मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय की दो कविताएं


अवधेश मिश्र की कलाकृति



कोशिश


मेरी कोशिश है-
शब्द अब नए अर्थों से सँवर जायें
लोग विध्वंस, चीख, धोखा और विवशता के अर्थ भूलकर
निर्माण, हँसी, विश्वास और सहजता की चर्चा करें।

मेरी कोशिश है-
लोगों के मुख से आशीषों के शब्द निकलें 
कबीर का जीवन जीकर लोग मीरा सा प्रेम करें।

मेरी कोशिश हैं-
बची रहे झरनों की शीतलता और नदियों की लहरें
शिशुओं की किलकन और गायों के मधुबन।

मेरी कोशिश है-
लोगों में ईसा जैसा सेवा का भाव हो
बदले में चाहे सलीबों की राह हो
हर एक कदम पर मानवता की जीत हो
होंठों पर सबके जीवन के गीत हों।


अभिलाषाएँ


चाहूँगा मैं फूलों से बन पराग बिछ जाना 
कलियों से थिरकन को लेकर पत्तों सा हिल जाना। 

उड़ता जाऊँ नील गगन में मन की यह अभिलाषा
माटी से जुड़कर बुझ पाए मन की गहन पिपासा। 

पतझड़ और तपन आकर भी गीत ऐसा गा जाए
स्वर कोयल का राग भ्रमर का जीवन गीत सुनाए। 

काँटे समझ भले ही अपने अन्त समय तज जायें
फिर भी सबके रक्षा की अभिलाषाएँ मिट ना पायें। 


डॉ. हृदय नारायण उपाध्याय



  • जन्म-1 जुलाई 1962 को चन्दौली जिले के एक गाँव फुलवरिया में।
  • शिक्षा-काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने के बाद 'हिंदी की प्रगतिशील आलोचना में द्वंद्व' विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया।
  • रचना कर्म-कविता, समीक्षा, निबंध, एकांकी लेखन।
  • प्रकाशन-‘व्याकरण कौमुदी‘ कक्षा एक से लेकर आठ तक की कक्षा के लिए व्याकरण की पुस्तक। प्राईमरी शिक्षक, शिराजा, कहानीकार, साहित्य दर्पण, साहित्य मंजरी, संगम, व्यंजना प्रज्ञा, विविध भारत, सृजन और अभिव्यक्ति आदि पत्रिकाओं में निबंध समीक्षा एवं कविताएँ प्रकाशित। इसके अतिरिक्त नवभारत, दैनिक भास्कर, स्वतंत्र मत, जे वी जी  टाइम्स आदि समाचार पत्रों में आलेख समीक्षाएं एवं कविताएँ प्रकाशित।
  • प्रसारण-आकाशवाणी अम्बिकापुर, रीवा एवं जबलपुर से कविताओं और चिंतन का प्रसारण।
  • सम्प्रति-स्नातकोत्तर शिक्षक (हिन्दी), केन्द्रीय विद्यालय, भुसवाल, ज़िला जलगाँव, महाराष्ट्र।
  • सम्पर्क-upadhyayhn@yahoo.com

मंगलवार, 20 अक्तूबर 2015

मैं ब्रह्मा हूँ एवं अन्य कविताएं-दिव्या माथुर


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मैं ब्रह्मा हूँ


मैं ब्रह्मा हूँ
ये सारा ब्रह्मांड
मेरी ही कोख से जन्मा है
पाला है इसे मैंने
ढेर सा प्यार-दुलार देकर
और ये मेरे ही जाए
मेरी ही गोद का
बँटवारा करने पर तुले हैं
चिंदी चिंदी कर डाला है
मेरा आँचल
युद्ध चल रहा है 
मेरी ही गोद में
ग़रीबों को कुचल रहें हैं अमीर
कमज़ोरों को धमका रहे हैं बलशाली
मैं किसके संग रहूँ
या किसको सही कहूँ
जिसको भी समझाना चाहूँ
वह ही विरुद्ध हो जाता है
’बहकावे में आ जाती हूँ’
मुझपर इल्ज़ाम लगाता है
एक दिन मुझसे जगह पलटें
ता जानेंगे दुविधा माँ की
क्या सह पायेंगे पल भर भी
सतत वे पीड़ा ब्रह्मा की?


तेरे जाने के बाद..


जब तुम घर आते थे शाम को
दिल की धड़कन थम जाती थी
झट दौड़ के मुन्नी कमरे के
किसी कोने में छिप जाती थी
टूटे फूटे अब दरवाज़े
चौखट तो है खिड़कियाँ नहीं
टेढ़े मेढ़े बर्तन हैं बचे
मार नहीं झिड़कियाँ नहीं
आँखों के आगे धरती भी
न जाने कब से घूमी नहीं
न ही दिन को तारे दिखते हैं
अब नींद में डरके उठती नहीं
नन्हीं सी एक आहट पर 
अब दिल जाता है सिमट नहीं
लोगों से नज़र मिलाने में
अब होती कोई झिझक नहीं
अक्कड़ बक्कड़ से खेल हैं अब
न सही जो टूटे खिलौने नहीं
चेहरों पे हमारे शरारत है
उँगलियों के तेरी, निशान नहीं
सामान बिक गया सारा पर
घर भरा-भरा सा लगता है
भर पेट न चाहे खाया हो
मन हरा भरा सा रहता है।


बसंत


स्वर्णिम धूप, हरा मैदान
      पीली सरसों हुई जवान
              चुस्त हुआ, रंगों में नहा
                   लो देखो वयस्क हुआ उद्यान
झील में हैं कुछ श्वेत कमल
        या बादल नभ पर रहे टहल
                     मृदु गान से कोयल के मोहित
                                हैं नाच रहे मोरों के दल
यूँ पवन की छेड़ाछेड़ी से
            उद्विग्न हैं कालियाँ
                      फूलों का पा संरक्षण 
                                निश्चिंत हैं कालियाँ
फूलों से चहुं ओर घिरे
          भौंरे जैसे मद पान किए
                ख़याल तेरा भी भंग पिए
                              आया बसंत को संग लिए


मलबा


लगता है ये रौरव नर्क मुझे
हो रहा है तांडव अग्नि का
यह किसका हाथ
वह किसका पाँव
यह धूलधूसरित सिर
किसका
क्या इस कपाल के पिता हो तुम
बोलो इस धड़ की माँ है कौन
क्यूँ गले लगाते अपने नहीं
क्या सूँघ साँप कर गया मौन
इक जली हुई अँगुली में अँगूठी
किसी को तन्हा छोड़ गई है
किसी के जीवन की धारा का
सदा को रुख़ यह मोड़ गई है
इक युवती का डिज़ाइनर पर्स
निज होगा कभी, अब बिखरा पड़ा है
पाउडर, रूज और लिपस्टिक को
काजल ने अब हथिया लिया है
ख़ासा महँगा किसी का जूता
धुएँ में लिपटा उल्टा पड़ा है
बहुत ही जल्दी में वो होगा
नंगे पाँव जो चला गया है।


कसक


इधर भागी, उधर भागी
उछली कूदी, लपकी, लाँघी
काँपी, तड़पी, उलटी, पलटी
कटी पूँछ मरी औंधी
बेबस और बेकल छिपकली
कर्मों को अपने रोती रही

ज़ख़्म भर गया जल्दी ही
न और उसे कुछ याद रहा
न तो दर्द
न ही कोई सदमा
खालीपन था 
कुछ लमहों का
मन को जब समझा उसने लिया
तो निकल आई इक पूँछ नई
छोटी, मोटी बेहद भद्दी

कर्मों का रोना छोड़
हड़पती है वह अब नित
कीड़े मकौड़े ढेर कि
जाए उसकी कसक मिट


दिव्या माथुर


दिव्या माथुर का जन्म दिल्ली में हुआ और वहाँ से एम.ए. (अँग्रेज़ी) करने के पश्चात दिल्ली व ग्लास्गो से पत्रकारिता का डिप्लोमा किया। चिकित्सा-आशुलिपि का स्वतंत्र अध्ययन भी किया। 1985 में आप भारतीय उच्चायोग से जुड़ीं और 1992 से नेहरु केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी के पद पर कार्यरत हैं। उनका लंदन के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अपूर्व योगदान रहा है। रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्‌स की फ़ेलो हैं। नेत्रहीनता से सम्बन्धित कई संस्थाओं में इनका अभूतपूर्व योगदान रहा है। इसी विषय पर इनकी कहानियाँ और कविताएँ ब्रेल लिपि में प्रकाशित हो चुकीं हैं। आशा फ़ाउँडेशन और ‘पेन’ संस्थाओं की संस्थापक-सदस्य, चार्नवुड, आर्ट्‌स की सलाहकार, यू. के. हिंदी समिति की उपाध्यक्ष, भारत सरकार के आधीन, लंदन के उच्चायोग की हिंदी कार्यकारिणी समिति की सदस्या, कथा यू. के. की पूर्व अध्यक्ष और अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन की सांस्कृतिक अध्यक्ष, दिव्या जी कई पत्र, पत्रिकाओं के सम्पादक मंडल में शामिल हैं। अंत:सलिला, रेत का लिखा, ख्याल तेरा और 11 सितम्बर: सपनों की राख तले (कविता संग्रह)। आक्रोश (कहानी संग्रह-प्रो. स्टुअर्ट मैक्ग्रेगर द्वारा विमोचित एवं पद्मानंद साहित्य सम्मान द्वारा सम्मानित), ओडेस्सी: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ सेटलड एबरॉड (अंग्रेज़ी में संपादन, डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी द्वारा विमोचित) एवं आशा: स्टोरीज़ बाई इंडियन वुमैन राईटरज़ (अँग्रेज़ी में संपादन, साराह माईल्स द्वारा विमोचित) शीघ्र प्रकाश्य : ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘जीवन हा! मृत्यु‘। उनकी कहानियाँ और कविताएँ भिन्न भाषाओं के संकलनों में शामिल की गई हैं। आक्रोश, ओडेस्सी (सईद जाफरी द्वारा विमोचित) एवं आशा- तीनों संग्रहों के पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं। जहाँ पॉल रौबसन द्वारा प्रस्तुत दिव्या माथुर के नाटक 'टेट-ए-टेट' की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई, वहीं उनकी दो अन्य कहानियों - ‘एक शाम भर बातें’ एवं ‘अपूर्व दिशा’ का भी सफल मंचन हो चुका है। रेडियो एवं दूरदर्शन पर इनके कार्यक्रम के नियमित प्रसारण के अतिरिक्त, इनकी कविताओं को कला संगम संस्था ने भारतीय नृत्य शैलियों के माध्यम से सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया।
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं निमंत्रित, दिव्या जी को Arts Achiever-2003 Award (Arts Council of England), Indivi™als of Inspiration and Dedication ह्मonour (Chinmoy Mission) एवं संस्कृति सेवा सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है।
लंदन में कहानियों के मंचन की शुरुआत का सेहरा भी आपके सिर जाता है। रीना भारद्वाज, कविता सेठ और सतनाम सिंह सरीखे विशिष्ठ संगीतज्ञों ने इनके गीत और ग़ज़लों को न केवल संगीतबद्ध किया, अपना स्वर भी दिया है।
सम्पर्क : DivyaMathur@aol.com

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

प्रो. राजकिशोर प्रसाद की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


अन्वेषण


प्रकृति ने सब कुछ रखा है,
जीवन सुखद बनाने को
मगर सुलभता नहीं हैं,
सब सुखद चीजें अपनाने में।

दृश्य नहीं है, श्रव्य नहीं हैं,
छिपा है गहन आवरण में,
है जरुरत अन्वेषण और
श्रमजल की, गोचर उसे बनाने में।

रहस्यों में रहस्य छिपा है,
सब तमाशा है तहखाने में,
बरगद का बृहत वृक्ष रखा है,
एक सरसों भर दाने में।

सफर दूब से दूध तक हो,
या फूलों का खिलना-मुरझाना
पूरा विज्ञान विरंची का,
कभी कहाँ किसी ने जाना।

अन्वेषणि बुद्धि ही रहस्य में,
छिपा तथ्य बतलाती है 
हटा आवरण पे आवरण,
नियति को दर्पण दिखलाती है।

अन्वेषण के बल हीं मनु-जीवन,
आज अन्य जीवों से इतर है,
हमारी इन अव्वलताओं के पीछे,
अन्वेषण और श्रमजल है।

अन्वेषण में जहाँ लोग लगे हैं,
आज धरती उनकी इतर है 
सुख-सम्पदा बसती वहाँ,
लोगों का जीवन वहाँ बेहत्तर है।

आराध्य और साध्य सभी को,
साधक हीं पा सकता है,
कुछ अद्भुत विज्ञान प्रभु का,
अन्वेषण ही बतला सकता है।


तन्हाई


बदलें चिन्ता को चिन्तन में
जब पास तन्हाई आए 
कुछ लोग हीं ढूँढते अपने भीतर
बाकी को तन्हाई खाए सताए।

ऋषि मुनि बैठ शिला पर
किसी घनघोर जंगल में
ब्रह्म शक्ति खुद में जगाते,
ढक निज को तन्हाई के आँचल में।

करते करते निज में अनवेषण
प्रज्ञा चढ़ चिन्तन पर चिन्ताएँ चरती है
बदलते तन्हाई को जो योगकाल में
तन्हाई उन्हीं का तम हरती है।

जब जब चिन्ता बदला है चिन्तन में
नव राह वहाँ से जना है
भागे हैं राजमहल से राजकुमार
तन्हाई में तपकर कोई महावीर और बुद्ध बना है।

डँसती खाती उनको तन्हाई
जो केवल चिन्ता में फँसते है
योगरूढ़ तो दुनिया में 
तन्हाई ढूँढते फिरते हैं।

चिन्ताओं के गहरे बादल में
चिन्तन तड़ित चमक है
योगी खींचे तन्हाई में नयी लकीरें
भोगी रोए कह कह तन्हाई तो दीमक है।


बड़ा मधुर एहसास हुआ..


आँखें लड़ी हिया में उठने लगा ऊँच ऊँच हिलोर
कहीं मधुवन में बरसने को था आतुर घटा घनघोर।


बातें यों फैल गयी मानो जंगल में लग गयी लुट्टी
दुनिया ही पीछे पड़ गयी लेकर बाधा और पट्टी।

वो क्षण किसी ने न जाना जब आँखें हुई थी चार
आज किसने न जाना पीछे आँखें पड़ी थी हजार।

कैद पiरंदा होता है गगन पर किसका जोर चला है
घेर रखे जो मगन मन को ऐसा पिंजरा कहाँ बना है।

हर विकट घेरे में भी छिपा रहता है जरूर एक मौका
काली बदरी के बीच ही चमका करती है लौका।

कल आग लगी मेरे मरई में ठीक हुआ सब राख हुआ
उसने दिया भर पानी की गगड़ी बड़ा मधुर एहसास हुआ।


प्रो.राजकिशोर प्रसाद


  • जन्म: 23 जनवरी, 1970, ग्राम मोहनपुर जिला वैशाली (बिहार)
  • शिक्षा: बी.आर.ए. (बिहार विश्वविद्यालय) से इलेक्ट्रानिक्स में पी-एच.डी. तथा वहीं व्याख्याता के पद पर कार्यरत।
  • सम्प्रति: जापान में डाक्टर ऑफ़ इंजीनियरिंग की उपाधि के लिये अध्ययनरत।
  • ईमेल : kishore@hi.mce.uec.ac.jp

पुस्तक चर्चा-आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं-माधव नागदा





यथार्थ को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश 


त्रिलोक सिंह ठकुरेला द्वारा संपादित लघुकथा संग्रह ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ मेरे सम्मुख है| आजकल संपादित लघुकथा संग्रहों की बाढ़ सी आ गई है| यह बात लघुकथा के भविष्य के लिए अच्छी भी है और बुरी भी| लघुकथा की विकास यात्रा में मील का पत्थर बनने की होड़ में कई लोग बिना किसी संपादकीय दृष्टि या कि सूझ-बूझ के जैसी भी लघुकथाएं उन्हें उपलब्ध हो जाती हैं उन्हें इकट्ठा कर पाठकों के सम्मुख पटक देते हैं| शायद इसी बात से दुखी होकर बलराम को कहना पड़ा है कि अधिकांश लघुकथा संग्रह भूसे के ढेर हैं जिनमें दाना खोज पाना बहुत मुश्किल काम लगता है| इस बात का उद्धरण स्वयं ठकुरेला ने ‘अपनी बात’ में दिया है| इसका अर्थ यह हुआ कि ठकुरेला ऐसा लघुकथा संकलन पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना चाहते हैं जिसमें भूसा कम और दाने अधिक हों| यद्यपि उन्होंने ‘अपनी बात’ में सीधे-सीधे अपने उद्देश्य के बारे में कुछ नहीं कहा है| हम केवल अनुमान लगा सकते हैं| वे कहते हैं, ‘लघुकथा घनीभूत संवेदनाओं को व्यक्त करने की क्षमता रखती है|’ अर्थात् वे ऐसी क्षमतावान लघुकथाएं संकलित करना चाहते हैं जिनमें घनीभूत संवेदनाएं हों| परन्तु मुझे लगता है कि उनका वास्तविक उद्देश्य कुछ और ही है जो कि पुस्तक के शीर्षक से ध्वनित होता है| शीर्षक है, ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं|’ यानि ऐसी लघुकथाओं का संकलन जो आधुनिक हों| परन्तु उन्होंने कहीं भी ‘आधुनिक’ की अवधारणा पर प्रकाश नहीं डाला है| 

यदि हम ‘आधुनिक’ की काल सापेक्ष चर्चा करें तो डॉ.रामकुमार घोटड़ के अनुसार लघुकथा के संदर्भ में सन् 1970 के पश्चात् का समय आधुनिक काल है| इस दृष्टि से सन् 1971 से अब तक रचित लघुकथाएं आधुनिक लघुकथाएं हैं परन्तु मेरी दृष्टि में आधुनिकता की यह परिभाषा मुकम्मल नहीं है| कारण कि काल विभाजन की दृष्टि से कोई रचना आधुनिक होते हुए भी जरूरी नहीं कि मूल्यबोध की दृष्टि से भी आधुनिक ही हो| उदाहरण के लिए एक लघुकथा (इस संग्रह से नहीं) इस प्रकार है: एक स्त्री को प्रसव-पीड़ा से मुक्ति मिलती है| जब दाई बताती है कि लड़की हुई है तो वहां उपस्थित सभी स्त्रियों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठते हैं| आगे लेखक अपनी तरफ से टीप जड़ता है, ‘कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सब वेश्याएं थीं|’ यानि पुत्री जन्म पर यदि कोई स्त्री खुशी जाहिर करती है तो लेखक के अनुसार वह वेश्या होगी| जाहिर है कि आधुनिक काल में रची गई होने के बावजूद प्रतिगामी मूल्य वाली यह लघुकथा आधुनिक तो कतई नहीं है| हां, समकालीन जरूर है| समय सापेक्षता समकालीनता का द्योतक है, आधुनिकता का नहीं| तो फिर सर्जनात्मकता के संदर्भ में आधुनिक होने का क्या तात्पर्य है? मेरे विचार से भाषा, भाव, कथ्य, संवेदना, शिल्प, विचार, जीवन मूल्य की दृष्टि से जिस रचना में नयापन हो वही आधुनिक है| आधुनिक वह है जो पुरानी सड़ी-गली, तर्कहीन मान्यताओं के प्रति अपना विरोध दर्ज करे या फिर उनके परिष्कार की ओर संकेत करे| आधुनिक लघुकथा या कोई भी रचना ताजा हवा के झोंके की तरह होती है| कुन्दन माली के अनुसार, ‘आधुनिकता जीवन और सर्जन के क्षैत्र में मौजूद यथास्थिति और रूढ़ियों के प्रतिकार का नाम है|’ इस दृष्टि से विचार करें तो ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ की कई लघुकथाएं आधुनिकता की कसौटी पर खरी उतरती हैं|


आज के दौर की कई लघुकथाओं में नगरीय जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी के कारण बुजुर्गों की दयनीय होती जा रही स्थिति को खूब चित्रित किया गया है| परन्तु रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की लघुकथा ‘ऊंचाई’ इन सबसे अलग हटकर है| यहां पिता जिस ऊंचाई पर खड़े हैं उसे देखकर एक ताजगी का अहसास होता है| यह लघुकथा सिर्फ कथ्य की दृष्टि से ही नहीं वरन अपनी संवेदनात्मक छुअन के लिए भी उल्लेखनीय है| रामयतन यादव की ‘डर’ में भी कमोबेश यही स्वर उभरकर आया है परन्तु तनिक भिन्न संदर्भ में| यहां मरणासन्न माधव अंकल का स्वाभिमान मन को भिगो देता है|


राजेनद्र परदेसी ने आज के शहरी युवा के मन में ग्रामीण जन-जीवन के प्रति पनप रहे वितृष्णा भाव को बड़ी कुशलता के साथ अपनी लघुकथा ‘दूर होता गांव’ में पिरोया है| प्रकान्तर से यह उपेक्षा श्रमशील संस्कृति के प्रति भी है जिसे लेखक ने सटीक संवादों के साथ प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया है| डॉ.रामनिवास मानव की लघुकथा ‘दौड़’ भी गांव और नगर के बीच की खाई की ओर इशारा करती है| प्रतापसिंह सोढ़ी ‘शहीद की माँ’ में शहीद बेटे की तस्वीर के माध्यम से देश की दुर्दशा के बीच स्वतंत्रता दिवस की धूमधाम के विरोधाभास को बड़े ही मर्मस्पर्शी रूप में प्रस्तुत करते हैं|


ज्योति जैन की ‘अपाहिज’ लघुकथा सोच को सार्थक दिशा देने वाली एक सशक्त लघुकथा है| इसमें पायल अपाहिज यश को अपना जीवन साथी चुनती है क्योंकि वह स्वयं फैसला लेने में सक्षम है| अमन पूर्णतया स्वस्थ होते हुए भी रीढ़विहीन है क्योंकि जिन्दगी के अहम् फैसले स्वयं नहीं ले सकता| यश को चुनकर पायल न केवल साहस का परिचय देती है वरन समाज के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करती है|
सुकेश साहनी सदैव शिल्प और कथ्य के स्तर पर पुरानी जमीन तोड़ते रहे हैं| इस संग्रह की लघुकथा ‘बिरादरी’ में उन्होंने बड़े सधे हुए अंदाज में इस बात को रेखांकित किया है कि किस तरह मनुष्य का व्यवहार सामने वाले के स्टेटस को देखकर पल-पल रंग बदलता है| भाषा के स्तर भी उन्होंने ध्यानाकर्षक प्रयोग किए हैं यथा, ‘किसी पुराने परिचित से सामना होने की आशंका मात्र से मेरे कान गर्म हो उठे’, ‘दांयीं आंख के नीचे बड़े-से मंसे के कारण मुझे अपने बचपन के दोस्त सीताराम को पहचानने में देर नहीं लगी’, ‘मैंने प्यार से उसकी तौंद को मुकियाते हुए कहा|’ साहनी की ‘आईना’ भी एक स्थापित उपन्यासकार की गरीबों के प्रति सहानुभूति के खोखलेपन को आईना प्रतीक के माध्यम से एकदम मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है|


मुरलीधर वैष्णव की ‘पॉकेटमार’ तीर्थस्थलों पर पंडे-पुजारियं द्वारा की जाने वाली लूट पर प्रकाश डालती है तो अंजु दुआ जैमिनी की ‘कमाई का गणित’ इन पवित्र स्थलों पर दुकानदारों द्वारा भक्तों के साथ की जाने वाली चालाकियों का रोचक बयान है| संग्रह की कई लघुकथाओं में दरकते रिश्तों को नयेपन के साथ विश्वसनीय तरीके से चित्रित किया गया है| ये लघुकथाएं हैं आशा शैली की ‘खोटा सिक्का’, कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ व ‘सहारे’, ज्योति जैन की ‘झप्पी’, कृष्णकुमार यादव की ‘बेटे की तमन्ना’, शकुन्तला किरण की ‘कोहरा’, सुरेश शर्मा की ‘भूल’ , अमरनाथ चौधरी अब्ज की ‘वसीयत’ आदि| इनमें से कमल कपूर की ‘सर्वेंट क्वार्टर’ को पाठक लम्बे समय तक भूल नहीं पायेंगे| पोता पेंटिंग में घर बनाता है, घर में अलग-थलग सर्वेंट क्वार्टर| पिता खुश होता है कि बेटा सर्वेंट के लिए भी अलग घर बना रहा है| इस पर बेटा कहता है कि यह आपके लिए है, जब बूढ़े हो जाओगे तब इसमें रहोगे| दादाजी भी तो सर्वेंट क्वार्टर में ही रहते हैं| यह लघुकथा उस पुरानी कहानी का आधुनिक परिवेश में सार्थक रूपान्तरण है जिसमें बेटा मिट्टी के बरतन को संभालकर रखता है जिसमें दादाजी को बचा-खुचा खाना खिलाया जाता रहा है| सूर्यकान्त नागर की ‘कुकिंग क्लास’ तथा डॉ.सुधा जैन की ‘समाज सेवा’ सास-बहू के रिश्तों के तनाव को नये ढंग से परिभाषित करती हैं| अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों को लेकर प्रभात दुबे की ‘गर्म हवा’ जबर्दस्त लघुकथा है| यह रचना वृद्ध लोगों की त्रासदी को घनीभूत संवेदना के साथ प्रस्तुत करती है| यह जानकर कि शर्माजी को उनके बेटे-बहू ने वृद्धाश्रम भेज दिया है, उनके साथ रोज घूमने वाले शेष दो वृद्ध बुरी तरह सहम जाते हैं| उन्हें अपना भविष्य दिखने लगता है| ट्रीटमेंट के लिहाज से यह लघुकथा बेहद सशक्त है|


यह सच है कि आज के समय में तमाम रिश्ते बेमानी होते जा रहे हैं, वृद्धजन लगातार अपनों ही के द्वारा अपमान झेलने को मजबूर हैं और स्वयं को असुरक्षित महसूस करते हैं| ऐसे में डॉ.दिनेश पाठक शशि की ‘साया’ एवं डॉ.योगेन्द्र नाथ शुक्ल की ‘टूटी घड़ी’ अंधेरे में प्रकाश की बारीक लकीर की तरह नयी आशा जगाती है| ‘साया’ में अपनी बीमार वृद्धा मां की मृत्यु पर बेटा स्वयं को अकेला और अनाथ-सा अनुभव करता है जबकि ‘टूटी घड़ी’ में पुत्र अपनी मां की निशानी स्वरूप बची एक टूटी घड़ी के प्रति पिता के भावनात्मक लगाव को देखकर उसे कमरे से फेंकने की बजाय पुनः वहीं रख देता है| ये दोनों लघुकथाएं इस बात के प्रति आश्वस्त करती हैं कि अभी तक मानवीय संवेदनाएं पूरी तरह मरी नहीं हैं कि अभी भी बहुत कुछ बचा हुआ है|
संग्रह में ऐसी लघुकथाएं भी हैं जिनमें अभावग्रस्त आम आदमी की भूख और जिल्लत भरी जिंदगी को नये शिल्प और अछूते प्रतीकों के माध्यम से वाणी दी गई है| पेट की ‘आग’(देवांशु पाल) ‘भूत’(डॉ.पूरन सिंह) पर भारी पड़ती है| ‘भूत’ लघुकथा का नायक भूख के आगे बेबस होकर श्मशान घाट पर रखे भोजन को ग्रहण करने से भी भयभीत नहीं होता है| ‘पैण्ट की सिलाई’(डॉ.रामकुमार घोटड़), ‘साहब का कुत्ता’(आकांक्षा यादव), ‘पसीना और धुंआ’(अंजु दुआ जैमिनी), ‘सोने की चेन’(डॉ.रामनिवास मानव) तथा ‘पहली चिन्ता’(डॉ.कमल चोपड़ा) लघुकथाएं आम आदमी की बेबसी को अपने-अपने ढंग से बयान करती है| डॉ.कमल चोपड़ा की ‘धर्मयुद्ध’ भी उल्लेखनीय है जो बेबाकी के साथ सांप्रदायिक दंगों के राजनीतिक मुखौटे को बेनकाब करती है| डॉ.सतीशराज पुष्करणा की ‘अंधेरा’ भी इसी अंधेरे पक्ष के चलते चारों ओर पसरे वैचारिक शून्य को भरने की सर्जनात्मक कोशिश है|


संग्रह में कुछ और लघुकथाएं हैं जो कथ्य या शिल्प की ताजगी के चलते अलग से ध्यान आकर्षित करती हैं| ये हैं ‘विरेचन’(डॉ.पुरुषोत्तम दुबे), ‘गुस्सा’(गुरुनाम सिंह रीहल), ‘मामाजी’(नदीम अहमद नदीम), ‘यकीन’, ‘भरोसा’(निशा भोंसले), ‘घिसाई’(राजेन्द्र साहिल), ‘प्रश्न चिह्न’(प्रदीप शशांक), ‘फर्क’(इंदु गुप्ता), मध्यस्थ’(मालती बसंत), ‘सुकन्या’(कुंवर प्रेमिल) और ‘नया क्षितिज’(साधना ठकुरेला)| ‘विरेचन’ में चुटीले संवादों के माध्यम से पर निंदा सबसे बड़ा सुख कहावत को चरितार्थ किया गया है तो ‘गुस्सा’ में कायर का गुस्सा सदैव कमजोर पर निकलता है को| ‘मामाजी’ और ‘नया क्षितिज’ में पुरुष मानसिकता पर सार्थक चोट की गई है| साधना ठकुरेला ने चिड़े का प्रतीक लेकर एक नयी बात कही है कि नर किसी भी प्रजाति का हो नारी के प्रति उसका रवैया सदा समान रहता है|

आज भ्रष्टाचार ने इस कदर शिष्टाचार का रूप धारण कर लिया है कि ईमानदार आदमी की निष्ठा भी अविश्वसनीय लगती है(यकीन)| दूसरी ओर राजेन्द्र सिंह साहिल की ‘घिसाई’ ईमानदार आदमी के भोलेपन और तद्जन्य बेबसी को बताती है| निशा भोंसले की ‘भरोसा’ में पिता द्वारा जवान बेटी को दिया गया यह जवाब मन को झिंझोड़कर रख देता है, ‘तुम पर (भरोसा) है पर इस शहर पर नहीं|’ यह अकेला वाक्य लोगों की मानसिकता पर एक मुकम्मल बयान है| ‘प्रश्न चिह्न’ समय के साथ लोगों के बदलते मिजाज का अच्छा जायजा लेती है| यहां तलाक मिल जाने की खुशी(?) में युवती को मिठाई बांटते हुए दिखाया गया है| संतोष सुपेकर की ‘उलझन’ तथा ‘एक और जानवर’ भी नयी जमीन पर खड़ी दिखायी देती है| लेखक जब एक व्यक्ति को घायल बैल पर गाड़ी चढ़ाते देखता है तो उसकी यह टिप्पणी बहुत कुछ कह देती है, ‘सबने केवल एक जानवर देखा, पर मैंने दो जानवर देखे, एक चौपाया और एक दोपाया|’ वस्तुतः आज समाज में दोपाये जानवरों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है जिनके प्रति एक साहित्यकार ही अपनी लेखनी द्वारा लोगों को सचेत कर सकता है|

आजकल जातिवाद भी हमारे समाज में नासूर की तरह फैलता जा रहा है| अफसोस कि राजनेता अपने नहित स्वार्थों के लिए इस सड़ांध को बचाए और बनाये रखना चाहते हैं| हालांकि जातिवाद के इस पहलू पर गौर करने वाली लघुकथाओं का अभाव है फिर भी इसके परंपरागत कारणों पर प्रहार करने वाली कतिपय लघुकथाएं यहां संकलित की गई हैं| ये लघुकथाएं हैं त्रिलोक सिंह ठकुरेला की ‘रीति-रिवाज’, आनन्द कुमार की ‘विभेद’, ‘अपवित्र’ अशोक भाटिया की ‘बंद दरवाजा’ तथा डॉ.सुरेश उजाला की ‘जातिगत द्वेष|’
यद्यपि सभी लघुकथाओं में यथार्थ को विश्वसनीय ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है और भाषा के प्रति भी पर्याप्त सावचेती बरती गई है फिर भी कहीं-कहीं असावधानीवश कुछ छिद्र रह गये हैं| उदाहरण के लिए जातिगत भेदभाव की मनोवृत्ति पर प्रहार करने वाली लघुकथा ‘विभेद’ का आरंभ यों होता है, ‘बात आज से 20-25 साल पूर्व की है|’ यह पंक्ति अनावश्यक है और लघुकथा के शिल्प को क्षति पहुंचाने वाली है| लगता है जैसे लेखक किसी सत्य घटना का बयान करने जा रहा है| इसी तरह ‘सोने की चेन’ लघुकथा जो आरंभ में बहुत सहजता के साथ आगे बढ़ रही होती है कि ‘मैं’ पात्र द्वारा चेन वाले से पूछा गया यह प्रश्न पाठकों को चौंका देता है, ‘भाई, यदि तुम्हारी चेन इतनी बढ़िया है तो इसे अपनी बेटी और बीवी को क्यों नहीं पहनाते?’ यह वाक्य यथार्थ को खंडित करने वाला है क्योंकि लघुकथा में कहीं नहीं बताया गया है कि लेखक (मैं) ने चेन वाले की बीवी व बेटी को पहले कहीं देखा है कि ये दोनों नकली चेन नहीं पहने हुए हैं| पाठक के मन में तो यह सवाल भी उत्पन्न होता है कि लेखक को कैसे पता कि चेन वाले के एक बेटी भी है| जरा सी असावधानी लघुकथा की विश्वसनीयता को सवालों के घेरे में खड़ा कर देती है| एक लघुकथा में वाक्य प्रयोग आता है, ‘उल्लास से छलकता, उसका मन सहसा बुझ गया|’ बुझता वह है जो जलता है| छलकने वाला तो रीतता है| अतः यहां छलकने के साथ बुझना का प्रयोग अप्रासंगिक है| एक और लघुकथा में वाक्य-खण्ड आता है, ‘एक पान के ठेले के सामने खड़े रिक्शेवाले की वजह से’ जबकि होना चाहिए ‘पान के एक ठेले के सामने...|’


कुल मिलाकर ‘आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं’ संग्रह की आधिकतर लघुकथाओं में नये शिल्प और संवेदना के साथ समकालीन जीवन मूल्यों तथा समाज में व्याप्त विसंगतियों का गहराई के साथ जायजा लिया गया है| ये लघुकथाएं निस्सन्देह पाठकों को रोजमर्रा की समस्याओं पर नये सिरे से सोचने के लिए बाध्य करेंगी|


  • पुस्तक-आधुनिक हिन्दी लघुकथाएं
  • संपादक-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
  • प्रकाशक-अरिहन्त प्रकाशन,जोधपुर|
                 

 माधव नागदा


लालमादड़ी (नाथद्वारा)-313301
मोबाइल-09829588494

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2015

दस्तक: तीन कविताएं-श्रवण कुमार


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


असमानता


मैंने देखा है
असमानता को कुछ इतने क़रीब से
बता सकता हूँ,
क्या है ये बड़े ही तहजीब़ से।
आर्थिक रुपी असमानता
यूँ अपना पाँव पसारे है
कुछ तो रहते हैं, महलों में
खाते ऱोज होटलों में,
चलते हैं, मर्सडीज से
बहुतों को मिलती है
सूखी रोटी भी नसीब़ से
न हो अगर विश्वास
मेरी बातों का,
जाओ देखो
झोपड़पट्टी और मजदूरों की बस्ती में
पूछो ग़रीब से
खाने की तो छोड़ो
बात भी नहीं करता कोई
उनसे तमीज़ से
फ़सल उगाता है किसान
पर बच्चे मरते भूख से
महलबनाने वालों के
खुद के घर घासफ़ूस के
कमर टूट गयी मेहनत करके
बेहाल होते हैं धूप से
हाय ! विडम्बना
बू आती है
उन अमीरों को
इन मेहनतकशों की कमीज़ से
जो रहते हैं इन्हीं के बनाये महलों में
उनके ही अन्न से बनाते हैं
व्यंजन लजीज़ से
बड़ा फ़र्क है
अमीरों और ग़रीबों की बीमारी में
जुक़ाम भी हुआ जो अमीर को
डॉक्टर पर डॉक्टर आते हैं
बीमार हुआ ग़र ग़रीब तो
अस्पताल के चक्कर और घनचक्कर में
क्या हाल हुआ
पूछो मरीज़ से
यूँ तो शाही शादी में करोड़ों उड़ाये जाते हैं
देश और विदेश से मेहमान बुलाये जाते हैं
पर एक ग़रीब की बेटी की
शादी टूट जाती है
सपनों की तरह
बारात लौट जाती है दहलीज़ से
अच्छी शिक्षा से ही होता है बुद्धि विकास
पर मेरे देश में शिक्षा भी
बिकती है बाजार में
फ़ीस चुका नहीं सकते ग़रीब
इसी वजह से बच्चे उनके
महरूम रह गए तालीम से 
सामाजिक असमानता की तो
बात न करना
सदियों से ये सुरसा सा मुँह फैलाए है
जाति धर्म और वर्ण के नाम पर
न जाने कितने बलि चढ़ गए
कितनों बंधे ज़रीब से
पर मानवता का गला घोंट कर
ये यूँ ही बढ़ी जा रही है
मैं पूछता हूँ ?
इन दुनिया वालों से
मानवता के रखवालों से
क्या है ये ?
क्या यही है, मानव धर्म?
यही है इंसाफ़
क्या ये लगते नहीं कुछ अजीब़ से
ग़र लगते हैं
तो दूर कर दीजिये
ऐसी असमानताओं को
दुनिया से
मानवता के लिए
अपनी किसी तरकीब़ से।



मैं बेजान हूँ


मैं बेजान हूँ ।
फिर भी कहता हूँ,
जीवों में सर्वश्रेष्ठ हूँ
क्योंकि इंसान हूँ ।
मैं रोज़ देखता हूँ, सुनता हूँ
इंसान को इंसान से नफ़रत करते हुए
कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर
तो कभी आत्मसम्मान के नाम पर
मार दिए जाते हुए 
तो कभी भूख से मरते हुए ।
मैं सब कुछ देख रहा हूँ
बस ! देख रहा हूँ
मैं कुछ कर नहीं सकता ।
मेरा यही देखने सुनने का
दौर चल रहा है सदियों से 
समय का पहिया दौड़ रहा है ।
आज इन्सानों में एक दूसरे से
आगे जाने की होड़ लगी है 
अगर यही होड़ प्रतियोगी की तरह होती
तो कितना अच्छा होता
पर ये तो द्वेष भावना से प्रेरित है।
मैं बस देख रहा हूँ
इन्हें बदल नहीं सकता ।
मैं देख रहा हूँ
आज का युवा वर्ग
किस तरह नशे के आगोश में
फँसा जा रहा है।
एक गऱीब बाप दहेज में देने के लिए
लिए गये कर्ज में दबा जा रहा है ।
इस दहेज रूपी राक्षस की वजह से ही
न जाने कितनी मासूम बेटियों का
गला घोंटा जा रहा है ।
मैं देख रहा हूँ, बस !
इन्हें रोक नहीं सकता ।
मैंने सुना था-
ईश्वर ने इन्सानों को
विवेक दिया है,ज्ञान दिया है ।
जीवों की रक्षा के लिए
सत्य की खोज के लिए
सदाचार के लिए, परोपकार के लिए
आपसी समानता के लिए
पर शायद मैंने गलत सुना था
ये सब हो नहीं रहा है
मैं ऐसा करा भी नहीं सकता ।
मैं देख रहा हूँ बस !
मैं बेजान हूँ ।
फिर भी कहता हूँ,
जीवों में सर्वश्रेष्ठ हूँ
क्योंकि इंसान हूँ ।



बसंत


प्रकृति के ख़ूबसूरत नजारों का,
फूलों की बहारों का,
मौसम है बसंत |
चिड़ियों की चहचहाहट का,
कोयल के मधुर गीतों का
मौसम है बसंत |
गिल्लू के पेड़ों की इस डाली से 
उस डाली पे कुदकने का,
तीतर के फुदकने का
मौसम है बसंत |
छोटे-छोटे सुन्दर फलों से ढके
बेर के पेड़ों का,
फलों के राजा आम की डालियों पर मंजरी का,
मौसम है बसंत |
गुनगुनी धूप में बैठकर गुनगुनाने का,
प्यार के इज़हार का,
मौसम है बसंत |
प्रत्येक जीवों के मन को 
उल्लासित करने वाले मौसम का
सरताज़ है बसंत | 


श्रवण कुमार


शोध छात्र,
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय,
नयी दिल्ली।
फ़ोन-8010008797
ईमेल- Shravan.aug12@gmail.com


पुस्तक समीक्षा-‘स्त्री-मुक्ति की प्रतिनिधि तेलुगु कहानियाँ’-जे.एल.रेड्डी




महिला मुक्ति के प्रश्न पर नये सिरे से विचार विमर्श



    अन्य भाषाओँ का हिन्दी अनुवाद साहित्य और साहित्यकार तक पहुंचने का माध्यम ही नहीं बल्कि समाज में हो रहे बदलावों से परिचय कराती है। इसके साथ ही स्त्री मुक्ति के प्रश्न व उसमें अंतर्निहित संघर्षों की व्याख्या करने में मदद करती है बल्कि उसमें हस्तक्षेप करने के लिए भी आह्वान करती है।

जे.एल.रेड्डी द्वारा संकलित एवं अनुवादित पुस्तक ‘स्त्री-मुक्ति की प्रतिनिधि तेलुगु कहानियाँ’ स्त्री संघर्ष और स्त्री मुक्ति की जद्दोजहद को सामने लाती है। पुस्तक में स्त्रियों की इच्छा शक्ति, स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता, संकल्प को पूरा करने का साहस दिखाने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि उन मुस्लिम महिलाओं की रचनाओं को भी शामिल किया गया है जिन्हें मजहब के नाम पर घरों में कैद किया गया है। इस संग्रह में त्रिपुरनेनि गोपीचन्द की कहानी ‘ये पतित लोग’ पढने पर ऐसा लगता है कि दुनिया कितनी भी आगे बढ़ गयी हो लेकिन आज भी निम्न जाति और महिला अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर हैं लेकिन यह कहानी जहाँ यथार्थ जीवन की व्याख्या करती है वहीं भविष्य की रूपरेखा भी तैयार करती है।

‘एलूरू जाना है’ कहानी के माध्यम से चा. सो. स्पष्ट करते हैं कि सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था कैसे महिलाओं को पतन की तरफ धकेलती है. इस कहानी का मर्म इससे समझा जा सकता कि संतान का न होना आज भी समाज में अभिशाप और कुंठित करने वाला है बल्कि महिलाओं को समाज से अलगाव पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

1902 में भंडारु अच्चमांबा द्वारा संवाद शैली में लिखी गयी ‘स्त्री शिक्षा’ आपमें अनोखी कहानी है। यह कहानी स्त्री शिक्षा के महत्व को बहुत ही ऊँचे स्तर तक पहुँचाती है। यह कहानी स्त्री समानता और स्वतन्त्रता का प्रश्न पूरे विश्व के दुखों तक पहुँचाने में मदद करती है।
वैश्वीकरण के दौर में पैदा हुई लड़कियों की क्या स्थिति होती है, इसका जीता जागता उदाहरण कहानी ‘मेरा नाम क्या है?’ में स्पष्ट होता है. जैसे ही कहानी की पात्रा का नाम उसके मस्तिष्क से धूमिल हो जाता है, उसका अस्तित्व खत्म हो जाता है। वह पति, बच्चों व अन्य रिश्तों के सहारे जीती है. जब उसे पता चलता है कि उसका नाम शारदा है तो उसे सबकुछ याद आ जाता है कि वह दसवीं में प्रथम, संगीत प्रतियोगिता में प्रथम आई थी. वह एक अच्छी चित्रकार थी।

वह इस अज्ञातवास का कारण ढूँढती है “मेरे दिमाग के सारे खाने तो लीपने-पोतने में भरे हुयें हैं और किसी बात की वहाँ गुंजाईश ही नहीं रही। यह कहानी विद्रोह भी करती है अपने अस्तित्व और पहचान को बनाने के लिए अपने पति से संघर्ष करती है- “घर को लीपने-पोतने से त्यौहार नही हो जाता. हाँ एक बात और. आज से आप मुझे ऐ, ओय कहकर मत बुलाइए. मेरा नाम शारदा है.” यह बहुत ही मार्मिक और दिल में हलचल पैदा करने वाली कहानी है।

‘ऐश-ट्रे’एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी जिन्दगी अपनी तरह से जीना चाहती है। उसने अपने हठ के कारण शादी नहीं की. उसी का परिणाम है कि वह आज अपने पैरो पर खड़ी है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा है एक कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में, अच्छा व्यक्तित्व रखने वाली कुशल प्रशासक।

‘बीवी के नाम प्रेम-पत्र’ कहानी में बहुत ही रोचक तरीके से पति-पत्नी के सम्बन्धों को नये सिरे से समझने की कोशिश की गयी है। पत्नी सिर्फ और सिर्फ उसके घर के काम को करने वाली नहीं है। प्रेम का अपना सौन्दर्य बोध होता है यदि वह नहीं तो कुछ भी नहीं.
महिला मुक्ति का प्रश्न निरंतर प्रगति कर रहा है और  नये सिरे से विचार-विमर्श  हो रहा है. वह घर और बाहर दोनों जगह समान रूप से हमारी चेतना में उपस्थित है लेकिन सभी जगह महिलाओं को सामन्ती और पुरुषवादी मानसिकता से टकराना पड़ रहा है। कहानी ‘संघर्ष’ में जब ललिता का पति तलाक की बात करता है तो वह तमाम, सवालों, उलझनों और अन्तर्द्वन्द्वों को हल करती हुई फैसला करती है कि “अब मुझे जीवन में एक नया संघर्ष करना है। एक मनुष्य की तरह अपने ही सहारे खड़े होना है। इस प्रकार यह कहानी महिला मुक्ति के प्रश्नों को आर्थिक आजादी तक पहुँचाती है कि महिला मुक्ति का आरम्भ आर्थिक निर्भरता से शुरू होता है।

इस कहानी संकलन में एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि मुस्लिम महिला लेखिकाओं ने भी उन मुद्दों को सामने रखा है जिसका जिक्र आमतौर पर नहीं किया जाता। दूसरा यह कि पुरुष लेखकों की कहानियों को भी इस संकलन में शामिल किया गया है जिससे यह अहसास होता है कि तेलुगु साहित्य में महिला मुक्ति के प्रश्न पर नये सिरे से विचार विमर्श हो रहा है। महिला मुक्ति का प्रश्न स्त्री एवं पुरुष के लिए साझा प्रश्न है, साझा हस्तक्षेप है, साझा संघर्ष और साझा सपना है।


-एम.एम.चन्द्रा


  •  पुस्तक-स्त्री-मुक्ति की प्रतिनिधि तेलुगु कहानियाँ 
  • अनुवादक-जे.एल. रेड्डी 
  • प्रकाशक-शिल्पायन, नयी दिल्ली