मंगलवार, 29 सितंबर 2015

फ़िरदौस ख़ान की पांच नज़्में


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


लड़कियां…


लड़कियां
डरी-सहमी लड़कियां
चाहकर भी
मुहब्बत की राह पर
क़दम नहीं रख पातीं
क्योंकि
वो डरती हैं
उन नज़रों से
जो हमेशा
उन्हें घूरा करती हैं
उनके हंसने-मुस्कराने
की वजहें पूछी जाती हैं
उनके चहकने पर
तानें कसे जाते हैं
उनके देर तक जागने पर
सवालों के तीर छोड़े जाते हैं…
लड़कियां
मजबूर और बेबस लड़कियां
चाहकर भी
अपनी मुहब्बत का
इक़रार नहीं कर पातीं
क्योंकि
वो डरती हैं
कहीं कोई उनकी आंखों में
महकते ख़्वाब न देख ले
कहीं कोई उनकी तेज़ होती
धड़कनें न सुन ले
कहीं कोई उनके चेहरे से
महबूब का नाम न पढ़ ले
सच
कितनी बेबस होती हैं
ये लड़कियां…



हव्वा की बेटी…


मैं भी
तुम्हारी ही तरह
हव्वा की बेटी हूं
मैं भी जीना चाहती थी
ज़िन्दगी के हर पल को
मेरे भी सतरंगी ख़्वाब थे
मेरे सीने में भी
मुहब्बत भरा
एक दिल धड़कता था
मेरी आंखों में भी
एक चेहरा दमकता था
मेरे होठों पर भी
एक नाम मुस्कराता था
जो मेरी हथेलियों पर
हिना-सा महकता था
और
कलाइयों में
चूड़ियां बनकर खनकता था
लेकिन
वक़्त की आंधी
कुछ ऐसे चली
मेरे ख़्वाब
ज़र्रा-ज़र्रा होकर बिखर गए
मेरे अहसास मर गए
मेरा वजूद ख़ाक हो गया
फ़र्क़ बस ये है
तुम ज़मीन के नीचे
दफ़न हो
और मैं ज़मीन के ऊपर…
(रेहाना जब्बारी को समर्पित) 



मंज़िल की चाह में…


मैं
एक मुसाफ़िर थी
तपते रेगिस्तां की
बरहना1 सर पर
सूरज की दहकती धूप
पांव तले
सुलगते रेत के ज़र्रे
होठों पर
बरसों की प्यास
आंखों में अनदेखे सपने
दिल में अनछुआ अहसास…
मैं चली जा रही थी
ख़ुद से बेज़ार सी
एक ऐसी मंज़िल की चाह में
जहां
मुहब्बत क़याम करती हो
अहसास का समंदर
हिलोरें लेता हो
बरसों की तिश्नगी को
बुझाने वाला
बहका सावन हो…
तभी
तुम मुझे मिले
एक घने दरख़्त की तरह
मेरे बरहना सर को
तुम्हारे साये का
आंचल मिला
ज़ख़्मी पांव को
मुहब्बत की मेहंदी मिली…
मुझे लगा
जिसकी तलाश में
भटकती रही थी
दर-ब-दर
अब वही मंज़िल
मुझे अपनी आग़ोश में
समेटने के लिए
दोनों बांहें पसारे खड़ी है
दिल ख़ुशी से
झूम उठा
मैं ख़ुद को
संभाल नहीं पाई
और आगे बढ़ गई
तभी
मेरी रूह ने
मुझे बेदार किया
मैंने पाया
तुम वो नहीं थे
जिसके साये में
मैं ताउम्र बिता सकूं
क्योंकि
तुम तो एक सराब 2 थे
सराब !
हां, एक सराब
और
फिर शुरू हुआ सफ़र
भटकने का
उस मंज़िल की चाह में…
(अर्थ 1-नंगा,2-मृगतृष्णा)



बरहना


वो
मेरी रूह तक को
बरहना करने पर
आमादा है
जिसे
ये हक़ था
मेरी हिफ़ाज़त करता
मेरे सर का
आंचल बनता…



खु़दकशी की ख़बर…


जब कभी
अख़बार में पढ़ती हूं
खु़दकशी की कोई ख़बर
तो
अकसर यह
सोचने लगती हूं
क्या कभी ऐसा होगा
मरने वाले अमुक की जगह
मेरा नाम लिखा होगा
और
मौत की वजह नामालूम होगी…


फ़िरदौस ख़ान


समूह संपादक,
स्टार न्यूज़ एजेंसी,
दिल्ली।



फ़िरदौस ख़ान 


  • फ़िरदौस ख़ान पत्रकार, शायरा और कहानीकार हैं। कई भाषाओं की जानकार हैं। उन्होंने दूरदर्शन केन्द्र और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में कई साल तक सेवाएं दीं हैं। अनेक साप्ताहिक समाचार-पत्रों का संपादन भी किया। ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन केन्द्र से समय-समय पर उनके कार्यक्रमों का प्रसारण होता रहा है । उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो और न्यूज़ चैनलों के लिए भी काम किया है।  उर्दू, पंजाबी, अंग्रेज़ी और रशियन अदब (साहित्य) में उनकी ख़ास दिलचस्पी है। वह मासिक पैग़ामे-मादरे-वतन की भी संपादक रही हैं और मासिक वंचित जनता में संपादकीय सलाहकार हैं। साथ ही वह स्टार न्यूज़ एजेंसी में संपादक हैं। ‘स्टार न्यूज़ एजेंसी’ और ‘स्टार वेब मीडिया ’ नाम से उनके दो न्यूज़ पॉर्टल भी हैं। उन्होंने सूफ़ी-संतों के जीवन दर्शन पर आधारित एक किताब ‘गंगा-जमुनी संस्कृति के अग्रदूत’ लिखी है, जिसे साल 2009 में प्रभात प्रकाशन समूह ने प्रकाशित किया था।  वह अपने पिता स्वर्गीय सत्तार अहमद ख़ान और माता श्रीमती ख़ुशनूदी ख़ान को अपना आदर्श मानती हैं। हाल में उन्होंने राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम का पंजाबी अनुवाद किया है। उनके कई बलॉग हैं। फ़िरदौस डायरी और मेरी डायरी उनके हिंदी के बलॉग है. हीर पंजाबी का बलॉग है. जहांनुमा उर्दू का बलॉग है और द पैराडाइज़ अंग्रेज़ी का बलॉग है। अपने बारे में वह कहती हैं-मेरे अल्फ़ाज़, मेरे जज़्बात और मेरे ख़्यालात की तर्जुमानी करते हैं, क्योंकि मेरे लफ़्ज़ ही मेरी पहचान हैं…!

मंगलवार, 22 सितंबर 2015

तेरी वरवीणा से ही रागिनी-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


सरस्वती वंदना (घनाक्षरी छंद)


ऋषियों, तपस्वियों के मन का विराग, त्याग,
कामिनी के मोहक स्वरुप का श्रृंगार तुम |
शब्द-शब्द में बही प्रवाहमयी भावना हो,
मानस में दीपक सा जलता विचार तुम |
एक तुममें ही सब, सबमें तुम्हीं रमी हो,
सृजन हो, पालन हो, सृष्टि का संहार तुम |
हो धनुष-बाण कभी, बाँसुरी की तान कभी,
जानकी की वंदना तो राधिका का प्यार तुम |
                            ****


अधरों के द्वार को सरलता की धार दे दे,
नयनों में प्यार की उदारता उतार दे |
तार हिल भी उठें तो झूमने लगे बहार,
मन के सितार को तू ऎसी झनकार दे,
अभिमान से भरे विचार हार जाएँ जहां,
पत्थरों में आज ऎसी भावना उतार दे |
मात शारदे, पुकारता हूँ तुझे बार-बार,
आके’ मेरे जीवन के गीत को सँवार दे |
                          ****

पर्वतों में, नदियों में, बादलों में, सागरों में,
कंटकों में, पुष्प के मरंद में तुम्हीं बसी |
ज्योति में, तिमिर में हो, धूल में कि चन्दन में,
पशुओं में, फल, मूल, कंद में तुम्हीं बसी |
मेरे सपनों के तार-तार में बसी हो मात,
मेरी कामना, मेरी पसंद में तुम्हीं बसी |
मेरी भावना, मेरे विचार, मेरी लेखनी में,
मेरे गीत में हो, मेरे छंद में तुम्हीं बसी |
                           ****

वर्तमान का हो चित्र, कल्पना भविष्य की हो,
बीतते अतीत की कहानी बोलती रहे |
प्रेम के प्रसंग गहराई में छिपाए हुए,
आँसुओं से दर्द की निशानी बोलती रहे |
बाल्यकाल के वे खेल, बूढ़ी अँखियों की यादें,
अधरों के द्वार से जवानी बोलती रहे |
मात वरदान यही मांगता हूँ बार-बार,
गीत के स्वरों में जिंदगानी बोलती रहे |
                         ****

तेरी वरवीणा से ही रागिनी बरसती है,
तेरे कर-कमलों से निकली कलाएं हैं |
तेरी ही कृपा से राग-रंग की विविधताएं,
तेरी ही कृपा से सारी छंद की विधाएं है |
तेरी पलकों ने दिन-रात के नियम रचे,
तेरी वंदना में ही मगन ये दिशायें हैं |
तेरे चरणों की भेंट जीवन का पल-पल,
तेरी ही कृपा से अधरों ने गीत गायें हैं |
                         ****

छंद के चरण और गीत के ये स्वर सारे,
भेंट करता तुम्हें स्वीकार लो माँ शारदे !
देने के लिए न और कुछ भी है पास मेरे,
आज मेरी लेखनी की धार लो माँ शारदे !
अश्रुओं के वारिधि में, हर्ष की तरंग बीच,
मेरी तारिणी की पतवार लो माँ शारदे !
धन्य मेरा जीवन, मरण मेरा धन्य होगा,
एक बार मुझको निहार लो माँ शारदे !
                         ****

अपना वरद हस्त शीष पर रख दो तो,
आँधियों भरी अमा में दीप मैं जलाऊंगा |
पत्थरों की बस्तियों में काँच का महल रच,
पर्वतों को काट, पथ नूतन बनाऊंगा |
मन के हुताशन में पानी का महत्व रख,
मरुओं में भी मैं फुलवारियाँ सजाऊंगा |
कंटकों के बीच भी गुलाब सा खिलूँगा मात!
भीगी-भीगी अँखियों को हँसना सिखाऊंगा |
                       ****

दंभ या प्रमाद वश जो भी अपराध हुए,
बालक समझ कर माफ कर देना माँ |
एक ही पुकार, प्रार्थना यही है बार-बार,
चित्त से बुराइयों को साफ कर देना माँ |
ऐसा ओज, ऐसी दृढ़ता प्रदान करना कि,
हर अत्याचार के खिलाफ कर देना माँ |
काम, क्रोध, लोभ के झकोरे छेड़ने लगें तो,
अपने भजन का लिहाफ कर देना माँ |


आशुतोष द्विवेदी 

भारत का राजदूतावास,
अदिस अबाबा,
इथियोपिया 

पुस्तक समीक्षा : दुनिया दुनिया न रहे ग़ज़ल हो जाए–जावेद अख्तर





जहाँ ख़यालों के शरह ज़िन्दा हैं...



'लावा' जावेद अख्तर का ग़ज़लों और नज्मों का दूसरा संग्रह है, जो पहले संग्रह से लगभग 20 वर्ष बाद आया है. इन बीस वर्षों में पूरी दुनिया की तस्वीर बदल चुकी है और एक पीढ़ी जवान हो चुकी हैं औए  मनुष्य के सामने नई चुनोतियाँ, नये सवाल और नये विचार भी सामने आ चुके हैं. इन चुनोतियों का सामना यह ग़ज़ल संग्रह करता है .
इस संग्रह में 145 ग़ज़लें शामिल की गयी जिसमें एक बात स्पष्ट  नजर आती है कि लेखक ने उन विवादों को थाम दिया है जो कविता ग़ज़ल को लेकर होते रहें हैं. उन्होंने ये दिखा दिया है कि अपनी बात छंद मुक्त और छंद युक्त दोनों ही तरीके से कही जा सकती है. लेखक ने दोनों ही कला का बेहतर प्रयोग किया है. किसी बात को कहने का जितना अच्छा तरीका और सलीका उनको आता है शायद वही तरीका लिखने में दिखता है. जब व्यक्ति अंतर्मन के द्वंद्व में जकड़ा रहता है और वस्तु और विचार के उद्भव पर सोचता है तो जावेद अख्तर इसे इस प्रकार लिखते हैं–
      कोई ख़याल
      और कोई भी जज़्बा
      कोई शय हो
      पहले-पहल आवाज़ मिली थी
      या उसकी तस्वीर बनी थी
      सोच रहा हूँ

जावेद अपने गहरे और विस्तृत चिंतन को प्रस्तुत करते हुए लिखतें है कि तमाम लोग भेड़ चाल या घिसे-पिटे रास्ते पर चलते रहते हैं जिनको वो ठीक नहीं मानते.
      जिधर जाते हैं सब उधर जाना अच्छा नहीं लगता
      मुझे पामाल रास्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

आज पूरा समाज एक ख़ास तरह की चुप्पी या मौन साधे हुए है. बहुत से लोग गलत विचारों को सुनते है और आगे चल देते है. जावेद जी की पैनी नज़र इस पर भी गयी है-
गलत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं फायदे इसके मगर अच्छा नहीं लगता

भारत जैसे देश में जहाँ बहुआयामी सांस्कृतिक विरासत की बहुलता है. जिसे बहुत से लोगों ने अपनी जान देकर सजोकर रखने की कोशिश की है, वह आज टूटने की कगार पर है. दंगा-फसाद, साम्प्रदायिकता इत्यादि मनुष्यता का नाश करने में लगे हैं. वहीं अख्तर जी की संवेदनशीलता कहती है –
      ये क्यों बाकी रहे आतिश-जनों, ये भला जला डालो
      कि सब बेघर हो और मेरा हो घर, अच्छा नहीं लगता

सम्बन्धों, रिश्तेनातों में आज जो नये तरह के उलझाव पैदा हो गये हैं उनको समझने का मौका जावेद की ग़ज़ल में देखने को मिलता है कि अब गलती स्वीकार नहीं की जाती बल्कि थोपी जाती है-
      उठाके हाथों से तुमने छोड़ा,चलो न दानिस्ता तुमने तोड़ा
      अब उलटा हमसे ये न पूछो कि शीशा ये पाश-पाश क्यों हैं

जावेद ने अपनी कलम उस खेल पर भी चलाई जिसको की बुद्धिजीवी वर्ग का खेल कहा जाता है- शतरंज. इस तरह उन्होंने कला, साहित्य और खेल को भी वर्गीय दृष्टि से देखा है –
      मैं सोचता हूँ
      जो खेल है
      इसमें इस तरह का उसूल क्यों है
      कि कोई मोहरा रहे की जाए
      मगर जो है बादशाह
      उस पर कभी कोई आंच भी न आए

आँसू मनुष्य की जिन्दगी का बहुत ही संवेदनशील हृदयस्पर्शी अहसास है जो बहुत कम लोगों की समझ में आता है. जावेद ने लिखा है –
      ये आँसू क्या इक गवाह है
      मेरी दर्द-मंदी का मेरी इन्सान-दोस्ती का...
      मेरी ज़िन्दगी में ख़ुलूस की एक रौशनी का...
      जहाँ ख़यालों के शरह ज़िन्दा हैं...
      झूठे सच्चे सवाल करता
      ये मेरी पलको तक आ गया है.

इंसानी रिश्ते बहुत ही जज़बाती होते हैं. जुदाई, मिलन, स्नेह, क्रोध ये सब उन्हीं पर करते हैं जिन्हें वे प्यार करते हैं या जिन पर यकीन करते हैं. यह नहीं तो कुछ नहीं –
      यकीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा
      तो शुक्र कीजिए कि अब कोई गिला नहीं रहा

जावेद अख्तर ने उन लोगों को पहचान लिया था कि जो सबके साथ हैं और किसी के साथ नहीं. ऐसे लोग सिर्फ अपने स्वार्थ के साथ खड़े होते हैं-
मुसाफिर वो अजब है कारवां में
कि हमराह है शामिल नहीं

आज के दौर में अन्धविश्वास और आडम्बरों का पुनः उत्थान हो रहा है. पहले भी चार्वाक, बुद्ध, कबीर जैसे लोगों ने उस पर बहुत चोट की. जावेद ने भी उसी परम्परा का निर्वाह किया है-
      तो कोई पूछे
      जो मैं न समझा
      तो कौन समझेगा
      और जिसको कभी न कोई समझ सके
      ऐसी बात तो फिर फ़ुज़ूल ठहरी

जावेद अख्तर का नाम उन शायरों जरूर गिना जायेगा जब बात सितमगारों, चमनगारों की होगी. उन शायरों में भी गिनती होगी जिसने अपनी शायरी के माध्यम से हुक्मरानों की आँखों में आँख डालकर सच को सच और न्याय को न्याय कहा –
      खून से सींची है मैंने जो मर-मर के
      वो ज़मी एक सितमगार ने कहा उसकी है

और इसी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि -
वो चाहता है सब कहें सरकार तो बेऐब है
      जो देख पाए ऐब वो हर आँख उसने फोड़ दी

ऐसा नहीं है कि जावेद ने सिर्फ दूसरों पर ही लिखा. अपने बारे में, समय के बारे में, मानवीय व्यवहार के बदलते पैमाने पर भी उन्होंने लिखा है-
      गुज़र गया वक्त दिल पे लिखकर न जाने कैसी अजीब बातें
      वरक (पृष्ठ) पलता हूँ जो मैं दिल के तो सादगी अब कहीं नहीं

आज का मनुष्य दुःख, आशंका, कड़वाहट, द्वेष, अजनबीयत और अलगाव का शिकार हो चुका है. तमाम एकता और संघर्ष के नारों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा –
      सच तो यह है
      तुम अपनी दुनिया में जी रहे हो
      मैं अपनी दुनिया में जी रहा हूँ

प्रस्तुत संग्रह आवाज़ है उन लोगों की जो सुनी नहीं जाती. यह आगाज़ है उन तरंगों का जिनका अहसास बहुत दूर तक जाता है. यह सम्बोधन है अपने समय से कि वक्त सदा आगे बढ़ता है. यह ललकार है उनके लिए जो वक्त से आगे की सोचते हैं.
      न कोई इश्क है बाकी न कोई परचम है
      लोग दीवाने भला किसके सबब हो जाएँ

-एम.एम.चन्द्रा


लावा (ग़ज़ल संग्रह)/ जावेद अख्तर 
प्रकाशक/ राजकमल प्रकाशन 

मंगलवार, 15 सितंबर 2015

सुधेश की ग़ज़लें


अजामिल की कलाकृति


दुनिया क़ुनबा सब अपने हैं..


दुनिया क़ुनबा सब अपने हैं
पर अपने तो बस सपने हैं।

सब जगह उन्हीं के जलवे हैं,
हर जगह उन्हीं के अपने हैं।

जो मिलता कभी न जीवन में,
आ जाते उस के सपने हैं।

अघटित की ही आशंका में,
दिखते उस के ही सपने हैं।।

वह मुखड़ा ही इतना सुन्दर 
सपने में उस के सपने हैं।

जीवन तो ख़ाली ख़ाली है,
अपने तो केवल सपने हैं।। 

वह खुल कर कम मिलता है,
छिप-छिप मिलते जो अपने हैं।



मैं ने लिखा कुछ भी नहीं..    


मैं ने लिखा कुछ भी नहीं,
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।

जो भी लिखा दिल से लिखा,
इस के सिवा कुछ भी नहीं । 

मुझ से ज़माना है ख़फ़ा,
मेरी ख़ता कुछ भी नहीं । 

तुम तो खुदा के बन्दे हो, 
मेरा खुदा कुछ भी नहीं । 

मैं ने उस पर जान दी, 
उस को वफ़ा कुछ भी नहीं ।

चाहा तुम्हें यह अब कहूँ
लेकिन कहा कुछ भी नहीं । 

यह तो नज़र की बात है, 
अच्छा बुरा कुछ भी नहीं । 



हम ज़िन्दा रहें..


हर आदमी दुश्मन हो ज़रूरी तो नहीं,
हर दोस्त भी दोस्त हो ज़रूरी तो नहीं । 

जो शख़्स फ़रिश्ता नज़र आता है, 
ताउम्र फ़रिश्ता हो ज़रूरी तो नहीं ।

दोस्तों की ये महफ़िल रहे यों ही, 
मैं इस में रहूँ ही ज़रूरी तो नहीं । 

जो आप भी शेर कहते कहिये कहिये,
हर कोई उसे गाए ही ज़रूरी तो नहीं ।

यह देश जो अपना वतन सलामत हो,
हम ज़िन्दा रहें ये ज़रूरी तो नहीं । 



आज दिल बुझा बुझा..   


आज दिल बुझा बुझा क्यों है, 
हुआ क्या किसे पता क्यों है । 

सुबह दिल गुलाब था पहले, 
शाम को झरा झरा  क्यों है ।

वक्त कुछ बदल गया ऐसा,
आज बेरहम हवा क्यों है । 

वक्त बेरहम हुआ अब तो 
रूठ सा गया खुदा क्यों है । 

सुबह थी खिली खिली जूही, 
शाम को  धुवाँ धुवाँ क्यों है ।

चलो कुछ कहो सुनो अब तुम, 
मौन रह जो दी सजा क्यों है । 

साफ़ अब कहो कहो खुल कर, 
आज मुहब्बत ख़ता क्यों है । 

ज़िन्दगी जियो बन्धु हँस कर,
आज दिल थका थका क्यों है। 



अपनी डफली है यहाँ..(दोहे)


अपनी डफली है यहाँ अपना अपना राग। 
कोई गीत मल्हार है या बेमौसम फाग।।

अपना विज्ञापन करो कोई रोक न टोक। 
खुदरा हो तो ठीक है हर्ज नहीं जो थोक।। 

युग की वीणा में भरे अपने अपने राग। 
कोई सुन सो जाय या सुन कर जाये जाग।।

करे प्रशंसा आप की इस युग मेँ है कौन। 
अपनी गाल बजाय कै सब हो जाते मौन।।

नित्य उतारूँ आरती अगर आप भगवान।  
मगर काम से लग रहा आप सिर्फ शैतान।।

जो भी दिखे महान है कोई महा महान।
ढूँढ ढूँढ हारा मगर दिखा नहीं इन्सान।।

दूजे की तारीफ़ में है अपनी तारीफ़। 
परनिन्दक की पर भला कौन करे तारीफ़।।

निन्दा को सुन कर गुणी क्षण में जाते भूल। 
जो ओछे बजते अधिक हिय में गड़ते शूल।।



सुधेश 


  • पूरा नाम-एस.पी.सुधेश 
  • जन्मतिथि-6 जून सन 1933
  • जन्म स्थान-जगाधरी  ज़िला अम्बाला (हरियाणा) 
  • जीवनी-बचपन जगाधरी,देवबन्द में बीता। 
  • (दिल्ली में सन 1975 से)
  • शिक्षा-एमए.हिन्दी में (नागपुर विवि) पीएचडी आगरा विवि से। 
  • प्रकाशित-काव्य कृतियाँ- फिर सुबह होगी ही -1983, घटनाहीनता के विरुद्ध -1988, तेज़ धूप-1993, जिये गये शब्द -1999, गीतायन (गीत और ग़ज़लें) -2009, बरगद (खण्डकाव्य)-2001, निर्वासन (खण्ड काव्य) -2005, जलती शाम (काव्यसंग़ह) -2007, सप्तपदी ,खण्ड 7 (दोहा संग़ह)-2007, हादसों के समुन्दर (ग़ज़लसंग़ह) -2010, तपती चाँदनी (काव्यसंग़ह)-2013
  • आलोचनात्मक पुस्तकें- आधुनिक हिन्दी और उर्दू कविता की प़वृत्तियां-1974, साहित्य के विविध आयाम -1983, कविता का सृजन और मूल्याँकन -1993, साहित्य चिन्तन-1995, सहज कविता,स्वरूप और सम्भावनाएँ -1996, भाषा ,साहित्य और संस्कृति -2003, राष्ट्रीय एकता के सोपान -2004, सहज कविता की भूमिका -2008, चिन्तन अनुचिन्तन -2012, हिन्दी की दशा और दिशा -2013
  • विविध प़काशन- तीन यात्रा वृत्तान्त ,दो संस्मरण संग़ह,एक उपन्यास,एक व्यंग्यसंग़ह, एक आत्मकथा प़काशित । कुल 29 पुस्तकें प़काशित।
  • पुरस्कार/सम्मान-मध्यप़देश साहित्य अकादमी का भारतीय कविता पुरस्कार-2006, भारत सरकार के सूचना प़सारण मंत्रालय का भारतेन्दु हरिश्चन्द़ पुरस्कार-2000, लखनऊ के राष्ट्रधर्म प़काशन का राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान-2004, आगरा की नागरी प़चारिणी सभा द्वारा सार्वजनिक अभिनन्दन-2004।
  • सम्प्रति-उप्र.के तीन कॉलेजों में अध्यापन के बाद दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विवि में 23 वर्षों तक अध्यापन। प़ोफेसर पद से सेवानिवृत्त। तीन बार विदेंश यात्राएँ। अब स्वतन्त्र लेखन ।
  • सम्पर्क-314, सरल अपार्टमैन्ट्स, द्वारिका, सैक्टर-10, दिल्ली-110075
  • ई-मेल-dr_sudhesh@yahoo.com
  • फ़ोन-09350974120

मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अवनीश त्रिपाठी की दो ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कौन था जो मुख़्तसर..


कौन था जो मुख़्तसर पूरी कहानी लिख गया
होंठों' से मेरे बदन पर रातरानी लिख गया।

बावरा मन गिन रहा था देह की जब रंगतें
कौन धीरे से मुहब्बत की निशानी लिख गया।

छू रहीं थीं सर्द रातों में हवाएँ जब तुझे
चूमकर मैं होंठ तेरे बेज़ुबानी लिख गया।

फुनगियों पर शाम को जब धूप ठहरी देर तक
सूर्य फिर आकाश में आदत पुरानी लिख गया।

अलगनी भी रो रही है चीथड़ों के साथ साथ
टीसते इस दर्द की पूरी कहानी लिख गया।

धूप क्या है छाँव क्या है कुछ पता मुझको नहीं
देखते ही देखते ग़ज़लें रूहानी लिख गया।

प्यास थी कोई हठीली तेरी नज़रों में प्रिये!
सांस को तब खुशबुओं से ज़ाफ़रानी लिख गया।



नहीं बादल सुनाता गीत..

             
मचलने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी 
महकने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

नहीं बादल सुनाता गीत बूंदों का अगर
बरसने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

मेरी तन्हाईयाँ मुझसे लिपटकर रो रहीं
तड़पने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

बहुत भोली तेरी चितवन लगी मुझको प्रिये!
बहकने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

इशारों से हुआ घायल ये दिल कहने लगा
धड़कने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

नहीं कुछ सोचना मुझको तेरी बाहों में अब
पिघलने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

तेरे अधरों की गरमी से जलूँगा रातभर
दहकने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

भरी है नेह की गागर हृदय की देह में
छलकने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।

मुझे हिम्मत मिली मेरे ख़ुदा से उम्रभर
सम्भलने का हुनर मैं जानता हूँ आज भी।



अवनीश त्रिपाठी


ग्राम/पोस्ट-गरएं,भरखरे
सुलतानपुर (उ.प्र.)-227304
ई-मेल-tripathiawanish9@gmail.com
मोबाइल-9451554243

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

मुट्ठी भर रेत एवं अन्य रचनाएं-शील निगम


विनोद शाही की कलाकृति


मुट्ठी भर रेत


मुट्ठी भर रेत, सूखी सी,
छोड़ गई रीतापन हाथों में,
रह गया शून्य सा मन.

एक आस जगी, जब बन बैठा-
छोटा सा बच्चा, मन,
करने लगा बाल-हठ
वो सब पाने को,
जो खो चुका था जीवन.

जागी एक लगन,
और..
मन के शून्य,
बन गए दो नयन,
बह गया विषाद,
उन नयनों के
झरोखों से,
और.........
बदल गई दिशा दृष्टि राहों की.

इस बार..
वो रेत सूखी न थी,
उसमें थी नमी अश्रुओं की
और कुछ खारापन भी,
जो ना रिस पाया, न बह पाया,
मेरी इस बंद मुट्ठी के भीतर से,
चार उंगलियों और एक अँगूठे के
बंद आगोश में,
बसी है वो रेत लिए हुए,
आज भी अपने अन्दर,
एक नमी-प्यार की, मनुहार की.

आखिर यही अन्तर तो होता है,
गीली और सूखी रेत में,
होता है रीतापन सूखी रेत में
और नम रहती है गीली रेत सदा,
आशाओं से, प्यार से और भावनाओं से.



मेरा स्नेह


मेरा स्नेह सम्पूर्ण प्रतिदान है,प्रेम की सीमाओं में न तोलो. 
असंख्य भावनाओं का गठबंधन है, ज़रा धीरे-धीरे खोलो .

प्रेम तुम्हारा चिंगारी बन आया हृदय के द्वार,
इसी स्नेह से शोला भड़का पाया कभी न चैन,
प्रेम-ज्वाला की अग्नि में तपता रहा दिन-रैन ,
आशाओं के दीपों में स्नेह- बाती से जले नैन .
समर्पण की अद्भुत बेला में आकर्षण के सैन ,
खोल गये  तन- मन-मस्तिष्क के सब  बंद द्वार 
प्रेम तुम्हारा शोला बन तब आया हृदय  के द्वार 
फिर-फिर पाने को तृप्ति मन मचला बारम्बार,
इसी स्नेह ने किया तुम्हारी अतृप्ति का संहार .

मेरा स्नेह सम्पूर्ण प्रतिदान है,प्रेम की सीमाओं में न तोलो .
असंख्य भावनाओं का गठबंधन है, ज़रा धीरे-धीरे खोलो .



प्रेम में प्रतिकार कैसा? 


परवाने की दीवानगी पर शमा ने आँसू बहाए .
ओ मीत! प्रीत में  तुम क्यों जलने चले आये?
शलभ और दीप का रक्तरंजित त्योहार कैसा?
प्रेम में यह बलिदान कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

कंटकों के बीच भ्रमर का पुष्प पर मंडराना,
पंखुड़ियों का शूल भरे आगोश में मुस्कुराना,
भ्रमर की गुंजन लगे वीणा की झंकार जैसा .
प्रेम में यह अपूर्व संस्कार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

शबनम के अश्रुओं को  रवि ने दी सदाएँ ,
रश्मियों  के रथ पर नभ-फेरी पर चली आयें .
मन को लगे यह माननी केमनुहार जैसा,
प्रेम में कोई आभार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

कुमुदनी ने चाँदनी को गुपचुप बुलाया .
रुपहले आँचल को सुगंध से सजाया .
चाँद को लगे रूपसी के अभिसार जैसा .
प्रेम में यह अधिकार कैसा ? 
प्रेम में प्रतिकार कैसा?

पपीहे की पिहू-पिहू,कोयल की कुहू-कुहू .
मधुप की गुन-गुन,नव-दुल्हन की छुन-छुन .
स्वरों की रागिनी को लगे मधुर झंकार जैसा .
प्रेम का यह अद्भुत संसार कैसा?
प्रेम में प्रतिकार कैसा?



जीवन-संध्या


जीवन की संध्या में क्यों? तू बरस रहा बन स्नेह का बादल.
देख भीग रहा अधूरापन झलकाता मेरे जीवन का आँचल. 

बन भिक्षुणी स्नेहांजलि लिए दिन भर भटकती  रही. 
पा सकी न प्रेम-भिक्षा, झोली मेरी खाली ही रही. 
गेरुएपन की आड़ में रक्त हृदय का छिपाती ही रही . 
थोड़ा-कुछ पा जाने की आस में, सर्वस्व लुटाती रही. 

साधना-अर्चना की हृदय में जगी  ऐसी लगन. 
एक साध्वी के रूप में ,अब मैं बन गयी जोगन.
साहस नहीं है कि पा सकूँ, तुझे भर कर नयन. 
काल-रात्रि की ओर चले,थके -हारे मेरे चरण. 

जीवन की संध्या में क्यों ?तू बरस रहा बन स्नेह का बादल. 
देख भीग रहा अधूरापन झलकाता मेरे जीवन का आँचल. 



मोह-जाल 


सुनो !
निर्मोही सदा सुखी रहते हैं...
रिश्तों के मोह-जाल में नहीं फँसते,
स्वछंद,मुक्त पंछी से उड़ते फिरते हैं
उन्मुक्त, विस्तृत  नील-गगन में. 
पर मोही?
बहुत सुख पाते हैं जब रेशम से मधुर,
सुन्दर,सुनहरे रिश्ते  बंधन में बंधते हैं.
बंधन कब  बेड़ियाँ बन  जकड़ लेते हैं
मासूम से  मन को पता ही नहीं चलता. 
फिर तड़पता है मन,छटपटाता है खूब,
न जी पाता है, न मर पाता है चैन से,
लटकता रहता हैं त्रिशंकु सा अधर में.  




शील निगम


  • जन्म-6 दिसम्बर, 1952 आगरा (उत्तर प्रदेश) 
  • शिक्षा-बी.ए./बी.एड.
  • व्यवसाय-कवयित्री, कहानी तथा स्क्रिप्ट लेखिका.
  • (मुंबई में 15 वर्ष प्रधानाचार्या तथा दस वर्षों तक हिंदी अध्यापन)
  • विद्यार्थी जीवन में अनेक नाटकों,लोकनृत्यों तथा साहित्यिक प्रतियोगिताओं में सफलतापूर्वक प्रतिभाग एवं पुरुस्कृत. 
  • प्रसारण-दूरदर्शन पर काव्य-गोष्ठियों में प्रतिभाग एवं संचालन तथा साक्षात्कारों का प्रसारण
  • आकाशवाणी के मुंबई केंद्र से रेडियो तथा ज़ी टी.वी.पर कहानियों का प्रसारण.प्रसारित कहानियाँ-'परंपरा का अंत' 'तोहफा प्यार का', 'चुटकी भर सिन्दूर,' 'अंतिम विदाई', 'अनछुआ प्यार' 'सहेली', 'बीस साल बाद' 'अपराध-बोध' आदि .
  • प्रकाशन-देश-विदेश की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं तथा ई पत्रिकाओं में कविताएं तथा कहानियाँ प्रकाशित.विशेष रूप से इंगलैंड की 'पुरवाई' कनाडा के 'द हिंदी टाइम्स' व 'प्रयास' तथा ऑस्ट्रेलिया  के 'हिंदी गौरव' व 'हिंदी पुष्प' में बहुत सी कविताओं का प्रकाशन.'हिंद युग्म' द्वारा कई कविताएँ पुरुस्कृत. 
  • विविध-बच्चों  के लिए नृत्य-नाटिकाओं का लेखन, निर्देशन तथा मंचन.
  • कहानियों के नाटयीकरण,साक्षात्कार,कॉन्सर्ट्स तथा स्टेज शो के लिए स्क्रिप्ट लेखन.
  • अनुवाद-हिंदी से अंग्रेज़ी तथा अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद कार्य-हिंदी से अंग्रेज़ी एक फिल्म का अनुवाद, 'टेम्स की सरगम' हिंदी उपन्यास का अंग्रेजी अनुवाद,एक मराठी फिल्म 'स्पंदन' का हिंदी अनुवाद.
  • A special Issue of 'TSI, Hindi  111 Top Hindi Women Writers of 21st Century', published in August,2011,  has included me in this issue as one of the top writers in 'The Sunday Indian' published in NOIDA 
  • सम्मान-'डॉ आंबेडकर फेलोशिप अवार्ड' (दिल्ली),'हिंदी गौरव सम्मान' से सम्मानित (लंदन)
  • विदेश-भ्रमण-जर्मनी, फ्रांस, हॉलैंड, बेल्जियम,फ़िनलैंड, युनाइटेड किंगडम,ऑस्ट्रेलिया,सिंगापुर तथा मालदीव्स.
  • संपर्क -बी,401/402,मधुबन अपार्टमेन्ट, फिशरीस युनीवरसिटी रोड, सात बंगला के पास,वर्सोवा,अंधेरी (पश्चिम),मुंबई-61
  • फोन-022-26364228/9987464198/ 9987490692