सोमवार, 30 मार्च 2015

कल्पना रामानी के दोहे



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


सुखद घनेरी छाँव..



कर में बसते देवता, कर दर्शन नित प्रात,
एक नए संकल्प से दिन की हो शुरुवात।

कर दाता, कर दीन भी, जैसा करें प्रयोग।
छिपा हुआ हर हाथ में, सुख दुख का संजोग।

दिखलाती हर रेख है, जीवन की तस्वीर।
अपने हाथ सँवार लें, खुद अपनी तकदीर।

अपनेपन से है बड़ा, नहीं दूसरा भाव।
हाथ मिले तो गैर भी, करे नेक बर्ताव

गुस्से में जब कर उठे, मन हो जाता खिन्न।
सहलाए कर प्यार से, तो हो वही प्रसन्न।

अंतर में चाहे भरा, कितना भी दुर्भाव।
होता स्नेहिल स्पर्श से, पशु मन में बदलाव।

कर से ही निर्माण हैं, कर से ही विध्वंस,
या तो मनुज कहाइए, या फिर दनुज नृशंस।

हवा विषैली हो चली, चलो विहग उस गाँव। 
जहाँ स्वच्छ आकाश हो, सुखद घनेरी छाँव।
  
भूख बढ़ी है शहर में, पड़ने लगा अकाल। 
क्या खाओगे तुम, तुम्हें खा जाएगा काल।
   
राहें हैं दुर्गम बड़ी, मगर न टूटे आस, 
भर लो कोमल पंख में, एक नया उल्लास।



कल्पना रामानी 

 

  • जन्म तिथि-6 जून 1951 (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक 
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।  
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’ की सह संपादक। 
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’ 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com

बुधवार, 25 मार्च 2015

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुंडलियाँ


विनोद शाही की कलाकृति


(एक) 


सोना तपता आग में , और निखरता रूप .
कभी न रुकते साहसी , छाया हो या धूप.
छाया हो या धूप , बहुत सी बाधा आयें .
कभी न बनें अधीर ,नहीं मन में घवराएँ .
'ठकुरेला' कविराय , दुखों से कैसा रोना .
निखरे सहकर कष्ट , आदमी हो या सोना .


(दो) 


होता है मुश्किल वही, जिसे कठिन लें मान.
करें अगर अभ्यास तो, सब कुछ है आसान.
सब कुछ है आसान, बहे पत्थर से पानी.
यदि खुद करे प्रयास , मूर्ख बन जाता ज्ञानी.
'ठकुरेला' कविराय , सहज पढ़ जाता तोता.
कुछ भी नहीं अगम्य, पहुँच में सब कुछ होता.


(तीन) 


मानव की कीमत तभी,जब हो ठीक चरित्र.
दो कौड़ी का भी नहीं, बिना महक का इत्र.
बिना महक का इत्र, पूछ सदगुण की होती.
किस मतलब का यार,चमक जो खोये मोती.
'ठकुरेला' कविराय ,गुणों की ही महिमा सब.
गुण,अबगुन अनुसार,असुर,सुर,मुनिगन,मानव.


(चार)


पाया उसने ही सदा,जिसने किया प्रयास.
कभी हिरन जाता नहीं, सोते सिंह के पास.
सोते सिंह के पास,राह तकते युग बीते.
बैठे -ठाले व्यक्ति , रहे हरदम ही रीते.
'ठकुरेला' कविराय ,समय ने यह समझाया.
जिसने किया प्रयास ,मधुर फल उसने पाया



हाइकु गीत-सुनो! कबीर..


सुनो ! कबीर  
बचाकर रखना 
अपनी  पोथी ।
सरल  नहीं  
गंगा  के  तट पर
बातें  कहना  ,
घड़ियालों  ने  
मानव  बनकर 
सीखा रहना ,
हित  की  बात 
ज़हर  सी लगती 
लगती थोथी ।
बाहर  कुछ 
अन्दर से  कुछ  हैं 
दुनिया  वाले ,
उजले  लोग ,
मखमली कपड़े,
दिल हैं  काले ,    
सब  ने रखी
ताक  पर  जाकर 
गरिमा  जो थी ।  


त्रिलोक सिंह ठकुरेला


बंगला संख्या-99
रेलवे चिकित्सालय के सामने
आबू रोड-307026 (राजस्थान)
मो-946071426
ई-मेल-trilokthakurela@gmail.com



त्रिलोक  सिंह ठकुरेला 



  • शिक्षा-        विद्युत अभियांत्रिकी में डिप्लोमा 
  • प्रकाशन-     नया सवेरा (बाल-साहित्य)
  •                   -काव्यगंधा (कुण्डलिया संग्रह) 
  •                   -आधुनिक हिन्दी लघुकथाएँ ( लघुकथा संकलन)
  •                   -कुण्डलिया छंद  के  सात हस्ताक्षर ( कुण्डलिया संकलन)
  •                   -कुण्डलिया कानन ( कुण्डलिया संकलन)
  • सम्मेलनों/ कार्यशालाओं में  प्रतिभागिता-कतिपय सम्मेलनों में प्रतिभागिता 
  • सम्मान/पुरस्कार-राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर (राजस्थान ) द्वारा शम्भूदयाल  सक्सेना बाल- साहित्य पुरस्कार 
  • पंजाब कला साहित्य अकादमी,जालंधर (पंजाब) द्वारा 'विशेष अकादमी पुरस्कार '
  • विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ,गांधीनगर (बिहार) द्वारा विद्या वाचस्पति
  • हिन्दी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग द्वारा 'वाग्विदाम्बर सम्मान'
  • निराला साहित्य एवं संस्कृति संस्थान,बस्ती द्वारा 'राष्ट्रीय साहित्य गौरव सम्मान'
  • हिन्दी  भाषा साहित्य परिषद,खगड़िया (बिहार) द्वारा 'स्वर्ण सम्मान'.साथ ही  अन्य अनेक सम्मान 
  • अन्य प्रासंगिक जानकारी-कुण्डलिया छंद के उन्नयन, विकास और पुनर्स्थापना हेतु कृतसंकल्प एवं समर्पित 
  • ब्लॉग-www.triloksinghthakurela.blogspot.com        
  • सम्प्रति-रेलवे में इंजीनियर                             
  • संपर्क-बँगला संख्या-99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड, सिरोही, राजस्थान-307026 ( भारत) 
  • फोन/ फैक्स-02974221422/ 09460714267/ 07891857409 
  • ई-मेल-trilokthakurela@gmail.com

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

शैल अग्रवाल की रचनाएं


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


हिचकियां याद दिलाएँगी..

 


हिचकियां याद दिलाएँगी भूलने वालों को
गुमनाम चिठ्ठियां यूँ लिखी जाती नहीं ।

जल चुका है पूरा जंगल एक शरारे से
हवाओं की वो शरारत रुक पाती नहीं।

डूब जाते हैं लोग यूँ ही इस समन्दर में
कश्तियां ये सबको पार लगाती नहीं।

फिर टूटा है एक तारा आसमान में और
हर टूटे तारे की खबर लग पाती नहीं।

बह जाते हैं कई समन्दर बन्द पलकों से
खुली आंखों की किरक  मगर जाती नहीं।


रात की पलकों पर..

 


रात की पलकों पर फिर खेला है चांद
फिर हवा आज यह जाने कैसी चली

मेरे संग संग चल तो रहा था आसमां
रास्तों ने ही यूँ मुड़-मुड़के करवटें लीं

तारों का ये कारवां लेकर हम जाए कहां
हर आँख में तो झिलमिल एक मूरत बसी

किनारे वो प्यासे खडे ही रहे उम्र भर
नदी एक दरमियां थी, जो बहती रही


उड़ने को आकाश नहीं..

 


उड़ने को आकाश नहीं ठहरने को टहनी नहीं                                         
समंदर सी गहराई है पर पीने को पानी नहीं

दरिंदों के साये हैं यहाँ पर दरख्त नहीं                                                         
खुदा की दुनिया में अब रहमत नहीं

नादानी है हमने बात ये हंस कर उड़ा दी                                                     
पर मन ने बात वो हरगिज मानी नहीं

चलो घोंसले बनाए खुशियाँ जो उम्मीद से हैं                                                       
रूह का सफर ये सुख-दुख की कहानी नहीं।


रेत रेत की प्यास..

 


जंगल जंगल आग लगी मन पाखी ना शांत                                                    
एक कहे विश्वास तुम, दूजा तुम मेरे एकांत

सागर से मन में कब डूबी सूरज सी हर बात                                                    
लहर लहर का शोर और रेत रेत की प्यास

चांद खड़ा खिड़की से बोला बढ़ना घटना जग का भाव                                                                  
मन बेचारा कैसे जाने एक सीमा भी लांघ सके ना पांव़

तीखे हैं आंखों के सपने तीखी मन की प्यास                                                 
तीखी इक आंच से जलते धरती औ आकास

बूंद बूद बरसा है भटकेगा अब फिर यह मेघ विपुल...                                                
किरन किरन धरती की आस ओढ़े जो बैठी इंद्रधनुष।



बूंद-बूंद बरसते हैं लब्ज..

 


बूंद-बूंद बरसते हैं लब्ज आसमां से
और लहरों की साजिश में डूब जाते हैं

जैसे बगीचे में बैठा पत्थर का बुद्धा
हिलता नहीं आँधी और तूफानों में

जैसे नभ के सारे रंग, तारे औ फूल
खिलते बुझते रोज, अनदेखे नजारों में

कल रात एक कविता जन्मी तो थी
पर जी न सकी मन के वीराने में...



समंदर सी प्यास है जिन्दगी..


तिश्नगी, समंदर सी प्यास है जिन्दगी                                                                  

बरस जाते हैं बादल भी रेगिस्तान में


जंगल और जीवन का नियम नहीं 

भटकते क्यों दिनरात सभी चाह में                                                                                                  


सूखे पत्तों से झांके रूप औ खुशबू                                                            

दबी रह जाए एक चिनगारी राख में


बढ़े तो बढ़े घटे तो घटता ही जाए                                                               

चंदा भी उलझा है किस विचार में


नमक सा बदल दे स्वाद तुरंत ही                                                             

मिल जाए जब चाहत इंतजार में 



शैल अग्रवाल

 

राग-वैराग के शहर बनारस में 21 जनवरी 1947 को जन्म और वहीं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए। मानव और प्रकृति के साथ-साथ भाषा और भारत में विशेष रुचि। 50 से अधिक देशों का भ्रमण। रुझान कलात्मक व दार्शनिक। अंग्रेजी के साथ साथ संस्कृत और चित्रकला में प्रथम श्रेणी में औनर्स, साथ-साथ मूर्तिकला और सितारवादन व भरतनाट्यम में भी प्रशिक्षण। शादी के बाद से यानी पूरी वयस्क जिन्दगी यहाँ यू.के की संघर्षमय दौड़ती-भागती सभ्यता में स्वेच्छा से सहज गृहिणी जीवन शैली का वरण। मन से पूर्णतः भारतीय और स्वभाव से चिर विद्यार्थी। सत्यम्, शिवम, सुन्दरम की पुजारी। मुख्यतः आत्म उद्वेलन और मंथन को शान्त करने के लिए ही लिखा। पहली कविता आठ वर्ष की उम्र में और पहली कहानी 11 वर्ष की उम्र में। बचपन के छुटपुट लेखन और फिर 1967 से 1997 तक एक लम्बे मौन के बाद 1997 से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में ही निरंतर लेखन। सभी मुख्य पत्रिकाओं में व कई साझे संकलनों में प्रकाशित व देश विदेश के कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच और विमर्शों में साझेदारी। पिछले आठ साल से नेट पर हिन्दी और अंग्रेजी की मासिक पत्रिका www.lekhni.net का संपादन व प्रकाशन।
  • प्रकाशित किताबें-
  • समिधा ( काव्यसंग्रह-2003)
  • ध्रुवतारा ( कहानी संग्रह-2003)
  • लंदन पाती ( निबंध संग्रह-2007)
  • कई पाण्डुलीपियाँ सही प्रकाशक की तलाश में
  • सम्मान-
  • 2006 - भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, साहित्य अकादमी तथा अक्षरम का संयुक्त अलंकरणः काव्य पुष्तक समिधा के लिए लक्ष्मीमल सिंघवी सम्मान। (देहली)
  • 2007- उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थानः उत्कृष्ट साहित्य-सृजन व हिन्दी प्रचार-प्रसार सम्मान (विदेश)। (लखनऊ)
  • 2010 - यू.के. हिन्दी समितिः हिन्दी सेवा सम्मान (लंदन)
  • 2012- प्रवासी मीडिया सम्मान ( अक्षरम देहली)
  • ई मेल-shailagrawal@hotmail.com

रविवार, 15 मार्च 2015

लोकेश शुक्ल के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



सुधियों के झुरमुट ना होते..



सुधियों के झुरमुट ना होते-
तुम फिर मेरे पास न होते

मुग्ध पलों के पृष्ठ बांचने-
आये सावन के साक्षी घन
खिड़की से कमरे में आकर-
बूंदें दिखलातीं अपनापन

खुशबू के आभास न होते-
तुम फिर मेरे पास न होते

चीड़ वनों में घाटी गायें-
पर्वत श्रोता बन जाते हैं
झरनों की नूपुर धुन सुनकर-
इंद्रधनुष भी तन जाते हैं

मौसम के ये रास न होते-
तुम फिर मेरे पास न होते

बहुत तेज है धार नदी की-
पल-पल ढहती रहीं कगारें
जीवन के इस कठिन मोड़ पर-
यादें  लाती रहीं बहारें

छवियों के जो दास न होते-
तुम फिर मेरे पास न होते




गंध बिखेरी जब से तुमने..



गंध बिखेरी जब से तुमने
एकाकी मेरे जीवन में,
महक उठा है कोना-कोना
सूने-सूने घर आंगन में

भूल नहीं पाया मैं तेरे
रतनारे नयनों की भाषा
गंधों के कोमल वचनों ने
बदली  है जीवन परिभाषा

जब से एक दिशा दी तुमने
भटक रही निस्सीम तृषा को-
रोम-रोम रस नेह नहाये,
छलक रहे घट अंतरमन में

महक उठा है........

अवरोधों से रुकी हुई थी
जलधारा गतिमान हुई है
छुये अनछुये सभी तटों की
एक नयी पहचान हुई है

मुक्त किया है जब से तुमने
अभिशापित बंधन से मुझको-
सतरंगी किरनों के रथ पर
भोर खड़ी है अभिनंदन में

महक उठा है ........



तुम अचानक आ गये..



तुम अचानक आ गये मधुमास में
फागुनी रंग छा गये आकाश में

प्रेम रस की चितवनी पिचकारियां-
प्राण-वन में खिल उठीं फुलवारियां,

तन हुआ बेसुध, मगन मन हो गया-
स्वप्न रूठे गा उठे भुजपाश में
तुम अचानक...

दिन सुनहरी धूप का झरना हुआ
सांझ मंदिर दीप का धरना हुआ,

राम जाने हर घड़ी क्यूं लग रहा-
ये गगन जैसे घिरा हो प्यास में
तुम अचानक...




रजनीगंधा महक रही है..



तुम नज़दीक नहीं हो फिर भी-
रजनीगंधा महक रही है

महका गया जनम ये मेरा-
तेरे तन का मादक चंदन
गीतों की छुअने जीने को-
कस्तूरी मृग सा भागे मन

बुनता हूं यादों के  सपने
और चांदनी दहक रही है
रजनीगंधा...

अनबुझ एक पहेली तेरा-
मौन कि मेरे होंठ मुखर हैं
रूठो तुम रूठोगे कितना-
मनुहारों के कई शिखर हैं

शायद टूट गया हठ तेरा-
हवा मदिर क्यों बहक रही है
रजनीगंधा...


लोकेश शुक्ल

12/116, ग्वालटोली, कानपुर
मो. 9305651685
ईमेल:lokeshshk@gmail.com



लोकेश शुक्ल 


  • जन्म- 19 जुलाई 1949
  • शिक्षा- बी. एससी एम.ए
  • कृति- गीत संकलन 'मनुहारों के शिखर' (अंतिम चरण में)
  • अन्य प्रकाशन- कानपुर गीत दशक-1 में दस गीत प्रकाशित, अखिल भारतीय गीत संकलन 'गीत वसुधा' में पांच गीत प्रकाशित, 'कानपुर के कवि' में रचनायें संकलित, देश की विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं गीत-ग़ज़ल व दोहे,मुक्तक समय-समय पर प्रकाशित
  • सम्मान- उत्तर प्रदेश के राज्यपाल से सम्मानित, बिहार में ' काका बिहारी शिखर सम्मान ' उत्तर प्रदेश मर्चेंट चैम्बर के अध्यक्ष से 'कानपुर की आवाज़' का सम्मान, अलावा इसके देश व कानपुर के विभिन्न संगठनों से पुरस्कृत एवं सम्मानित
  • प्रसारण- सब टीवी के दबंग कार्यक्रम में काव्य पाठ, आकाशवाणी व दूरदर्शन से काव्य पाठ
  • संप्रति- पत्रकार,  दैनिक जागरण से सम्पादक के पद से सेवानिवृत्त
  • सम्पर्क-12/116, ग्वालटोली, कानपुर
  • मो. 9305651685
  • ईमेल:lokeshshk@gmail.com

गुरुवार, 5 मार्च 2015

रंग बरसे: मंजुल भटनागर की रचनाएं



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



रंग उड़े बयार में..



रंग उड़े बयार में
खुशबू हरसिंगार
टेसू मन  रंग गए
पत्ते बंदन वार

ओढ़े चुनर थी ठगी
सरसों बारम्बार
खेत खलिहान रंग गए
मलयानिल बौछार .

फाग नहाई रुत हुई
जीवन जगा बसंत
पिया मिलन की आस में
चकवी उड़ी दिगंत .

द्वार सजाने आ गए
बाल गोपाल  अनंग
बसंत भेज सन्देश तो
मन में बजे मृदंग  .


टेसू तन मन भिगो रहे
गुलाल अबीर कपोल सजे
आज बुनेगा प्रेम कोई
नूतन प्रणय प्रसंग .



रंग भरे बादल से..



रंग भरे बादल से
उड़ रहे अबीर संग
आँगन द्वार रंग गए
यादों के पनघट
सज गए .

गाँव छोड़, शहर गए
खेतों दो मंजिला भये
खलियान बेरंगत हुए
देख मन रुसवा हुए
यादों के पनघट
सज गए .

कृष्ण रेंगे गोपियाँ रंगी
रधिया अपटूडेट  सजी
दुलेंडी के  गीत गवे
कचौरी और गुजिया बनें
शगुन की घुटी भाँग
सुन मनवा भी मोद  भए
यादों के पनघट
सज गए .

होलिका जली चौराहे पे
भूंज लाये बूटवा
हल्दी लगी चूनर उड़े
फाग मंजिरें ढोलक बजे
आंखियन पोर रेशमी हुए
यादों के पनघट
सज गए .



बसंत ओड़ दुशाला..



बसंत ओड़ दुशाला
झुरमुटों का
पीत वसन छिटका रही
दूर तलक .

सरसों बीच छिपी चाँदनी
सिमिट गयी .

किरण दिनमान के
पंख लगाये
उतरी है धरा पर
शुभ्र निश्चल.

मंगल हलद पीत
वीणा के तार झंकृत करती
मन प्रागंण में ,रंग भरे .

निशब्द मन तकता कौन .
होली उत्सव है ,धूम मचे न हो मौन .




खुशबुओं के पाँव फैले..



होली की सुगबुगाहट है
पेड़ों ने की खुसर पुसर है
पक्षियों संग विमर्श है
पत्ते खत सा निमंत्रण  हैं.

टेसू ,बोगन विला रंग भरे
द्वार फैले ,छाँव  फैले
रंग फैले रहा अबीर सा
खुशबुओं के पाँव फैले
प्रकृति में आकर्षण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

अंतर्मन प्रतीक्षा है
बावरी उत्सुकता है
कोई उम्मीद जग रही
कोपले रस ले पगी
दे रही आमंत्रण है
पत्ते खत सा निमंत्रण है

हाट  सजे बाग़ सजे
पलाश हरसिंगार सजे
सूर्य रथ चल पड़ा
हाक रहे श्री कृष्ण हैं
गोपियाँ मुग्ध हैं
उधो की न सुनें
प्रेम प्रीत हर्षन  है
पत्ते खत सा निमंत्रण है .



फागुन चित्तचोर है..



आम्र पर बौर है
फिज़ाओं  में  शोर है
लिए सरसों पीत वर्ण
झूम रही कृषक मन
फागुन चित्तचोर है

कोयल की कूक सुन
अनमना सा क्यों है मन
उठ रही क्यों आज
प्रीत भरी हूक  तन

फूल भरी शाख है
मन फिर भी उदास है
गोपियाँ रंगों भरी
तन मन उजास है

प्र कृति का हास है
पिया मिलन की आस है
रंग संग श्याम खेलें
होली का चुहू  वास है

पलाश टेसू रस से भरे
पिचकारियों संग झरे
ग्वाल बाल रंगों से सने
फागून की बरसात है .




रंग भरे पलाश..


.
होली का आना
रंगों की दुनिया का
मुट्ठी में थी
सिमिट जाना.

उड़ रही है गंध
फिजाओं में
आँगन में उगे थे
कुछ रंग भरे पलाश

टेसू फूल डूबे
कांसे के डोळ में
अमृत बरस रहा था
बिन मोल में.

पलक झपकी थी
और दृश्य बदल गया
होलिका का मन छल गया
प्रह्लाद को बिठा अंक
पर अहंकार छल गया
असत्य  यूँ जल गया  .



मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम मुंबई 53
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877
ईमेल–manjuldbh@gmail.com

रंग बरसे:दिन सुहाने आ गये (ग़ज़ल)-अंसार क़म्बरी



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



दिन सुहाने आ गये..



खिल उठीं सरसों की कलियाँ दिन सुहाने आ गये
आ गया फागुन कि हर बाली में दाने आ गये

फूल महुवे के झरे मौसम शराबी हो गया
आम के बाग़ों में खुशबू के ख़ज़ाने आ गये

आ गया फागुन मेरे कमरे के रौशनदान में
चन्द गौरय्यों  के जोड़े घर बसाने आ गये

नाचती-गाती हुई निकलीं सड़क पर टोलियाँ
चन्द चेहरे खिड़कियों में मुस्कुराने आ गये

एकता सदभावना के शे'र लेकर ‘क़म्बरी’
रंग की महफ़िल में लो होली मनाने आ गये


अंसार क़म्बरी

‘ज़फ़र मंजिल’, 11/116,
ग्वालटोली, कानपूर–208001
मो - 09450938629
ईमेल : ansarqumbari@gmail.com






रंग बरसे: रंग और व्यंग्य मोदी के संग-ओम नारायण शुक्ल



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



होली की उमंग में..



होली की उमंग में
भंग की तरंग में
माननीय नरेन्द्र मोदी से
प्रस्ताव किया गया
कि आप प्रधानमंत्री तो बन गये
अब जनहित में
राष्ट्रपति पद का आगामी चुनाव लड़ियेगा
जनता के इस प्रस्ताव पर
गौर करियेगा
तभी मोदी जी झिड़कते हुये बोले
क्या बकते हो
तुम्हारे इस प्रस्ताव पर जमाना हंसेगा
जो आदमी " ठीक से "
एक औरत का पति नहीं बन सका
वो " राष्ट्रपति " कैसे बमेगा..!



उड़े अबीर-गुलाल..

 


उड़े अबीर-गुलाल रंग बदरंग न हो
ठी़क-ठ़ाक सब रहें कहीं हुड़दंग न हो

पर ऐसे रंगबाजों से  बच कर रहना
रंग खेलने का जिनमें कुछ ढंग न हो

गले मिलें सब और बढ़े भाईचारा
आज जरूरत है आपस में जंग न हो

दिल-दिमाग में रिश्ता बहुत जरूरी है
किन्तु रास्ता इनका बिलकुल तंग न हो

सफर जिन्दगी का मुस्काने क्या देगा
अगर अकेले हों कोई भी संग न हो

यह भी कोई बात हुई ठन्डाई में
सब कुछ तो हो केवल उसमें भंग न हो


वो टोली भी क्या टोली है होली में
"ओम"सरीखा जिसमें मस्त मलंग न हो



ओम नारायण शुक्ल


11/ए,चन्द्रा हार्डवेयर के पास
गोपाल नगर,कानपुर-208011
मो.09935272979
ईमेल-kavionashu@gmail.com

रंग बरसे:लोकेश शुक्ल के दोहे



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




उतरा है मधुमास..

 

टांग अलगनी धूप को उतरा है मधुमास,
बौराई हर प्रीत है बेलगाम है प्यास

फागुन देने आ गया फिर उनका  संदेश,
भोर महकती डोलती सांझ सॅवारे केश

मौसम ने फैला दिया खुशबू संजाल,
अपने प्रिय की याद में सभी हुये बेहाल

बने चितेरे घूमते ये मेघों की  शान,
एक-एक छवि पर तुले मर्यादा की आन

तू बैठा उस छोर पर मैं बैठा इस छोर,
तेरा मेरा प्यार है जैसै चांद चकोर

राधा के इस देश में प्रेम बिक रहा हाट
अपनी संस्कृति को युवा जला रहा हर घाट

डाल-डाल पर हो गई कागों की अब भीड़,
सोन चिरइया सोचती कहां बनायें नीड़

लोकतंत्र की आड़ में चलता कुर्सी तंत्र,
भारत की ये त्रासदी जब से हुआ स्वतंत्र

जंगल राज है देश में लूट मची चहुॅ ओर,
रुपया कोमा में पड़ा डाॅलर मारे जोर

करते बंदरबांट जब ये सत्ता के लोग,
हित हो कैसे देश का जहां लगा यह रोग

चैनल-चैनल खुल गईं प्रवचन की दूकान,
कोई बेचे भक्ति को औ' कोई भगवान



लोकेश शुक्ल


12/116 ग्वालटोली, कानपुर
मो. 9305651685
ईमेल:lokeshshk@gmail.com

रंग बरसे: पांच कुण्डलिया-शैलेन्द्र शर्मा


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



कवि

        

कतरन ले अखबार की
उसको तनिक उबाल
कहकर व्यंग परोसते
कविवर  बांकेलाल
कबिवर  बांकेलाल
लाल ये ललितकला के
मंच लूटते खूब
द्वि-अरथी तीर चला के
कहते कवि शैलेन्द्र
सुधीजन झेलें ज़बरन
वाह वाह क्या खूब
गज़ब ढाये है कतरन



आचार्य

     

बन बैठे आचार्य वे
कर पिंगल का जाप
किंतु काव्य के क्षेत्र में
रहे अंगूठाछाप
रहे अंगूठाछाप
चली पर चालें ऐसी
शनै: शनै: हो गयी
काव्य की ऐसी-तैसी
कहते कवि शैलेन्द्र
जली रस्सी से ऐठे
चलकर टेढी चाल
मियां फरज़ी बन बैठे



संपादक

    

निश्चित रोग छपास का
हर लेता है ताप
संपादक के नाम का
सदा कीजिये जाप
सदा कीजिये जाप
और भरसक अभिनन्दन
ह्विस्की से अभिशेक
सतत नवनीतम लेपन
कहते कवि शैलेन्द्र
न संशय करें कदाचित
स्वयं सिद्ध यह जाप



गज़ल-गो


पढ-पढ कर कुछ मज़मुए
गढ-गढ कुछ शेर
गालिब वे जब से हुए
' मिर्जा गालिब ' ढेर
'मिर्जा गालिब' ढेर
' मीर ' भरते हैं पानी
रह-रह आती याद
' दाग '  को अपनी नानी
कहते कवि शैलेन्द्र
डीग मारें ये बढ-चढ
कुछ सीखो भी मियां
इन्ही को तुम भी पढ-पढ



आयोजक


आयोजक भी काव्य के
अब हैं तुर्रमशाह
कोप-दृष्टि जिन पर पडे
होते वही तवाह
होते वही तवाह
फ़ाडते कपडे अपने
कौडी मोल खरीद
बेंचते सपने जिनके
कहते कवि शैलेन्द्र
करो मत इनसे बक-झक
अगर चाहते मंच
सतत पूजो आयोजक


शैलेन्द्र शर्मा

248/12, शास्त्री नगर,
कानपुर-208005
मोबा: 07753920677
ईमेल:shailendrasharma643@gmail.com

रंग बरसे: फागुनी दोहे-कल्पना मिश्रा बाजपेई



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




गजरे में कचनार..



नवल यौवना ले चली, कर में लाल गुलाल
उमग हृदय वो ढूंढती,छिपे कहाँ नंदलाल ॥

धानी चूनर पीत सी,गले नौलखा हार
खिलते टेसू गालों पर,गजरे में कचनार ॥

पंचम स्वरलहरी सुनी,राधा हुई विभोर
कुंज गली में खोजती,जादूगर चितचोर ॥

मोहन मारे कांकरी ,फूटी गागर रंग
राधा ललिता कह उठी,क्या खाये हो भंग ॥

श्याम सखी बन नाचते,गोकुल में है धूम
राधा को उर में लिए,रास रचाते झूम ॥

लाली बिंदिया चाँद सी,कजरारे से नैन
बतियाने पनघट लगे,फागुन गाती रैन ॥



कल्पना मिश्रा बाजपेई


प्लॉट नंबर 27, फ़्रेंड्स कॉलोनी
निकट रामादेवी चौराहा, चकेरी,
कानपुर (उ०प्र०)
फोन-09455878280, 08953654363
ईमेल –kalpna800mb@yahoo.com

रंग बरसे: दो गीत-कृष्ण नन्दन मौर्य



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



कैलेंडर पर आया फागुन..

 


कैलेंडर पर आया फागुन
पर मन में
पतझर छहरा है।

खाली-खाली गली नेह की
ठूँठ पड़े संवेदन
गुमे सड़ाधों के दफ्तर में
खुशबू के आवेदन
तिथियों में मुखरित बसंत
सन्नाटा
उपवन में गहरा है।

कैलेंडर पर आया फागुन
पर मन में
पतझर छहरा है

चौपालें चुप-चुप सी
बरगद से रूठा अपनापा
स्वारथ की लू में झुलसा
भाईचारा, बहनापा
दिन
उमंग-मस्ती वाले पर
बस्ती पर
भय का पहरा है।

कैलेंडर पर आया फागुन
पर मन में
पतझर छहरा है।

हाथ खेतिहर गये
जुटाने रोटी-दाल भिवंडी
हँसी गाँव की भर गठरी में
शहर चली पगडंडी
कागज पर रंगो का पल
अंतस में
कोरापन ठहरा है।

कैलेंडर पर आया फागुन
पर मन में
पतझर छहरा है।

कंक्रीटों की बाड़ उगी
खो गई कहीं  अमराई
सहमी– सहमी फिरे
कूक कोयल  ने भी बिसराई
हो  ली नारों  में  होली
अहसास          
मुआ, गूँगा, बहरा  है।

कैलेंडर पर आया फागुन
पर मन में
पतझर छहरा है।



बीज बोकर स्नेह के..

      

बीज बोकर स्नेह के
सदभाव के विरवे उगा दो
आज होली के दिवस पर
स्वार्थ के बगुले भगा दो

छद्म–छल के दस्युओं से
लुट रहा है आदमी
द्वेष दंभ और वंचना में
घुट रहा है आदमी
दृष्टि की संकीर्णता ही
धर्म का मतलब हुई
ईर्ष्या की पूतना
पाले हुये हर आदमी

इसी
मन की पूतना को
होलिका में अब जला दो।


शुचिता नहीं तो क्या
कहो प्रह्लाद कोई और था
हिरण्य के अन्याय का साम्राज्य
कोई और था
ताण्डव असुरत्व का
जो आज चहुँ दिश चल रहा
इन क्षणों से परे
वह अध्याय कोई और था

उठो
इस असुरत्व के अध्याय को
फिर से मिटा दो


पार्थ को जो जुये से छलते रहे
वो आज भी हैं
सिया को छल–वेश में हरते रहे जो
आज भी हैं
प्रेमपथ ही धर्मपथ
जो चिरन्तन कहती रही
उसी मीरा को गरल देते रहे जो
आज भी हैं
उनको
फिर से विष सुधासम
आज पीकर के दिखा दो

पीत सरसो के सुमन की मुस्कराहट
सार्थक हो
तितलियों का
बालियों पर गुनगुनाना सार्थक हो
सद् के चंदन से
महक जाये जगत की वात अबके
पाप जल जायें
तो होली का जलाना सार्थक हो
हर्ष का
प्रांगण सुहाना
प्रेममय जग को बना दो।


                    

कृष्ण नन्दन मौर्य


154, मौर्य नगर, पल्टन बाजार
प्रतापगढ़,उत्तर प्रदेश–230001
ईमेल:krishna.n.maurya@gmail.com

रंग बरसे: कमलेश द्विवेदी की दो ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




होली आई है..

 


उड़े अबीर-गुलाल कि होली आई है.
करते रंग कमाल कि होली आई है.

भाँग छानकर हुए रवाना झाँसी वो,
पहुँच गए भोपाल कि होली आई है.

बच्चों को हम क्या समझाए ऐसे में,
बाबा करें धमाल कि होली आई है.

खेलें रंग कुंवारे देवर भाभी से,
भैया हैं बेहाल कि होली आई है.

पत्नी से वे कहते-तुम मैके जाओ,
मैं जाता ससुराल कि होली आई है.

रंग भरी पिचकारी मारी साली ने,
जीजा हुए निहाल कि होली आई है.

लपट-झपट कर कपड़े सालों ने फाड़े,
वे दिखते कंगाल कि होली आई है.

चाहे जैसे रंग खेल लो मस्ती में,
पर मत करो बवाल कि होली आई है.




किससे खेलूँ रंग पिया..




जब तुम ही नहीं हो संग पिया.
मैं किससे खेलूँ रंग पिया.

ये बैरी फागुन मतवाला,
करता है कितना तंग पिया.

जिस ओर नजर उठती मेरी,
दिखता है सिर्फ अनंग पिया.

ऐसे मौसम से मन मेरा,
क्या कर पायेगा जंग पिया.

यादों के नभ में उड़ती है,
फिर मन की आज पतंग पिया.

रंगों से नहीं अब अश्कों से,
सब भीग रहे हैं अंग पिया.

आ भी जाओ इस होली पर,
डालो मत रँग में भंग पिया.



डॉ. कमलेश द्विवेदी


119/427, दर्शनपुरवा,
कानपुर-208012 (उ.प्र.)
मो.09415474674,08081967020
ईमेल-drkamlesh.dwivedi@gmail.com

सोमवार, 2 मार्च 2015

दो कविताएं-कल्पना मिश्रा बाजपेई





चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार





जिन्दादिली



देखो प्रिय मैं कहता था ना!
कि ज़िंदगी कितनी
हसीन है।
अगर जिंदा दिली से जियो
तो हर पल ज़िंदगी का
नमकीन हैं ।
आओ बुने रंगीन चादर
एक, रिश्तों के ख़ातिर
जानती हो क्यों,
क्योंकि आज रिश्ते बड़े ही
रंगहीन हैं।
और अब..
जब देखता हूँ पीछे मुड़कर
तुम्हें हँसता हुआ
बिल्कुल करीब अपने तो
महसूस करता हूँ
कि हमारी जिंदगी
अब भी उतनी ही
रंगीन है।
क्यों बेवजह सताएँ किसी को
अपने खातिर
क्या हमारा जीवन खुशियों
से विहीन है ?
चलो प्रिय रोज घूमने
अपने अतीत में
वहाँ बजती खुशियों की
अब भी मनोरम
बीन है..।
और
कुछ पल बैठेंगे बच्चों की
किलकारियों की अपनी
सी छांव में..
जहां हम दोनों अब भी
तमाशबीन है।
देखो प्रिय मैं कहता था ना!
कि ज़िंदगी कितनी
हसीन है।



थोड़ा सा अपनापन 



मैं सोचती हूँ जब कभी
कि जब तू रात को मेरी गोदी में
दुबक कर चैन की नींद
सो जाता है
तब तुझे मैं आंशिक रूप से
गोदी में उठाकर
कश्मीर से कन्या कुमारी तक
हर मंदिर में करवाती हूँ दर्शन
और माँगती रहती हूँ तेरे उन्नत
भविष्य की मंन्नत
जब तू सोता है दुबक कर
मेरी गोदी में रात को
आ जाओ अब बैठो मेरे पास
देख लूँ तुझे जी भर,जिससे मैं
जी सकूँ चैन से उम्र भर
क्योंकि मुझे मालूम है कि
संसार की आपा-धापी से तू भी
अछूता नहीं बचेगा
तू स्वस्थ रहे और व्यस्त भी रहे
इन सब के बीच में भी

मैं तलाश लूँगी अपने सकून को
बस डर तो इस बात का है कि
तू कहीं ,पराया न हो जाए
बच्चों का परायापन ही तो
सालता रहता है नासूर की तरह
बूढ़े माँ बाप के कलेजे को
आखिर उन्हें क्या चाहिए ?
धन दौलत नहीं तो बिलकुल नहीं
बस थोड़े से अपनेपन की
उम्मीद करते है माता-पिता अपनी
औलाद से और ज्यादा कुछ नहीं
क्या तू मुझे...?

​कल्पना मिश्रा बाजपेई 


प्लॉट नंबर 27,
फ़्रेंड्स कॉलोनी,
निकट रामादेवी चौराहा,
चकेरी, कानपुर(उ०प्र०)
ईमेल –kalpna800mb@yahoo.com



​कल्पना मिश्रा बाजपेई 


  • जन्म तिथि-     4 जून-1972
  • जन्म स्थान–    औरैया (इटवा)
  • माता का नाम- स्व- श्रीमती मनोरमा मिश्रा
  • पिता का नाम- श्री प्रकाश नारायण मिश्रा
  • शिक्षा -             एम.ए (हिन्दी) बी.एड
  • कर्म क्षेत्र -         अध्यापिका
  • प्रकाशित कृतियाँ–सारंस समय का साझा संकलन,जीवंत हस्ताक्षर साझा संकलन,
  •                          कानपुर हिंदुस्तान,निर्झर टाइम्स अखबार में,इंडियन हेल्प लाइन
  •                         पत्रिका में लेख,अभिलेख, 'सुबोध सृजन' अंतरजाल पत्रिका में
  •                         हमारी रचनाएँ पढ़ सकते हैं।
  • लेखन -            स्वतंत्र लेखन
  • सम्मान -         मुक्तक मंच द्वारा (सम्मान गौरव दो बार )भाषा सहोदरी द्वारा (सहोदरी साहित्य ज्ञान                               सम्मान)
  • साहित्य सृजन -अनेक कवितायें तुकांत एवं अतुकांत,गजल गीत ,नवगीत ,लेख और आलेख,कहानी,                             लघुकथा इत्यादि ।
  • संप्रति-              इंटर कॉलेज में अध्यापन कार्य ।
  • ईमेल –           kalpna800mb@yahoo.com