मंगलवार, 25 अगस्त 2015

डा. राधा शाक्य की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


पीर के मेघ (गीत)



दर्द रोने से तो दूर होता नहीं,
गीत इसको बना लो तो कुछ बात हो |

पीर के मेघ पलकों में छायें मगर,
अश्रु मोती न किंचित धरा पर गिरें|
नेह के दीप की ज्योति बुझने न दें,
पंथ में चाहे जितने अँधेरे घिरें|

ऐसे मुस्काओं उपवन में कलियाँ खिले,
ऐसे झूमों कि मरुस्थल में बरसात हो|

हर्ष है कष्ट है धुप से छाँव से,
जिन्दगी वस्तुत:एक संघर्ष है |
ये कसौटी परम सत्य का साक्ष्य है,
दाह स्पर्श में स्वर्ण उत्कर्ष है|

जिंदगी एक शतरंज का खेल है,
ऐसे खेलो इसे मौत की मात हो|

सबको आलोक दो अपने व्यक्तित्व से,
सूर्य जैसे भले ताप से तुम जलो|
लोक कल्याण सबसे बड़ा धर्म है,
मानकर के यही लक्ष्य तक तुम चलो|

ऐसे आवाज दो हर दिवस छन्द हो,
ऐसे गाओ कि नवगीत सी रात हो|



अब तो खुदा के वास्ते..(गजल)



अब तो खुदा के वास्ते ऐसा न कीजिए,
फिर चूर-चूर प्यार का शीशा न कीजिए |

इन्सानियत की मौत का भी गम हो कुछ घड़ी,
हर वक्त पैसा-पैसा-पैसा न कीजिए |

रब से करो गिला या फैला लो झोलियाँ,
यूं हर किसी के सामने रोया न कीजिए |

फिर जिसके बाद जुड़ना सम्हलना न हो सके,
यूं टूटकर किसी को चाहा न कीजिए |

चलकर लहू पे हम करें आरती अजान,
यूं ही खुदा और राम को रुसवा न कीजिए |

क्या ले के आये थे यहाँ क्या ले के जाएंगे,
अपने जमीर का कभी सौदा न कीजिए |



जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं..?



अक्सर सोचती हूँ
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं ?
जो ठुमक-ठुमक कर चलते हुए
किसी कृष्ण-कन्हैया की खिलखिलाहट
पर लिख दिया करती थी हजारों छन्द
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं
जो किसी शबरी के जूठे बेरों की मिठास पर
लिख देती थी चौपाईयाँ,
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं
जो किसी पंछी के घायल
होकर मरने की पीड़ा से
द्रवित होकर रचतीं थी महाकाव्य
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं
जो रोटी बनाते समय चिमटा न
होने के कारण किसी हामिद की
बूढ़ी दादी की झुलसी हुई
अंगुलियों के दर्द से आहत
होकर रचती थी कथाये,
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं
जो सर्दी से ठिठुरते हुए आदमी
के तन को ढक देती थी
अपने तन के कपड़ो से
जाने कहाँ गयी वो संवेदनाएं
जो पढ़ लिया करती थी
फूलों के मन की भाषा
लगता है अब संवेदनाएं
निष्प्राण हो गयी है|
नहीं-नहीं अभी निष्प्राण नहीं हुई सवेदनाएं|
वो उलझ गयी है..
दलित-सवर्ण और नारी
विमर्श के मकड़ जाल में
वो अग्नि परीक्षा दे रही है|
समीक्षाओं और आलोचनाओं
के दरवाजे पर
वो चक्कर लगा रही है
विचार गोष्ठियों सेमिनारों
और सम्मेलनों के
वो गुम हो गयी हैं
तालियों की गड़गड़ाहट
और नोटों के ढेर में|
अस्वीकृत कविता
आज-डाक से मिली है मुझे
मेरी अस्वीकृत कविता
सम्पादक महोदय, आपने लिखा है-
हम कविता प्रकाशित करने में विवश है
इसको अन्यथा न लें|
नहीं मेरे भाई हम जानते हैं
आपकी विवशताएं|
अपने जानने वालों की रचनाओं के बीच
एक अजनवी की कविता विवशता ही तो है
चटपटी और सनसनी खेज खबरों के आगे
एक मासूम कविता
विवशता ही तो है
बड़े बड़े पन्नों पर अभिनेत्रियों के
अर्धनग्न चित्रों के आगे
एक मर्यादित कविता
विवशता ही तो है
बड़े-बड़े पन्नों पर लाखों के
विज्ञापनों के आगे
एक बेमोल कविता विवशता ही तो है
और फिर मेरे भाई
मेरी कविता में था भी क्या ?
हिंसा की शिकार नारियों की वेदनाएं
बलात्कार की शिकार
मासूम बेटियों की मौन सिसकियाँ

दहेज की चिंता में जीवित जलती बहुओं की चीखें
इनमें नया भी क्या है
इन वेदनाओं, सिसकियों और चीखों का
आप, और आपके ये अखबार
और आपका यह समाज
अब अभ्यस्त हो गया है
लेकिन मेरे भाई
जितनी प्यारी लगती हैं आपको
ये चटपटी और सनसनी खेज ख़बरें
और जितने प्यारे लगते है
आपको ये अभिनेत्रियों के
अर्ध नग्न चित्र
और जितने प्यारे लगते हैं
ये लाखों के विज्ञापन
उससे कई गुना प्यारी है
मुझे मेरी ये
अप्रकाशित एवं अस्वीकृत कविता |



डा. राधा शाक्य



  • विधाये-गीत, गजल, कहानी, कवितायेँ, छन्द, मुक्तक, तथा छन्द मुक्त रचनाएं |
  • प्रकाशन-(प्रथम कृति): कोई रास्ता तो हो (गीत, गजल, कविता, संग्रह)
  • विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन काव्य पाठ प्रसारण | लखनऊ महोत्सव तथा अनेक शहरों के कवि सम्मलेन में काव्य पाठ |
  • पुरस्कार-सम्मान-काव्यायन संस्था द्वारा पं0 बाल मुकुन्द द्विवेदी, स्मृति सम्मान 2010 साहित्य सृजन परिषद मिलाई द्वारा सृजन सम्मान, पुष्पगंधा प्रकाशन कवर्धा (छत्तीसगढ़) द्वारा स्व. हरिशंकर ठाकुर स्मृति सम्मान, भारतीय रिजर्व बैंक, कानपुर नगर द्वारा सम्मान 2008, लाइंस क्लब ऑफ कानपुर, गैगेज द्वारा सम्मान 2013.
  • संपर्क-379/4, शास्त्री नगर,कानपुर–208005
  • मोबाइल-9451021666/ 9415058737

शनिवार, 15 अगस्त 2015

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की रचनाएं..


अवधेश मिश्र की कलाकृति



माँ के अनगिन रूप (गीत)


जग में परिलक्षित होते हैं 
माँ के अनगिन रूप।
माँ जीवन की भोर सुहानी 
माँ जाड़े की धूप ।।

लाड़ प्यार से माँ 
बच्चों की झोली भर देती ,
झाड़-फूंक करके 
सारी बाधाएं हर लेती ,

पा सानिध्य प्यास मिट जाती 
माँ वह सुख का कूप।

माँ जीवन का मधुर गीत,
माँ गंगा सी निर्मल,
आशाओं के द्वार खोलता 
माता का आँचल,

समय समय पर ढल जाती माँ 
बच्चों के अनुरूप। 
जग में परिलक्षित होते हैं 
माँ का अनगिन रूप।। 



  पांच हाइकु 


   (एक) 


   कोसते रहे
   समूची सभ्यता को
   बेचारे भ्रूण


    (दो)


    दौड़ाती रही
    आशाओं की कस्तूरी
    जीवन भर


    (तीन)


    नयी भोर ने
    फडफढ़ाये पंख 
    जागीं आशाएं


     (चार)

 
     प्रेम देकर
     उसने पिला दिए
     अमृत घूँट

    (पांच)


    थका किसान 
    उतर आई साँझ 
    सहारा देने 



त्रिलोक सिंह ठकुरेला


बंगला संख्या-99
रेलवे चिकित्सालय के सामने
आबू रोड-307026 (राजस्थान)
मो-946071426
ई-मेल-trilokthakurela@gmail.com



त्रिलोक  सिंह ठकुरेला 



  • शिक्षा-विद्युत अभियांत्रिकी में डिप्लोमा 
  • प्रकाशन-नया सवेरा (बाल-साहित्य)
  •              -काव्यगंधा (कुण्डलिया संग्रह) 
  •              -आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ ( लघुकथा संकलन)
  •              -कुण्डलिया छंद  के  सात हस्ताक्षर ( कुण्डलिया संकलन)
  •              -कुण्डलिया कानन ( कुण्डलिया संकलन)
  • सम्मेलनों/ कार्यशालाओं में  प्रतिभागिता-कतिपय सम्मेलनों में प्रतिभागिता 
  • सम्मान/पुरस्कार-राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर (राजस्थान ) द्वारा शम्भूदयाल  सक्सेना बाल- साहित्य पुरस्कार 
  • पंजाब कला साहित्य अकादमी,जालंधर (पंजाब) द्वारा 'विशेष अकादमी पुरस्कार '
  • विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ,गांधीनगर (बिहार) द्वारा विद्या वाचस्पति
  • हिन्दी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग द्वारा 'वाग्विदाम्बर सम्मान'
  • निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान,बस्ती द्वारा 'राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान'
  • हिन्दी  भाषा साहित्य परिषद,खगड़िया (बिहार) द्वारा 'स्वर्ण सम्मान'.साथ ही  अन्य अनेक सम्मान 
  • अन्य प्रासंगिक जानकारी-कुण्डलिया छंद के उन्नयन, विकास और पुनर्स्थापना हेतु कृतसंकल्प एवं समर्पित 
  • ब्लॉग-www.triloksinghthakurela.blogspot.com        
  • सम्प्रति-रेलवे में इंजीनियर                             
  • संपर्क-बँगला संख्या-99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड, सिरोही, राजस्थान-307026 ( भारत) 
  • फोन/ फैक्स-02974221422/ 09460714267/ 07891857409 
  • ई-मेल-trilokthakurela@gmail.com

मंजुल भटनागर की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



सुनता रहा आकाश मौन..


निर्जन सा मन
नीला अम्बर पहन
मिलता है प्रेम बांचती धरा से
ओस पड़ी थी रात बहुत,
हवाएं आती जाती हैं
पक्षियों के परों पर बैठ
पारिजात महकता रहा

नदी को कुछ कहना था
नाव सी मुस्कराहटें लिए
नदी मझधारे बहती रही
डूबने का खौफ लिए
लहरों के साथ घुमड़ती रही
सुनता रहा आकाश मौन.

चिनार के पत्ते उड़ने लगे थे
बिखरे पलों से
रोज शाम समेटती हूँ मैं
जानते हुए,
कल फिर बिखर जाना है उन्हें

शर्म से लाल सूरज उग रहा था
सब कुछ बहुत साफ़ था
भीगी सी पगडण्डी
अलसाई घास
रास्तों के पत्थर
चल रहे थे साथ साथ

दूर अमराई पर
कोयलिया गा रही थी
स्वप्न गीत
मौन आकाश सब कुछ गुन रहा था .


जो कुछ सामने है वो..


जो कुछ सामने है वो कडवा बहुत है
असलियत जान लूँ वो कहता बहुत है.

माँ के आशीष में कितना है कमाल
दुश्मन भी हो तो उसे भाता बहुत है.

बोल दे लव्ज कोई प्यार के इस बस्ती में
यह हुनर किसी को कहाँ आता बहुत है.

सजाये जो सपने दिल में कभी मैंने
उनको रात दिन वो टटोलता बहुत है.

छू कर चला आया धरती के क़दमों को वो
अब यही शौक उस निष्ठुर को भाता बहुत है।


धरा के जंगले हरे रहें..


छाँव भी झुक गयी
पेड़ पीछे छिप गई
धरा पर शीत रहे
ग्रीष्म रहे
छाँव के सिलसिले रहें
और जंगल भी हरे रहें

शखाएं उन्माद भरी
बाहं डाले झूम रही
फूल हूँ पराग हो,पत्तियों पर रंग चढे हों
धरा के जंगले हरे रहें


घर आंगन में चहक हो
प्यार की खुशबुओं लिए
बड़ों की आसीस हो
मिलनेे के सिलसिलें रहें
धरा के जंगल हरे रहें

उदास न कोई रात हो
मेहँदी भरे हाथ हों
इशारों से बात हो
जिसे नज़र खोजती
दिल मनचले रहें
और धरा के जंगल भी हरे रहें।


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

सोमवार, 10 अगस्त 2015

पांच ग़ज़लें-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आँखों ने है देखा..


आँखों ने है देखा, अक्सर ये तमाशा,
जब खुश था ज़रा सा, तब टूट गया दिल|

किस्मत का सताया, हर दर्द में गाया,
पर वो नहीं आया, तब टूट गया दिल|

हम प्यास के मारे, सेहरा से न हारे,
बादल जो हँसा रे, तब टूट गया दिल|

आँगन का अँधेरा, तो बन गया मेरा,
मुँह उसने जो फेरा, तब टूट गया दिल|

अश्कों की कहानी, शेरों की ज़ुबानी,
उसने नहीं मानी, तब टूट गया दिल|

ख्वाबों के परिंदे, उड़ते कि न उड़ते,
पर आप ने कतरे, तब टूट गया दिल|

दफ्तर की सीढ़ियाँ, हम भी चढ़े मियाँ,
पर आये जब यहाँ, तब टूट गया दिल|

सहते नहीं बना, रहते नहीं बना,
कहते नहीं बना, तब टूट गया दिल|

जोड़ा हजार बार, टुकड़ों को बेशुमार,
फिर जब भी हुआ प्यार, तब टूट गया दिल|

कमज़ोर था बहुत, पर इश्किया बहुत,
जब-जब जिया बहुत, तब टूट गया दिल|

हल सब सवालों के, क्या लिख नहीं पाते?
पर हाथ रुक गए, तब टूट गया दिल?

मुँह मोड़ना पड़ा, सब छोड़ना पड़ा,
दिल तोड़ना पड़ा, तब टूट गया दिल|



भूख को ओढ़े गरीबी..


भूख को ओढ़े गरीबी सो रही है|
देश में काफी तरक्की हो रही है|

बाल-विधवा सी हमारी ज़िन्दगानी,
दाग़ दामन के, छिपाकर धो रही है|

जो नदी कल तेरी आँखों से बही थी,
मेरे मन का गाँव आज डुबो रही है|

फिर तेरे होठों की गर्मी चाहती है,
फिर हमारी  साँस ठंडी हो रही है|

क्यों न उग जाये ईमारत पर ईमारत,
हवस दिल में कंकरीटें बो रही है|

बोझ बस्तों का बढ़ा इतना ज़ियादा,
स्कूल में बैठी शरारत रो रही है|

'उम्र को हम ढो रहे हैं'-ये भरम था,
आज जाना-'उम्र हमको ढो रही है'|



पत्थरों की बस्तियों में..


हम उम्मीदों के अलादिन, आँख में सपने संजोये,
खुद को एक चिराग जैसा, मुद्दतों से घिस रहे हम|

जो मुक़द्दर दे रहा था और हम जो चाहते थे,
फर्क़ दोनों में बहुत था इसलिए मुफलिस रहे हम|

दीदावर पैदा चमन में एक दिन होगा कहीं तो,
अपनी बेनूरी पे’ रोते, उम्र भर नर्गिस रहे हम|

पत्थरों की बस्तियों में, इस क़दर बिगड़ी तबीयत,
गुलशनों में भी गए तो देर तक बेहिस रहे हम|



मौन को स्वर में सजाकर..


मौन को स्वर में सजाकर आज हम कविता कहेंगे,
और तब साहित्य-शोधक उस विधा को क्या कहेंगे|

भ्रष्ट होते जा रहे दिन-रात नैतिक मूल्य सारे,
लोग इसको देश में बढ़ती हुई शिक्षा कहेंगे|

हम कहेंगे, चाहिए अब क्रांति आध्यात्मिक पटल पर,
किन्तु समझेंगे नहीं सब और हाँ में हाँ कहेंगे|

स्मरण में उनके, हृदय पाषाणवत् होने लगा है,
वे छलकते नयन को सम्बन्ध की सीमा कहेंगे|

स्वप्न टूटा, विवशता में धैर्य ने की आत्म-हत्या,
इस व्यथा को हम नियति की गूढ़ संरचना कहेंगे|

जटिलता इतनी कि जीवन को न जीवन कह सकेंगे,
यदि  कहेंगे कुछ इसे तो मृत्यु की सुविधा कहेंगे|

 जब कभी उस द्वार पर दो-चार पल ये पग रुकेंगे,
‘आशुतोष’, उसे कहीं भीतर छिपी श्रद्धा कहेंगे|



वैसे लोकतंत्र है फिर भी..


'आपस में सब भाई-भाई हैं', ऐसा जब भी लिखना,
पहले थोड़ा समझाकर 'भाई' का मतलब भी लिखना| 

कलम छीन लेंगे, कागज़ फाड़ेंगे ये दुनिया वाले,
आँसू और लहू से सारी सच्चाई तब भी लिखना|

वैसे लोकतंत्र है फिर भी अपने दस्तावेज़ों पर,
सब बातों के साथ जाति भी लिखना, मज़हब भी लिखना|

मैं बहका, मैं भटक गया, इसको भी करना दर्ज़ मगर,
उसकी मादकता, उसका आकर्षण, वो सब भी लिखना|

ऊपर वाले को कुछ मेरे बारे में जब भी लिखना,
हर मज़हब पे' हँसने वाला मेरा मज़हब भी लिखना|



आशुतोष द्विवेदी 


भारतीय राजदूतावास,
अद्दिस अबाबा,
इथियोपिया |
ईमेल:ashutoshdwivedi1982@gmail.com

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

पूर्णिमा वर्मन के पांच नवगीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


जीने की आपाधापी में


कितने कमल खिले जीवन में
जिनको हमने नहीं चुना

जीने की
आपाधापी में भूला हमने
ऊँचा ही ऊँचा
तो हरदम झूला हमने
तालों की
गहराई पर
जीवन की
सच्चाई पर
पत्ते जो भी लिखे गए थे, 
उनको हमने नहीं गुना

मौसम आए मौसम बीते
हम नहिं चेते
अपने छूटे देस बिराना
सपने रीते
सपनों की
आवाजों में
रेलों और
जहाज़ों में
जाने कैसी दौड़ थी जिसमें
अपना मन ही नहीं सुना


कोयलिया बोली


शहर की हवाओं में
कैसी आवाज़ें हैं
लगता है
गाँवों में कोयलिया बोली

नीलापन हँसता है
तारों में
फँसता है
संध्या घर लौट रहा
इक पाखी तकता है
गगन की घटाओं में
कैसी रचनाएँ हैं
लगता है
धरती पर फगुनाई होली

सड़कों पर नीम झरी
मौसम की
उड़ी परी
नई पवन लाई है
मलमल की ये कथरी
धरती के आँगन में
हरियल मनुहारें हैं
लगता है
यादों ने कोई गाँठ खोली


मंदिर दियना बार


मंदिर दियना बार सखी री
मंगल दियना बार!
बिनु प्रकाश घट-घट सूनापन
सूझे कहीं न द्वार!

कौन गहे गलबहियाँ सजनी
कौन बँटाए पीर
कब तक ढोऊँ अधजल घट यह
रह-रह छलके नीर
झंझा अमित अपार सखी री
आँचल ओट सम्हार

चक्र गहें कर्मो के बंधन
स्थिर रहे न धीर
तीन द्वीप और सात समंदर
दुनिया बाजीगीर
जर्जर मन पतवार सखी री
भव का आर न पार!

अगम अगोचर प्रिय की नगरी
स्वयं प्रकाशित कर यह गगरी
दिशा-दिशा उत्सव का मंगल
दीपावलि छाई है सगरी
छुटे चैतन्य अनार सखी री
फैले जग उजियार 



 कचनार के दिन


 फिर मुँडेरों पर
 सजे कचनार के दिन

 बैंगनी से श्वेत तक
 खिलती हुई मोहक अदाएँ
 शाम लेकर उड़ चली
 रंगीन ध्वज सी ये छटाएँ
 फूल गिन गिन
 मुदित भिन-भिन
 फिर हवाओं में
 बजे कचनार के दिन

 खिड़कियाँ, खपरैल, घर, छत
 डाल, पत्ते आँख मीचे
 आरती सी दीप्त पखुरी
 उतरती है शांत नीचे
 रूप झिलमिल
 चाल स्वप्निल
 फिर दिशाओं ने
 भजे कचनार के दिन


वह झोली ही बदल गई


 पगडंडी सड़कों में बदली, 
 सड़क पुलों में बदल गई
 पार पुलों के
 आते आते
 जिसे बुना था
 बड़े शौक से
 वह झोली ही बदल गई

 याद नहीं
 हम कहाँ चले थे

 और कहाँ तक जाना था
 एक कहानी शुरू हुई जो
 उसे कहाँ ले जाना था
 जिस भाषा
 में बात शुरू की
 वह बोली ही बदल गई

 कौन थका
 कब कौन विरामा
 किसने बोझा थामा था
 कौन चल दिया राह छोड़ कर
 सफर में जो सरमाया था
 जिन लोगों
 के साथ चले थे
 वह टोली ही बदल गई



पूर्णिमा वर्मन  


  • जन्म : 27 जून 1955 को पीलीभीत में।
  • शिक्षा : संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि, स्वातंत्र्योत्तर संस्कृत साहित्य पर शोध, पत्रकारिता और वेब डिज़ायनिंग में डिप्लोमा।
  • कार्यक्षेत्र : पूर्णिमा वर्मन का नाम वेब पर हिंदी की स्थापना करने वालों में अग्रगण्य है। 1996 से निरंतर वेब पर सक्रिय, उनकी जाल पत्रिकाएँ अभिव्यक्ति तथा अनुभूति वर्ष 2000 से अंतर्जाल पर नियमित प्रकाशित होने वाली पहली हिंदी पत्रिकाएँ हैं। इनके द्वारा उन्होंने प्रवासी तथा विदेशी हिंदी लेखकों को एक साझा मंच प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। लेखन एवं वेब प्रकाशन के अतिरिक्त वे जलरंग, रंगमंच, संगीत तथा हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय विकास के अनेक कार्यों से जुड़ी हैं।
  • पुरस्कार व सम्मान : दिल्ली में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य अकादमी तथा अक्षरम के संयुक्त अलंकरण "प्रवासी मीडिया सम्मान", जयजयवंती द्वारा जयजयवंती सम्मान, रायपुर में सृजन गाथा के "हिंदी गौरव सम्मान", विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ, भागलपुर द्वारा मानद विद्यावाचस्पति (पीएच.डी.) की उपाधि तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान के पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार से सम्मानित।
  • प्रकाशित कृतियाँ : कविता संग्रह : पूर्वा, वक्त के साथ एवं चोंच में आकाश
  • संपादित कहानी संग्रह- वतन से दूर 
  • चिट्ठा : चोंच में आकाश, एक आँगन धूप, नवगीत की पाठशाला, शुक्रवार चौपाल, अभिव्यक्ति अनुभूति।
  • अन्य भाषाओं में- फुलकारी (पंजाबी में), मेरा पता (डैनिश में), चायखाना (रूसी में)
  • संप्रति : संयुक्त अरब इमारात के शारजाह नगर में साहित्यिक जाल पत्रिकाओं 'अभिव्यक्ति' और 'अनुभूति' के संपादन और कला कर्म में व्यस्त।
  • संपर्क : purnima.varman@gmail.com 
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