गुरुवार, 30 जुलाई 2015

कल्पना रामानी की गज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


सुनहरी भोर बागों में..



सुनहरी भोर बागों में, बिछाती ओस की बूँदें,
नयन का नूर होती हैं, नवेली ओस की बूँदें।

चपल भँवरों की कलियों से, चुहल पर मुग्ध सी होतीं,
मिला सुर गुनगुनाती हैं, सलोनी ओस की बूँदें।

चितेरा कौन है? जो रात, में जाजम बिछा जाता,
न जाने रैन कब बुनती, अकेली ओस की बूँदें।

करिश्मा है खुदा का या, कि ऋतु रानी का ये जादू,
घुमाकर जो छड़ी कोई, गिराती ओस की बूँदें।

नवल सूरज की किरणों में, छिपी होती हैं ये शायद,
जो पुरवाई पवन लाती, सुधा सी ओस की बूँदें।

टहलने चल पड़ें मित्रों, निहारें रूप  प्रातः का,
न जाने कब बिखर जाएँ, फरेबी ओस की बूँदें।



जिसको चाहा था..



जिसको चाहा था तुम वही हो क्या,
मेरी हमराह, ज़िंदगी हो क्या।

कल तो हिरनी बनी उछलती रही,
क्या हुआ आज, थक गई हो क्या।

ऐ बहारों की बोलती बुलबुल,
क्यों हुई मौन, बंदिनी हो क्या।

ढूँढती हूँ तुम्हें उजालों में,
तुम अँधेरों से जा मिली हो क्या।

महफिलें अब नहीं सुहातीं तुम्हें,
कोई गुज़री हुई सदी हो क्या।

क्यों मेरे हौसले घटाती हो,
मेरी सरकार, दिल-जली हो क्या।

प्यार से ही तो थी मिली तुमसे,
खुश नहीं फिर भी, सिरफिरी हो क्या।

थी नदी चंचला उफनती हुई,
सागरों से भला डरी हो क्या।

सुन रही हो, कि जो कहा मैंने
कोई फरियाद अनसुनी हो क्या।

'कल्पना' मैं कसूरवार नहीं,
रूठकर जा रही सखी हो क्या।



बदले हो तुम, तो है क्या..



बदले हो तुम, तो है क्या, मैं भी बदल जाऊँगी,
दायरा तोड़, कहीं और निकल जाऊँगी।

एक चट्टान हूँ मैं, मोम नहीं याद रहे,
जो छुअन भर से तुम्हारी, ही पिघल जाऊँगी।

जब बिना बात के नाराज़ हो दरका दर्पण,
मेरा चेहरा है वही, क्यों मैं दहल जाऊँगी?

मैं तो बेफिक्र थी, मासूम सा दिल देके तुम्हें,
क्या खबर थी कि मैं यूँ, खुद को ही छल जाऊँगी।

दर अगर बंद हुआ एक, तो हैं और अनेक,
चलते-चलते ही नए दौर में ढल जाऊँगी।

किसी गफलत में न रहना, कि अकेली हूँ सुनो
साथ मैं एक सखी लेके गज़ल जाऊँगी।

जो मुझे आज तलक, तुमने दिये हैं तोहफे,
वे तुम्हारे ही लिए छोड़ सकल जाऊँगी।

‘कल्पना’ सोच के रक्खा है जिगर पर पत्थर,
पी के इक बार जुदाई का गरल जाऊँगी।


कल्पना रामानी 


  • जन्म -6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

पुस्तक चर्चा: कवि महेंद्रभटनागर का चाँद-खगेंद्र ठाकुर




कुछ और जीना चाहता हूँ..


‘चाँद, मेरे प्यार!’ नाम से महेंद्रभटनागर के मात्र प्रेम-गीतों का एक विशिष्ट संकलन प्रकाशित हुआ है। इसमें संकलित 109 गीतों का चयन उनके पूर्व-प्रकाशित कविता-संग्रहों में से किया गया है। चयन स्वयं कवि ने किया है। ये प्रेम-गीत चाँद के माध्यम से व्यक्त हुए हैं। महेंद्रभटनागर जी के अन्य विषयों से सम्बद्ध और भी संचयन प्रकाशित हैं; पर मैं प्रेम-गीतों पर ही लिख पा रहा हूँ। इस लेख से हिंदी-कविता के पाठक उनकी कविता की ओर प्रेरित हुए तो मुझे प्रसन्नता होगी और मैं अपना श्रम सार्थक समझूंगा। मैं समझता हूँ कि कवि-कर्म कोई निष्काम कर्म नहीं होता। लेकिन लिखने मात्र से यश नहीं मिलता। उसके पीछे आजकल तो आलोचकों से पहले प्रकाशकों की भूमिका होती है।
मैं 1957-59 में ‘पटना विश्वविद्यालय’ में एम. ए. (हिंदी) का छात्र था, तभी महेंद्रभटनागर जी की कविताएँ पढ़ता था। तभी से नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और मुक्तिबोध आदि प्रगतिशील कविता के प्रतिनिधि माने जाते रहे हैं। प्रगतिशील कविता ही नहीं छायावादोत्तर हिंदी-कविता का इतिहास इन्हीं कवियों से बनता है। ‘चाँद, मेरे प्यार!’ के गीत रूमानी भावधारा की याद दिलाते हैं। लेकिन गीतों के इतिहास में ये उल्लेखनीय हैं। मुझे नागार्जुन की एक बात याद आती है, वह यह कि अगर कोई पाठक कुछ गुनगुनाना चाहे, तो उसे पीछे की कविताओं को ही मुड़ कर देखना होगा। इस दृष्टि से महेंद्रभटनागर जी के ये गीत ध्यान देने योग्य हैं।
पहली रचना है ‘राग-संवेदन’, जिसमें कवि एक सामान्य सत्य की तरह जीवन का यह सत्य व्यक्त करता है —
सब भूल जाते हैं
केवल / याद रहते हैं
आत्मीयता से सिक्त
कुछ क्षण राग के !
कवि राग यानी अनुराग यानी प्रेम को याद रखने की बात कहते हैं। ‘राग’ को छंद और ध्वन्यात्मक लय से भी जोड़ा जा सकता है। राग जीवन में दुर्लभ होता है, खास कर के समकालीन जीवन में, इसीलिए तो कवि उसे याद रखने का विषय समझता है। इस कलन में अनेक ऐसे गीत हैं, जिनके आधार पर महेंद्रभटनागर जी को याद रखा जा सकता है। उनमें सफल अभिव्यक्ति है। एक गीत है ‘जिजीविषा’। कवि कहता है —
अचानक
आज जब देखा तुम्हें
कुछ और जीना चाहता हूँ!
पारस्परिक आकर्षण और प्रेम से जीने की इच्छा बढ़ती है और शायद जीने की शक्ति भी। जब आदमी अपने प्रिय पात्र को देखता है, तो जि़न्दगी के दाह के बावजूद कवि कहता है —
विष और पीना चाहता हूँ!
कुछ और जीना चाहता हूँ!
जब अकेलापन दूर हो जाता है, तो जिजीविषा मज़बूत होती है। यह एक श्रेष्ठ भावना है, जो कविता को श्रेष्ठ बनाती है।
इस संकलन की कविताएँ विविध प्रसंगों के साथ विविध प्रकार से विविध अदाओं में प्यार की भूमिका, प्यार की महत्ता, और प्यार की शक्ति महसूस कराती हैं। एक जगह कवि कहता है —
याद आता है
तुम्हारा रूठना!
इसके जरिये कवि जीवन के अनेक प्रसंग कवि को याद आते हैं। प्यार की अभिव्यक्ति स्मृति के रूप में आती है। जाहिर है कि वर्तमान जीवन में प्यार का अभाव है। कवि कहता है कि प्यार की स्मृति आगे जीने का सहारा बनता है। प्यार की स्मृति में भी जीवनी शक्ति है —
शेष जीवन
जी सकूँ सुख से
तुम्हारी याद काफ़ी है!
यह है प्यार की स्मृति की शक्ति। कवि के लिए प्यार बहुत व्यापक है। मनुष्येतर प्राणी  भी प्यार का साधन  है —
गौरैया हो
मेरे आँगन की
उड़ जाओगी!
यद्यपि गौरैया यहाँ रूपक है, फिर भी वह प्रेम का आलम्बन भी है। कवि को इस बात का अनुभव है कि जीवन आमतौर से दुःखद है और आदमी सुख पाने के लिए तरसता रहता है। ज़रूरी नहीं कि वह सुख भौतिक साधनों से ही मिले। वह किसी का प्यार पाने से भी मिलता है —
क्या-क्या न जीवन में किया
कुछ पल तुम्हारा प्यार पाने के लिए!
इस सम्पूर्ण संकलन की कविताएँ तरल और सुखद प्रेम की भावुकता से लबालब भरी हुई हैं। एक गीत है ‘रात बीती’, उसकी प्रारम्भिक पंक्तियाँ हैं —
याद रह-रह आ रही है
रात बीती जा रही है!
याद आती है रात में, अँधेरे में, शायद प्रेम और स्मृति के लिए अँधेरे का एकांत अधिक उपयुक्त होता है, लेकिन रात बीतती भी है यानी प्यार की स्मृति का समय स्थायी नहीं होता। ‘रह-रह याद ’ आने में एक प्रकार की असंगति है। पाठक यह सोच सकता है कि रात बीत जाने के बाद यादों का क्या हो जाता है? इस प्रसंग में यही सोचना चाहिए कि प्रेम लपेटे अटपटे बैन हैं ये। कविता का झुकाव गुज़रे दिनों की ओर है। उपर्युक्त गीत में ही वे लिखते हैं —
झूमते हैं चित्र नयनों में कई
गत तुम्हारी बात हर लगती नयी
आज तो गुज़रे दिनों की
बेरुखी भी भा रही है!
यह प्रेम पात्र की विशेषता है कि उसके प्रभाव से विगत बात भी नयी लगती है और गुज़रे दिनों की बेरुखी भी भा रही है। समय की गतिशीलता पर कवि की नज़र है। प्रेम-पात्र के अभाव में ‘मुरझाया-सा जीवन-शतदल’ लगता है। इस अभिव्यक्ति से प्रेम की महत्ता प्रकट होती है।
रात प्रेम की अभिव्यक्ति का उपयुक्त समय है, इसकी परम्परा भी है। प्रेम केवल भावना नहीं है। वह भौतिक सुख का माध्यम भी है। प्रेमी को लगता है शशि दूर गगन से देख रहा है, जैसे कि रात भी एकांत नहीं रहती। प्रेम का भंडार अथाह है, अक्षय है। रात बीत जाती है,  लेकिन प्रेम-वार्ता ख़त्म  नहीं होती।  इसके बावज़ूद कवि कहता है —
सारे नभ में बिखरी पड़ती है मुसकान
पर कितना लाचार अधूरा है अरमान!
प्रेम की मुसकान का सारे नभ में बिखरा होना — तारों के प्रसंग में अच्छी अभिव्यक्ति है, रोचक कल्पना है। कवि के अरमान इतने ज़्यादा हैं कि अनन्त आकाश में मुसकान बन कर बिखर जाने के बावजूद अरमान अधूरे रह जाते हैं।
चाँद में कवि के लिए आकर्षण है, लेकिन चाँद तो  आकाश में है। कवि कहता है —
मुझे मालूम है यह चाँद
मुझको मिल नहीं सकता,
कभी भी भूल कर स्वर्गिक
महल से हिल नहीं सकता।
कवि कहना चाहता है कि प्यार तर्क का विषय नहीं है। वह भावना का विषय है, भावुकता में बुद्धि-विवेक स्थगित हो जाते हैं। यही कारण है कि प्रेमिका उजड़ी फुलवारी को भी बडे़ जतन से सजाती है। असल में कवि प्रेम को सदाबहार मधुमास और बरसात समझता है। प्रेम भावना के साथ विश्वास का भी विषय है, इसीलिए विश्वास भी तर्क का विषय नहीं है। तर्क विश्वास को खंडित कर सकता है, अतः वहाँ तर्क की ज़रूरत नहीं होती। प्रेम कविता का शाश्वत विषय है। इसीलिए इस बात की गुंजाइश वहाँ कम ही होती है कि नये प्रसंग, नये संदर्भ और अभिव्यक्ति की नयी भंगिमा आये। यह बात महेंद्रभटनागर के गीतों पर भी लागू है। 
हिंदी-गीत ने विकास के क्रम में परिवर्तन के अनेक दौर देखे हैं, जैसे नवगीत, जनगीत आदि। महेंद्रभटनागर जी परिवर्तन की इस प्रक्रिया से अप्रभावित अपनी गति से चलते रहे हैं। इनकी भाषा-भंगिमा भी रूमानी गीतों वाली है। यही कारण है कि ये गीत आलोक, चाँद, घन, दीपक, स्वप्न, आदि प्रतीक बन कर बार-बार आते हैं। यह प्रवृत्ति विगतकाल होने के कारण गतिशील इतिहास द्वारा ही उपेक्षित हो जाती है। समकालीनता जिनमें नहीं है, शाश्वतता है, जब कि काव्य-धारा में शाश्वत कुछ भी नहीं होता। आलोचक आम तौर से समकालीन और आधुनिक को पहचानने की कोशिश करता है। वह रचना के यथार्थ के चरित्र को पहचानने की कोशिश करता है। इसीलिए गतानुगतिक प्रवृत्तियाँ उपेक्षित रह जाती हैं, और ऐसा होना स्वाभाविक है।

डॉ.महेंद्रभटनागर 


110, बलवन्तनगर, गाँधी रोड, 
ग्वालियर-474 002 (म॰ प्र॰)
फ़ोन : 0751-4092908
ई-मेल: drmahendra02@gmail.com

शनिवार, 25 जुलाई 2015

सजन मुरारका की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


दर्द 


गहराई से
उठती टीस का 
दर्द बयान
कर नहीं सकते 
लोक लाज का
उलाहना
मुझे ही डसते
जब अपनों का 
बेरूखापन
रिश्तों को तार तार करते
दौलत का
अंधापन 
दूरियां बड़ाते
दर्द सहकर
होकर मौन
नज़ारे देखते
क्यों कि मेरे 
स्वाभिमान 
इस से नहीं दबते 
और तभी मेरा वजूद 
उनकी नज़र में
खूब उलझते 
क्यों की उम्र की
दहलीज़ पर 
हम जैसों के हाल
प्रायः यह ही होते


यौवन ज्वाला


लहर अंग-अंग मे
नव यौवन की
अठखेली करती लता-सी
निज तन,निज मन भ्रमाय
खिले-खिले फूल से
वसन्त की हरियाली-सी
हर अदा मे बवार देती फैलाय
विभोर रास-रंग मे
भ्रमित चित्त- प्रणय ज्वाला की
भिन्न भिन्न उमंग से
विचरे अभिलाषित पंख फैलाय
मुखर या फिर मौन सी
आनन्द विभोर मन ही मन मे
पुलकीत हो बार-बार
कम्पित अधर मुस्कान मे
निश्चल नयन मे सपने सजाय
रूप के मोहिनी जादु से
प्रणय-गान गुंजन से
लावण्य, कोमलता से इतराय
श्रृंगार की मूक दृष्टि मे
देखे नयन सचल 
अपल हो दृष्टिमे स्तब्ध सी
दिगभ्रमित आपने ही हो जाये!
छबि प्रियतम की
ह्रदय मे बाँधकर
तनकी-लता सन्देशीका सी
प्रथम प्रणय के भाव मे
कैसे सहज,लज्जित चुपचाप
विमुख अपने से
निमेषहीन नयनों से तकाय!
सर्बसुख प्रियतम मे
प्यार ही सर्वस्व प्रतीत पाय
बहका-बहका विवेक
अधीर और भी अस्थिर
कुल मान-संस्कार निष्फल,निश्प्राय
देह-मे रति झुलसे
पंकिल हो चाहे सलिल-
या लघु लगे प्यार मे
भावों की हर सीमा लाँघ जाय
सुखद या मनोहर सी 
व्यर्थ अभिमान से
विचार-बुद्धी से सोच न पाय 
शत बार गर्वित प्यार मे
नभ से बरसती धारा सी
धरती मे समाने को मचल जाय !


मन की भूख


कवि,तुम जो लिखते हो
सोच के सागर मे
कई-कई बार
पहले डुबकी लगाकर!
भावनाओं के मोती
या गहराई से
जलज़-सिक्त
धुली हुई मिट्टी
उठाकर या बटोरकर
रूप देते !
मासूम चुलबुला शैशव
पल्लवित किशोर अवस्था
उतेज़ित यौवन 
झुरियों भरी अधेड़ उम्र
और थका-हारा वार्धक्य
हर तरह का वर्णन!
प्रेम-वियोग,सुख-दु:ख
बन्ध आँखों से
उखड्ती साँस,असहाय दर्द
लहु को करे सर्द या ज़ोशीला
दिल दहलानेवाली बात
लिखते तुम,लिख सकते 
परन्तु! लिखते ही क्यों ?
मैं सोचता-भूख के कारण
रोटी,कपड़ा,मकान 
यश,प्रतिष्ठा,मान-सन्मान
व्यवस्था,अव्यवस्था के दंशन
नीति-अनीति के कथन
कहे-अनकहे वचन
जो शब्द नहीं:-
सिर्फ़"भूख"के प्रतिफलन 
हम सब भूखें,भूख मिटाने
कविता लिखते हैं
पर यह पेट नहीं भरता 
सिर्फ भरे दिमाग और मन


एक दहकता सवाल ...


यह मेरी माँग में
सिंदूर भर के 
पहनाया मंगलसूत्र 
सात फेरों में बंध
कसम खाई 
यह कहते हुए
कि मेरे दुःख-सुख में 
जीते जी 
साथ निभाओगे 
कुछ बरस बाद 
आज यह ज़ख्म
कर रहा सवाल
चीख़-चीख़ के 
कि क्या तुम उत्तरदायी नहीं 
या सिर्फ़ मैं ही ?
अकेले 
प्रजनन कर पाती 
वंश बेल 
यह कैसे तय हो पाया 
स्त्री होने के नाते 
सारा कसूर मेरा 
या आज तुम्हारा पुरुषत्व 
अपना 
दर्शा रहा है 
सदियों से 
चला आ रहा 
नपुंसक दोगलापन


दायित्व 


समाज ने फैलाई
यह सामाजिक बुराई
दहेज लेना
नारी को
अपनी संतुष्टि का
साधन समझ
बड़ते रहना
जैसे खरीद बिक्री का
हो कोई सामान
मगर आज

परिणाम प्रश्न जगाये
कन्याओं की कमी
समाज की उलझन
बड़ते अपराधीकरण
निश्चित जताती
आदिम लालसा
शारीरिक आकांक्षा
विसर्जित करता
समस्त मर्यादा
यह सामाजिकता
हमारी देन
हमने फैलाई
असमानता
आखिरकार इसका अंत
हमें ही करना


सजन कुमार मुरारका


Nutanganj
P.O.+ Dist.Bankura - 722,101
(पश्चिम बंगाल)
मोबाइल No.09434743802
ईमेल: sajanmurarka@gmail.com

सोमवार, 20 जुलाई 2015

मंजुल भटनागर की रचनाएँ


 चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


नदी 



नदी का जल
बादल की बूंद बन
बहता है घने जंगल की
डालियों पर
मुग्ध हो जाता है वह
एकाकार हो
जंगल झाँकने लगता है उसमे

साफ़ परिदृश्य
पाखी ,तितली ,हिरण और
अनछुई बदली
छू लेती है
नदी का अंतर्मन

जब नदी बर्फ हो
बूंद बूंद बन उड़ रही थी
तो भी नदी का रंग
श्वेत ही था
उडती भाप सा

नदी हमेशा से पाक
पवित्र थी,
जब गाँव गाँव भटकी
जब शहर घूमी
जब समुन्द्र से ,मिली
या फिर बादल बन ढली

बचा सको तो नदी का रंग
बदरंग होने से
तो नदी बनना होगा
तर्पण करना होगा

अपने आँख की
बहती अश्रु धारा बचानी होगी
जहाँ से फूटते हैं सभी
आत्मीय स्त्रोत।



बुनता है मन



बुनता है मन
रोज हजारों अहसास
अलसाई सी आँखों में रोज
जैसे कोई रख जाए ढेरों ख्वाब।

सूरज रख जाता है
हजारों रंग अंजुरी में
चुग ने नही आती कोई चिड़िया
यूँ ही चलता रहता है परिसंवाद।

कुछ टुकड़े आसमान के रंगों के
मिलते हैं तितलियों के पंखों में
तितलियाँ सिमटती चित्रों में
खोलती अपने न मिलने का राज।

पुरानी सी हवेली
लिपि पुती सी मायूसी
खिड़की से कूद कर आती
ताज़ी हवा ओ गुनगुनाती एल्बम.
मिल जाय,
जैसे कोई अपना ख़ास।

हजारों चित्र समय के आगोश में
पहचान खोते
दूर उड़ता सा पाखी जैसे
खो जाए क्षितिज में उड़ते उड़ते
हो जाय दृष्टी से ओझल
फिर न कभी
मिलने की हो आस।



जैसे सूरज की रोशनाई है..



कुछ बूंदें हैं
कुछ अमराई है
भीग गया कुछ अंतर्मन में
दूर नदी बह आई है
भीगा तन है भीगा अंतर्मन
भीग गयी तरुनाई है।

गुपचुप शाखें
चुप चुप सड़के टुकड़े होती
चुप्पी कहती रात अँधेरी
भूले ख़त ले आई है।

टुकड़े होते बेबस लम्हें
दिन भी बाँट जोहता
यादों के टुकड़े जुड़ जाते
वक्त चल रहा बिलकुल वैसे
जैसे खुदा की आशनाई है।

जिन्दगी इंद्रधनुष सी बन कर
वो पल फिर जी आई है
वो भूला मंजर
सर्द कहानी,लगे रूहानी
भीगा सा पनघट
इंद्रधनुष यूँ सोहे अम्बर
जैसे सूरज की रोशनाई है।



जीवन क्रम 



धान का पका खेत
खेत नहीं होता
होता है एक सदविचार
मशक्कत का उपहार

किसान के खेत में
छिपी रहती हैं अनगिनत आँखें
आशा की
भूख की
जीवन रस टपकता है
प्रेम बन

सूरज तपता है
भाप बन
बुनता है बादल
बरसता मेघ
सिर्फ पानी नहीं होता
प्रेम होता है

अम्बर से बरसता है नेह
धरती से कौंपल
झांकती है
जीवन क्रम यूँ ही निरंतर चलता है..!



कैसा रूप धरा..



जलमग्न धरा
देखा नही सूरज
मिलती नहीं किरने
बादल ने ली अंगडाई है
धरा ने यह कैसा रूप धरा।

बरसता मेह अविरल
हवाओं को साथ लिए
पातो पर बांसुरी बज रही
बुँदे टिप-टिप
घनघोर टपकारे
पंछी कहाँ जाएँ बेचारे।

आम पत्र झूम रहे
ले सुगन्ध डोल रहे
खोज रहे कोयलिया
नहीं सुनाती गीत आज
न जाने कहाँ छिपी हो ले साज।

बादल घनघोर हैं
नहीं मिल रहा छोर आज
मंद-मंद पछुआ हवा
बदली का दुकूल लिए
बह रही तरंगित आज।



मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम, मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

बुधवार, 15 जुलाई 2015

दो ग़ज़लें-अवनीश त्रिपाठी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


धुंध कुहरा ओस की..


धुंध कुहरा ओस की आदत बदलनी चाहिए
धूप की चादर हवा के साथ चलनी चाहिए।

शब्द अर्थों की हुई आहट नई पहचान कर
इस हृदय में कल्पना कोरी मचलनी चाहिए।

दूब की पतली कलाई थामकर आई हवा
साँझ की मेंहदी लगाकर धूप ढलनी चाहिए।

फूल खिलते जा रहे हैं गुलमोहर के आजकल
बादलों की बूँद उन पर भी उछलनी चाहिए।

सृष्टि के उद्भास की उत्कृष्ट हो परिकल्पना 
सब घरों के दीवटों पर ज्योति जलनी चाहिए।

घोर सम्वेदन, घने संत्रास से आँखें थकीं
रात लोरी गुनगुनाए, नींद पलनी चाहिए।

नेह के अक्षत धरे हैं प्रीति के हर द्वार पर
छलछलाती लाज अधरों पर मचलनी चाहिए।



छीनकर मेरा तबस्सुम..


छीनकर मेरा तबस्सुम,मुस्कुराई आज फिर,
ज़िन्दगी से मौत की है आशनाई आज फिर।

हो गई ख़ामोश मेरे इश्क़ की दुनिया मगर,
मुस्कुराकर आग उसने क्यों लगाई आज फिर।


तिश्नगी बढ़ती गई जब ख्वाहिशों की चार सू,
अब दिलों में देखता हूँ ख़ुदनुमाई आज फिर।

ख़ुशबुओं के दर्द को पहचानता ही कौन अब,
ये हवा भी बेरुख़ी से तिलमिलाई आज फिर।

हो गईं बर्बाद फसलें,बारिशें थीं साल भर,
जून कैसा,क्या मई,कैसी जुलाई आज फिर।

इक नदी के दो किनारे हो न जाएँ हम कहीं
हाथ से छूटी हुई तेरी कलाई आज फिर।

प्यास बाक़ी है अभी तक इस पतंगे में बहुत,
महफ़िलों से जोर की आवाज़ आई आज फिर।।


अवनीश त्रिपाठी


ग्राम/पोस्ट-गरएं,भरखरे
सुलतानपुर (उ.प्र.)-227304
मोबाइल-9451554243

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

सुशीला शिवराण के दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



पावन अपना प्यार


आँखों का काजल हुआ,तीखा नयन कटार।
उतरी पी के चित्त में,पाया नेह अपार।।

सरहद के इस पार या,सरहद के उस पार।
अम्‍न-पसंद अवाम है,सियासतें मक़्कार।।

क्यों होता भयभीत मन,संबल रख तू साथ।
सत्य-डगर पर चल पथिक,रक्षक हैं रघुनाथ।।

चाँद बिना कटती नहीं,सीली-सीली रात।
तारों से हो गुफ़्तगू,आँखों से बरसात।।

पोथी में ही रह गया,मानवता का पाठ।
जिसको देखो कर रहा,सोलह दूनी आठ।।

पल-पल तेरा रूठना,पल-पल में मनुहार।
गुस्से में भी प्यार है,अँसुवन झरे दुलार।।

रोशन जुगनू-सा रहे,कितना हो अँधियार।
मंदिर के इक दीप-सा,पावन अपना प्यार।।

दौलत-दंभ निगल गए,सत्य-भरोसा-प्यार।
शक़ की दीमक खा गई,रिश्तों का आधार।।

दिल की पतिया बाँच लो,तुम जो मेरे मीत।
हर धड़कन संगीत हो, साँस-साँस हो गीत।।

ना पैरों नीचे धरा,ना सर पर आकास।
उजड़े-उजड़े दिन लगें,रातें लगें उदास।।

माँ ने मुझको दे दिया,जो था उसके पास।
त्याग-नेकियाँ-सादगी,अपनी पूँजी ख़ास।।

ग़ुल-ख़ुशबू के संग-सा,तेरा मेरा प्यार।
महक रहा लोबान-सा,रूहानी इक़रार।।

नित पौ-बारह कर रहे,नेता और दलाल।
ख़ून-पसीना एक कर,श्रमिक रहें बदहाल।।

लहर-लहर बहती रही,मेरे मन में प्रीत।
मैं बिरहा गाती रही,ओ मेरे मनमीत॥

यहाँ भेड़ की खाल में,असली रँगे सियार।
खंजर घोंपा पीठ में,समझा जिनको यार।।


सुशीला शिवराण


बदरीनाथ–813,
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,
गुड़गाँव–122011
दूरभाष–09873172784
ईमेल-sushilashivran@gmail.com


सुशीला शिवराण


  • जन्म : 28 नवंबर 1965 (झुंझुनू,राजस्थान)
  • शिक्षा : बी.कॉम.,दिल्ली विश्‍वविद्‍यालय, एम.ए. (अंग्रेज़ी) राजस्थान विश्‍वविद्‍यालय, बी.एड.,मुंबई विश्‍वविद्‍यालय।
  • पेशा : अध्यापन। पिछले तेईस वर्षों से मुंबई, कोचीन, पिलानी,राजस्थान और दिल्ली में शिक्षण। वर्तमान समय में गुड़गाँव में शिक्षणरत।
  • रुचि : हिन्दी साहित्य, कविता पठन और लेखन में विशेष रुचि। स्वरचित कविताएँ कई पत्र-पत्रिकाओं – हरियाणा साहित्य अकादमी की ‘हरिगंधा’, अभिव्यक्‍ति–अनुभूति, नव्या, अपनी माटी, सिंपली जयपुर, कनाडा से निकलने वाली ‘हिंदी चेतना’, नेपाल से निकलने वाली ‘नेवा’ सृजनगाथा.कॉम, आखर कलश, राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की बीकानेर की जागती जोत, हाइकु दर्पण, दैनिक जागरण और अमेरिका में प्रकाशित समाचार पत्र ‘यादें’ में प्रकाशित। हाइकु, ताँका और सेदोका संग्रहों में भी रचनाएँ प्रकाशित।
  • हरेराम समीप द्‍वारा संपादित दोहा कोश में दोहे प्रकाशित।
  • नेपाल से निकलने वाली ‘शब्द संयोजन’ में कविताएँ नेपाली भाषा में अनूदित और प्रकाशित
  • जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल एवं बीकानेर साहित्य एवं कला उत्सव में एक रचनाकार के रुप में काव्यपठ तथा वक्‍तव्य।
  • ऑल इंडिया रेडियो पर अनेक बार कविता पाठ, दूरदर्शन पर दोहा-गोष्‍ठी में दोहों का वाचन
  • २३ मई २०११ से ब्लॉगिंग में सक्रिय। इसके अतिरिक्‍त खेल और भ्रमण प्रिय। वॉलीबाल में दिल्ली राज्य और दिल्ली विश्‍वविद्‍यालय का प्रतिनिधित्व।
  • ब्लॉग: www.sushilashivran.blogspot.in
  • संपर्क: बदरीनाथ–813, जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-56,गुड़गाँव–122011
  • दूरभाष: 09873172784
  • ईमेल: sushilashivran@gmail.com

रविवार, 5 जुलाई 2015

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के दोहे

अवधेश मिश्र की कलाकृति


कैसा यह संसार..


समझ न पाया आज तक, होरी है मतिमंद।
महाजनों ने हर तरफ,बिछा दिये हैं फंद।।

निरपराध धनिया खड़ा, कौन करेगा माफ़।
है धनिकों के पास में, बिका हुआ इन्साफ।।

सुना रहा है आजकल, वही खबर अखवार।
लूट,क़त्ल,धोखाधड़ी, घोटाले,व्यभिचार।।

जीवन के इस गाँव में, ठीक नहीं आसार।
मुखिया के संग हर घडी, गुंडे हैं दो-चार।।

ठगी रह गयी द्रोपदी, टूट गया विश्वास।
संरक्षण कब मिल सका,अपनों के भी पास।।

समझा सकी न झोंपड़ी, अपना गहन विषाद।
मन की भाषा और थी,और हुआ अनुवाद।।

समझा वह अच्छी तरह, कैसा यह संसार।
फिरता रहता आजकल, लेकर शब्द उधार।।

आशाएं धूमिल हुईं, सपने हुए उदास।
सब के द्वारे बंद हैं, जाएँ किसके पास।।

मंहगाई के दौर में, सरल नहीं है राह।
जीवन नैया डोलती,दुःख की नदी अथाह।।

मौन खड़े  हैं आजकल, मीरा,सूर,कबीर।
लोगों को सुख दे रही, आज पराई पीर।।

कैसे झेले आदमी, मंहगाई की मार।
सूख रहे है द्वार पर, सपने हरसिगार।।

छूएगी किस शिखर को, मंहगाई इस साल।
खाई में जनता गिरी,रोटी मिले न दाल।।


जीवन यापन के लिए, कोशिश हुईं तमाम।
पेट,हाथ खाली रहे,मिला बन कोई काम।।

खाली ,खाली मन मिला, सूने सूने नैन।
दुविधाएं मेहमान थीं, गाँव बहुत बेचैन।।

फसी भंवर में जिंदगी, हुए ठहाके मौन।
दरवाजों पर बेबशी,टांग रहा है कौन।।

इस मायावी जगत में, सीखा उसने ज्ञान।
बिना किये लटका गया,कंधे पर अहसान।।

महानगर या गाँव हो,एक सरीखे लोग।
परम्पराएँ भूल कर,भोग रहे है भोग।।

                                        


त्रिलोक सिंह ठकुरेला


बंगला संख्या-99
रेलवे चिकित्सालय के सामने
आबू रोड-307026
( राजस्थान )
मो-946071426



त्रिलोक  सिंह ठकुरेला


  • शैक्षणिक उपलब्धियां-विद्युत अभियांत्रिकी में डिप्लोमा
  • पद-रेलवे में इंजीनियर
  • प्रकाशन-नया सवेरा (बाल-साहित्य)
  •         -काव्यगंधा (कुण्डलिया संग्रह)
  •         -आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ (लघुकथा संकलन)
  •         -कुण्डलिया छंद के सात हस्ताक्षर (कुण्डलिया संकलन)
  •         -कुण्डलिया कानन (कुण्डलिया संकलन)
  • सम्मेलनों/ कार्यशालाओं में  प्रतिभागिता-कतिपय सम्मेलनों में प्रतिभागिता
  • सम्मान/पुरस्कार-राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर (राजस्थान) द्वारा शम्भूदयाल  सक्सेना बाल- साहित्य पुरस्कार
  • पंजाब कला साहित्य अकादमी,जालंधर (पंजाब) द्वारा 'विशेष अकादमी पुरस्कार '
  • विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ,गांधीनगर (बिहार) द्वारा विद्या वाचस्पति
  • हिन्दी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग द्वारा 'वाग्विदाम्बर सम्मान'
  • निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान,बस्ती द्वारा 'राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान'
  • हिन्दी  भाषा साहित्य परिषद,खगड़िया (बिहार) द्वारा 'स्वर्ण सम्मान'.साथ ही  अन्य अनेक सम्मान
  • अन्य प्रासंगिक जानकारी-कुण्डलिया छंद के उन्नयन, विकास और पुनर्स्थापना हेतु कृतसंकल्प एवं समर्पित
  • ब्लॉग-www.triloksinghthakurela.blogspot.com                                   
  • संपर्क-बँगला संख्या-99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड, सिरोही,राजस्थान-307026 ( भारत ) 
  • फोन/ फैक्स-02974221422/ 09460714267/ 07891857409
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