताकते हुए जागते रहना
भला तो है किन्तु डरावना भी है
हर बार हजामत बनाते हुए
अपने चेहरे को देखो !
भूल जाओ अपनी उम्र !
दुश्मन से सतर्क रहो
और मधुमास की रातों के लिए
रोटी का आख़िरी टुकड़ा खाना
हमेशा याद रखो
और कभी मत भूलो
दिल से खिलखिलाना !
कौन जानता है
वह महिला जिसे तुम प्रेम करते हो
कल तुम्हें प्रेम करना ही छोड़ दे
मत कहना यह कोई बड़ा मसला नही है
यह मनुष्य के लिए
मन की हरी डाली तोड़ देने जैसा होगा
मन ही मन गुलाबों और बाग़ीचों के बारे में
सोचते रहना फिजूल है
वहीँ समन्दर और पर्वतों के बारे में सोचना उत्तम होगा
बिना रुके पढ़ते-लिखते रहो
और मैं तुम्हें बुनने और
दर्पण बनाने की सलाह भी दूँगा
मेरा आशय यह कतई नही है
तुम दस या पन्द्रह वर्ष
जेल में नही रह सकते
इससे कहीं ज़्यादा .....
तुम कर सकते हो
जब तक
तुम्हारे हृदय के बाईं ओर स्थित मणि
अपनी कान्ति न गँवा दे !

(अंग्रेज़ी से अनुवाद : नीता पोरवाल)


पुस्तक समीक्षा: कंगाल होता जनतंत्र–एम.एम.चन्द्रा




मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता..


‘कंगाल होता जनतंत्र’ अनिल कुमार शर्मा का पहला काव्य संग्रह है. यह संग्रह पिछले दो दशकों के आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र का एक ऐसा दस्तावेज़ है जिसने न सिर्फ लेखक की चेतना का ही निर्माण किया बल्कि आम जनमानस की चेतना की निर्माण प्रकिया को आसानी से समझने का प्रयास किया. सन् 1993 से लेकर आज तक का हमारा समय वैचारिक विभ्रम, विघटन, उत्थान और पतन के दौर से गुजर रहा है. यह काव्य संग्रह मुझे ऐसे समय में पढ़ने को मिला जब नये रचनाकारों पर सवाल दर सवाल दागे जा रहे हैं. ऐसे समय में अनिल कुमार की रचनाएँ साहित्य जगत में बहुत सी संभावनाओं को जन्म देती हैं. ‘कली रहने दो’ एक लम्बी कविता है जिसमें ‘डर’ विभिन्न रूपों में हमारे सामने आता है और कहता है कि-

तुम मत उगो सूरज
तुम्हारे डूबने उगने से
मेरे हसीन बचपन में कोई नयापन नहीं आता

1992-93 के उस मंजर को अनिल ने बहुत ही गम्भीरता से महसूस किया है जब देश में अराजकता, साम्प्रदायिकता और धार्मिक उन्मांद आज की तरह ही अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया था तब ऐसे समय में अनिल कुमार की कविताये अपने से संवाद करती हुई दिखाई देती है-  
 
ईश्वर होने का कितना बड़ा प्रपंच
धर्म की ज्वाला कितनी प्रचंड
रक्तपात होते हैं
अपने स्वकृत ईश्वर की स्थापना में
जो शाश्वत है
न विगत है
न आगत है
गढ़े मूल्यों की परिधि में
विवाद है
एकांगी सोच के नशे में
अब जागती हुई नींद आधी है

1990 के दशक में शुरू हुई भारत की विकास यात्रा भारत निर्माण, ग्लोबल विलेज, शाइनिंग इण्डिया इत्यादि मुहावरों की यथास्थिति 2010 आते-आते लेखक की नजरों में एकदम साफ़ हो जाती है. इसी का नतीजा है कि भूमंडलीकरण का सब्जबाग़ और उसकी नियति अब नये तरह की सभ्यता और संस्कृति को जन्म दे रही है जिससे कोई भी अछूता नहीं है-

भूमंडलीकरण के चंगुल में
बाजार का विस्तार होगा
खरीदने बेचने का व्यवहार होगा
यही सभ्यता और संस्कार होगा
भावनाओं का मोल-भाव होगा
बिकाऊ सद्भाव होगा
सारा विश्व एक गाँव होगा

भूमंडलीकरण से जहाँ एक तरफ देश की रहस्मय बीमारियों से लड़ने के लिए फाइफ स्टार जैसे अस्पताल भारतीय महानगरों की शोभा बढ़ा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ गरीब लोग छोटी-छोटी बीमारियों में बगैर इलाज के मर रहे हैं. निजीकरण की आंधी ने बिमारियों को भी एक अच्छा धंधा बना दिया है-

क्लीनिक के आगे दो कतार है
एक में बीमार हैं
दूसरे में एम.आर. हैं
एक दवा खायेगा
दूसरा दवा खपायेगा

युवा रचनाकार के सामने सही मूल्यांकन का सवाल बहुत बड़ा होता है. सही साहित्य की समझ को बनाये रखने के लिए युवा रचनाकारों को सचेत करते हुए अनिल कुमार इशारा करते हैं कि आलोचना के सांचे बन चुके हैं उसके झांसे में आने से बचने की आवश्यकता है -

ये आलोचना तो सात अंधों की जुबान है
जो एक हाथी के जिस्म की कहानी है
समग्र खंडित है
बहुत बड़ा पंडित है

साधु-संतो के वेश में चोर, लुटेरे, बलात्कारी, अंधविश्वासी समाज में भरे हुए है. वे देश की भोली-भाली जनता को अपना जाल बिछा कर फंसाती है और जनता को मुर्ख बनाने के गोरखधंधे को देश के हर कोने में फैला रही है. वे अन्धविश्वासी, तार्किक परम्परा का गला घोटने के लिए नये तौर-तरीकों से पुराने मूल्यों को जबरदस्ती थोप रहे हैं-

अध्यात्मिक अलगाव की बुझे राख को...
पुराने मूल्यों के नाश्ते को
नई तकनीक की गोली से पचा रहे थे
और मीडिया संविधान की धाराओं में
बड़ी ही सुरक्षित गुफा तलाश रहा था
या यों कहें कि देश चला रहा था .

भारतीय जनतंत्र में भीड़ के द्वारा मोर्चा, अनशन, विरोध-प्रदर्शन एवं भूख हड़ताल जैसी कार्यवाही के पीछे नेताओं की हकीकत को अनिल कुमार की कविता बेनकाब ही नहीं करती बल्कि भारतीय जनतंत्र की खोखली हो रही जमीन को और भी खोदने की काम करती है. ‘कंगाल होता जनतंत्र’ भी बाकी कविताओं की तरह लम्बी कविता है जिसमें कंगाल होते भारतीय जनतंत्र को चिन्हित किया गया है-

विदेशी पूँजी से छलकते हुए
समृद्धि की हवाओं से
कंगाल होता जनतंत्र हूँ

लेखक भारतीय जनतंत्र पर प्रश्न चिन्ह लगाने का प्रयास ही नहीं करता बल्कि उसकी जर-जर होती सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक सच्चाइयों को सामने लाता है-

इस देश महान में खेत में खलिहान में
बाबा के संविधान में
सिद्धांत यह है कि समानता का अधिकार है
एक वैचारिक विकार है
सामान्य में कुछ विशेष है
विशेष में अति विशेष है
बाकी अवशेष है

मीडिया की भूमिका जनतंत्र में चौथे स्तम्भ के रूप में मानी जाती है लेकिन देशी-विदेशी पूँजी के गठजोड़ ने मीडिया के चरित्र को बदल दिया है. जहाँ मीडिया को जनपक्ष होना था वहीँ आज मीडिया सरकार की चाटुकारी करती नजर आती है. इस व्यवहार को लेखक ने अपनी कविता के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया है-

यह मूल्यहीन अर्थव्यवस्था
डिब्बे बंद पूँजी तलाश रही है
उदारीकरण की वातानुकूलित हवा में खांस रही है
मीडिया उससे टपकते मधु को चाट रही है...
यह लोकतंत्र एक खिलौने की दुकान है...
सब मूल्य और तर्क तोड़ कर बाजार के लायक बना दो
जो बिक सके वही टिक सके
अब तो हद है कि न्यूज चैनलों में हो रहा दंगा है
अख़बार कैमरे की आँख से भी नंगा है...
तिकड़म तो बस यही है कि
जिसने लोकतंत्र कमा लिया
झोंपड़ी से महल बना लिया

भूखों, किसानों, मजदूरों के लिए भारतीय लोकतन्त्र के नारों के अनुभवों को अनिल कुमार ने खूब लताड़ा है. सड़ते हुए लोकतंत्र का विकल्प अनिल कुमार प्रस्तुत नहीं करते. वे सिर्फ कंगाल होते लोकतन्त्र की सामाजिक, राजनैतिक व आर्थिक ढांचे की सच्चाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं. उनकी कविताएँ दुखद अनुभव और पीडाओं से गुजरी हैं लेकिन इसके बावजूद अनिल कुमार शर्मा की उम्मीद अभी भी जिन्दा है क्योंकि ‘इन्कलाब अभी जिन्दा है’.

  • कंगाल होता जनतंत्र:अनिल कुमार शर्मा
  • विकल्प प्रकाशन | कीमत:300 रुपये