बुधवार, 28 जनवरी 2015

आशा पाण्डेय ओझा की कविताएं



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



नदी

 


आखिर क्यों उफन जाती हैं नदियां
आखिर क्यों बिफ़र जाती है औरत
रोकी जायेगी जब  क्षमता उनकी
उजाड़ कर प्राक्रतिक प्रेमवृक्ष
बोये जायेंगे वासनाओं के  जंगल 
काट कर किनारे विश्वास पहाड़ के
खुरच-खुरच निकाली  जायेगी
मिट्टी जब नर्म अहसासों की
पाटे जायेंगे कोमल भावों के जलस्रोत
रोकेंगे पग -पग पर
बेवजह  बन्धनों के बाँध
जान जायेगी जब वो
अपने अस्तित्व को मिटाये जाने की
तमाम साजिशें
मात्र कूड़ाघर समझी जाने लगेगीं जब 
जीवनदात्रियाँ
मन की सुरम्यता तो होगी ही न अशांत
वेदना में डूबी केवल कराहेगी कब तक
एक रोज सीमाएं बढा लेगी  नदी
इक रोज क्षमताएं बढा लेगी औरत
आखिर उफनेगी नदी
आखिर बिफरेगी औरत



कहो ना क्यूं ?

 


मेरी देह की
मखमली दीवार पर
आये दिन गड़ती
असंख्य नजरों की कीलें
अंदर ही अंदर सिसकती हूँ
हर तरफ से बिंधी हुई मैं
टाँगना चाहता उस पर
अपनी वासना का रुमाल
कोई, कोई
टेकता इस पर
मैली इच्छाओं के हाथ
खींचता दर्द की लकीरें
कोई,कोई
खुरेचता विश्वास की पपड़ियाँ

कहो ना
क्यों उतारना चाहते हो
मुझ पर चढ़े
ये नाजुक अह्साओं के रंग
कोमल अह्साओं से विहीन
अखरुंगी ना
अंतत:
तुम्हारे ही मन की
आँखों को



ईश्वर और स्त्री



धीरे-धीरे मेरी ही तरह
तू भी एकला हो रहा है न इश्वर !
वो तेरी प्राण प्रतिष्ठा के गाजे बाजे
जलसे रौनक धूमधाम
पूरी तन्मयता से
तुझे स्थापित करने वाले
आते रहे फिर तेरे द्वार
आस्था में लिपटी लालसा लेकर
और मेरी बारात,शादी,विदाई
पगफैरा दो दिन का लाड कौड़
फिर मुझे ब्याह कर ले जाने वाले
अपनत्व में लिपटा स्वार्थ लेकर
उम्र भर चुप्पी के साथ
चाहते रहे सिर्फ मुझसे  काम
तू भी चुप मैं भी चुप
दोनों से सिर्फ प्रतिफल की कामना
तू गर दुआएं स्वीकारना बंद करदे
तू रह जाये सिर्फ पत्थर
धूल धूसरित जाले लटकता
परित्यक्त सा पड़ा रहेगा तेरा मंदिर
नदारद तेरा पुरोहित  
मैं काम करना छोड़ दूं तो
अनादरित प्रताड़ित पीड़ित
खतरे में पड़ जायेगा मेरा
सामाजिक पारिवारिक अस्तित्व
रह जाउंगी सिर्फ बोझ भर
देख कितनी समनाता है
तुझमे और मुझमें
दोनों बने सिर्फ कामना पूर्ती के लिए
बचाये रखने को अस्तित्व
चल लगें अपने-अपने काम पर 




रेत होना चाहती हूँ



नहीं रहा हौसला
उम्र भर
टुकड़ा टुकड़ा
बिखरने का
खत्म करके
मन पहाड़
मैं
एक साथ
रेत होना चाहती हूँ
कभी तो बहेगी
तेरे प्रेम की भागीरथी
इस तरफ
और बहा ले जाएगी
अपने साथ
मुझे 


अवैध संबंध 

  

इन बरसों
अपना रिश्ता
सालों से
ड्राइंग की दिवार पर लटकी
दिंवगत तस्वीर सा
झेल रहा
दंश खामोश नफरत का
जिस पर
जम गई
उपेक्षाओं की गर्द
फैली हुई
चारों तरफ
अविश्वास की सीलन
दिन-दिन उतर रही
विश्वास की पपड़ियाँ
बदरंग होते भाव
अन्दर ही अन्दर
खोखली हो रही
प्रेम की फ्रेम  
सारे संवाद चुप
चालित हैं
केवल दृश्य
दो वक़्त
खाने की मेज पर
अचकचाती
झुकी हुई
तुम्हारी  नजरें
स्नेह से खाली
ठंडी सी
मेरी निगाह
हमारे संबंधों की
 इस तस्वीर के पास
टांग लिया जिस रोज से
तुमने अपना नया
अवैध संबंध
न तुम
उतारकर
फैंक पा रहे मुझे
न खुद मैं गिरकर
चटक रही
अजब मजबूरियां

आशा पाण्डेय ओझा


c/o जितेन्द्र पाण्डेय
उपजिला कलक्टर
पिण्डवाडा 307022
जिला सिरोही राजस्थान
07597199995





आशा पाण्डे ओझा

  

  • जन्म स्थान-ओसियां (जोधपुर) 
  • जन्मतिथि-25/10/1970 
  • पिता : श्री शिवचंद ओझा 
  • माता :श्रीमति राम प्यारी ओझा 
  • शिक्षा :एम .ए (हिंदी साहित्य )एल एल .बी। 
  • जय नारायण व्यास विश्व विद्यालया ,जोधपुर (राज .) 
  • 'हिंदी कथा आलोचना में नवल किशोरे का योगदान में शोधरत 
  • प्रकाशित कृतियां 
  • -दो बूंद समुद्र के नाम, एक कोशिश रोशनी की ओर (काव्य), 
  • त्रिसुगंधि (सम्पादन ) 4 ज़र्रे-ज़र्रे में वो है 
  • शीघ्र प्रकाश्य- 
  • -वजूद की तलाश (संपादन), वक्त की शाख से (काव्य), पांखी (हाइकु संग्रह ) 
  • देश की विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं व इ-पत्रिकाओं में कविताएं ,मुक्तक ,ग़ज़ल 
  • ,क़तआत ,दोहा,हाइकु,कहानी , व्यंग समीक्षा ,आलेख ,निंबंध ,शोधपत्र निरंतर 
  • प्रकाशित 
  • सम्मान -पुरस्कार 
  • कवि तेज पुरस्कार-जैसलमेर,राजकुमारी रत्नावती पुरस्कार-जैसलमेर 
  • ,महाराजा कृष्णचन्द्र जैन स्मृति सम्मान एवं पुरस्कार पूर्वोत्तर हिंदी 
  • अकादमी शिलांग (मेघालय ) साहित्य साधना समिति पाली एवं राजस्थान साहित्यअकादमी उदयपुर द्वारा अभिनंदन ,वीर दुर्गादास राठौड़ साहित्य सम्मानजोधपुर ,पांचवे अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मलेन ताशकंद में सहभागिताएवं सृजन श्री सम्मान ,प्रेस मित्र क्लब बीकानेर राजस्थान द्वारा अभिनंदन,मारवाड़ी युवा मंच श्रीगंगानगर राजस्थान द्वारा अभिनंदन ,साहित्य श्रीसम्मान संत कवि सुंदरदास राष्ट्रीय सम्मान समारोह समिति भीलवाड़ा 
  • राजस्थान ,सरस्वती सिंह स्मृति सम्मान पूर्वोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग 
  • मेघालय ,अंतराष्ट्रीय साहित्यकला मंच मुरादाबाद के सत्ताईसवें 
  • अंतराष्ट्रीय हिंदी विकास सम्मलेन काठमांडू नेपाल में सहभागिता एवं 
  • हरिशंकर पाण्डेय साहित्य भूषण सम्मान ,राजस्थान साहित्यकार परिषद 
  • कांकरोली राजस्थान द्वारा अभिनंदन ,श्री नर्मदेश्वर सन्यास आश्रम 
  • परमार्थ ट्रस्ट एवं सर्व धर्म मैत्री संघ अजमेर राजस्थान के संयुक्त 
  • तत्वावधान में अभी अभिनंदन ,राष्ट्रीय साहित्य कला एवं संस्कृति परिषद् 
  • हल्दीघाटी द्वारा काव्य शिरोमणि सम्मान ,राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुरएवं साहित्य साधना समिति पाली राजस्थान द्वारा पुन: सितम्बर 2013 में अभिनंदन 
  • रूचि :लेखन,पठन,फोटोग्राफी,पेंटिंग,पर्यटन 
  • संपर्क : 09772288424/07597199995/09414495867 
  • ब्लॉग ashapandeyojha.blogspot.com 
  • पृष्ठ _आशा का आंगन एवं Asha pandey ojha _ sahityakar 
  • ईमेल: asha09.pandey@gmail.com

शनिवार, 24 जनवरी 2015

ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


भारत माता का जयगान..




दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

यहाँ सृष्टि के आदि काल में, समता का सूरज चमका,
करुणा की किरणों से खिलकर, धरती का मुखड़ा दमका!
सुनो! मनुजता को हमने ही, आत्म त्याग सिखलाया है,
लालच और लोभ को तजकर, पाठ पढ़ाया संयम का!!

जो जग के कण-कण में रहता, सब प्राणी उसकी संतान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

रहें कहीं हम लेकिन शीतल, मंद सुगंधें खींच रहीं
यह धरती अपनी बाँहों में, परम प्रेम से भींच रही!
सारे धर्मों, सभी जातियों, सब रंगों, सब नस्लों को,
ब्रह्मपुत्र, कावेरी, गंगा, कृष्णा, झेलम सींच रहीं!!

ऊँच नीच का भेद नहीं कुछ, सद्गुण का होता सम्मान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

हमने सदा न्याय के हक़ में, ही आवाज़ उठाई है,
अपनी जान हथेली पर ले, अपनी बात निभाई है!
पुरजा-पुरजा कट मरने की, सदा रखी तैयारी भी,
वंचित-पीड़ित-दीन-हीन की, अस्मत सदा बचाई है!

जन-गण के कल्याण हेतु हम, सत्पथ पर होते बलिदान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

जिसके भी मन में स्वतंत्रता, अपनी जोत जगाती है,
जो भी चिड़िया कहीं सींखचों, से सिर को टकराती है!
वहाँ-वहाँ भारत रहता है, वहाँ-वहाँ भारत माता,
जहाँ कहीं भी संगीनों पर, कोई निर्भय छाती है!

आज़ादी के परवानों का, सदा सुना हमने आह्वान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

सब स्वतंत्र हैं, सब समान हैं, सब में भाईचारा है,
सब वसुधा अपना कुटुंब है, विश्व-नीड़ यह प्यारा है!
पंछी भरें उड़ान प्रेम से, दिग-दिगंत नभ को नापें,
कहीं शिकारी बचे न कोई, यह संकल्प हमारा है!

युद्ध और हिंसा मिट जाएँ, ऐसा चले शांति अभियान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

जल में, थल में और गगन में मूर्तिमान भारतमाता,
अधिकारों में, कर्तव्यों में, संविधान भारतमाता!
हिंसासुर के उन्मूलन में, सावधान भारतमाता,
'विजयी-विश्व तिरंगा प्यारा', प्रगतिमान भारतमाता!!

मनुष्यता की जय-यात्रा में, नित्य विजय, नूतन उत्थान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!

दिशा-दिशा में गूँज रहा है, भारत माता का जयगान!
भारत का संदेश विश्व को, मानव-मानव एक समान!!




देश स्मरण 



गंध बह कर आ रही है
महकता है याद में भी
वह हवन का धूम

शंख के संग गूँजती है
ध्वनि अजानों की
खिल रहा है शब्द से आज्ञाकमल

प्राण में जागे असुर को रौंदती
युद्ध की देवी विचरती
रक्त पीती शत्रु का निर्भीक

लोग मरते-मारते
पर कहाँ धरती किसी की?
तैरता सच यह युगों के पार

जब  कभी होता अकेला मन
भीड़ में, परदेस में भी
जाग उठता देश-घर अपना

देश केवल स्थल नहीं
जन भी नहीं है देश
देश है संबंध का विस्तार

खोजते फिरते रहो
विश्व के बाज़ार में
देश अपने घोंसले में चहचहाता है!




ऋषभदेव शर्मा 




  • जन्म : 04 जुलाई 1957, ग्राम गंगधाडी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश.
  • शिक्षा : एम.ए. (हिंदी), एम.एस.सी. (भौतिकी), पीएच.डी. (उन्नीस सौ सत्तर के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन).
  • कार्य : 1983-1990 : जम्मू और कश्मीर राज्य में गुप्तचर अधिकारी (इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार).
  • 1990-1997 : प्राध्यापक. 1997-2005 : रीडर. 2005 से प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा.
  • प्रकाशन : काव्य संग्रह – 1. तेवरी (1982), 2. तरकश (1996), 3. ताकि सनद रहे (2002), 4. देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), 5. प्रेम बना रहे (2012), 6. सूँ साँ माणस गंध (2013), 7. धूप ने कविता लिखी है (तेवरी-समग्र, 2014).
  • [‘प्रेम बना रहे’ कविता संग्रह के 2 तेलुगु अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं - :प्रिये चारुशीले (डॉ. भागवतुल हेमलता, 2013), प्रेमा इला सागिपोनी (जी. परमेश्वर, 2013)],
  • आलोचना – 1. तेवरी चर्चा (1987), 2. हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक (1994), 3. कविता का समकाल (2011), 4. तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013).
  • अनुवाद चिंतन – साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000).
  • संपादन : पुस्तकें – भाषा की भीतरी परतें (भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 2012), शिखर-शिखर (डॉ.जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया (2013), प्रेमचंद की भाषाई चेतना, अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), अनुवाद : नई पीठिका - नए संदर्भ, कच्ची मिट्टी  2, पुष्पक 3 और 4, पदचिह्न बोलते हैं. पत्रिकाएँ – संकल्य (त्रैमासिक) : दो वर्ष, पूर्णकुंभ (मासिक) : पाँच वर्ष : सहायक संपादक, महिप (त्रैमासिक) : सहयोगी संपादक, आदर्श कौमुदी : तमिल कहानी विशेषांक, कर्णवती : समकालीन तमिल साहित्य विशेषांक, भास्वर भारत : संयुक्त संपादक.
  • मूलतः कवि. 1980 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन. अनेक शोधपरक समीक्षाएँ एवं शोधपत्र प्रकाशित. शताधिक पुस्तकों के लिए भूमिका-लेखन. आंध्रप्रदेश हिंदी अकादमी के ‘हिंदीभाषी हिंदी लेखक पुरस्कार - 2010’ द्वारा सम्मानित, ‘रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान - 2013’ से सम्मानित. डीलिट, पीएचडी और एमफिल के 125 शोधकार्यों का निर्देशन.
  • संप्रति : प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद – 500004.
  • संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतपुर, हैदराबाद – 500013.मोबाइल : 08121435033
  • ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com

हरि नारायण तिवारी के दो गीत



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



देश सुन रहा है..



जो वह सुना रहे हैं,
वही देश सुन रहा है।
जो जो दिखा रहे हैं,
वही देश गुन रहा है।

हम लोग बहु पठित हैं,
कुछ वर्ग संगठित हैं।
लेकिन अपढ़ अभी भी,
मौजूद परिगणित हैं।
रमुआ का पढ़ा बेटा,
क्या चीज बुन रहा है।।1।।

सड़कों का शोर घर-घर,
आवाज दे रहा है।
भाषण की गूढ़ता का,
अनुवाद कर रहा है।
वोटर समेटने की,
दीवान चुन रहा है।।2।।

भूखा कहाँ पड़ा है,
सूखा कहाँ पड़ा है।
बेघर के पास जाकर,
लालच लिये खड़ा है।
तिकड़म की अंगणित में,
हरि भी निपुण रहा।।3।।




मुझसे लिखा नहीं जाता..



जो लिखवाना चाह रहे तुम,
मुझसे लिखा नहीं जाता है।।

स्वार्थ सिद्धि की जिसमें रव हो,
जीवित रहते जो मन शव हो।
उसकी कहनी लोक जगत में,
खुलकर कहा नहीं जाता है।।

सुलभ न हो जिस तरुवर के फल,
नित्य नई अभिलाषा प्रति पल।
रसना के उन उच्छवासों में,
निधरक बहा नहीं जाता है।।

हम निर्जन में जन धन वाले,
अपने अन्तर उपवन वाले।
झूम झूमकर उसके रस में,
सुखमय स्वाद नहीं आता है।।

कल्प वृक्ष की हम पर दाया,
सदा सुहावन रहती छाया।
निर्मल रहना जीना सीखा,
कलुषित कर्म नहीं भाता है।।

हम हैं राह बनाते जाते,
सच सबको समझाते जाते,
सभी हमारे हम सबके हैं,
रखता मानवता से नाता।।


हरि नारायण तिवारी


बी-112, विश्व बैंक कालोनी,
बर्रा, कानपुर-27
मो. 9936770560
फोन 0512-2680865



हरि नारायण तिवारी 



  • जन्म-6 जून 1951
  • पिता स्व.बलदेव तिवारी
  • शिक्षा-एम ए (हिंदी) कानपुर विश्वविद्यालय
  • प्रकाशित काव्य-दीपनगर सौन्दर्य, अमर बलिदानी ऊधम सिंह (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत खंडकाव्य), वेणु शतक (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा पुरस्कृत खंडकाव्य), अन्तर्दिशाएँ, गीतालोक आदि।
  • अप्रकाशित काव्य-लहर लहर तक (खंडकाव्य),  भारत दर्शन ( पर्यटन काव्य), अजीजन बाई (खंडकाव्य)
  • विशेष- विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा देश, प्रदेश में सम्मानित,पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ प्रकाशित
  • स्थायी पता ग्राम-गौरा, पोस्ट-दियरा, जनपद-सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश)
  • सम्पर्क-भी-112-113 विश्व बैंक कॉलोनी, बर्रा, कानपुर नगर-208027
  • संप्रति- आज हिंदी दैनिक, 79/75, बांसमण्डी, कानपुर-01
  • फोन-0512 2680865/ मोबाइल 09936770560
  • ईमेल-Shaileshtiwari73@yahoo.com

मंगलवार, 20 जनवरी 2015

डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प' की दो कविताएं



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


शब्द 



शब्द आदि से ही धरोहर हैं
किन्हीं प्रदत्त अर्था की
जिन्हें अक्षर-अक्षर बुना था
अबूझे, अचीन्हे ब्रह्म ने।
ब्रह्म! या फिर
अक्षर है वह स्वयं ही
और निराकार भी
उस अनाम अचीन्हे को कहा ढूंढे कविता,
ताकि
अर्थ सीखचों में कैद छटपटाते शब्दों को
नई अभिव्यक्ति दे
मुक्त करवा सकें,
खुले आसमान पर अंकित
व निर्वसना धरा पर बिछी सभ्यता को,
आदर्शों-आश्वासनों के
सही मायने समझा सकें।
लीक से हट कर
कुछ नैसर्गिक उद्भावना कर सकें
ऐसी उद्भावना जिससे
खुले आसमान और
निर्वसना धरती पर बिछी सभ्यता को
दिशा मिले सही सही।    



जीवन-संध्या 



जीवन की संध्या उसे
किसी अन्धेरी गुफ़ा में
धकेलने को आतुर
प्रतिक्षण चली ही आ रही थी।
और वह
किन्हीं चिराग़ों की टोह में
अपनी मोतिया-बिन्द भरी आंखों को
और-और फैलाती
बढ़ते अन्धेरे को काटने के
अथक प्रयास करती रही।

उसकी आशा के चिराग़
किसी तेल-घी के नहीं थे मोहताज
स्निग्ध-स्नेह की मोहमयी बाती से
दिपदिपाते थे।
सुख-दुःख के झोंकों से
बुझती-जगती, बढ़ती-घटती लौ
तन्मय हो नाचती गाती-सी
पूरी रात का अन्धेरा
काटती रही थी।

अब जब आंखें उसकी
धुंआले गुब्बार में डूब गई हैं
और हड्डियों में रेंग जाती हैं
असहनीय दर्द की उद्वेलित लहरें
आवाज़ें बहरे जंगलों से होकर आती हैं
मानो पत्थरों पर
सिर पटकती बौखलाई हुई-सी,
तो ऐसे में वह
स्निग्ध स्नेह को
कहां से ढूंढ निकाले।



डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प' 


संपादक,
'अनहद कृति' त्रैमासिक ई-पत्रिका
(www.anhadkriti.com)
ईमेल:chaswalprempushp@gmail.com

शुक्रवार, 16 जनवरी 2015

दस्तक: दो कविताएं-मनोज कुमार




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



स्त्रियाँ 



स्त्रियाँ जनती है स्त्रियाँ...
मार दी जाती है अनगिनत स्त्रियाँ
स्त्रियों की ही कोख में,
स्त्रियों कि देखरेख में,
पुरुषों के समाज में,
पुरुषों के ही कुनबो को आगे बढ़ाने वाली
स्त्रियाँ मार दी जाती है !

अपनी माँ की कोख में ...
अपने पिता की जानकारी में,
जिनकी वो रानी बेटी होती,
जिनकी वो सोन चिरैया होती,
जिनके वो जीना का सहारा होती
मार दी जाती है स्त्रियाँ ....
स्त्रियों की ही कोख में !

किसी बाप की वो दुलारी होती,
किसी भाई की राखी होती,
किसी पति की पत्नी होती,
फिर उसी के बच्चे की माँ होती ...
पर फिर भी मार दी जाती है
अनगिनत स्त्रियाँ कोख में ही ...

वो स्त्रियाँ जो समाज की -
जननी है,
परिवार की धुरी है,
पुरुषों की लोरी है,
उनके जीवन की डोरी है.

मत मारो जो प्यार का प्रतीक है,
मत छीनो जो परिवार की रौनक है,
मत छलो उसे जो -
बल, बुद्धि, धन की देवी है ...
ये तुम्हारी किस्मत है
की वो तुम्हारे घर जन्म लेती है
संवार देती है तुम्हारा आँगन.



मोहब्बत 



जाने कैसे लोग नफरत के लिए
समय निकाल लेते है ?
हमे तो मोहब्बत से ही
फुर्सत नहीं मिलाती है !
कोई पूंछता है तो हम कह देते है -
नफरत आपके यहाँ होगी,
हमारे घर मोहब्बत बसती है...
हमारे घर मोहब्बत बसती है I


मनोज कुमार

सीनियर मैनेजर मैकेनिकल (निरीक्षण),
जॉर्डन इंडिया फर्टिलिज़र कंपनी,
जोर्डन।
फोन: +962 788293431/ 790219472
ईमेल: manojkumar@jifco.co

सोमवार, 12 जनवरी 2015

साधक व अन्य कवितायें-मंजुल भटनागर




कलाकृति:अजामिल




साधक



निर्जन सा मन
कोहरा पहन
मिलता है प्रेम बांचती धरा से
ओस पड़ी थी रात बहुत
हवाएं सनसनाती थी
पक्षियों के डेनो पर
बैठ सवेरा सोता रहा.

नदी को कुछ कहना था
नाव सी मुस्कराहटें लिए
आस तैरती रहीं
नदी मझधारे चली
डूबने का खौफ लिए.


भीगी सी पगडण्डी
अलसाई घास
रास्तों के पत्थर
चल रहे थे साथ साथ

दूर पहाड़ी से
बांसुरी की धुन
मौन ,साधक बन
सब कुछ गुन रहा था .



प्रेम के स्त्रोत



स्वप्न कभी सो जाएँ
सूख जाएँ प्रेम के स्त्रोत
नदी जंगल सभी तरफ हो आग
बुझाने को न हो जल
न बादल
तब भी छाँव ,कस्तूरी मृग सी
जल है या कहीं मृगतृष्णा
बुझा देती अग्नि ,ताप
मृग मारीचिका सी प्यास .

रिश्ते जब धुंध से हों
कुछ दीखता न हो
धूम्र रेखा सा अस्तित्व
खंडित सा हो मन
फिर भी हाथ खुले तो बदली की एक बूंद भी
देती है कुछ जीने की आस.

धूप जलती हुई है
हवा नासाज़, बहती हो
लेकिन दूर.....चलती हुई
जलती सड़क पर
सड़क की सतह पर
पानी सा झिलमिला रहा है
जैसे सहरा का मिराज़
पर ओस चाटने से
क्या बुझी है किसी प्यासे की प्यास .



नावें



पानी की सड़क
चप्पू से चलती नावें
संगीत सा झंकृत
पैदल पैदल चलती नावें .


जीवित पेड़ की
काठ की मुर्दा नावें
ले चलती कितनी  यादों को समेटे
इस पार से उस पार नावें


पानी कम हो
पहरुए सवार हों
ठेलती हैं दूर तक
कितनी बोझिलता ढोती  नावें

मझदार में फंस जाये कभी
तुफानो से भी लड़ जाती हैं नावें
काठ की सही कभी
दोबारा पेड़ बन जाती हैं नावें




प्रणय प्रसंग



रंग उड़े बयार में
खुशबू हरसिंगार
टेसू मन  रंग गए
पत्ते बंदन वार

ओढ़े चुनर थी ठगी
सरसों बारम्बार
खेत खलिहान रंग गए
मलयानिल बौछार .

फाग नहाई रुत हुई
जीवन जगा बसंत
पिया मिलन की आस में
चकवी उड़ी दिगंत .

द्वार सजाने आ गए
बाल गोपाल  अनंग
बसंत भेज सन्देश तो
मन में बजे मृदंग  .


टेसू तन मन भिगो रहे
गुलाल अबीर कपोल सजे
आज बुनेगा प्रेम कोई
नूतन प्रणय प्रसंग .



मनुहार



मेघा कब बरसोगे
नदी व्याकुल सी
झील मंद सी मौन
खेत ,आँगन ,मोर नभ निहारे
कब भरेंगे सुखन मनस सारे
कब मन हर्षोगे
मेघा तुम कब बरसोगे ?
नगार्जुन के प्रिय
देखा तुम्हें बरसते
विंध्याचल के द्वारों पर
देखा दूर हिमालय पर
मलयानिल झोंको से मेरा आंगन
तुम कब सरसोगे
मेघा तुम कब बरसोगे?

कालिदास के मेघ दूत
विरह सिक्त पावक प्रतीक्षा रत
नभ गवाक्ष से झांक रहे तुम
ले अगणित जल संपदा
गुजर रहे सजल तुम द्वारिका से
मेरे द्वार कब छलकोगे
मेघा तुम कब बरसोगे.

दया निधि बन जाओ
कृषक  प्रतीक्षा रत
बरसा जाओ नभ कंचन
महकेगा  खेत प्रागंन
आह्लादित होगा धरणी का तन मन .


मंजुल भटनागर


0/503, तीसरी मंजिल, Tarapor टावर्स
नई लिंक रोड, ओशिवारा
अंधेरी पश्चिम मुंबई 53।
फोन -09892601105
022-42646045,022-26311877।

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

अवधेश सिंह की कविताएं



विनोद शाही की कलाकृति


सफर 



 (एक)


मृत्यु के बाद का सफर
क्या पता कहाँ जाना है
किस मंजिल को
क्या पता वापसी का
लेकिन तय है, देखा है
शिशु से वृद्ध होने तक का सफर।
सफर का अर्थ
बदल भी सकता है ..... शायद
तुम साथ होते तो भी सफर होता
तुम साथ नहीं
तो भी सफर का साथ तो है।
वजूद ए सफर को फर्क नहीं पड़ता
तुम्हारे साथ होने या न होने का
फर्क पड़ता है हमें और तुम्हें भी तो ....
क्यों की बड़ा फर्क है
सफर तन्हा हो
बद-गुमाँ हो
बद – हवास हो .....
या हो सफर खुश-नुमाँ ।

 

(दो)



सफर में काश..
अपनों की
अहमियत होती।
रिश्तों में मनमोहक महक होती
सफर कैसा भी होता
तो भी
ये जिंदगी
मायूसी में भी जन्नत होती।



गर्म स्वेटर



(एक)


मेरी ठिठुरन को
दूर करने के लिए
ऊन के मुलायम नर्म धागे से बुनती रही
मेरे लिए गर्म स्वेटर
अलग अलग रंग
चित्रकारी के
मैं तुम्हारी आँखों में बनने वाले
धागों से बुनता रहा तुम्हारे सपने
ताकि बदले में वैसे ही प्यार की
गर्माहट तुम्हें भी मिले
मिले रंगीन चित्रकारी भरे दिन रात

न कभी शीत ॠतु ने हमारे घर आना बंद किया
और न कभी मैंने रोका खुद को
तुम्हारी आँखों से पकड़ कर
लाल धागों से तुम्हारे सपनों को बुनना

25 शीत ॠतुओं की ठंड गवाह है
उस गर्माहट की
जो तुम्हारे बुने स्वेटरों से मुझे मिलती रही

अब चश्मे के पीछे आँखों में वो धागे नहीं दिखते
प्रमाण है एक
एक वो सारे तुम्हारे सपने पूरे ही नहीं हुए
बल्कि वे तुम्हारे चारो ओर
खड़े मुस्करा रहें हैं साकार होकर जीवंत ।


(दो)



ऐसा नहीं की पलकें भीगी न हों
ऐसा नहीं वो काजल की काली लकीर
आंसुओं से मिटी न हो
ऐसा नहीं की मैं सावन–भादों सी आँखों में
खो गए धागों को पकड़ने में असफल रहा हूँ ।

ऐसा नहीं की इन 25 वर्षो में
आंखे–काजल–सपनों के क्रम
आगे पीछे न हुए हो
लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ की
शीत ॠतु आई हो बिना तुम्हारे हाथों बने
नए गर्म स्वेटर को लिए हुए ।

यह आस्था थी ,
विश्वास था ,
सौगंध थी ,
साथ निभाने की
मैं हर बार की आँधी
और तूफान के जलजले के बाद
आँखों के धागे को पकड़ता रहा
देर सबेर ही सही लेकिन बुनता रहा
सपने सिर्फ तुम्हारे लिए।

.

अवधेश सिंह 


'स्वीट होम अपार्टमेन्ट',
एम.आई.जी/ऍफ़ ऍफ़-1,
प्लाट - 212 , सेक्टर-04,
वैशाली,गाजियाबाद–201010
[ रा.राज. क्षेत्र दिल्ली ]
मोबाइल–09868228699




अवधेश सिंह



  • जन्म: : जनवरी 4, 1959, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश (भारत)।
  • शिक्षा : विज्ञान स्नातक, मार्केटिंग मैनेजमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, बिजनिस  एडमिनिस्ट्रेशन में परास्नातक तक शिक्षा प्राप्त की है ।
  • प्रतिनियूक्ति  पर भारतीय सूचना सेवा के वरिष्ठ मीडिया अधिकारी के पद पर भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के डी.ए.वी.पी. [DAVP] , डी.ऍफ़.पी [DFP] के प्रमुख रहे व पी आई बी [PIB] , समाचार प्रभाग दूरदर्शन तथा आकाशवाणी विभागों से सम्बद्ध रहे [1989 -1995]  ।
  • साहित्यक यात्रा : 1972 में आकाशवाणी  में पहली  कविता  प्रसारित हुई मात्र तेरह वर्ष की बालावस्था में, स्कूल, विद्यालय से कालेज स्तर तक लेख , निबंध , स्लोगन , कविता लिखने का एक  क्रम   नयी कविता , गीत , नवगीत , गज़ल , शब्द चित्र , गंभीर लेख , स्वतन्त्र टिप्पड़ी कार , कला व साहित्यक समीक्षक की विधाओं के साथ आज तक निर्बाध जारी है ।
  • अस्सी -नब्बे के दशक में मौलिक रचनाएँ व लेख, सांस्कृतिक समीक्षायें आदि दैनिक जागरण , दैनिक आज, साप्ताहिक हिदुस्तान , धर्मयुग  आदि   में प्रकाशित हुए   तब के समय ब्याक्तिगत रूप से धर्मयुग के श्री गणेश मंत्री ,  साप्ताहिक हिंदुस्तान की श्रीमती म्रनाल पान्डे , दैनिक जागरण के स्व श्री नरेन्द्र मोहन व वरिष्ठ पत्रकार स्व श्री जीतेन्द्र मेहता , वरिष्ठ पत्रकार स्व श्री हरनारायण निगम का सानिध्य व सुझाव दिशा निर्देश प्राप्त का सौभाग्य  मिला था जो आज भी अविस्मरनीय है. प्रख्यात साहित्यकार, हिंदी प्रोफ़ेसर, पत्रकार डाक्टर स्व. श्री प्रतीक मिश्र  द्वारा  रचित " कानपुर के कवि " एक खोज पूरक दस्तावेज में प्रतिनिध ग़जल- कविता व जीवन परिचय का संग्रह 1990 में किया गया था । नव निकस , परिंदे , मंजूषा ,संवदिया आदि  गंभीर साहित्यक पत्रिकाओं और नेट पत्रिकाओं में लगातार रचनाएँ प्रकाशित हो रहीं हैं ।
  • संपादन व प्रकाशन कार्य यात्रा : सामाजिक संस्था अशोक क्लब की वार्षिकी सामाजिक गृह पत्रिका अनुभूति के संपादन व प्रकाशन कार्य 1979 से 1981 तक किया , मीडिया अधिकारी के रूप में लगातार 1990 से 1995 तक सम्बंधित नगरों की डायरी सूचना प्रसारण मंत्रालय हेतु प्रस्तुत की.  दूरसंचार विभाग की विभागीय प्रकाशन गृह पत्रिका गंतव्य कानपुर 1995 से 1998 तक, विभागीय प्रकाशन गृह पत्रिका हिमदर्शन शिमला 2000 से 2002 तक में सम्पादकीय सहयोग का कार्य  किया इसके अतिरिक्त दूरदर्शन शिमला ,आकाशवाणी तथा स्थानीय मंचों पर काव्य पाठ के साथ विभागीय राज-भाषा कार्यों में सतत संलग्नता नें हिदी साहित्य की उर्जा का लगातार उत्सर्जन किया है ।
  • प्रकाशित किताबें-
  • -प्रेम कविताओं पर आधारित संकलन "छूना बस मन"  [2013 ]
  • -सामाजिक विघटन ,मूल्यों -आस्थाओं पर कविताओं का संग्रह "ठहरी बस्ती ठिठके लोग " [2014]
  • प्रकाशाधीन पांडुलिपियाँ : आवारगी (गजल संग्रह ) , नन्हें पंक्षी (बाल कविताओं का संगह )
  • सम्पादन : अंतर्जाल साहित्यक-सांस्कृतिक पत्रिका www.shabdsanchar.in
  • अन्य संपर्क : https://www.facebook.com/awadheshdm , www.hellohindi.com
  • सम्प्रति : वर्तमान में ग्रेड-ई 5 सीनियर एक्जीक्युटिव अधिकारी पद पर भारत संचार निगम लिमिटेड के कार्पोरेट आफिस नयी दिल्ली में कार्यरत हैं।

रविवार, 4 जनवरी 2015

पुष्पराज चसवाल की दो कविताएं




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



रहस्यमय सत्ता 



अकेले नितांत अकेले अविराम
सागर के असीम विस्तार से आगे
आकाश के कलपनातीत ऊंचाई से परे
क्षितिज के पारदूर सुदूर तक
उसके आर-पार सौरमंडल में घूमती
अंतरिक्ष में झूलती भव्य धरा की
आकर्षण सीमा से आगे
लम्बा बहुत लम्बा सफर तय किया मैंने
         किन्तु तुम्हारी रहस्यमय सत्ता के
         अनोखे जादुई रूप के विराट दृष्य से
         वंचित रहा,
यहाँ तक वंचित रहा रहा हूँ मैं
की संभवतः युगों-युगों तक
मेरी यह कालातीत यात्रा
अधूरी ही रहेगी, निरंतर अधूरी
        कौन जाने मेरी इस युगीन यात्रा का
        सतत अधूरापन ही कहीं
        'वह' अंतिम सत्य न हो
जो होने न होने के युगीन द्वंद्व की
शाश्वत त्रासदी के कालांतर में
झेलते हुए अनायास ही
सम्पूर्ण सत्य के नैसर्गिक उद्घाटन का
विहंगम अवलोकन कर सके
और उस कालजयी मार्मिक क्षण की
दिव्यता को निमिष भर निकट हो सके,
जिसकी अक्षुण्ण सत्ता के कारन
इस विराट सृष्टि की व्यापकता एवं सार्थकता
अक्षत है, अनुपम है, अपरिमित है।



क्षण का आकर्षण 



धूप खिली खो गयी
शिखर पे इतराते क्षण का
आकर्षण कब हो सका
दीर्घ स्थायी,
उम्र-भर
संचित निधि पाने
की प्रतीक्षा क्या करते हो
उपहास जन्य प्रयास करते हो!
'अमरत्व कभी
सुदूर अज्ञेय से नहीं जन्मा
-न जन्मेगा
गंगा शिव की जटाओं में नहीं
भगीरथ के श्रम में
प्रतिक्षण-क्षणांश की सीमा तक
प्रवाहित है।
क्षण-वर्तमान क्षण ही
श्रम से तपा-निखरा क्षण
ही परन्तप सत्य है
पूर्णकालिक समाहित सत्य।


पुष्पराज चसवाल

संपादक,
'अनहद कृति' त्रैमासिक ई-पत्रिका
(www.anhadkriti.com)
ईमेल: prchaswal@gmail.com