मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

देवेन्द्र सफल के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



दिन हैं शर्मीले..


सिर पर चढ़ी धूप ने पहने
कपड़े कुहरीले
काँपें तन-मन चुभें शीत के
ये शर जहरीले।

चारों ओर धुंध का घेरा
नजर न कुछ आये
राख मले जोगी-सा मौसम
जिसे न जग भाये
दबे पाँव आकर छुप जाते
दिन हैं शर्मीले।

वृक्षों और लताओं के अब
पीत हुए पत्ते
इन पत्तों पर गिरे ओस-कण
आँसू-से झरते।
उपवन, खेत, मेड़, पगडण्डी
सब गीले-गीले।

पंछी दुबक गये कोटर में
सूनी अँगनाई
लेकिन  चक्की से चूल्हे तक
नाच रही माई
सर्द अलाव हुआ तो बाबा
हुए लाल-पीले।


देहरी भीतर खुशियाँ आईं..


देहरी भीतर खुशियाँ आईं
लगता अपने दिन बहुरे हैं
बहुत दिनों के बाद हमारे
आँगन में पंछी उतरे हैं ।

अच्छी फसल हुई है अबकी
खूब हुए हैं चना औ' मटर
कुठला भरा हुआ गेहूँ से
धरे बरोठे राई-अरहर
बेच अनाज चुकाया कर्जा
ईश-कृपा से अब उबरे हैं ।

कजरारे नयना शर्मीले
दर्पण से खुलकर बतियाते
सेंदुर ,टिकुली और महावर
बिन बोले सब कुछ कह जाते
वर्षों बाद बज रही पायल
मेंहदी रचे हाथ निखरे हैं ।

शुभ-शुभ शगुन हो रहें हैं नित
कागा भी मुँडेर पर बोले
चैता,बन्ना गावै तिरिया
भेद जिया के रह-रह खोले
गेरू मिले हुए गोबर से
घर औ' द्वार लिपे  संवरे हैं।

पिछले साल पड़ा सूखा तो
रोई मुनिया की महतारी
देवी की किरपा से अबकी
गौना देने की तैयारी
जो सम्बन्धी तने -तने थे
लगे तनिक वो भी निहुरे हैं।


आने वाली पीढी को हम..


आने वाली पीढी को हम
आओ सुखद जवानी दे दें
अपने जले पांव हों चाहे
उन को शाम सुहानी दे दें।

जहरीली जो हुईं हवाएं

उनमें भी वे जहर न भर दें
बढें कदम तो झंझाऐं आ
उंहें कहीं भयभीत न कर दें
डरें न झुकें उंहें हम ऐसा
गैरत वाला पानी दे दें।
नये दौर की चाल तेज है
आओ बढकर उन्हें सराहें
करवट बदल रहा है मौसम
बदल रही हैं उनकी चाहें
वे पिज्जा. बर्गर खाएं पर
थोडी .सी गुडधानी दे दें

वे अतीत के पृष्ठ सुनहरे

जिंहें भुलाना कभी न संभव
आने वाले कल की खातिर
फिर उनमें रंग भर दें अभिनव
पुरखों के स्वरणिम अतीत की
ताजा लिखी कहानी दे दें।


चाँद-सितारे छू कर भी हम..


चाँद-सितारे छू कर भी हम
मन से अभी आदिवासी हैं ।

घिरे हुए मोहक घेरों से
जिनके रंग-बिरंगे फंदे
इन फंदों में सभी फंसे हैं
मूरख,ज्ञानी,ध्यानी बन्दे
मुख्य पृष्ठ पर अभी जमे हैं
जो सन्दर्भ हुये बासी हैं।

तन्त्र-मन्त्र के जाल बिछे हैं
स्वांग सरीखे जादू टोने
दिशाशूल ,अपशगुन से डरें
माथे-माथे लगे दिठौने
जब हम तिलक भभूत लगायें
शिर धुनते मगहर-काशी हैं ।

भूमण्डलीकरण की बातें
लेकिन मन में बसे कबीले
सब पर गहरे रंग चढ़े हैं
लाल, हरे औ'नीले ,पीले
अणु बम सिर पर लादे फिरते
पर खुशियों के अभिलाषी हैं।

जाने कितने दर्पण बदले
लेकिन खुद को बदल न पाये
गहन अँधेरे मिटें न मेटे
कहने को हैं दीप जलाये
भयवश पलकें बन्द न होतीं
सुख के सपने अनिवासी हैं ।


अम्मा का मन कुढ़ता है..


फोटो वही पुरानी लेकिन
फ्रेम नया मढ़ना पड़ता है।

लोटा,थाली और कटोरों

का जारी है पीछे हटना
कब्जाए क्राकरी किचन को
ठप्पा जिस पर मेड-चाइना
बच्चों की खुशियों में खुश हूँ
पर अम्मा मन कुढ़ता है ।

ह्रदय-पटल पर खिंची रेख वो

कभी-कभी गहरी हो जाती
मोबाइल ,कम्प्यूटर हैं पर
मन फिर पढ़ना चाहे पाती
वे अतीत के पृष्ठ सुनहरे
अन्तस् व्याकुल हो पढ़ता है।

यादें बढ़ कर छाया देतीं

जब-जब तपने लगे दुपहरी
उन्हें भूलना बहुत कठिन है
ऐसी छाप पड़ी है गहरी
बीता कल सिर सहला देता
और कभी चांटा जड़ता है ।

नये चलन का है प्रभाव  पर

रखता हूँ मैं खुद संयत
अभी संभाले हूँ वैसे ही
पुरखों से जो मिली विरासत
सुधियाँ  उधर-उधर जातीँ,मन-
पंछी जिधर-जिधर उड़ता है।


तोड़ लो अनुबन्ध..


तोड़ लो अनुबन्ध जहरीली हवा से,
मन महासागर समय बहती नदी है ।

एक मन्थन ने प्रलय को रच दिया था

बस सुधा घट के लिए छल-किया था
कौन पीता विष भला सञ्जीवनी-सा
शंभु ने जिसको विहंस कर पी लिया था।
चेतना के सप्त स्वर बेचैन लगते
गरल है हर होंठ पर क्या त्रासदी है।

जाल फैलाये शिकारी मौन साधे

देखते चुपचाप बगुलों से इरादे
स्वर्ण-पिंजरे में सही पर कैद हैं हम
गत हुए हैं स्वप्न देखे एक-आधे
काट दो इन बंधनों की मेखला को
पीठ पर वैताल बन कर जो लदी है।

सिमट आये हैं छितिज घर -आंगनों में

दर्द के अहसास जगते फागुनों में
बाँसुरी क्यों मोहिनी लगती नहीं अब
हाट के पर्याय हैं वृंदावनों में
बन्द नैनों से नहीं दर्पण निहारो
नव किरण ले चल रही नूतन सदी है।


छुट्टी पर है घाम (दोहे)


कुहरे ने फिर खत लिखा
है सूरज के नाम
अब ड्यूटी पर मैं डटा
छुट्टी पर है घाम।

ठण्ड ओस से घास पर
सजा रही बाजार
औ' बढ़ता ही जा रहा
कुहरे का व्यापार।

ठिठुरन बढ़ती जा रही
ज्यों- ज्यों बढ़ती शीत
ठंडक का दिखता असर
पात हुये हैं पीत।

कुहरे का ऐसा असर
मौसम साधे योग
पंछी कोटर में छुपे
सिकुड़े-सिमटे लोग ।

मौसम वैरागी हुआ
मले वदन में राख

माघ-पूस कुहरा ढँके
घटी सूर्य की साख ।

सर्दी से बेहाल सब
मांगें रब से खैर
सूरज भी लगता डरा
भुला दिया है बैर ।

छाया कुहरा छँट गया
जो था बड़ा अरूप
कल तक ठिठुरी थी बहुत
आज खिली है धूप । 


देवेन्द्र सफल


  • पूरा नाम-देवेन्द्र कुमार शुक्ल
  • पिता- कीर्तिशेष लक्षमी नारायण शुक्ल
  • माता- समृतिशेष अलक नंदा देवी शुक्ला
  • जन्म-स्थान-कानपुर महानगर (उ.प्र)
  • जन्म तिथि-04-01-1958
  • शिक्षा-स्नातक
  • प्रकाशन-गीत-नवगीत संग्रह: पखेरू गन्ध के,  नवांतर, लेख लिखे माटी ने, सहमी हुई सदी, हरापन बाक़ी है।
  • अन्य अनेक सामूहिक संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी के मान्य कवि ।
  • सम्मान-देश-विदेश में अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित/ पुरस्कृत।
  • संपर्क-117/क्यू / 759 -ए,शारदा नगर, कानपुर, उत्तर प्रदेश-208025
  • ईमेल-devendrasafal@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: अँधेरे दौर में रोशनी दिखाती कविताएं




                              क्या कहूँ तुमको, तुम तो खुद ही  दर्द का..

    

क्या अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जायेगी ?
क्या अँधेरे दौर की कविता लिखी जायेगी ?
हाँ! अँधेरे दौर में भी कविता लिखी जाएगी.

अरविन्द कुमार का काव्य संग्रह इस अँधेरे दौर की वह कविता है जो सिर्फ अँधेरे की गहराई और विस्तार का मुआयना ही नहीं करती बल्कि अपने समय के साथ संवाद करती है. इनकी कविताओं को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि यह उनके और हमारे समय का यथार्थ है और इससे बढ़कर पाठक की जिन्दगी से ऐसे मिल जाता है जैसे कि लेखक और पाठक एकमय हों. वे अपने दर्द को इस प्रकार बयाँ करते हैं -

      क्या कहूँ तुमको
      तुम तो खुद ही
      दर्द का एक
      ठहरा हुआ समन्दर हो
अरविन्द की शुरुआती कविताओं में मनुष्य मन की झुंझलाहट, असंतुष्टि, भय, संशय और विरोधाभास की अभिव्यक्ति को सहजता से महसूस किया जा सकता है.  

      हर रात की काली चादर
      फटने के बाद सुबह का सूरज
      सुंदर, नया और पाक तो जरूर लगता है
      पर बेकार
      शाम के धुँधकले में वह भी
      थक, हार कर
      समन्दर में डूब जाता है
      और फिर कुछ भी नहीं बदलता
      ठीक कल की तरह

शहर की हर हलचल पर कवि की पैनी नजर है. वह उसकी आबोहवा से वाकिफ हैं. शहर का मिजाज़ पढ़ने और गढ़ने का यही शिल्प पाठक को अपने साथ शहर की सैर कराता है.
      सच तो यह है कि
      दिन भर इस शहर में
      संकल्प फूलते हैं
      और शाम तक बजबजा कर
      सड़ जाते हैं
      पल-प्रतिपल
      पोस्टर चिपका दिए जाते हैं
      यहाँ वहाँ हर तरफ
      लोगों की पीठ पर
      भोथरे आक्रोशों की अलसाई खड़-खड़
      और टूटी पत्तियों की
      फंफूदी लगी भीड़ में
      पेड़ अब आग प्रूफ हो चुके हैं

अरविन्द अपनी कविताओं में मनुष्य के अंतर्मन में पैदा होने वाले प्रश्नों से संघर्ष करते हैं. लेकिन वह बड़ी आत्मीयता के साथ स्वीकार करते हैं कि मैं पल-प्रतिपल हजारों प्रश्न करता हूँ और उन्हें हल करता हूँ, लेकिन कुछ न कुछ रह जाता है जो लोगों की आँखों में चुभता है-
      पर जानते हो,
      जब तक वह औजार
      उन्हें मिलेगा
      मेरे भीतर भी
      उग आएगी
      एक और दाढ़ी
      ठीक नागफनी की तरह

कविता यथार्थ का मात्र चित्रण ही नहीं बल्कि उस दुनिया का सपना भी है जिसे कवि मनुष्यता के लिए चुनता है, उसका ख़्वाब बुनता है. आधुनिक कविता का यह नया स्वरूप अरविन्द कुमार की कविताओं में धीरे-धीरे विचरण करने लगता है.
      और गुलाम पड़ी फसलें
      आज़ाद होकर
      निडर चाँदनी में
      लहलहाने लगती हैं
      सपनों में यूँ ही
      मिटती है पुरानी दुनिया
      और जन्म लेती है
      एक नई सुहानी सुबह

एक तरफ वे नई सुबह को लाने का ख़्वाब बुनते हैं तो दूसरी तरफ उन लोगों की तमाम लड़ाईयों की तरफ इशारा भी करते हैं कि आने वाली पीढ़ी हमसे सवाल करेगी कि इस अँधेरे दौर में हमने क्या किया? हम लड़े क्यों नहीं और इतनी गहरी चुप्पी क्यों है ? शायद इसीलिए लेखक अपने और अपने जैसे लोगों से संवाद करते हैं-
    ऐसा न हो
    कि हमें अपनी गर्दनें झुका लेनी पड़ें
    अपराधियों की तरह
    क्योंकि आज
    हम या तो मौन हैं
    या लड़ रहे हैं
    सिर्फ कायरों की तरह
हमारे आस-पास सामाजिक बदलाव के नाम पर ढोंग-पाखंड इत्यादि करने वालों की सुध-बुध इन्होने बड़े ही सहज, सरल लेकिन तीक्ष्ण तरीके से ली. अरविन्द दिखावटी बुद्धिजीवियों की रोजमर्रा की जिन्दगी का वर्णन इस प्रकार करते हैं जैसे उन्हें वे रोज-ब-रोज होने वाली चर्चाओं-परिचर्चाओं में देखते हों-
      आओ, चलो कहीं बैठकर...
      उसकी बखिया उधेड़ दें ...
      आसमान को अपनी मुट्ठी में कस लें ...
      शोर मचाते हुए
      भीड़ में तबदील हो जाएँ ...
      और चाय के गिलासों में डूबकर
      कोई तूफ़ान खड़ा कर दें ...
      और टाँगे फैलाकर
      क्रांति की अगवानी करें ...

रचनाकार कभी भी निरपेक्ष नहीं रह सकता, उसको अपना पक्ष चुनना ही पड़ता है. पक्षधरता ही रचनाकार को अपने कर्तव्यों पर चलने के लिए प्रेरित करती है. अरविन्द ने बीच का रास्ता चुनने वाले लोगों के लिए लिखा-
बीच के लोग
बीच में रहते हैं...
और हवा के रुख को भाप कर
बातें करना इनकी समझदारी है ...
हमेशा दुम हिलाते हैं
और पीठ पीछे जुबान ...
और यात्राओं को हमेशा कमजोर करते हैं ...
निरंतर रोशनी को
दूर धकेलते रहते हैं

उपभोगतावादी संस्कृति ने जहाँ सबकुछ बाजार के हवाले कर दिया वहीं प्रेम को भी लाभ हानि के स्तर पर पहुँचा दिया गया. लेकिन अरविन्द कुमार की कविताएँ प्रेम को नया आयाम देने में सफल रहीं. प्रेम व्यक्तिनिष्ठ नहीं बल्कि वह पूरी दुनिया से प्रेम करना सिखाती है-
      मैं तुम्हारी ऊँगली पकड़कर
      इस आग के विशाल दरिया को बेखौफ पार करना चाहता हूँ
      और रचना चाहता हूँ
      तुम्हारी छाँव में बैठ कर
      प्यार और शांति की नई इबारतें
      एक नई दुनिया के लिए

बड़ा लेखक बड़े विचारों से बनता है. लेखक ने भी अपनी विचार यात्रा को कविताओं में सहजने का काम किया है. उनकी कविताओं में प्रेम, संघर्ष, स्वतंत्रता और विश्वबंधुत्व का पक्ष तो है ही साथ ही साथ उन्होंने विचारों की तमाम अभिव्यक्तियों की स्वतंत्र चेतना का निर्माण पथ को मजबूत करने का इरादा जाहिर किया है.
कवियों को लिखने दो
अपनी पूरी ईमानदारी
और जीवंत दृष्टि सपन्नता के साथ
प्रकट करने दो उन्हें
जन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति
नहीं तो वे तंग आकर
मौन धारण कर लेंगे
और समूची धरती
तब किसी स्पष्ट रोशनी के बिना
अराजक हो जायेगी 

अरविन्द कुमार ने अँधेरे दौर की उस परम्परा को कायम किया है कि दुनिया में सिर्फ अँधेरा ही नहीं है अँधेरे को दूर करने वाली रोशनी भी है. आधुनिक कविताओं में प्रतिरोध की कविताओं में मदन कश्यप, आलोक श्रीवास्तव के साथ-साथ अरविन्द कुमार का नाम भी अवश्य आएगा.
कुमार की कविताएँ इस अँधेरे दौर की वो कविताएँ हैं जो आगे रोशनी दिखाती हैं. नये समाज के निर्माण में पाठक को साझीदार करती हैं. ये वो कविताएँ हैं जो एक ऐसा ख्वाब बुनती हैं जिसकी माध्यम से मनुष्यता के उच्चतम मूल्यों को प्राप्त किया जा सकता है. 

-समीक्षक : एम. एम. चन्द्रा


  • आओ कोई ख्वाब बुने : अरविन्द कुमार 
  • प्रकाशन : शब्दारंभ 
  • कीमत : 100 
  • पेज :116 

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

कल्पना रामानी की पांच ग़ज़लें


विनोद शाही की कलाकृति


खुशबू देते कोमल फूलों जैसे..


खुशबू देते कोमल फूलों जैसे रिश्ते
ना जाने क्यों आज बन गए काँटे रिश्ते

सहलाते थे दर्द दिलों का मरहम लाकर
अब महरूम हुए हाथों से गहरे रिश्ते

खिल जाते थे नैन चार होते ही जो कल
नैन मूँद बन जाते अब, अनजाने रिश्ते

बूँद-बूँद से बरसों में जो हुए समंदर
बाँध पलों में तोड़ बने बंजारे रिश्ते

हरे भरे रहते थे भर पतझड़ में भी जो
अब सावन में भी दिखते हैं सूखे रिश्ते

तकरारों में पूर्व बनी माँ, पश्चिम बाबा   
सुपर सपूतों ने कुछ ऐसे बाँटे रिश्ते

नादानी थी या शायद धन-लोभ 'कल्पना'
गाँव-गली से बिछड़ गए जो प्यारे रिश्ते


दिलों से तंग शहर के सिवा..


खुदा से माँगा मेहर के सिवा कुछ और नहीं। 
दुआएँ देती नज़र के सिवा कुछ और नहीं।

दुखा के गाँव का दिल चल दिये मिला लेकिन
दिलों से तंग शहर के सिवा कुछ और नहीं।

पिलाके नाग को पय, बाद पूज लो चाहे
मिलेगा दंश-ज़हर के सिवा कुछ और नहीं।

चमन को सींच लहू से है सोचता माली
गुलों की लंबी उमर के सिवा कुछ और नहीं।

लिया तो सौख्य नई पौध ने बुजुर्गों से
दिया है रंज-फिकर के सिवा कुछ और नहीं।

जवाबी तोहफे मिलेंगे हमें भी कुदरत से
सुनामी, बाढ़, कहर के सिवा कुछ और नहीं।

जो जानते ही नहीं, साज़, राग, उनके लिए
ग़ज़ल भी रूक्ष बहर के सिवा कुछ और नहीं।

विपन्न हैं जिन्हें दिखता हसीन दुनिया में
उदास शाम सहर के सिवा कुछ और नहीं।

कुछ ऐसा हो कि बसे “कल्पना” हरिक जन के
हृदय में प्रेमनगर के सिवा कुछ और नहीं।


खुदा से खुशी की लहर..


खुदा से खुशी की लहर माँगती हूँ। 
कि बेखौफ हर एक घर माँगती हूँ।

अँधेरों ने ही जिनसे नज़रें मिलाईं
उजालों की उनपर नज़र माँगती हूँ।

जो लाए नए रंग जीवन में सबके
वे दिन, रात, पल, हर पहर माँगती हूँ।

जो पिंजड़ों में सैय्याद, के कैद हैं, उन
परिंदों के आज़ाद, पर माँगती हूँ।

है परलोक क्या ये, नहीं जानती मैं
इसी लोक की सुख-सहर माँगती हूँ।

करे कातिलों के, क़तल काफिले जो
वो कानून होकर, निडर माँगती हूँ।

दिलों को मिलाकर, मिले जन से जाके 
हरिक गाँव में, वो शहर माँगती हूँ।  

बहे रस की धारा, मेरी हर गज़ल से
कुछ ऐसी कलम से, बहर माँगती हूँ।

करूँ जन की सेवा, जिऊँ जग की खातिर
हे रब! ‘कल्पना’ वो हुनर माँगती हूँ। 


गंध-माटी में बसी..


गंध-माटी में बसी, माँ भारती की शान है। 
गर्व-गौरव सिंधु हिन्दी, देश की पहचान है।

भाव, रस, छंदों से है, परिपूर्ण हिन्दी का सदन
जिसपे भारतवासियों को सर्वदा अभिमान है।

थामती ये हाथ हर भाषा का है कितनी उदार!
मान हिन्दी का किया जिसने, लिया सम्मान है।

गैर आए, बैर आए, टिक न पाए पैर पर
मात खा हर घात ने, वापस किया प्रस्थान है।

छद्म-छल क़ाबिज़ हुए, जड़ खोदने को बार-बार
पर मिटे हिन्दी की हस्ती, यह नहीं आसान है।    

बेल अमर हिन्दी की ये, बढ़ती रहेगी युग-युगों
कंटकों को काट जो, चढ़ती रही परवान है।     

चाहती साहित्य-सरिता, हक़ से अपना पूर्ण हक़
हर दिशा में ज्यों बहे, हिन्दी का ये अरमान है।

गौण हैं अपने वतन में, किसलिए हिन्दी के गुण?
जबकि इसका विश्व सारा, कर रहा गुणगान है।

जागते रहना है ज्यों मुरझा न जाए फिर चमन
‘कल्पना’ हिन्दी से ही गुलज़ार हिंदुस्तान है। 


जिनके मन में सच की..


जिनके मन में सच की सरिता बहती है
उनकी कुदरत भी होती हमजोली है

जब-जब बढ़ते लोभ, पाप, संत्रास, तमस
तब-तब कविता मुखरित होकर बोली है

शब्द, इबारत, कागज़ चाहे चुराए कोई
गुण, भावों की होती कभी न चोरी है

होते वे ही जलील जहाँ के तानों से
बेच ज़मीर जिन्होंने ‘वाह’ बटोरी है

खोदें खल बुनियाद लाख अच्छाई की
इस ज़मीन में बंधु! बहुत बल बाकी है  

बनी कौन सी सुई? सिये जो सच के होंठ
किए जिन्होंने जतन, मात ही खाई है

पानी मरता देख कुटिल बेशर्मों का
माँ धरती भी हुई शर्म से पानी है

कलम ‘कल्पना’ है निर्दोष रसित जिसकी
रचना उसकी खुद विज्ञापन होती है



कल्पना रामानी 



  • जन्म तिथि-6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

पुस्तक चर्चा: सपने ऒर आत्म भरोसे की कविताएं: 'सरहदें' -दिविक रमेश




                             'सरहदें' (कविता-संग्रह)-सुबोध श्रीवास्तव 



    कवि सुबोध श्रीवास्तव की कविताएं गाहे-बगाहे पढ़ता रहा हूं। अपने दूसरे कविता-संग्रह 'सरहदें' की पांडुलिपि भेजते समय उन्होंने अपने पहले प्रकाशित संग्रह 'पीढ़ी का दर्द' की प्रति भी भेज दी। उनके संग्रहों ऒर कविताओं को पढ़ते समय यह जानकर अच्छा लगा कि सुबोध मात्र कवि ही नहीं बल्कि एक सजग पत्रकार ऒर कहानी, व्यंग, निबंध आदि विधाओं के भी लेखक हॆं। इससे उनकी बहुविध प्रतिभा का भी पता चलता हॆ ऒर अनुभव के दायरे का भी। अच्छा यह जानकर भी लगा कि उनके पहले ही संग्रह की कविताओं ने उन्हें डा.गिरिजा शंकर त्रिवेदी, कृष्णानन्द चॊबे, डॉ. यतीन्द्र तिवारी, गिरिराज किशोर ऒर् नीरज जॆसे प्रशंसक दिला दिए। अत: कानपुर के इस कवि को प्रारम्भ में ही प्रयाप्त प्रोत्साहन ऒर स्नेह मिल गया। डॉ. यतीन्द्र ने पत्रकार होने के नाते सुबोध की सामाजिक सहभागिता को रेखांकित किया हॆ। साथ ही उनकी रचनाओं में व्यक्ति की संवेदनाओं का सार्थक साक्षात्कार भी निहित माना हॆ। तमाम कविताओं को पढ़कर एक बात तो सहज रूप में सिद्ध हो जाती हे कि इस कवि का मिजाज सोच या कला के उलझावों का नहीं हॆ। जब जो अनुभव में आया उसकी सहज ऒर सच्ची अभिव्यक्ति करने में इसे एकदम गुरेज नहीं हॆ। वस्तुत: यह कवि अपनी धुन का पकका लगता हॆ--कुछ-कुछ अपनी राह पर, अपनी मस्ती में चलने का कायल। सबूत के लिए, पहले संग्रह में उनकी  एक कविता हॆ- कविता के लिए। कविता यूं हॆ- तुम,/ अपनी कुदाल/चलाते रहो,/ शोषण की बात सोचकर/रोकना नहीं/अपने-/यंत्रचालित से हाथ/वरना,/मॊत हो जाएगी/कविता की। इस सोच के कवि के पास आत्म भरोसा, सपना ऒर कभी-कभी अपने भीतर भी झांकने ऒर कमजोरियों को उकेरने का माद्दा हुआ करता हॆ। वह झूठी ऒर भावुक आस बंधाने से भी बचा करता हॆ। यथार्थ का दामन न छोड़ता हॆ ऒर न छोड़ने की सलाह देता हॆ।यथार्थ कविता की ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हॆं-पहाड़ से टकराने का/तुम्हारा फॆसला/अच्छा हॆ/शायद अटल नहीं/क्योंकि/कमज़ोर नहीं होता/पहाड़,/न ही अकेला/ उस तक पहुंचते-पहुंचते/कहीं तुम भी,/शामिल हो जाओ/उसके-/प्रशंसक की भीड़ में। अच्छी बात हॆ कि दूसरे संग्रह तक पहुंचकर भी इन बातों से कवि ने मुंह नहीं मोड़ा हॆ।

    'सरहदें' की कविताएं नि:संदेह कवि का अगला कदम हॆ। यह संग्रह अनुभव की विविधता से भरा हॆ, लेकिन दृष्टि यहां भी कुल मिलाकर सकारात्मक हॆ। वस्तुत: कवि के पास एक ऎसी अहंकार विहीन सहज ललक हॆ, बल्कि कहा जाए कि सक्रिय जीवन की सहज समझ हॆ जो उसे लोगों से जुड़े रहने की उचित समझ देती हॆ--हमें मिलकर/ बनानी हॆ/इक खूबसूरत दुनिया/हां, सहमुच/बगॆर तुम्हारे/ यह सब संभव भी तो नहीं। इस कवि में अपनी राह या प्रतिबद्धता को लेकर कोई दुविधा नहीं हॆ-मॆं घुलना चाहता हूं/खेतों की सोंधी माटी में/गतिशील रहना चाहता हूं/किसान के हल में/ खिलखिलाना चाहता हूं/दुनिया से अनजान/खेलते बच्चों के साथ/हां, चहचहाना चाहता हूं/सांझ ढले/घर लॊटते/पंछियों के संग-संग/चाहत हॆ मेरी/कि बस जाऊं वहां-वहां/जहां/सांस लेती हॆ जिन्दगी। अनेक कविताएं ऎसी हॆं जो उम्मीद ऒर आत्मविश्वास की अलख को जगाने का काम करती हॆं। यह काम इसलिए ऒर भी महत्त्व का हो जाता हॆ क्योंकि कवि यथार्थ के कटु पक्ष से अपरिचित नहीं हॆ। मोहभंग की स्थितियों से भी अनजान नहीं हॆ। तभी न यह समझ उभर कर आ सकी हॆ -लॊट भले ही आया हूं/मॆं/लेकिन/हारा अब भी नहीं। वस्तुत:, इस संदर्भ में संकलन की एक अच्छी कविता फिर सृजन को भी पढ़ा जाना चाहिए। यह कवि सपने के मूल्य को भी स्थापित करता हे क्योंकि सपने-/जब भी टूटते हॆं/"लोग"/ अक्सर दम तोड़ देते हॆं। ऒर यह भी-उम्मीदें हमेशा तो नहीं टूटतीं।यह कवि बार बार बच्चे अथवा बच्चे की मासूमियत की ओर लॊटता हॆ क्योंकि बच्चा ही हॆ जो अपने को तहस-नहस की ओर ले जाती मनुष्यता को बचा सकता हॆ। इस दृष्टि से जब एक दिन कविता पढ़ी जा सकती हॆ। सरहदें पांच की ये पंक्तियां ऒर भी गहरे से इसी भाव को बढ़ाते हुए अपनी-अपनी, तरह-तरह की सरहदों में कॆद हो चुके मनुष्य की संवेदना को झकझोर सकती हॆं--विश्वास हॆ मुझे/जब किसी रोज़/क्रीडा में मग्न/मेरे बच्चे/हुल्लड़ मचाते/गुजरेंगे करीब से/सरहद के/एकाएक/उस पार से उभरेगा/एक समूह स्वर/"ठहरो!"/ खेलेंगे हम भी/तुम्हारे साथ.../ एक पल को ठिठकेंगे/फिर सब बच्चे/हाथ थाम कर/एक दूसरे का/दूने उल्लास से/ निकल जाएंगे दूर/खेलेंगे संग-संग/ गांएंगे गीत/प्रेम के, बंधुत्व के/तब न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें/ तब रहेंगी/ सिर्फ..सिर्फ...सिर्फ.। संग्रह की एक विशिष्टता इसमें संकलित 'सरहदें' शीर्षक से 11 कविताएं भी हॆं। कहीं- कहीं कवि दार्शनिक होकर भीतरी सत्य को उकेरता भी नजर आता हॆ, जॆसे

'अंतर' कविता में। कोमल निजी एहसासों कि कुछ कविताएं, जॆसे एहसास, इंतज़ार आदि कविताएं भी पाठकों का ध्यान खींच सकती हॆं। पाठक पाएंगे कि अपनी भाषा पर कवि कोई अतिरिक्त मुलम्मा नहीं चढ़ाता। यूं कुछ खूबसूरत बिम्ब आदि पाठक को सहज ही सहभागी बनाने में समर्थ हॆं--लेकिन/खिड़की पर/बॆठे धूप के टुकड़े से/नहाया/सफ़ेद कबूतरों का जोड़ा।

    यहां मॆंने कुछ ही कविताओं के माध्यम से पाठकों को इस संकलन के पढ़े जाने की जरूरत को रेखांकित किया हॆ। मुझे विश्वास हॆ इस संग्रह की कविताएं अपने पाठकों को अपना उचित भागीदार बनाने में समर्थ सिद्ध होंगी।

दिविक रमेश


बी-295, सेक्टर -20,
नोएडा-201301



  • पुस्तक-सरहदें/ कविता संग्रह
  • कवि-सुबोध श्रीवास्तव
  • पृष्ठ-96
  • मूल्य-120 रुपये 
  • बाईंडिंग-पेपरबैक
  • प्रकाशक-अंजुमन  प्रकाशन, इलाहाबाद
  • ISBN12: 9789383969722
  • ISBN10: 9383969722
  • http://www.anjumanpublication.com