मंगलवार, 24 नवंबर 2015

दो कविताएं-सुधीर मौर्य ‘सुधीर’


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


तुम्हे लौटा लाएगा..


मैं जनता हूँ
तुम्हे लौटा लाएगा
एक दिन
मेरा प्रेम
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरे हाथ के
लिखे खत
तुम्हे लौटा लाएंगे
मेरी आँख से
झरते अश्रु

तुम्हे लौटा लाएंगी
हरसिंगार की कलियाँ
मेरे घर की
मेहंदी की महक

तुम्हे लौटा लायंगी
तुम्हारी गलियों में बहती हवा
मेरी अटारी से उड़ती पतंग
तुम्हे लौटा लाएंगे
तुम्हारी आँखों में
बसते मेरे ख्वाब
तुम लौट आओगी
इसलिए नहीं कि
मै करता हूँ तुम्हे प्रेम
इसलिए
कि मैं प्रियतम हूँ तुम्हारा।


पहेली 


मैने ख्वाबो में
ख्यालो में
लिखी हैं–अनगिनत नज़्में
होठों पे,
रुखसार और कांधो पे,
कमर और स्तनों पे
पिंडलियाँ और नितम्बों पे
चमकते हुए पाँव पे
मेरी लिखी हुई
नज़्म का
हर्फ़–हर्फ़ पढा है उसने
मेरे साथ

कभी मेरे ख्वाबो में आकर
कभी मुझे
ख्वाबो में बुलाकर

जानती हो
फिर मैं उसे
समझ नहीं पाता

नदी सी आँखों वाली
जो तुम्हारी सहेली है
मेरे लिए वो
तुमसे भी बड़ी पहेली है।


सुधीर मौर्य ‘सुधीर‘ 


  • जन्म-01/11/1979, कानपुर 
  • शिक्षा-अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा.
  • सम्प्रति–इंजिनियर, और स्वतंत्र लेखन.
  • कृतियाँ :‘आह’ (ग़ज़ल संग्रह),‘लम्स’ (ग़ज़ल और नज़्म संग्रह), ‘हो न हो (नज़्मसंग्रह), ‘अधूरे पंख'(कहानी संग्रह) ‘एक गली कानपुर की’ (उपन्यास), किस्से संकट प्रसाद के (व्यंग्यउपन्यास),  अमलताश के फूल (उपन्यास), बुद्ध से संवाद (काव्यखंड)- प्रकाशाधीन, देवलदेवी: एक संघर्ष गाथा (ऐतहासिक उपन्यास ), क़र्ज़ और अन्य कहानिया (कहानी संग्रह)
  • पत्र-पत्रिकायों में प्रकाशन- खुबसूरत अंदाज़, अभिनव प्रयास, सोच-विचार, युग्वंशिका,कादम्बनी, बुद्ध्भूमि, अविराम,लोकसत्य, गांडीव, उत्कर्ष मेल,  जनहितइंडिया, शिवम्, सत्यम ब्यूरेट, अखिलविश्व पत्रिका, रुबरु दुनिया आदि में.
  • वेब प्रकाशन–गद्यकोश, स्वर्गविभा, काव्यांचल, इंस्टेंट खबर, बोलोजी, भड़ास, हिमधारा, जनहित इंडिया, परफेक्ट खबर, वटवृक्ष, देशबंधु, अखिलविश्व पत्रिका, प्रवक्ता, नाव्या, प्रवासी दुनिआ, रचनाकार, अपनी माटी, जनज्वार, आधी आबादी, अविराम
  • संपर्क-ग्राम और पोस्ट-गंज जलालाबाद, उन्नाव,पिन-209869, उत्तरप्रदेश                            
  • ईमेल-Sudheermaurya2010@gmail.com
  • ब्लॉग -http://sudheer-maurya.blogspot.com

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

डॉ. अंजना बख्शी की चार कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कविता


कविता मुझे लिखती है
या, मैं कविता को
समझ नहीं पाती
जब भी उमड़ती है
भीतर की सुगबुगाहट
कविता गढ़ती है शब्द
और शब्द गढ़ते हैं कविता
जैसे चोपाल से संसद तक
गढ़ी जाती हैं जुल्म की
अनगिनत कहानियां,
वैसे ही,
मुट्ठीभर शब्दों से
गढ़ दी जाती है
कागज़ों पर अनगिनत
कविताएं और कविताओं में
अनगिनत नक्श, नुकीले,
चपटे और घुमावदार
जो नहीं होते सीधे
सपाट व सहज वर्णमाला
की तरह!!


यादें


यादें बेहद खतरनाक होती हैं
अमीना अक्सर कहा करती थी
आप नहीं जानती आपा
उन लम्हों को, जो अब अम्मी
के लिए यादें हैं..
ईशा की नमाज़ के वक्त
अक्सर अम्मी रोया करतीं
और मांगतीं ढेरों दुआएं
बिछड़ गए थे जो सरहद पर,
सैंतालीस के वक्त उनके कलेजे के
टुकड़े.
उन लम्हों को आज भी
वे जीतीं दो हजार दस में,
वैसे ही जैसे था मंजर
उस वक्त का ख़ौफनाक
भयानक, जैसा कि अब
हो चला है अम्मी का
झुर्रीदार चेहरा, एकदम
भरा सरहद की रेखाओं
जैसी आड़ी-टेढ़ी कई रेखाओं
से, बोसिल, निस्तेज और
ओजहीन !


गुमनाम गलियों में


सुबह होते-होते
गिर जाता है ग्राफ
ज़िस्म की नुमाइश का
चढ़ने लगता है पारा
सूरज के ढल्ते ही
बाज़ार का,
रामकली की आवाज़
की खुमारी के साथ
शाम की ख़ामोशी में
कतारें हो जाती हैं
लम्बी और---लम्बी
जो बना लेती हैं
एक घेरा अपने
इर्द-गिर्द ज़िस्म की
टकराहटों के लिए
जिसमें महज़ आवाज़ें
नहीं होतीं,
एक ख़ामोश चीख
होती है, भीतर की
तहों में खनकती,
सुराख की गहराई में
सिमटती और खो जाती
इन गुमनाम गलियों में
जहां जिस्म बिकता है,
आवाज़ बिकती है,
और बिका करती है
सोलह साल की कई
रामकली और कलावतियां
आलू-बैगन की तरह होता है
मोलभाव
गिद्ध और भेड़ियों
के चबाने-खाने
और डकार लेने
के लिए!!


प्यार ऎसा होता है?


कितनी बार चाहा ऎनी
तुझे बताना..आज-कल
तुम मेरे सपनों में रोज
ही चली आती हो
अपने ’अक्षरों के साये’
के साथ,
कभी धुंए के छल्ले उड़ाती
तो कभी ’नागमणी’ के पन्ने
पलटती..
वो देखो तुम्हारा अक्स
इन दीवारों पर सजीव हो
उठा है लाल-पीला
और दूधिया रंगो से
आड़ी-तरछी रेखाएं
तुम हवा में बनाने
लगी हो
अमृता,
कभी-कभी सोचती हूं
तुम्हें और ’रसीदी टिकट’ को
क्यों नहीं समझा गया इतना
जितना कि एक सागर की
गहराई को समझा जाना चाहिए!
तुम्हारे भीतर के सागर से
कई सीप निकाले हैं
मैंने और कुछ फूल तुम्हारी
बगियां से चुन लाई हूं मैं.!!
इमरोज़ से मिलकर लगा
उस रोज,
तुम यहीं हो, उसी में ज़िन्दा
तुम्हारी सांसे, उसकी सांसों,
में महक रही हैं
नहीं जानती थी,
प्यार ऎसा होता है.

डॉ. अंजना बख्शी 


ईमेल-anjanajnu5@gmail.com

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

ज्योति पर्व: मंजुल भटनागर की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


दीप जले


मन मेरा
भोलेपन से
दिवाली का दीप जलाता
त्योंहारो की डोर बाँध कर
मन ही मन यू
क्यू इठलाता
मोहित क्यों है?
दीप ज्योत से
पतंगा प्रकाश से
खुद को ही
क्यों मिटाता?
पर मेरे मन प्रागंन में
एक दीप जला जाता !

दीप जला कर
भूला मन मेरा
राग, द्वेष,विषाद
वो सब तेरा
प्रेम मन में
सदा रहें
दीपावली का रूप धरे
कष्ट पोटली सुदामा सी
देव भापते बिन कहे
लक्ष्मी बरसे,
हर कृषक पर
हर बेबस लाचारो पर
मेहमान के द्वारो पर
होएँ आनंदित बाल गोपाल
हर चौखट पर दीप जले

सत्कार करूँ में
उस लक्ष्मी को ,
जो बेटी का रूप धरे
सरस्वती ज्ञान फैलाती
ऐसी लक्ष्मी रोज वरे
अन्धकार सब मिट जाये
दीप दिलो में रोज जले

स्नेह दीप जले तो
बुझे न कोई आस
हर घर मे दीपोत्सव हो
यह सोच बनाये रखना
हर चौखट हर आँगन में
बस एक दीप जलाये रखना



अनुष्ठान


आसमां से तम नहा कर
एक मोहता छंद आया
दीप सी आस लेकर
जागता एक स्वपन आया
स्वर्ग की सीढ़ी उतर कर
दीपमालिका का अनुष्ठान आया

खिल गए सब सूरजमुखी हैं

खिल गया आसमान
खिल  गए घर चौबारे
खिल गयी चहुँ नव दिशाएँ
खिल गए उद्यान
जग गयी डूबती सी आशा
दीप पंक्ति  है क्षणिक सी
दो दिवस मेहमान

जाग गयी पग डंडियाँ हैं

जाग गए काजल दिठौने
जाग गए हैं सब संगी साथी
भर गए बाज़ार सारे
आ गयी दीपों की पंक्ति
उगा जैसे रात्रि में दिनमान


हो नया सवेरा..


घुप अन्धेरा क्षितिज पर लेटा
द्वार भोर का नहीं दीखता
सघन कालिमा पसरी जाए
पग डंडी भी नज़र ना आये
राहो को दमकाता दीपक,
राहें नयी दिखाता दीपक

लालच पसरा आतंक फैला

अनाचार ने तांडव खेला,
मनुष्यता है धूमिल हाय
राह कोई भी नज़र ना आये
सही राह दिखाता दीपक,
घर अपने पहुंचता दीपक

रिश्ते जो भी रूठ गए हैं

साथी जो  थे छूट गए हैं
मन के कोने लीप लाप कर
बरसो की धूल हटाता दीपक,
हर चौखट और देहेरी पर
फिर से दीप जलाता दीपक

एक हो मेरा एक तुम्हारा,

दीप पंक्ति से मिटे घनेरा
चाँद गगन का दीप सही
दीप धरा की मृतिका ने उकेरा
दीपावली का दीप जले तो
अज्ञान तिरोहित, हो नया सवेरा


विश्वास


जले दीप ज्योति
मन देहरी पर
बाले रखूँ
मन में ,तेरा उजास लिए

तिमिर घटे

चहुं ओर
ऐसा विश्वास
बनायें रखूँ
मन में तेरा प्रकाश लिए

आँधियों से भी

बुझे नही
दीप अनवरत जले
जगता रहे
झंझावात में
टपकती बरसात में
छप्पर छवाए रखूं
एक तेरा संबल लिए

टिमटिमाते तारें

हुए तिरोहित
अमावस की इस गहन रात्रि में
धन लक्ष्मी का दीप जले,
मन में प्रभु विश्वास लिए ..

क्षणिकाएं


(एक)

अमावसी रात में
दीप तुम हो दिव्यार्थ
दीप है घर पाहुना
देता नूतन प्रकाश
सुन्दर किसलय संग
अंबुज पर
माँ लक्ष्मी का वास
दीप जले अनवरत
हर ओर हो
माँ लक्ष्मी का वास .

(दो)

दीप पुरुष है
दीप है प्रकृति
मिटटी पानी की देह रची
ज्योति दीप की
प्राण गति
दीप मनु है
बात्ती इरावती
दीप वेदों की है अनुकृति।

(तीन)

दीप पर्व है
दीप है गति
दीप स्वर्ग की है स्वीकृति
अन्धकार में
बन कर्मरत
दीप जलाये रखना
हर चोखट चोराहों पर
उजड गए जो
उन दरियारों पर
एक दीप जलाये रखना
एक आस जगाए रखना

(चार)

आँधियों से भी
बुझे नही

दीप अनवरत
जलता रहे
भीषण झंझावात में
पथ दिखाता  रहे
टपकती बरसात में भी
बुझे  नहीं कोई आस
द्वार ,छप्पर बंधे रहे
दीप तेरा आलोक फैले
मन में तन में
दीप्त हों दिशाएं अज्ञान छ्टे।


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

ज्योति पर्व: उम्मीद की लौ-सुशीला शिवराण


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


रखना एक दिया..


इस दिवाली पर
रखना एक दिया
अंधे मन के आले में
कि हो कुछ उजाला
देख सकें 
मसली-रौंदी कलियों की लाशें
वहशत के अँधेरों के पार
हवस की अंधी आँखें
रखना एक और दिया
अकाल से बाँझ हुए
बंजर खेतों में

कि किसानों के साथ
गिरवी हर ईंट
अधमरी बहू-बेटियाँ
देख सकें कुछ उम्मीद
क़र्ज़ के नीम अंधेरों के पार
कि थम जाए
हताश ज़िंदगियों की
आत्महत्या का सिलसिला
एक दिया
जात-पाँत की उन्मादी
अँधी गलियों में भी रखना
जो सुरसा बन 
निगल जाती हैं
कभी कुलबर्गी
कभी अख़लाक़
कभी गोधरा
कभी भागलपुर को
रखना दीयों की कतार
जगमग राजपथ पर
कि अँधी सियासत
देख सके दीयों में
देश की माटी
कुम्हार का पसीना
मुनिया के सपने
मुल्क़ की तक़दीर
शायद !

देखो ! तुम हारना नहीं
घुप्प अँधेरों में
उम्मीद की लौ
जलाए ही रखना 
रखोगे ना !


फैले जग उजियार..


देहरी दीपक जल रहा, मन में तम का द्वार।
मन-अँधियारा दूर कर, फैले जग उजियार।।

शम्मा से कहने लगी, रौशन हर कंदील।
आ अब ग़म को कर चलें, ख़ुशियों में तब्दील॥

दीया-बाती-रोशनी, दुनिया करती बात। 
तिल-तिल जलता तेल है, सारी-सारी रात॥

दीपक-सी पावन सजन, तेरी-मेरी प्रीत।
देख हवा भी तेज़ है, तेल न जाए रीत॥


सुशीला शिवराण


बदरीनाथ–813,
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,
गुड़गाँव–122011
दूरभाष–09873172784
ईमेल-sushilashivran@gmail.com

पुस्तक समीक्षा: अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख-ऋषभदेव शर्मा




मनुष्यों द्वारा विचारों और मनोभावों की अभिव्यक्ति के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के शास्त्र को भाषाविज्ञान कहा जाता है. सामान्य भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा के उद्भव और विकास पर विचार किया जाता है. सैद्धांतिक भाषाविज्ञान भाषा अध्ययन और विश्लेषण के लिए सिद्धांत प्रदान करता है. वह मूलतः इस प्रश्न पर विचार करता है कि भाषा क्या है और किन तत्वों से बनी हुई है. इसके चार क्षेत्र हैं – ध्वनि विज्ञान, रूप विज्ञान, वाक्य विज्ञान और अर्थ विज्ञान. आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी से आगे बढ़कर विभिन्न क्षेत्रों में अनुप्रयुक्त हो रहा है और भाषा-उपभोक्ता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान विकसित हुआ है. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अंतर्गत भाषा शिक्षण, शैलीविज्ञान, कोशविज्ञान, भाषा नियोजन, वाक् चिकित्सा विज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान, अनुवादविज्ञान आदि अनुप्रयोग के क्षेत्र शामिल हैं. हिंदी में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संक्रियात्मक भूमिका पर केंद्रित गंभीर पुस्तकों का लगभग अभाव-सा है. डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (1975) की पुस्तक ‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ (2015) इस अभाव की पूर्ति का सार्थक प्रयास प्रतीत होती है.

‘अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख’ में कुल 29 अध्याय हैं जो इन 7 खंडों में विधिवत संजोए गए हैं – अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान, भाषा शिक्षण, अनुवाद विमर्श, साहित्य पाठ विमर्श (शैलिवैज्ञानिक विश्लेषण), प्रयोजनमूलक भाषा, समाजभाषिकी और भाषा विमर्श में अनुप्रयोग. अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के अग्रणी विद्वान प्रो. दिलीप सिंह का निम्नलिखित कथन इस पुस्तक की प्रामाणिकता का सबसे अधिक विश्वसनीय प्रमाणपत्र है –पुस्तक का प्रत्येक खंड एवं संबद्ध आलेख बड़ी ही तन्मयता के साथ लिखे गए हैं. इस तन्मयता का ही परिणाम है कि हिंदी भाषा के साहित्यिक और साहित्येतर पाठों के विश्लेषण में यह सफल हो सकी है और इस तथ्य को उजागर कर सकी है कि कोई भी भाषा (इस अध्ययन में हिंदी भाषा) अलग-अलग सामाजिक परिस्थितियों और प्रयोजनों में अलग-अलग ढंग से बरती ही नहीं जाती, बल्कि भिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होते समय अपनी अकूत अभिव्यंजनात्मक क्षमता को भी अलग-अलग संरचनाओं में ढाल कर अलग-अलग तरीकों से सिद्ध करती है.

लेखिका ने पहले खंड में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के स्वरूप और क्षेत्र पर सैद्धांतिक चर्चा की है. इसके बाद दूसरे खंड में मातृभाषा, द्वितीय भाषा और अन्य भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण के लिए भाषाविज्ञान के सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर चर्चा की है. तीसरे खंड में अनुवाद सिद्धांत, अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन पर सोदाहरण प्रकाश डाला गया है. पुस्तक का चौथा खंड साहित्यिक पाठ विमर्श के लिए शैलीविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को सामने लाता है. यहाँ एक निबंधकार (प्रताप नारायण मिश्र), एक उपन्यासकार (प्रेमचंद) और दो कवियों (शमशेर तथा अज्ञेय) के साहित्यिक पाठ निर्माण, बनावट और बुनावट का विश्लेषण किया गया है. यह खंड पाठ विश्लेषण के क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए विशेष उपयोगी है. पाँचवे खंड में अखबारों से लेकर टीवी तक विविध संचार माध्यमों द्वारा समाचार से लेकर प्रचार तक के लिए व्यवहार में लाई जाने वाली हिंदी भाषा के लोच भरे गंभीर और आकर्षक रूप की सोदाहरण मीमांसा की गई है. इसके पश्चात छठा खंड समाजभाषाविज्ञान पर केंद्रित है. जहाँ एक ओर तो सर्वनाम, नाते-रिश्ते की शब्दावली, शिष्टाचार, अभिवादन और संबोधन शब्दावली पर हिंदी भाषासमाज के संदर्भ में तथ्यपूर्ण विमर्श शामिल है तथा दूसरी ओर दलित आत्मकथाओं और स्त्री विमर्शीय लेखन की भी गहन पड़ताल की गई है. यह खंड साहित्य पाठ विमर्श वाले खंड के साथ मिलकर पाठ विश्लेषण के विविध प्रारूप सामने रखता है. पुस्तक का अंतिम खंड है – ‘भाषाविमर्श में अनुप्रयोग’. यहाँ विदुषी लेखिका ने महात्मा गांधी, प्रेमचंद, अज्ञेय, रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, विद्यानिवास मिश्र और दिलीप सिंह जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों के भाषाविमर्श पर सूक्ष्म विचार-विमर्श किया है. इतना ही नहीं यह खंड इन भाषाचिंतकों के भाषाविमर्श की केंद्रीय प्रवृत्तियों को भी रेखांकित करता है. लेखिका ने प्रमाणित किया है कि महात्मा गांधी के भाषाविमर्श के केंद्र में संपर्कभाषा या राष्ट्रभाषा का विचार है, प्रेमचंद के भाषाविमर्श में सर्वाधिक बल हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी जैसी साहित्यिक शैलियों के रचनात्मक समन्वय पर है तो अज्ञेय का भाषाविमर्श उनकी साहित्यिक शैली के प्रति जागरूकता के इर्दगिर्द निर्मित होता है. प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव को डॉ. जी. नीरजा ने अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के सजग प्रहरी सिद्ध किया है तो विद्यानिवास मिश्र को आधुनिक भाषाशास्त्रीय चिंतन की पीठिका का भारतीय संदर्भ खड़ा करने का श्रेय दिया है. उनके अनुसार दिलीप सिंह का भाषाविमर्श अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की संपूर्ण पड़ताल के लिए कटिबद्ध और प्रतिबद्ध है. उल्लेखनीय है कि यह पुस्तक प्रो. दिलीप सिंह को ही समर्पित भी है.

अंत में, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के अनुवाद अध्ययन विभाग के आचार्य डॉ. देवराज के शब्दों में यह कहना समीचीन होगा कि डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने एक ऐसे विषय पर भरपूर सामग्री तैयार की है जो अन्य लोगों के लिए रचनात्मक स्तर पर चुनौती बना हुआ है. उनकी अध्ययनशीलता और संकल्पशीलता के लिए मेरी शुभकामनाएँ!

  • पुस्तक-अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की व्यावहारिक परख
  • लेखिका-गुर्रमकोंडा नीरजा
  • पृष्ठ-304
  • मूल्य–रु. 495/-
  • प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली

प्रो. ऋषभदेव शर्मा


(पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा)
208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स
गणेश नगर, रामंतापुर
हैदराबाद–500013
मोबाइल– 08121435033
ईमेल – rishabhadeosharma@yahoo.com

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की चार बाल कविताएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

   

    रैन बसेरा

 
    नाम रखा है रैन बसेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।

   नीचे धरती ऊपर छप्पर,
   घर दिखता है कितना सुन्दर।

   बैठक खाना रम्य मनोहर,
   खिड़की पर परदों की झालर।

   सोफा सेट गद्दियों वाला,
   बिछी हुई सुन्दर मृग छाला।

   कोने में सुन्दर गुलदस्ते,
   दरवाजों पर परदे हँसते।

   है घर में खुशियों का डेरा,
   दो मंजिल का घर है मेरा।

   शयन कक्ष भी तीन बने हैं,
   परदे बहुत महीन लगे हैं।

   बड़े पलंगों पर गादी है,
   चादर बिछी स्वस्छ सादी है।

     शिवजी की होती हर हर है,
    यह दादी का पूजा घर है।

    जहाँ रामजी लड्डू खाते,
    कृष्ण कन्हैया धूम मचाते।

    सबको सबसे प्रेम घनेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।

    इस कमरे में दादी दादा,
    उच्च विचार काम सब सादा।

    सभी दुआएं लेने आते,
    दादी दादा झड़ी लगाते।।

    बच्चे धूम मचाते दिन भर,
    भरा लबालब खुशियों से घर।

    दादाजी के लगें ठहाके,
    लोट पोट हैं हंसा हंसा के।

    कण कण में आनंद बिखेरा,
    दो मंजिल का घर है मेरा।
           

पलकों की चादर


थपकी देकर हाथ थक गए,
लजा लाज कर लोरी हारी।

तुम अब तक न सोये लल्ला,
थककर सो गई नींद बिचारी।


वृंदावन के कृष्ण कन्हैया ,
देखो कब के सो गए भैया।
पर तुम अब तक जाग रहे हो,
किये जा रहे ता ता थैया।

कौशल्या ने अवधपुरी में,
राम लखन को सुला दिया है।
गणपति को माँ पार्वती ने,
निद्रा का सुख दिला दिया है।

हनुमान को अंजनी माँ ने ,
शुभ्र शयन पर अभी लिटाया।
तुरत फुरत सोये बजरंगी,
माँ को बिलकुल नहीं सताया।

सुबह तुझे में लड्डू दूंगी,
बेसन की बर्फी खिलवाऊं।
पर झटपट तू सोजा बेटा,
तू सोये तो मैं सो पाऊं।

अगर नहीं तू अब भी सोया,
तो मैं गुस्सा हो जाउंगी।
और इसी गुस्से में अगले ,
दो दिन खाना न खाऊँगी।

इतना सुनकर लल्ला भैया,
मंद मंद मन में मुस्काये।
धीरे से अपनी आँखों पर,
पलकों की चादर ले आये।


                         

       लाइलाज बीमारी


         बन्दर मामा शिक्षक बनकर,
         शाळा गए पढ़ाने।

         भूल पढ़ाना बच्चों से वे,
         गप्पें लगे लड़ाने।

        तभी अचानक हेडमास्टर ,
        भालूजी आ धमके।
        बन्दर की ऐसी हरकत पर,
        गरज गरज कर चमके।

        बंदर  ने इक डिब्बा खोला,
        शहद वहां बिखराई।
        भूल डांटना, व्यस्त हो गए,
        उसमें भालू भाई।
      
        यही व्यवस्था शालाओं की,
        तब से  अब  तक जारी।
        शहद गिराना, शहद चाटना,
        लाइलाज बीमारी।


  हथनी दीदी


  हथनी दीदी बैठ रेल में,
  निकल पड़ीं भोपाल को।
  धुम चुक धुम चुक बजा रहीं थीं,
  अपने सुन्दर गाल को।

   तभी अचानक टिकिट निरीक्षक,
   बोला टिकिट कहाँ ताई।
   हथनी बोली टिकिट मांगकर,
   तुमको शरम नहीं आई।

   टिकिट केंद्र है इतना छोटा,
   सूंड नहीं घुस पाई थी।
   अरे! निरीक्षक जी इस कारण,
   टिकिट नहीं ले पाई थी।

   पहले  तो तुम ,जाकर खिड़की,
   खूब बड़ी करवाओ।
   उसके बाद निरीक्षक भैया,
   टिकिट मांगने आओ।


प्रभुदयाल श्रीवास्तव



  • जन्म : 4 अगस्त, 1944 धरमपुरा दमोह {म.प्र.)।
  • शिक्षा : वैद्युत यांत्रिकी में पत्रोपाधि।
  • संप्रति : सेवानिवृत कार्यपालन यंत्री म.प्र. विद्युत मंडल छिंदवाड़ा से।
  • लेखन : विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानियाँ, कवितायें व्यंग्य, लघु कथाएँ लेख, बुंदेली लोकगीत, बुंदेली लघु कथाएँ, बुंदेली गज़लों का लेखन।
  • प्रकाशन : लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग-बेरंग में प्रकाशन, दैनिक भास्कर, नवभारत, अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस, पंजाब केसरी एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्यों का प्रकाशन, कविताएँ बालगीतों क्षणिकाओं का भी प्रकाशन हुआ। पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली, शुभ तारिका अंबाला, न्यामती फरीदाबाद‌, कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन, मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित। 
  • कृतियाँ : दूसरी लाइन (व्यंग संग्रह), बचपन छलके छल छल छल (बाल गीत), बचपन गीत सुनाता चल (बाल गीत)।
  • प्रसारण : आकाशवाणी छिंदवाड़ा से बालगीतों, बुंदेली लघुकथाओं एवं जीवन वृत पर परिचर्चा का प्रसारण।
  • सम्मान : राष्ट्रीय राज भाषा पीठ इलाहाबाद द्वारा "भारती रत्न" एवं "भारती भूषण सम्मान"; श्रीमती सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान, वैदिक क्रांति देहरादून एवं हम सब साथ साथ पत्रिका दिल्ली द्वारा "लाइफ एचीवमेंट एवार्ड"; भारतीय राष्ट्र भाषा सम्मेलन झाँसी द्वारा "हिंदी सेवी सम्मान"; शिव संकल्प साहित्य परिषद नर्मदापुरम, होशंगाबाद द्वारा "व्यंग्य वैभव सम्मान"; युग साहित्य मानस गुन्तकुल आंध्रप्रदेश द्वारा काव्य सम्मान।
  • संस्था संबद्धता : अध्य‌क्ष‌ बुंदेल‌खंड‌ साहित्य‌ प‌रिष‌द‌, भोपाल‌, छिंद‌वाड़ा जिला इकाई के अध्य‌क्ष‌।
  • विशेष : बुंदेली लोक गीत, गज़लें, बुंदेली साहित्य पर लेख। वर्ष 2009 में साहित्य अकादमी दिल्ली में आयोजित बुंदेलखंड साहित्य परिषद भोपाल के कार्यक्रम में रवींद्र भवन दिल्ली में बुंदेली की दक्षिणी सीमाएँ विषय पर आलेख का पाठन। 
  • ईमेल : pdayal_shrivastava@yahoo.com