सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

दौड़ एवं अन्य कविताएं-संजीव ठाकुर


विनोद शाही की कलाकृति


दौड़


वे पहुँच गए वहाँ
जहां उन्हें पहुंचना था
अब वे उससे आगे
पहुँचने की तैयारी में हैं ।
मेरे लिए वहाँ तक
पहुंचना
नामुमकिन तो रहा ही
उस रास्ते का पता भी लापता रहा
मैं देखता रहा सबको
आगे –
और आगे जाते हुये
मैं कर भी क्या सकता था
इसके सिवा ?


मित्र


वे देते रहते थे मुझे
जीने की दुआएं
और कब्रिस्तान के किसी कोने में बैठे
काले कपड़े वाले बाबा से
करवाया करते थे काला जादू
मेरे सर्वनाश के लिए ।
उनकी इस दोगली चाल का
क्या करें ?
भिजवाते थे प्रसाद
वैष्णो देवी का
और मेरे सत्यानाश को
किया करते थे
बगुलामुखी का जाप !


क्या करते होंगे ?


क्या करते होंगे रुपयों का
कुबेर के नाती ?
गद्दों में भरवाते होंगे?
सजाते होंगे चिता
मृतकों को जलाते होंगे
इस्तेमाल करते होंगे
टॉइलेट पेपर की तरह ?
नाक का नेटा पोंछ फेंक देते होंगे ?
सेनेटेरी नैप्किन खरीदने की जहमत से
बच जाती होंगी उनकी स्त्रियाँ ?
फेंक देती होंगी डस्ट्बिन में
खून सनी गड्डियाँ ?
रगड़ती होगी आया
दस की गड्डी से
उनके घरों में बर्तन
और सहलाती होंगी
अपने कुत्ता –मूते नसीब को

मन-ही –मन ?
कितने खुश होते होंगे
कुबेर के वंशज
बाथरूम से निकलकर
रुपयों के पायदान पर
गीली स्लीपर रखकर
खड़े होते वक्त !


ज़िंदगी


आकाश में
घर बनाने की कोशिश
ही तो है यह ज़िंदगी
मुर्दा सम्बन्धों की ईटों को ढोकर
वहाँ तक पहुंचाना
आसान भी तो नहीं ?


संजीव ठाकुर


  • जन्म-1967 (मुंगेर, बिहार)
  • शिक्षा- पीएचडी (दिल्ली विश्वविद्यालय)
  • प्रकाशन-नौटंकी जा रही है फ्रीलान्स  ज़िंदगी, अब आप आली अनवर से, प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ (कहानी –संग्रह), झौवा-बैहार (लघु –उपन्यास), इस साज़ पर गाया नहीं जाता (कविता-संग्रह), बच्चों के लिए पंद्रह किताबें । 
  • संप्रति-स्वतंत्र  लेखन 
  • निवास-सिद्ध विनायक अपार्टमेंट, अभय खंड, इंदरापुरम, गाजियाबाद 
  • संपर्क-0120 4116718 

पुस्तक समीक्षा: आख्यान में बदलते ‘क्षण’ की कविताई-प्रो. राजमणि शर्मा




‘कविता’ क्या है? किसे कहेंगे? यह आज का ऐसा ज्वलंत मुद्दा है जिससे हर एक ‘रचना’/ ‘कलाकार’, ‘रचनाकार’ जूझ रहा है. इसे पारिभाषित करना तब और कठिन है जब परिवेश और परिस्थितियों के चक्रवाती तूफ़ान में मनुष्य को अपनी अस्मिता की तलाश हो और कला को अपने अस्तित्व की रक्षा की चिंता हो. आज तो मनुष्य का सर्वोत्तम, वर्षों की साधना का प्रतिफल उसका ‘मूल्य’ ही छिन्न भिन्न हो रहा है, उसकी सार्थकता पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं, उनके अर्थ बदल रहे हैं. किंतु क्या यहाँ ‘मानवीयता’ या ‘मनुष्य’ जीवित है? नहीं. तभी तो आज का कलाकार, कवि-मन अपने सुंदर को खोजने, संजोने, सँवारने में संलग्न है. वह विकल है – इसकी खोज और प्रतिस्थापना के लिए. किंतु, आज के इस अजनबीपन की गुहा के गहन अंधकार में क्या वह स्वयं विलुप्त होने के करीब नहीं है? तभी तो वह कह उठता है – “ईश्वर,/ गलती हो गई आप से,/ दुनिया बनाई मेरे लिए/ पर गलत नाप की,/ फिट नहीं होती मुझे.” इसके बावजूद, मनुष्य कभी हारा नहीं. वह फिर से स्थापित करेगा, खोजेगा कला का मानदंड, नया मानदंड. यही खोज रचनाकार के जीवन का उद्देश्य है, और है इसी में उसके जीवन की सार्थकता - “कला कई मौतें मर चुकी है./ .../ पर फिर भी जीवित है.” कुमार लव भी यह स्वीकार करते हैं कि “पर गर्भ में ... गुफाओं में .... वहाँ सब बार-बार लिखा जाता है/ कई बार दोहराया जाता है.” यह सच है, स्वीकार्य है किंतु कुमार लव का कथन कि “जन्मती नहीं कविता” विचारणीय है. ‘कविता’ तो मनुष्य की जीवंतता का आधार है, यदि काव्य-संवेदना नहीं तो मनुष्य नहीं. वस्तुतः वह मनुष्य के अंतस में सदा सर्वदा विद्यमान रहती है और प्रतिभा के सहारे वह एकाएक फूट पड़ती है.

कुमार लव (1986) हिंदी-युवा-कवि के रूप में अपने पहले संग्रह ‘गर्भ में’ (2015) के साथ हमारे सामने आते हैं. इस संकलन में उनकी ‘अनुभूति’; विचारधारा, परिस्थिति-परिवेश, संघर्ष, वर्तमान जीवन-जगत के यथार्थ रूपी रसायन में रची-पगी है. इस संग्रह की कविताओं के शीर्षक इस तथ्य के साक्षी हैं कि आज की रचनात्मकता की सार्थकता अपने परिवेश को यथार्थ रूप में अभिव्यक्ति प्रदान करने में ही है. कुमार लव इस कसौटी पर खरे उतरते तो हैं, किंतु कहीं-कहीं शीर्षक अपनी सार्थकता संप्रेषित करने तथा पूरी कविता को बाँधने की दृष्टि से सीमित दिखाई देते हैं. यथा – ‘चार आँखों वाला कुत्ता’. यह टिप्पणी एक सामान्य पाठक की है. हो सकता है कि बौद्धिक ऊँचाई प्राप्त पाठक उनसे तादात्म्य स्थापित कर पाएँ, किंतु कविता तो ‘जन’ के लिए भी होनी चाहिए ताकि वह अपनी बौद्धिक क्षमता के अनुरूप उसे आत्मसात कर सके. फिर भी इस संग्रह में ऐसी कविताओं की भरमार है, जिनमें रागात्मकता अपने चरम उत्कर्ष के साथ खड़ी है, और एक ऐसा बिंब उभरता है जो अंतस को झकझोर देता है. यथा – 

  तुम कहती/ पढ़ लेता हूँ तुम्हेँ/ 
  जान लेता हूँ तुम्हारा मन/ 
  समझ लेता हूँ तुम्हारा दर्द... 
  अब/ हो रहे हम/ दूर फिर से... 
  चाहता हूँ थामना/ तुम्हारा हाथ/
  छूना तुम्हारा मन/ कहना फिर से ... (फिर से – 1) 
  हमारी बातों को/ शब्दों को 
  लग गई है दीमक/ खामोशी की. (फिर से – 2) 

ऐसी ही कविता है – ‘शून्यपाल’. 
रागात्मकता का दूसरा पक्ष दिखाई देता है – ‘द्वंद्वातीत’ में 

  नहा धोकर आया/ 
  तड़पते हुए तुम्हें देखा न गया. ×××
  और तुम्हारी आखिरी साँस के साथ 
  मेरी नींद भी टूट गई. 

सामाजिक विसंगति को लेकर रची गई कविता ‘जोंक’ आज के मनुष्य को अपने असली रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास है. ‘शोषण’ का यह यथार्थ चित्रण हमेशा याद रहेगा. इसी तरह की रचना है – ‘सुश्री आत्म संहार’, ‘किसलिए’ सांप्रदायिकता तथा दोस्तों की असलियत का पर्दाफाश है – 

  छोड़ आए थे उसे अकेला 
  वही सब जिन्हें बचाने को 
  रुका था वह वहाँ./ ...
  मैंने देखा/ अपने सबसे करीबी दोस्त को/ टूटते हुए/ ...
  उसकी पहचान के कारण/ उसका ईमान मुसल्लिम होने के कारण. 

वस्तुतः यह आज का मानवीय संकट है, संबंध या दोस्त आज बेमानी हो गए हैं. ‘घृणातीत’ भी इसी प्रकार की रचना है. यहाँ मानवीय संवेदनाएँ मर ही नहीं रही हैं, इससे आतंक का माहौल भी पैदा किया जा रहा है – 

  पर उसकी सड़ती लाश/ आतंकित नहीं करती मुझे,/
  उस पर रेंगते कीड़ों से/ घृणा नहीं होती मुझे./... 
  धर्म से प्यार/ और सत्य से नफ़रत -/ 
  इनका नशा/ और खुले मुँह -/ इनकी भूख 
  और इनकी खुराक/ भर देती है मुझे/ 
  आतंक से. 

निश्चय ही ‘घृणातीत’ मेरी अपनी दृष्टि में एक ऐसी रचना है जो मानवीय यथार्थ से भरपूर और संप्रेषणीयता के माध्यम से संवेदना का तीखा-नुकीला बिंब प्रस्तुति का प्रयास भी है. 
कुमार लव की कविताओं में नए-नए प्रतीक और बिंबों की प्रस्तुति का प्रयास दिखाई देता है. ‘कत्तन वाली’, ‘कैनवस’, ‘नाटा उत्सव’, ‘झील में धूप’ अपने विभिन्न रूपों में प्रस्तुत हैं. यह ‘धूप’, ‘प्रकाश’, ‘रोशनी’ आदि उनकी आशा का केंद्र है. ‘आत्मा’ एक ऐसी कविता है जिसमें आँगन में कभी उपस्थित पेड़ की स्मृतियों की ताजा अनुभूति है. यह अतीत की खोज है, याद है, पुनः स्मरण है और ‘बीते’ से लगाव का प्रमाण. आज ऐसी कविताई कम ही दिखाई देती है. ‘विजया ऐसी छानिए’, ‘झील’, ‘सपनों की टोली’, ‘पेड़ बनना’ अच्छी कविताओं के उदहारण हैं जिनसे सरसता, सहजता और सरलता से संवाद संभव है. मैं कह सकता हूँ कि ‘यह संग्रह आख्यान में बदलते क्षण की कविताओं का संग्रह है.’ कुमार लव को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ. विश्वास है – हिंदी कविता की नई पीढ़ी में वे अग्रणी बनेंगे. 


  • गर्भ में/ कुमार लव/ 2015/ तक्षशिला प्रकाशन,
  • 98-ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
  • नई दिल्ली- 110002
  • पृष्ठ–136/ मूल्य–रु. 300/-


प्रो. राजमणि शर्मा



चाणक्यपुरी, सुसुवाही,
वाराणसी– 22
मोबाइल : 09450454328

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ का लोकार्पण संपन्न


‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ का लोकार्पण करते हुए अरबामिंच
     विश्वविद्यालय, इथियोपिया के भाषाविज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. गोपाल शर्मा. साथ
 मेंप्रो. ऋषभदेव शर्मा, प्रो. एम. वेंकटेश्वर, गुर्रमकोंडा नीरजा एवं ज्योति नारायण.
                                 

‘’अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की चर्चा पश्चिम में 1920 ई. के आसपास तब शुरू हुई जब एक देश के सैनिकों को शत्रु देश के सैनिकों की भाषा सीखने की आवश्यकता पड़ी. उस कार्य में ब्लूमफील्ड का विशेष योगदान रहा. 1964 में हैलिडे, मैकिंटोश और स्ट्रीवेंस ने ‘लिंग्विस्टिक साइंस एंड लैंग्वेज टीचिंग’ शीर्षक पुस्तक का सृजन किया. 1999 में विड्डोसन  ने ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ और ‘भाषाविज्ञान का अनुप्रयोग’ के बीच निहित भेद को स्पष्ट किया. ‘संप्रेषणपरक भाषाशिक्षण’ के आगमन के साथ-साथ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान को ‘भाषा शिक्षण’ के अर्थ में रूढ़ माना जाने लगा. हिंदी की बात करें तो रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ‘हिंदी अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ के जनक हैं. उन्होंने अपने समकालीनों के साथ मिलकर इसके अनुवाद विज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठ विश्लेषण, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान और कम्प्यूटेशनल भाषाविज्ञान जैसे अन्य विविध पक्षों को भी हिंदी में उद्घाटित किया. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा की वाणी प्रकाशन से आई पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ को इस परंपरा की तीसरी पीढ़ी में रखा जा सकता है.

ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के खैरताबाद (हैदराबाद) स्थित सम्मलेन-कक्ष में ‘साहित्य मंथन’ द्वारा आयोजित समारोह में ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ नामक पुस्तक को लोकार्पित करते हुए अरबामिंच विश्वविद्यालय, इथियोपिया के भाषाविज्ञान के विभागाध्यक्ष प्रो. गोपाल शर्मा ने व्यक्त किए. उन्होंने लोकार्पित पुस्तक की लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा को साधुवाद देते हुए कहा कि यह पुस्तक इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि  इसमें भाषिक अनुप्रयोग की पड़ताल के अनेक व्यावहारिक मॉडल उपलब्ध हैं. उन्होंने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि इस पुस्तक में विभिन्न विमर्शों की भाषा के विवेचन द्वारा ‘उत्तरआधुनिक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान’ को भी पुष्ट किया गया है. उन्होंने अपील की कि आम आदमी के दैनंदिन जीवन से जुड़ी समस्याओं को लेकर भी अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की दृष्टि से काम होना चाहिए.     

अपने अध्यक्षीय भाषण में इफ्लू के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने आर्येंद्र शर्मा, कृष्णमूर्ति और श्रीराम शर्मा जैसे भाषावैज्ञनिकों को याद करते हुए कहा कि समय और स्थान के ग्राफ के साथ भाषा के परिवर्तनों को देखना-परखना आज की आवश्यकता है तथा लोकार्पित पुस्तक इस दिशा में उठाया गया एक सही कदम है. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक भाषा के अध्येता छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों और समीक्षकों के लिए समान रूप से उपयोगी है क्योंकि इसमें सैद्धांतिक पिष्टपेषण से बचते हुए लेखिका ने हिंदी भाषा-व्यवहार विषयक प्रयोगात्मक कार्य के परिणामों को प्रस्तुत किया है.  

आरंभ में वुल्ली कृष्णा राव ने अतिथियों का सत्कार किया तथा लेखिका गुर्रमकोंडा नीरजा ने विमोच्य पुस्तक की रचना प्रक्रिया के बारे में चर्चा की. वाणी प्रकाशन के निदेशक अरुण माहेश्वरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि यह पुस्तक प्रसिद्ध हिंदी-भाषावैज्ञानिक प्रो. दिलीप सिंह को समर्पित है जिन्होंने प्रत्यक्ष रूप से इस पुस्तक के प्रणयन की प्रेरणा दी है. इस अवसर पर प्रो. दिलीप सिंह ने भी दूरभाष के माध्यम से सभा को संबोधित किया और लेखिका को शुभकामनाएं दीं. ‘भास्वर भारत’ के संपादक डॉ. राधेश्याम शुक्ल, ‘साहित्य मंथन’ की परामर्शक ज्योति नारायण, ‘विश्व वात्सल्य मंच’ की संयोजक संपत देवी मुरारका और शोधार्थी प्रेक्के पावनी ने लेखिका का सारस्वत सम्मान किया.

कार्यक्रम के संयोजक प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने कहा कि लोकार्पित पुस्तक अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अनेक आयामों की व्यावहारिकता को उद्घाटित करने के साथ-साथ उनका परीक्षण एवं मूल्यांकन भी करती है जिसमें लेखिका का गहरा स्वाध्याय और शोधपरक रुझान झलकता है. इस समारोह में गुरुदयाल अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी, मटमरि उपेंद्र, जी. परमेश्वर, भंवरलाल उपाध्याय, डॉ. बी. सत्यनारायण, वुल्ली कृष्णा राव, डॉ. एम. रंगय्या, राजकुमारी सिंह, डॉ. सुनीला सूद, डॉ. बालकृष्ण शर्मा ‘रोहिताश्व’, डॉ. के. श्याम सुंदर, डॉ. मंजुनाथ एन. अंबिग, डॉ. बलबिंदर कौर, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. करन सिंह ऊटवाल, डॉ. बी. एल. मीणा, मनोज शर्मा, डॉ. मिथिलेश सागर, संतोष विजय मुनेश्वर, सुभाषिणी, संतोष काम्बले, के. नागेश्वर राव, किशोर बाबू, इंद्रजीत कुमार, आनंद, वी. अनुराधा, जूजू गोपीनाथन, गहनीनाथ, झांसी लक्ष्मी बाई, माधुरी तिवारी, सी.एच. रामकृष्णा राव, प्रमोद कुमार तिवारी, रामकृष्ण, दुर्गाश्री, जयपाल, अरुणा, नागराज, लेसली आदि ने उपस्थित होकर इस समारोह की गरिमा बढ़ाई.


ऋषभदेव शर्मा


(पूर्व आचार्य-अध्यक्ष),
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद
208 -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,गणेश नगर, 
रामंतापुर,हैदराबाद-500013.
मोबाइल: 08121435033.

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

वसंत: दो नवगीत-कल्पना मनोरमा


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


बासंतिक उल्लास..


बासंतिक उल्लास हृदय ले 
पीत पर्ण झरता 
नव लतिका के यौवन से 
मन उपवन सजता। 

लाल-लाल अंगारे जैसा 

वन पलाश फूला,
कंचन काया प्रकृति कामनी 
झूल रही झूला,
अंजुरीभव्य नजारे भर कर
पवन शोर करता। 

तितली मधुप प्रीत उर भर के 

देख रहे कलियाँ,
वनिता पहन झांझरें पग में
डोल रही गालियां,
कामदेव धार रूप सुहावन 
सब का मन हरता। 

सरिता सम्मोहित कर बहती 

ताक रहा झरना, 
लहरों पर इठलातीं किरणें 
सीख रहीं तरना,
सागर लेकर माल फेन की 
हर लेता लघुता,
नव लतिका के यौवन से 
मन उपवन सजता।


कंत वसंत सनेही आये..


पादप कुल को ऋतु वसंत ने 
दिया सुघड़ उपहार, 
खुशियों की पगडी संग लाया 
मदना केशर हार। 

नव-बसना हो नीम सुहाया 

आम्र चढ़ी तरुणाई
मनभावना सुरभित चादर में 
लिपट प्रकृति हर्षाई 
स्वर्ग लोक से उतरी रौनक 
कर अनुपम श्रंगार। 

फूले कीकर हुये दीवाने 

वेल अमर इतराई,
दूब घास से लेकर चम्पा 
लहर-लहर लहराई, 
डाल मंजरी हुई सुनहरी 
बन फूली कचनार। 


चंचल हवा बसंती डोली 
पहुँचा मधुकर बाग, 
रंग हाथ ले टेसू-सरसों 
खेलें उपवन फाग, 
फिरे छिपाये मुखड़ा सूरज 
रंगों का आधार। 

सौरभ लाई भोर थाल भर 

आया दिवस गुमान, 
कूलों में कोयल बौराई 
छाया राग वितान, 
कंत वसंत सनेही आये 
दिव्य लिये आकार 
खुशियों की पगडी ले आया 
मदना केशर हार। 


कल्पना मनोरमा 


प्लॉट नंबर 27, फ़्रेंड्स कॉलोनी
निकट रामादेवी चौराहा, चकेरी,
कानपुर (उ०प्र०)
फोन-09455878280, 08953654363
ईमेल –kalpna800mb@yahoo.com

कुण्डलिया संग्रह 'शिष्टाचारी देश में' का लोकार्पण




              समृद्ध साहित्य ही सशक्त समाज का निर्माण करता है..


          संस्कार भारती, साहित्य मंच और नगर पंचायत, इगलास के संयुक्त तत्वावधान में 13 फरवरी को बसंत पंचमी पर आयोजित साहित्यिक कार्यक्रम में कवि तोताराम 'सरस' के कुण्डलिया संग्रह 'शिष्टाचारी देश में' का लोकार्पण सुपरिचित कुण्डलियाकार एवं साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा किया गया। पं.शिव दत्त शर्मा की अध्यक्षता में कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। आगरा से पधारीं कवियित्री मीना शर्मा ने सरस्वती वंदना की। त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने अपने विचार रखते हुए कहा कि साहित्य मनुष्य जीवन की आवश्यकताओं में से एक है। साहित्य ही सही अर्थों में किसी व्यक्ति को मनुष्य बनाता है तथा समृद्ध साहित्य ही सशक्त समाज का निर्माण करता है। 
         ग़ाफ़िल स्वामी द्वारा तोताराम 'सरस' के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर  प्रकाश डाला  गया। इस अवसर पर ब्रज-भाषा के चर्चित कवि राधागोविंद पाठक और साहित्यकार त्रिलोक सिंह ठकुरेला को साहित्य मंच,इगलास की और से सम्मानित भी किया गया। डॉ. सियाराम वर्मा और पं. शिव दत्त शर्मा द्वारा दोनों साहित्यकारों को माल्यार्पण,शॉलएवं स्मृति-चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। बसंत पंचमी के उपलक्ष्य में आयोजित कवि सम्मलेन में राधागोविंद पाठक,सुनहरी लाल वर्मा 'तुरंत',मनोज फगवाड़वी, प्रदीप पंडित, प्रभुदयाल दीक्षित,मणिमधुकर 'मूसल',मीना शर्मा,मनु दीक्षित, त्रिलोक सिंह ठकुरेला,बनवारी लाल 'पुष्प', श्रीप्रकाश 'सृजन', प्यारे लाल 'शांत', श्याम बाबू 'चिंतन', ग़ाफ़िल स्वामी, ब्रजेश पंडित,तोताराम 'सरस', विजय प्रकाश भारद्वाज, दीपेश 'बिल्टू',प्रमोद गोला, कुमार अनुपम, पुनीत प्रकाश भारद्वाज, आकाश धनकर और डॉ. सियाराम वर्मा ने अपनी रचनाएँ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। अंत में कार्यक्रम के अध्यक्ष पं. शिव दत्त शर्मा ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया। 


प्रस्तुति-ग़ाफ़िल स्वामी