गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

शैलेन्द्र शर्मा के गीत



विनोद शाही की कलाकृति



सुनो कहानी..



प्रेक्षा रानी सुनो कहानी
आने वाले कल की
होगी हर तस्वीर भयावाह
बस्ती की जंगल की

वन सिमटेंगे उपवन में
उपवन कल क्यारी में
मिला करेगी प्राणवायु.
कालाबाज़ारी में

अज़ायबघरों में दिखा करेगी
लकडी संदल की


सेतु और तटबंध रहेगे
नदी नही होगी
तन-मन से सब रोगीहोंगे
भोगी क्या जोगी

खून से बढकर बेशक ज्यादा
कीमत होगी जल की


धड तो होगा मानुस का
पर सिर होगा पशु का
ताली बजा करेंगे स्वागत
परखनली-शिशु का

कीमत लेकिन दो टके न होगी
बहते काजल की


वेलेनटाइन-डे के  आगे
जश्न सभी फीके
नांचेगी विकृतियां सिर चढ
'रम-व्हिस्की ' पी के

याद किसे फ़िर रह जायेगी
खिचडी-पोंगल की



       

तोडे सारे कीर्तिमान..



गिद्धों से बलशाली गिरगिट
नये जमाने के
तोडे सारे कीर्तिमान
इतिहास रचाने के

डाल-डाल से पात-पात पर
चलने मे माहिर
बिना ' ट्रम्प 'के जीतें बाज़ी
ये ऐसे ' नादिर '

नये-नये नित दांव सीखते
पैर जमाने के

बहुत तेज रफ्तार है इनकी
रंग बदलने की
धमकी देते सूरज को भी
ढंग बदलने की

सिखा रहे हैं गुर सुरसा को
मुंह फैलाने के

जिनके रंग शोख हैं ज्यादा
सत्ता पर बैठे
असंतुश्ट कुछ लिये वित्रिश्ना
रस्सी से एन्ठे

जनता झेले दिन लोहे के
चने चबाने के

अच्छे-भले परिन्दों की
पर-कटी उडानें हैं
तोता-मैना चुप सुनते
कौवों के तानें हैं

हवा हो गये दिन कोयल के
गीत सुनाने के


 

जागा करते रामधनी..



रात-रात भर नींद न आती
जागा करते रामधनी

अम्मा-बाबू बेटा-बेटी
बहन और वे खुद दोनों
दो कमरे के मकान में
प्राणी सात रहा करते हैं

अम्मा रात-रात भर
खांसें बाबू आसमान तकते
रात गये घर लौटे बेटा
क्या-क्या नही सहा करतें हैं

झपकी आई नही कि आहट
कर जाती है राहजनी

गरू दिनों के बाद हर बरस
खाक छानते फिरते हैं
शायद अबकी मिलही जाये
बहना खातिर कोई वर
जनम-कुंडली मिल जाती तो
धनम-कुंडली फन काढे
साल खिसक जाते हैं यों ही
सूख रहे चिंता कर-कर

तीस बरस की बहन कुंआरी
बीस  बरस की हीर-कनी

रामधनी सोचा करते हैं
दिन पहले भी कठिन रहे
लेकिन नही हुआ करते थे
आज सरीखे कभी मलिन
एक दूसरे कीमजबूरी
लोग समझते रहे सदा
आपस में भाईचारे का
रहता था मजबूत पुलिन

अब तो झोपडपटटी तक में
लूट-पाट औ आगजनी



पोर-पोर टूटन..



मोबाइल पर कभी-कभी
वो बातें कर लेता

सुननी होगी घर-डयोदी की
पोर-पोर टूटन
इसीलिये गढ लेता पहले ही
झूठी उलझन

कह कर हेलो शुरू हो जाता
तनिक नही रुकता

'आना था पर नही आसका
मैं पिछले हफ़्ते
छोटू को ज्वर तेज बहुत
दिन-रात नही काटते

मंहगी बहुत दवायें
पैसा पानी सा बहता

भरनी फ़ीस बडे बेटे की
सिलनी यूनीफ़ार्म
घडी खराब पडी हफ्तों से
बजता नही अलार्म

रोज लेट होजता घुडकी
अफ़सर की सहता

इसीबीच रानी का वादा
पूरा करना है
वर्षगांठ पर सूट सिलाना
तोहफ़ा देना है

आखिर है जीजा-साली का
नाज़ुक जो रिश्ता

भरसक कोशिश करूंगा फ़िर भी
मैं घर आने की
करना कोशिश किंतु स्वयं ही
कर्ज चुकाने की

जितना मिलता उसमें घर का
खरच नही चलता

सुनने की बारी पर कहता
कम बैलेन्स बचा'
रस्म निभाने का है
उसने यों इतिहास रचा

'अच्छा,..बाई' कह कर उसका
मोबाइल कटता


 

तुमने पत्र लिखा है..



तुमने पत्र लिखा है प्रियवर
घर के हाल लिखूं

घर में कमरे कमरों में घर
बिस्तर बंटे हुए
किरच-किरच दर्पण के टुकडे
जैसे जडे हुए

एक ' फ्रेम ' में है तो लेकिन
कैसे एक कहूं

एक रहे घर इसके खातिर
क्या-क्या नही किया
चषक-चषक भर अमृत बांटा
विष है स्वयं पिया

टुकडे-टुकडे बिका हाट में
कितना और बिकूं

इंद्रप्रस्थ के राजभवन सा
हम को यह लगता
थल में जल का जल में थलका
होना ही दिखता

भ्रम के चक्रव्यूह में पडकर
कैसे सहज दिखूं



शैलेन्द्र शर्मा



  • पिता : स्व.( डा.) राम नारायण शर्मा 
  • जन्म : 14 अक्तूबर 1947 
  • विधाएं : गीत-नवगीत गज़ल.दोहे, कुंडलिया, नई कविता लेख व संस्मरण आदि
  • प्रकाशन : "संन्नाटे ढोते गलि-यारे" (गीत-नवगीत संय्रह) प्रकाशित एवं " राम जियावन बांच
  • रहे हैं" (गीत-नवगीत) व"धडकन को विषपान (दोहा संग्रह) यंत्रस्थ 
  • और "घुटने घुटने पानी में" ( गज़ल संग्रह ) शीघ्र प्र्काश्य
  • सम्पर्क: 248/12, शास्त्री नगर, कानपुर-208005
  • मोबा: 07753920677
  • ईमेल: shailendrasharma643@gmail.com

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

दस्तक: दो कविताएं-निधि जैन



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वो बचपन..


वो बचपन लौट आये
वो माँ का आँचल फिर मिल जाए
कहीं खो गयी जो अठखेलियां
वो जीवन में फिर लौट आएं
वो माँ का दुलार
वो माँ की फटकार
वो डाँट डपटकर भी पेट भर देना मेरा
वो हरदम मेरी ही फ़िक्र करना
वो मुझे अपनी गोद में सुलाना
वो सर पे उंगलियां फिराकर प्यार से उठाना
सब कुछ छूट गया ज़िन्दगी में
मैं कुछ लिख नहीं पाती तेरी बंदगी में
कलम और शब्द साथ नहीं देते
माँ, माँ है इससे ज्यादा कुछ और नहीं कहते
पर तेरी ये बेटी आज तुझको तरसती है
तेरी याद में मेरी अँखियाँ बरसती हैं
काश मैं फिर छोटी हो जाऊं
फिर से तेरे आँगन में खिलखिलाऊँ
काश ये काश सच हो जाए
कहीं से फिर मेरा बचपन लौट आये



एक दिन बोले पेड़..


एक दिन बोले पेड़ ये हमसे सुन लो ओ प्राणी
क्यूँ करते हो तुम हम सबकी ख़त्म कहानी
क्या भूल गए हो
जरूरत का सारा सामान
तुम्हे हमसे ही मिलता है
और धरती का हर फूल हमसे ही खिलता है
जीवन में ऑक्सीजन का अमृत
तुम्हे हम ही देते हैं
और कार्बन- डाई- ऑक्साइड का जहर
हम खुद में समा लेते हैं
मेघ बरसाते हैं अपना जल
चिड़ियों की चहचहाहट हमसे
कोयल की कहकहाहट हमसे
हमसे ही बजता संगीत है
हमसे ही बनता हर गीत है
हमसे ही जग को ये खुशबूयें सारी
हमसे ही तो हैं रंगीन फ़िज़ा ये तुम्हारी
फिर भी हमे तुम काट रहे हो
खुद अपनी ही ज़िन्दगी की खुशियों को
दीमक की तरह चाट रहे हो
भूल चुके हो तुम अपनी मानवता को
पछाड़ रहे हो दानव की दानवता को
हम नहीं होंगे गर तो,
तुम करोगे फिर फ़रियाद
क्यूंकि फिर न तुम बचोगे,
न ही तुम्हारी औलाद
वृक्षों का गर अकाल पडेगा
तो धरती पर महाकाल मचेगा
बिखर जायेंगी वादियाँ सारी
बेलगाम होंगी ये नदियाँ सारी
इसीलिए
हे मानव
वक़्त है , संभल जाओ अब भी
एक- एक पौधा लगाओ तुम सब भी
प्रण करो नहीं करोगे हमारा विनाश
बस फैलाओगे हरियाली का प्रकाश


निधि जैन

ईमेल: nidhijain6129@gmail.com

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

सजन मुरारका की कविताएं



विनोद शाही की कलाकृति



मन की गति-प्रकृति



मन की गति-प्रकृति
जल-प्रपात की जल-धार
बहे इधर-उधर
कभी तेज,कभी मंथर
मन की गति-प्रकृति
जल भरे बादल
गरजे या बरसे
मुसलाधार या रिम-झिम
कढ़के जोर से
मन की गति-प्रकृति
स्थिर पर्बत स्तर
कठोर और,बेजान,
उपजे जिस में
पत्थर,त्रिन या तरुवर
मन की गति-प्रकृति
निर्मल, कोमल- पवन
झंझावत या मन्द
उन्मुक्त, स्वाधीन
देती विनाश और जीवन
मन की गति-प्रकृति
सर्वभूक ज्वाला
दहन, तपन और जलन
जलाये,करे भस्म
निर्लिप्त,निर्मम जले अगन
मन की गति-प्रकृति
फ़ैली हुई भूमि या मैदान
बंजर या उपजाऊ
कांटे,फुल,खेत-खलियान
वन-उपवन या रेगिस्थान
जल,बादल और पर्वत
हवा, अग्नि और भूमि
और न जाने दिखें सर्वत्र
भिन्न रूप,आधार-आकृति
आचरण मे एक सी प्रवर्ति
दिखे मन की गति-प्रकृति



तेरी यादे



मयखाने में साकी सी
आँगन में तुलसी सी
गीता की वाणी सी
बरगद की छाया सी
सावन की बारिस सी
शीतल हवा पुरवाई सी
बगिया की अमराई सी
गंगा की लहर सी
बसन्त की सुरभि सी
सागर की गहराई सी
हिमालय की ऊँचाई सी
बगीचे की हरी दूब सी
नभ में छाये बदल सी
फूलों की क्यारी सी
मृग में छिपी कस्तूरी सी
पूनम में चांदनी सी
रंगों में इन्द्रधनुष सी
मेरे में हिम शिला सी
चुभ जाती है काँटों सी
मौत मे जीने की चाहत सी
यादे साथ रहती परछाई सी



पाती प्रेम की 



शब्द शब्द हैं मुखर
नेह अनुवादों की
अक्षर अक्षर गमक रहा
सुगंध देह की
स्याही महकी यादों की
फ़ैल गई
सुरभि अन्तरमन की
मन बहके
खुशबु सोंधापन की
सजल है नयन
है पाती प्रेम की



स्वप्न बुनना 



जब देखता हूँ --
बिछोने पर बैठी,
हज़ारों फंदे डाल,
बेटे के लिये,जाड़े मे,
क्रोशिए से स्वेटर बुनते;
सोचता हूँ,बुनती ही क्यों?
बुनती भी हो तो क्या-
स्वेटर या प्यार......!
कोई प्यारा सा सपना,
या भरती होगी रिक्तता,
बुनती होगी स्वयं के अरमान;
तुम्हारे शिथील हाथों से,
धुन्दली नज़र एनक की,
विक्षिप्त दर्द या वेदना,
समेटती चली आती होगी,
मुख-मंडल पर उत्साह लिये,
अंदर को छिपाकर,
उँगलियों चलती गति मे;
वैसे ही कुछ कहे बिना,
घर की दीवारों को ताककर;
आँचल मे मुहं डापकर,
कह देती हो बिन कहे .....!
सूनी आँखों से आप-बीती,
ठिठुरती सासों की,
सिकुड़ती उम्र की पैनी भाषा!
निद्रा-विहीन बीती रातें,
दुखती रग मे,
ठहरा खुरदुरा एकाकीपन;
सिसकता खालीपन,
कभी पूरा न होता स्वप्न;
कैसे देख लेती इन आँखों से,
सहज याद करके,
महसुश करती मीठास;
जो था तो सही! रहा नहीं साथ,
मैं भी कभी समझना चाहता-
उस सपने का सहज प्रभाव ,
पर नहीं,समझ पाता नहीं !!
सुनो,तुम बुनना बंद कर दो!
क्रोशिये के फंदे ,
मेरे दिल को जकड़ते,
कैसे जोड़ पावगी बुनकर,
जो अलग हो गये...|
वह सर्द हो गये हैं भावना से,
उन्हें सर्दी क्या ठिठुरायेगी ?
किसलिये कौशीश क्रोशिये से !
वृथा स्वप्न बुनने की,
बन्ध करो !
....कर दो ना।
स्वप्न बुनना ..


सजन कुमार मुरारका


Nutanganj
P.O.+ Dist.Bankura - 722,101
(पश्चिम बंगाल)
मोबाइल No.09434743802
ईमेल: sajanmurarka@gmail.com

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

तुम्हारी याद व अन्य कविताएं-संगीता सिंह ''भावना''




अजामिल की कलाकृति





तुम्हारी याद



एक मौन,
जो समाया है मेरे अंतर्मन में
यूं ही कभी चित्कारता है और
तुम्हारे आसपास होने की साजिश करता है
तुमसे बातें करने के बहाने ढूँढता है
तुम्हारी यादों को खुद में समाने की ,
पुरजोर कोशिश करता है...
पर दुर्भाग्य का खेल देखो ,,
तुम्हारे आसपास जो अनगिनत
जाल से बने हैं
मुझे रोक लेते हैं तुम्हारे पास होने से
तुम्हारे शब्दों को मूक बांध लिए हैं
अपने सुखद एहसासों में,
और साथ ही तुम्हारी यादों में
जमाय बैठे हैं खुद का डेरा .....
अब तुम्हीं बताओ कितना मुश्किल है
यूं तुमसे मिलना ,
बातें करना और तुम्हें अपनी
यादों में बसाना .......
पर,,अडिग है मेरा प्यार जो न कभी
सहमा है , रूका है और  न ही थका है
हाँ ,,एक सत्य जरूर है तुम्हारी
रूसवाइयों से थोड़ा डरता है .......!




जीवन का विस्तार 



समय के आकाश में तुम
जगमगाते तारों सा..
विश्वास और प्रेरणा की
अनुपम सौगात
मन की अन्तरिम गहराइयों में ,
तुम्हारे चंद शब्द
अपने समय और अपने जीवन को निहारती
थोड़ी अधीर सी मैं
जब भी खुद को तलाशती हूँ
तुम्हारे इर्द-गिर्द
पाती हूँ प्रेरणा के असंख्य सूत्र
जहां से अपने ही जीवन के अनन्य
प्रतिबिम्ब दिखते हैं
रूपान्तरण की अनंत संभावनाएं जब
जगमगाती हैं.
सोचती हूँ जीवन का विस्तार हो चला है..!!!



सतरंगी छ्टा



खिलेंगे फूल कभी
अपनी भी बगिया में
बिखरेंगी खुशबू
बनकर सुखद एहसास
निकलेगी धूप भी
धून्ध से छँटकर एक दिन
खिल उठेंगे ,
सिले सिले दिन भी कभी
रिश्तों की सूखी बगिया में
जब आएंगी मंजर
बहार के
घर -आँगन के मुंडेर पर
चहकेंगे पक्षियों का झुंड भी
और साथ ही ,,
निखर जाएगी सतरंगी छटा
इंद्रधनुष का
कट जाएगी यूं ही
ज़िंदगी मेरी ,
मौसम के भयावह तूफान से
मिल जाएगी मंजिल
हौसलों की ऊंची उड़ान से
और छू लेंगे हम भी कभी
सतरंगी आसमान को..!



संगीता सिंह ''भावना''


सह-संपादक.
''करुणावती साहित्य धारा' (त्रैमासिक),
वाराणसी।
ईमेल-singhsangeeta558@gmail.com

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

अशोक अंजुम के दोहे




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




प्रिया तुम्हारी याद..


                                                                                                                   
खुशबू से मन भर गया, खिले याद के फूल ।
मैं तुम में गुम हो गया, तोड़े सभी उसूल ।।

रोम-रोम झंकृत करे,  प्रिया तुम्हारी याद ।
चलो अभी करते रहें, सपनों में संवाद ।।

सारे के सारे मिले, जो भेजे पैग़ाम ।
जब-जब आईं हिचकियाँ, लिया आपका नाम।

कैसे लगे समाधि अब, कैसे कम हो भार ।
राग-रंग ले मेनका, खड़ी हृदय के द्वार ।।

कहना था हमको बहुत, शब्द हुए सब मौन।
आँखों के संवाद को, देखें रोके कौन ।।

रात गई करवट लिए, हुई रसपगी भोर ।
खुली खिड़कियाँ आपकी, मन में उठीं हिलोर ।।

अरे वक्त दे तो जरा, पल-भर को विश्राम ।
पगले लिखना है मुझे, पत्र प्रिया के नाम ।।

लोग लगे जब बाँटने, पग-पग पर अंगार ।
मूरत निकला बर्फ की, तेरा-मेरा प्यार ।।

रथ के पीछे धूल थी, आँसू भीगे गाल ।
ख़्वाबों में मिलते रहे, रेशम के रूमाल ।।

भोला देवर क्या करे, दौड़े सुबहो-शाम।
छोटी भाभी माँगती, फिर-फिर खट्टे आम ।।

निभ पाता कैसे भला, तेरा-मेरा प्यार ।
तेरे-मेरे बीच थी ‘मैं’ की इक दीवार ।।

आमंत्रण था आँख में, किंतु होंठ थे मौन ।
समय रुका किसके लिए, दाषी बोलो कौन ।।

तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे तार हुज़्ाूर ।
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में सन्तूर ।।

मधुमय बन्धन बाँधकर, कल लौटी बारात ।
हरी काँच की चूड़ियाँ, खनकीं सारी रात ।।

आवेदन ये प्रेम का, प्रिये! किया स्वीकार ।
होठों के हस्ताक्षर, बाकी हैं सरकार ।।

मिले ओठ से ओठ यूँ, देह हुई झनकार ।
सहसा मिल जाएँ कभी, बिजली के दो तार ।।
आमंत्रण देता रहा, प्रिया तुम्हारा गाँव ।
सपनों में चलते रहे, रात-रात भर पाँव ।।

प्रिये तुम्हारा गाँव है, जादू का संसार ।
पलक झपकते बीततीं, सदियाँ कई हज़ार ।।

प्रिये तुम्हारे गाँव की, अजब-निराली रीत ।
हवा छेड़ती प्रेम-धुन, पत्थर गाते गीत ।।

तोड़ सको तो तोड़ लो, तुम हमसे सम्बंध ।
अंग-अंग पर लिख दिए, हमने प्रेम-निबंध ।।

कौन पहल पहले करे, चुप्पी तोड़े कौन ।
यूँ बिस्तर की सलवटें, रहीं रात-भर मौन ।।

धूल झाड़कर जब पढ़ीं, यादों जड़ी किताब ।
हर पन्ने पर मिल गए, सूखे हुए गुलाब ।।

खुशबू से मन भर गया, खिले याद के फूल ।
मैं तुम में गुम हो गया, तोड़े सभी उसूल ।।





अशोक ‘अंजुम’

(अशोक कुमार शर्मा)


  • पिताजी - श्री जगदीश प्रसाद शर्मा माताजी - श्रीमती रामवती
  • जन्मदिन- 15 दिसम्बर 1966 (माँ ने बताया), 
  • 25 सितम्बर 1966 (काग़ज़ों पर)
  • काग़ज़ी शिक्षा - बी.एससी.,एम.ए.(अर्थशास्त्र, हिन्दी),बी.एड.
  • लेखन-विधाएँ - मुख्यतया गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य,साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक आदि
  • प्रकाशित पुस्तके-
  • 1. भानुमति का पिटारा (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 2.खुल्लम खुल्ला (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 3.मेरी प्रिय ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत /4.मुस्कानें हैं ऊपर-ऊपर (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत / 5.दुग्गी, चैके, छक्के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 6.अशोक अंजुम की प्रतिनिधि ग़ज़लें /7.तुम्हारे लिए ग़ज़ल (ग़ज़ल संग्रह) / 8.एक नदी प्यासी (गीत संग्रह) पुरस्कृत/ 9. जाल के अन्दर जाल मियाँ (व्यंग्य ग़ज़लें) पुरस्कृत/10. क्या करें कन्ट्रोल नहीं होता (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /11 . प्रिया तुम्हारा गाँव (दोहा-संग्रह) पुरस्कृत/ 12. यमराज आॅन अर्थ (नाटक संग्रह)/13. पढ़ना है (नाटक )/14. चम्बल में सत्संग(दोहा-संग्रह)/ 15.यूँ ही...(ग़ज़ल संग्रह) 
  • सम्पादित पुस्तकें:-
  • 1.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /2.अंजुरी भर ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/3.हास्य-व्यंग्य में डूबे, 136 अजूबे (हास्य-व्यंग्य कविताएँ)/4. हास्य भी, व्यंग्य भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /5. ग़ज़ल से ग़ज़ल तक (ग़ज़ल संग्रह) /6. रंगारंग हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य)/7. आह भी वाह भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /8. लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविता संक.) /9. लोकप्रिय हिन्दी ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/10. दोहे समकालीन (दोहा संकलन) /11. रंगारंग दोहे (दोहा संकलन) /12. दोहा दशक (दोहा संकलन) /13. दोहा दशक-2(दोहा संकलन) /14. दोहा दशक-3 (दोहा संकलन)/15. हँसता खिलखिलाता हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /16. व्यंग्य भरे कटाक्ष (व्यंग्य लघुकथाएँ) /17. हँसो बत्तीसी फाड़ के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /18. नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार (ग़ज़ल संकलन) /19. हँसी के रंग कवियों के संग (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /20.ग़ज़लें रंगबिरंगी (हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल संग्रह) /21. व्यंग्य कथाओं का संसार (व्यंग्य लघुकथाएँ) /22. नीरज के प्रेम गीत (गीत संग्रह) /23. नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार (दोहा संकलन) /24.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत (गीत संकलन) /25. हास्य एवं व्यंग्य ग़ज़लें (हास्य व्यंग्य ग़ज़ल संकलन)/26.नए युग के बीरबल (व्यंग्य लघुकथाएँ)/27. हास्य कवि दंगल (हास्य व्यंग्य कविताएँ)/28. हिंदी के लोकप्रिय ग़ज़लकार (पद्मभूषण नीरज के साथ संपादित)/ 29.नए दौर की ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह)/30.आनन्द आ गया (आनन्द गौतम की व्यंग्य कविताओं का संपादन)/31.आधुनिक कवयित्रियाँ (काव्य संकलन)/32.आधुनिक लोकप्रिय दोहाकार (दोहा संकलन) /33. शेर ग़ज़ब के ( अश्आर संकलन)
  • अशोक अंजुम: व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति ( श्री जितेन्द्र जौहर द्वारा संपादित ) 
  • सम्पादक - अभिनव प्रयास (कविता को समर्पित त्रैमा.) 
  • सलाहकार सम्पादक- हमारी धरती (पर्यावरण द्वैमासिक)
  • अतिथि संपा -1. प्रताप शोभा (त्रैमा.) (सुल्तानपुर) का दोहा विशेषाक/ 2. खिलखिलाहट (अनि.) (सुतानपुर) का हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल विषेशांक/ 3.सरस्वती सुमन (त्रैमा0) देहरादून का दोहा विशेषांक/ 4. हमारी धरती (द्वै0मा0) के दो जल विशेषांक तथा एक प्राकृतिक आपदा विशेषांक का अतिथि संपादन
  • अध्यक्ष-दृष्टि नाट्य मंच , अलीगढ़ / सचिव - संवेदना साहित्य मंच, अलीगढ़/पूर्व सचिव- हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा मंच, अलीगढ़/ सदस्य- बोर्ड आॅफ एडवाइजर्स-1999(अमेरिकन बायोग्राफिक्स इंस्टी. अमेरिका) 
  • सम्मानोपधियाँ- विशिष्ट नागरिक, राष्ट्र भाषा गौरव, हास्य-व्यंग्य अवतार, श्रेष्ठ कवि, लेखकश्री, काव्यश्री, साहित्यश्री, समाज रत्न, हास्यावतार, मेन आफ द इयर, साहित्य शिरोमणि......आदि दर्जनों सम्मानोपाधियाँ 
  • पंकज उधास (चर्चित गायक), श्री साहब सिंह वर्मा (तत्कालीन मुख्यमंत्री ),ज्ञानी जैलसिंह (भू.पू.राष्ट्र पति) श्री मुलायम सिंह यादव (त.मुख्यमंत्री, उ.प्र.), सांसद शीला गौतम (अलीगढ़),श्री आई.एस.पर्सवाल (महाप्रबंधक एन.टी.पी.सी. दादरी), श्री कन्हैयालाल सर्राफ(चर्चित उद्योगपति, मुम्बई), महामहिम के.एम.सेठ.(राज्यपाल छ.ग.),श्री रवेन्द्र पाठक (महापौर,कानपुर ) लेफ्टि.कर्नल श्री एस.एन.सिन्हा (पूर्व राज्यपाल असाम, जम्मू-कश्मीर) श्री टी. वेंकटेश ( कमिश्नर , अलीगढ ) इत्यादि गणमान्य हस्तियों द्वारा विशिष्ट समारोहों में सम्मानित।
  • पुरस्कार-श्रीमती मुलादेवी काव्य-पुरस्कार (भारत भारती साहित्य संस्थान) द्वारा ‘मेरी प्रिय ग़ज़लें’ पुस्तक पर 1995/- स्व. रुदौलवी पुरस्कार (मित्र संगम पत्रिका, दिल्ली) /-दुश्यंत कुमार स्मृति सम्मान-1999 (युवा साहित्य मंडल, गाज़ियाबाद )-सरस्वती अरोड़ा स्मृति काव्य पुरस्कार-2000 (भारत-एषिआई साहित्य अका., दिल्ली )/- डाॅ0 परमेश्वर गोयल व्यंग्य षिखर सम्मान-2001 ( अखिल भारतीय साहित्य कला मंच , मुरादाबाद )/-रज़ा हैदरी ग़ज़ल सम्मान-2005 ( सृजनमंच, रायपुर (छ.ग.)/- साहित्यश्री पुरस्कार-2009, डाॅ.राकेशगुप्त, ग्रन्थायन प्रकाशन, अलीगढ़/- स्व. प्रभात शंकर स्मृति सम्मान-2010, नमन प्रकाशन तथा माध्यम संस्था, लखनऊ/- विशाल सहाय स्मृति सम्मान-2010, मानस संगम, कानपुर/- मालती देवी-विलसन प्रसाद सम्मान-2010,अतरौली /.फणीश्वरनाथ रेएाु स्मृति सम्मान-2011, वाग्वैचित्र्य मंच,अररिया (बिहार)से ‘जाल के अन्दर जाल मियाँ’ पुस्तक पर/- राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान -2012, राष्ट्रधर्म प्रकाशन, लखनऊ,‘प्रिया तुम्हारा गाँव’ पुस्तक पर/-सेवक स्मृति सम्मान-2012, साहित्यिक संघ, वाराणसी /-हिन्दी सेवी सम्मान-2013, हिन्दी साहित्य विकास परिषद्, धनबाद (झारखण्ड)/- दुश्यंत स्मृति सम्मान-2013 एअन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मेरठ/स्व.सरस्वती सिंह हिन्दी विभूति सम्मान-2013,कादम्बरी, जबलपुर/नीरज पुरस्कार-2014ए (1 लाख 1 हज़ार रुपए) अलीगढ़ कृषि प्रदार्शनी द्वारा
  • अन्य. अलीगढ़ एंथम के रचयिता - अनेक गायकों द्वारा ग़ज़ल, गीत गायन/विभिन्न नाटकों में अभिनय व गीत तथा स्क्रिप्ट लेखन/कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य तथा गीत, ग़ज़ल, दोहों के लिए चर्चित / संयोजन व संचालन भी/- दूरदर्षन के राष्ट्रीय प्रसारण के साथ ही सब टी.वी,एन.डी टी.वी, ई.टी.वी, लाइव इण्डिया,तरंग चैनल आदि अनेक चैनल्स के साथ ही आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारण/ ई.टी.वी के एक लोकप्रिय हास्य कार्यक्रम में जज/ अनेक षोध ग्रन्थों में प्रमुखता से उल्लेख/सैकड़ों समवेत संकलनों में तथा देष की अधिकांष चर्चित पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित/विभिन्न रेखांकन पुस्तकों व पत्रिकाओं के आवरण पर प्रकाशित
  • सम्प्रति-सन्त पिफदेलिस स्कूल, ताला नगरी, रामघाट रोड, अलीगढ़ -202001 
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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

अंजू निगम की कविताएं




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


 सांसों को घेरता हुआ धुआं



सांसों को
घेरता हुआ धुआं
चेहरे लगने लगे
शहर से
परदों पर छींटों के
दाग हुए गहरे।
वर्जनाओं से भरे
इस जलते हुए
शहर का क्या  करें।

माथे झरे,
पसीने से
संयम कितने दिन
और करें।
हंसते-हंसते
विष पीने का
अभिनय कितने
दिन और करें।
तक्षक हैं
शोर-शराबे के
विनिमय
कितने दिन और करें।

भीड़ भरे चौराहों को
जैसे सूंघ गए
हों सांप
पोर-पोर पिघले ऐसे
अकुलाए चुपचाप।

विष बुझी हवाओं
को पीकर
बंसी तक
भर गई जहर से।
सांसों को
घेरता हुआ धुआं
चेहरे लगने लगे
शहर से।


 

धूप मुंडेरों पर 

                         

याद आती है
वह धूप
जब मुंडेरों पर
आते ही बैठ जाती थी।

याद आती है
वह धूप
जब रोशनी उजाला बनकर
घंटों बतियाती थी।

याद आती है
वह धूप
जब घंटों देखती  थी
रास्ता उनका
और लौट जाती थी।

   

नारी से शिला होना



मैं यशोधरा थी,
अहिल्या नहीं थी
लेकिन सिद्धार्थ की गौतमी कामना ने,
मुझे सचमुच में
अहिल्या बना दिया।

कभी,
इंद्र के राग से
जड़ हुई थी-
इस बार विराग ने पथरा दिया
दोनों की ही नियति थी
सोते हुए
छले जाना
और अनुत्तरित होकर रह जाना –
नारी से
शिला बनने की
प्रक्रिया का बार-बार दोहराया जाना।
पत्थर तन,
पत्थर मन,
लिए मैं
कभी अहिल्या बनती रही,
कभी यशोधरा कहलाती रही,
और हर बार पथराती रही।

सिद्धार्थ कैसे
पिता से गौतम,
गौतम से बुद्ध बने
राहुल को बताती रही।

     

क्यों  लांघी थी लक्ष्मण-रेखा 

                           

मैंने क्यों लांघी थी
लक्ष्मण रेखा ?
यह प्रश्न
मुझसे लक्ष्म‍ण ने तो क्या
कभी राम ने भी नहीं किया
उलटा मुझे ही,
प्रश्नों  के कठघरे में
खड़ा कर दिया।
मैं खुद लांघी थी
या बांध ही नहीं पाई थी
मुझको लक्ष्मण-रेखा !

सीता, जो
कभी जनकदुलारी थी
फिर बना दी गई
रघुकुल की मर्यादा,
पर लक्ष्मण-रेखा तो शायद
उल्लंघन करने के लिए
ही बनी थी,
साक्षी थी वह
सीता के हरण की
मर्यादा-हरण के
दु:खद चरण की।

पति की
पुकार को सुनते ही
जबरन भेज दिया
देवर को
उनके स्व र के पीछे
लेकिन,
सीता की चीखों को
किसने, कब, कहां सुना--

पत्नी की मर्यादा से
ऊपर थी,
रघुकुल की मर्यादा,
भिक्षुक को
खाली हाथ लौटाने से
रघुकुल लांछित हो जाता,
इसलिए,
भिक्षा देने
मैं बाहर चली गई,
यानी मर्यादा निभाने में ही
सीता छली गई।
पीछे मेरी आत्म  पुकारें,
चीत्कारें,
खाली चली गईं।

वैदेही तो,
कभी अयोध्या में
कही गई थी
लंका तो,
सचमुच मेरे लिए
विदेह थी।
कैसे
एक अशोक वृक्ष के नीचे
मैंने अपना
शोक काटा था
बहुमत में
रावण था,
मैं तिनके की ओट थी
नहीं खिंची थी
वहां पर
कोई भी लक्ष्मण-रेखा।

लौटने पर,
मैंने जब आंखें भरकर
उनको देखा
फिर भी कर दिया गया
मुझे अग्नि के हवाले
पर तपने के
बाद भी
पुरुषार्थ आश्वस्त  नहीं हो पाया
और मात्र
उस धोबी के कहने पर
जिसने खुद
अपनी पत्नी  को
शक में था पीटा
दण्डित करने के बजाय
मुझे ही रथ से उतारकर
वन में गया छुड़वाया
बिना कोई लक्ष्मण-रेखा खींचे ही,
उस हाल में,
जब मैं
रघुकुल के
‘वंश-गौरव’ का प्रतीक थी !


यह कैसा न्याय था
रघुकुल का
कैसा पुरुषार्थ था !
क्या  लक्ष्मण-रेखा
सिर्फ मेरे लिए ही बनी थी
क्या कोई मर्यादा नहीं थी
रघुकुल-पुरुष की ?

धनुष-यज्ञ के बाद,
वे भी तो
कुछ वचनों से
बंधे थे और
उनके लिए भी
कहीं खिंची थी रेखाएं –
मैं तो केवल सीता थी,
मात्र एक प्रतीक थी
अहं की
गर्व की,
मर्यादा की
पुरुष समाज की।।

मैंने तो कभी
भूलकर भी नहीं पूछा
पथराई अहिल्या
कैसे, क्योंकर द्रवित हुई,
शबरी के जूठे बेर
कैसे प्रेम का प्रतीक बने
पर तब
सचमुच मेरा मन भर आया
जब धोबी के प्रश्न  का
उत्तर देने के बजाय
मेरे राम ने
मुझे ही सवाल बनाया !

कैसा है यह समाज,
जो पत्नी को
निकालने के बाद
उसको सोने की
प्रतिमा में ढ़ालकर
यज्ञ पूरा कराता है
और तब कोई
लक्ष्मण-रेखा
उन्हें नहीं टोकती ।

यदि मैं खुद को
लक्ष्मण-रेखा में ही
बांधे रहती तो
रावण संस्कृति को
कैसे धिक्कारती !
अपने दो बेटों के साथ,
जंगल की चुनौतियां
कैसे स्वीकारती !

यह प्रश्न
सीता से
किसी ने भला
कभी क्यों नहीं किया –
क्यों लांघनी पड़ी थी,
उसे लक्ष्मण रेखा !

यह रेखा आखिर
किसी बलिहारी थी
क्या  यह केवल
पुरुष समाज की
लाचारी थी –
आगे-पीछे क्या हुआ,
किसी ने नहीं देखा
फिर भी,
लकीर की फकीर
बनी हुई है
आज भी
त्रेता की वह लक्ष्मण-रेखा !


अंजू निगम


संयुक्त सचिव,
संचार मंत्रालय,
भारत सरकार, नयी दिल्ली|



अंजू निगम



  • शिक्षा-एम.एस.सी. (भौतिक विज्ञान) 
  • लेखन क्षेत्र-गीत, नई कविता, व्यंग्य, रेखाचित्र आदि| 
  • प्रकाशन-रचनाएं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित | 
  • दूरदर्शन-आकाशवाणी से भी प्रसारण| 
  • प्रकाशित कृतियां-'धूप मुंडेरों पर' कविता संग्रह| 
  • व्यवसाय-भारतीय डाक सेवा| 
  • संप्रति-संयुक्त सचिव, संचार मंत्रालय, भारत सरकार| 

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

अंसार क़म्बरी के दोहे



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


लौट चलो अब गाँव..



हमको ये सुविधा मिली, पार उतरने हेतु |
नदिए तो है आग की, और मोम का सेतु ||

सारी नगरी रौंदते, बुलडोज़र के पाँव |
दाना-पानी उठ गया, लौट चलो अब गाँव ||

वो मुझसे नफ़रत करे, मैं करता हूँ प्यार |
ये उसका व्यवहार है, ये मेरा व्यवहार ||

केवल जो गरजे नहीं, बरसे भी कुछ देर |
ऐसे भी बादल पवन, अब ले आओ घेर ||

कोई कजरी गा रहा, कोई गाये फाग |
अपनी-अपनी ढपलियाँ, अपना-अपना राग ||

पहले आप बुझाइये, अपने मन की आग |
फिर बस्ती में गाइये, मेघ मल्हारी राग ||

सावन में सूखा पड़ा, फागुन में बरसात |
मौसम भी करने लगा, बेमौसम की बात ||

सफल वही आजकल, वही हुआ सिरमौर |
जिसकी कथनी और है, जिसकी करनी और ||

वैभव जो मिल जाय तो, करो न ऊँची बात |
चार दिनों की चाँदनी, फिर अंधियारी रात ||

पंछी चिंतित हो रहे, कहाँ बनायें नीड़ |
जंगल में भी आ गयी, नगरों वाली भीड़ ||




अंसार क़म्बरी



  • जन्म : 3–11–1950
  • पिता का नाम : स्व.ज़व्वार हुसैन रिज़वी
  • लेखन : ग़ज़ल, गीत, दोहा, मुक्तक, नौहा, सलाम, यदा-कदा आलेख एवं पुस्तक समीक्षा आदि
  • प्रकाशित कृति : ‘अंतस का संगीत’ (दोहा व गीत काव्य संग्रह) 
  • सम्मान : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ व्दारा १९९६ के सौहार्द पुरस्कार एवं
  •                समय-समय पर नगर व देश की अनेकानेक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं
  •                व्दारा पुरस्कृत व सम्मानित
  • सम्पर्क : ‘ज़फ़र मंजिल’ 11/116, ग्वालटोली, कानपूर – 208001
  • मो - 9450938629/ 9305757691
  • e-mail : ansarqumbari@gmail.com