शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

काव्य-उन्मेष-उत्सव







एक अनूठा ऑनलाइन साहित्यिक उत्सव 



'अनहद कृति' हिंदी की त्रैमासिक ई-पत्रिका के प्रथम वार्षिक साहित्यिक ऊर्जायन का काव्य-उन्मेष-उत्सव इन दिनों चल रहा है। 'अनहद कृति' की शुरुआत जिन उद्देश्यों को लेकर की गई, उनमें "हिन्दी साहित्य, संस्कृति एवं कला की गहन, निरंतर और व्यापक अमूल्य निधि में अपने सार्थक प्रयत्नों द्वारा वैश्विक स्तर पर साहित्य साधकों को संगठित करके हिंदी भाषा का समुचित संरक्षण, संवरण, विकास एवं विस्तार करना और साहित्य सृजन के महत कार्य में अपने-अपने सरोकारों से रचनाशीलता में जुड़े सभी कर्मठ, साहित्य एवं कला के प्रति कटिबद्ध रचनाकारों को एक सांझे मंच पर लाकर उनकी रचनाओं को विश्वस्तरीय पहचान करवाना हमारा परम लक्ष्य रहा है। इसके साथ ही उभरते रचनाकारों का स्वागत करना व उन्हें सृजन के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करना भी हमारा उद्देश्य है।"

'अनहद कृति' का नियमित संचालन व विकास उन्हीं उद्देश्यों के अंतर्गत किया जा रहा है और इसके सुखद परिणाम भी दृष्टव्य हैं कि इसके कलेवर, रचनाकारों, पाठकों व विभिन्न देशों तक पहुँच में निरंतर वृद्धि हो रही है। फिर भी हिन्दी का समुचित विकास एवं विस्तार, इस के अतिरिक्त भी हमसे कुछ अन्य प्रयासों की मांग करता है, जिसके लिए हम समय-समय पर नए लक्ष्य संधान करके इस कार्य को और उत्साहपूर्वक सबको सम्मिलित करने के प्रयास कर रहे हैं। फेस-बुक, लिंकडिन और ट्विटर से अधिक से अधिक हिंदी-प्रेमियों तक हमने अपनी पहुँच बढ़ाई है। रचनाकारों में साहित्य-संवर्धन हेतु नया ओज व ऊर्जा भरने के लिए 'अनहद कृति के वार्षिक साहित्यिक ऊर्जायन' का प्रारम्भ भी उन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में एक प्रयास है।

'अनहद कृति' वैश्विक स्तर पर हिंदी के विद्वत समाज एवं रचनाकारों को विशुद्ध साहित्यिक दृष्टि से सांझे मंच पर लाकर उन्हें उत्कृष्ट पहचान दिलवाने के लिए प्रयत्नशील है। इसी के अंतर्गत 'काव्य-उन्मेष' स्पर्धा उत्सव की घोषणा 'हिंदी दिवस' पर की गई, इस प्रतिस्पर्धा की रूपरेखा ऐसी बनायी गयी है कि यह लेखक, पाठक और रचना का एक सामूहिक उत्सव बन सके।

हिंदी साहित्य जगत में यह पहला ऐसा प्रयास है-
जिसमें कि काव्य-उत्कृष्टता का किसी अन्य पहचान की मोहताज न होकर विशुद्ध गुणवत्ता पर परखे जाने का प्रावधान किया जाएगा तथा प्रतिभागी रचनाकारों के नाम को या उनकी अन्य पहचान को निर्णय आने तक पूर्णतः गोपनीय रखा जाएगा। 'अनहद कृति' निष्पक्ष निर्णय से ऐसी रचनाशीलता को ढूंढने की पक्षधर है जो किसी पहचान, रसूख या लिप्सा की मोहताज न होकर विशुद्ध उत्कृष्टता पर निर्भर होगी। इसके लिए ४ माह तक प्रतिभागियों से रचनाएं एकत्रित की जाएंगी फिर ३ माह तक सभी सम्मिलित की गई कविताओं को पाठकों द्वारा मूल्यांकन के लिए उपलब्ध करवा दिया जाएगा। जो भी पाठक जज बनना चाहेंगे, उन्हें लगभग सभी कविताओं को अपनी समय सुविधा से पढ़ कर नियमानुसार अपना निर्णय प्रेषित करना होगा।
और, स्पर्धा के निर्णय में ३०% भागीदारी 'अनहद कृति' के सुधि पाठकों की होगी जिसके लिए सभी सम्मिलित की गई कविताओं को 'अनहद कृति' के खुले मंच पर डाल दिया जाएगा ताकि पाठक उन रचनाओं पर निःसंकोच अपना मत व्यक्त करने के अधिकारी हों। 'अनहद कृति' काव्य- उन्मेष को एक उत्सव की तरह आयोजित करना चाहती है जिसमें सभी की उत्साहपूर्ण सहभागिता हो। इसमें पाठक से अभिप्राय किसी विशेष वर्ग से नहीं, रचनाकार या लेखक भी एक अच्छा पाठक हो सकता है, बल्कि उसे एक अच्छा पाठक अनिवार्यतः होना ही चाहिए। ज़रा सोचिये, जब एक प्रतिभागी खुद ही अपनी व दूसरों की रचनाओं के मूल्यांकन करने में सहभागिता करेगा तो निश्चित रूप से वह अपनी कृति के गुण-दोषों को भी सहज ही जान पाएगा।

इसके लिए काव्य-उन्मेष-उत्सव को तीन चरणों में विभाजित किया गया है:
प्रथम चरण: लेखन का उन्माद: १० अक्टूबर, २०१४ - २० जनवरी, २०१५ - इसके दौरान रचनाकार अपनी काव्य-कृतियाँ प्रेषित करेंगे और पाठक अपना नाम प्रेषित करेंगे पाठक-जज बनने हेतु।
दूसरा चरण: पाठक सर्वोपरि: २१ जनवरी, २०१५ - २० अप्रैल, २०१५ - इस अवधि के दौरान पाठक-जज अपने समयानुसार कविताओं को पढ़ेंगे और निर्धारित मानदण्डों पर उनको आकलित करेंगे।
तीसरा चरण: लेखक-पाठक-सम्मान: २३ जून २०१५ - २३ सितम्बर, २०१५ - हिंदी-दिवस २०१५ के काव्य-उन्मेष-उत्सव अंक में लेखक-पाठक-रचना का सम्मान एक हृदयग्राही कलात्मक अंक में एवं "काव्य प्रतिष्ठा सम्मान" की घोषणा एवं उसके अंतर्गत विशेष-रचनकार-परिशिष्ट; इसी अंक से होंगे रचनाकार एवं पाठक-जज रू-ब-रू!

'काव्य-उन्मेष उत्सव' से हिन्दी भाषा व हिन्दी साहित्य के संवर्धन में 'अनहद कृति' से जुड़े साहित्यकार बंधु, सहृदय पाठक एवं विश्वभर में फैले हिन्दी प्रेमी इसे सफल बनाने में सक्रिय व सार्थक भूमिका निभा रहे हैं, काव्य-उन्मेष के पन्नों पर जा इस साहित्य-उत्सव के बारे में हो रही बातचीत का आनंद लें - (http://www.anhadkriti.com/competition.php)।

हिंदी दिवस २०१४ से शुरू हो हिंदी दिवस २०१५ तक चलने वाले इस अनूठे ऑनलाइन साहित्यिक उत्सव का लिंक है - http://www.anhadkriti.com/competition.php - आज ही कृपया पन्नों पर विस्तार से दिए गए उद्देश्य, लेखक नियमावली, पाठक-जज नियमावली, मूल्यांकन प्रक्रिया, काव्य प्रतिष्ठा सम्मान एवं कविताएं भेजने के बारे में पढ़ें और इस शब्द-यज्ञ में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें - लेखक, पाठक-जज या पाठक के रूप में। तो, आप पाठक हैं या लेखक साल भर की इस साहित्यिक यात्रा में 'काव्य-उन्मेष-उत्सव' पर हमारे साथ चलें नए साहित्यिक आयाम खोजने, नयी मंज़िलें नापने।


आपकी साहित्यिक ऊर्जा की अभिलाषा में,
सहयोगाकांक्षी,

पुष्प राज चसवाल एवं डॉ प्रेम लता चसवाल 'प्रेम पुष्प'

संपादक द्वय: अनहद कृति
(www.anhadkriti.com)
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बृजेश नीरज की कविताएं



विनोद शाही की कलाकृति


तुम ही तुम



निःश्वसन
उच्छ्वसन
सब देह-कर्म, यह अवगुंठन
मोह-पाश के बंधन तुम
बस तुम! तुम ही तुम

व्यक्त हाव
अव्यक्त भाव
नेह-क्लेश, अभाव-विभाव
रूप-गंध के कारण तुम
बस तुम! तुम ही तुम

सम्मुख हो जब
विमुख हुए, तब
मनस-पटल की चेतनता सब
अनुभूति-रेख में केवल तुम
बस तुम! तुम ही तुम


कविता


कविता -
शरीर में चुभे हुए काँटे
जो शरीर को छलनी करते हैं;
वह टीस
जो दिल की धड़कन
साँसों को निस्तेज करती है

यह तुम्हें आनंद नहीं देगी
प्रेम का कोरा आलाप नहीं यह
वासना में लिपटे शब्दों का राग नहीं
छद्म चिंताओं का दस्तावेज़ नहीं
इसे सुनकर झूमोगे नहीं

यह तुम्हें गुदगुदाएगी नहीं
सीधे चोट करेगी दिमाग पर
तड़प उठोगे
यही उद्देश्य है कविता का

रात के स्याह-ताल पर
नृत्य करने वाले नर-पिशाचों के लिए
नहीं होती कविता

कविता पैदा करती है
जिंदा लोगों में झुरझुरी
एक सिहरन!


अँधेरे से लड़ने के लिए


अँधेरे से लड़ने के लिए
धूप जरूरी नहीं होती
जरूरी नहीं होते चाँद और सूरज

जरूरी नहीं दीपक
तेल से भीगी बाती
माचिस की तीली

जरूरी है आग
मन के किसी कोने में सुलगती आग

सोमवार, 24 नवंबर 2014

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ का गीत




 चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



भारती उठ जाग रे !



है कहां निद्रित अलस से
स्वप्न लोचन जाग रे !
प्रगति प्राची से पुकारे
भारती उठ जाग रे !

मलय चन्दन सुरभि नासा
नित नया उत्साह लाती
अरूणिमा हिम चोटियों से
पुष्प जीवन के खिलाती

कोटिश: पग मग बढ़े हैं
रंग विविध ले हाथ रे !
भारती उठ जाग रे !

ज्ञान की पावन पुनीता
पुण्य सलिला बह रही
आदि से अध्यात्म गंगा
सुन तुझे क्या कह रही
विश्व है कौटुम्ब जिसका
चरण रज ले माथ रे!
भारती उठ जाग रे !

नदी निर्झर वन सुमन सब
वाट तेरी जोहते
ध्वनित कलकल नीर चँचल
मृगेन्द्रित मन मोहते !
कोटिश: कर साथ तेरे
अनृत झुलसा आग रे !
भारती उठ जाग रे !
युग भारती फिर जाग रे !
जाग रे ! .. फिर जाग रे !

चार मुक्तक-डॉ रमा द्विवेदी



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


                              (एक)


      कोई दुल्हन सँवरती जब तो दर्पण याद आता है,
      बरसता मेघ घन-घन-घन तो प्रियतम याद आता है।
      बिछुडने और मिलने में  बहुत कुछ सीख जाते हम,
       नदी कोई बहकती जब समंदर याद आता है॥

                              (दो) 


        गिरें जब शाख से पत्ते शज़र का दिल भी रोता है,
       कि सूरज डूबता है जब विरहन का दिल भी रोता है।
       सुबह आए, सुबह जाए ये दुनिया फ़र्क ना जाने,
       ना आए पिय  की गर चिठ्ठी दुल्हन  का दिल भी रोता है॥

                             (तीन) 


       नई पीढ़ी नए साँचों   में ढलना चाहती है,
       हवाओं के इशारों पर मचलना चाहती है ।
       क्लबों की संस्कृति में डूब कर आनंद  लेने को,
       नए साजों,नई धुन पर थिरकना चाहती है॥

                              (चार)


         इसे, कैसे बताएं कि किसी से प्यार होता क्यों?
       छलकता प्रेम आंखों से फिर आसूं क्षार  होता क्यों?
       प्यार और पीर का संबंध ये कैसा अज़ब देखो ,
       समंदर से ही मिल कर के नदी को खुमार होता क्यों?

          डॉ रमा द्विवेदी 


           102 ,Imperial Manor Apartment
           Begumpet ,Hyderabad -500016 (A.P.)
           Ph.040- 23404051
           (M) 09849021742




डॉ रमा द्विवेदी 



  • डॉ रमा द्विवेदी का जन्म 1 जुलाई 1953 में हुआ । हिंदी में पी एच डी हैं तथा अवकाश प्राप्त व्याख्याता है । दे दो आकाश ,रेत का समंदर तथा साँसों की सरगम  तीन काव्यसंग्रह प्रकाशित तथा `भाव कलश 'ताँका संकलन ,`यादों के पाखी ' हाइकु संकलन ,`आधी आबादी का आकाश ' हाइकु संकलन ,`शब्दों के अरण्य में ' कविता संकलन ,`हिन्दी हाइगा ' हाइकु संकलन ,`सरस्वती सुमन' 'विशेषांक क्षणिकाएँ संकलन ,`अभिनव इमरोज' हाइकु संकलन में रचनाएँ संकलित हैं । `पुष्पक 'साहित्यिक पत्रिका की संपादक तथा साहित्य गरिमा पुरस्कार समिति की महासचिव है । दूर दर्शन हैदराबाद  से काव्य पाठ एवं आकाश वाणी से रचनाएँ प्रसारित । राष्ट्रीय -अंतरराष्ट्रीय मंचों से काव्य पाठ । साहित्य गरिमा पुरस्कार,परिकल्पना काव्य सम्मान  एवं अन्य कई सम्मानो से सम्मानित । अंतरजाल और देश -विदेश की  पत्र -पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित । कविता कोश में रचनाएँ संकलित । साहित्य की कई  विधाओं में लेखन । सर्वे में चयनित -`द सन्डे इंडियंस' साप्ताहिक पत्रिका के  111 श्रेष्ठ महिला लेखिकाओं में चयनित। 
  • kavitakosh:www.kavitakosh.org/ramadwivedi  
  • email :ramadwivedi53@gmail.com 
  • Blog :http://ramadwivedi.wordpress.com 

गुरुवार, 20 नवंबर 2014

ज्योतिर्मयी पंत की रचनाएं



विनोद शाही की कलाकृति


पलायन के बाद 


नयन झरोखे ताकते
दूर दूर तक राह
मंद पवन भी जो चले
कक्ष कराहें  आह
घरौंदे हुए अकेले

सीलन नम हैं भित्तियाँ
चौबारे हैं  मौन
गौरैया- किलकारियाँ
 रूठे  लगते छौन
 यहाँ कोई नहिं खेले.

जालों के परदे लगे
द्वार उगी है घास
रंगों उभरी झुर्रियाँ
कहती हैं  इतिहास
पले रिश्ते   अलबेले.

 स्मृति रंग भरी होली
दिवाली   अनबोली
हँसी ख़ुशी  त्योहार पर
आ अतीत टोली
गुम हुए अब  खुद मेले.




बेटियाँ 


मन घबराये
चैन न पाये
जियरा भारी
दुश्चिंताएँ....

घर अँगना में
या चौरस्ते
विद्यालय हो
ऑफिस भीतर
पीछा करती
बुरी निगाहें
कुत्सित कर्म
भर वासनाएँ..

माँ की गोदी
में भी खतरा
असहाय बनी
बचा न   पाये
जीने का हक़
कौन छीन के
गर्त दबाएँ ...

लछमी कहते
मुँह माँगी  जो
रकम दिलाये
ला  दहेज़  दे
सिर्फ पूत दे
बने  कल्पतरु
सफल न हो तो
चिता चढ़ाएँ.



जीवन 


न जाने कब
कागज़ की नाव
गीली हो  डूब जाय
आती जाती सांसों का
सिलसिला  टूट जाय
मुट्ठी भरी रेत
हाथों  से फ़िसल जाय
घड़ी की टिक-टिक
अचानक रुक जाय ?
चलते-चलते
 जो  करना है  बस
 इसी पल किया जाय
 प्यार की खुशबू
सबमें बाँटी जाय
न रहेंगे हम यहाँ
ऐसा काम किया जाय
 यादों में जियें
जीवन सफल हो जाय .

पुस्तक चर्चा: अंतस का संगीत-काव्य संग्रह/अंसार क़म्बरी







जब रात होती है तो कोई अंधेरा देखता है, कोई आसमान की तरफ़ खिड़की खोल लेता है, कोई आसमान में फैले हुए असंख्य तारे देखता है, कोई उनमें से ढूँढ के ध्रुव तारा भी देख लेता है, जो सारे तारों से अलग खड़ा है……पर जो विराट आसमान में असंख्य तारों के बीच, दूर खड़े ध्रुव तारे का आसमान में दूर होते जाना, उसका निष्कासित किया जाना देख लेता है, जो उसकी चमक के उत्सव में भी उसके आसमान से निष्कासन का दुख देख लेता है, वह सच्चा कवि होता है। वह सदियों पुराने दर्दों को महसूस करता है, उन्हें जीता है। ख़ुद धागा बनके उन्हें अपने में पिरोता है। अपने दुख-दर्द दबाकर दूसरों के ज़ख्मों पर मरहम रखता है, उन पर आँसू बहाता है। उन्हें गीतों में, ग़ज़लों में, दोहों में ढालता है। वह आँखों में सूखती नमी को पालता है, सहेजता है और चुपके से संस्कृति और साहित्य की ज़मीन तैयार करके, उसमें उस नमी को बो देता है, जिससे सदियों तक आने वाली पीढियाँ मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं की छाँव में जी सकें। ऐसे ही घने छायादार मानवीय संवेदनाओं के पेड़ों को बोते, रोपते और सींचते कटी है अंसार क़म्बरी की ज़िन्दगी। उन्होंने दर्द के मौसमों में कबीर की तरह उत्सव मनाया है, तो संत दादू की तरह झूठी चकाचौंध के बीच सिसकती पीर को पढ़ा है। आज यहाँ हर चीज़ बाज़ार में बिकने के लिए खड़ी है, हमारे चारों तरफ़ दुकानें सजी हैं, शुक्र है कि हमारे बीच एक अंसार क़म्बरी हैं।

विवेक मिश्र



  • कृति : अंतस का संगीत
  • विधा : दोहे एवं गीत
  • रचनाकार : अंसार क़म्बरी
  • प्रकाशक : नवचेतन प्रकाशन, दिल्ली
  • वितरक : शिल्पायन, दिल्ली
  • मूल्य : रु 150/-

रविवार, 16 नवंबर 2014

अशोक अंजुम के दोहे..



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




तन-मन में सन्तूर.. 


तुमने छेड़े प्रेम के, ऐसे तार हुज़्रर ।
बजते रहते हैं सदा, तन-मन में सन्तूर ।।

मधुमय बन्धन बाँधकर, कल लौटी बारात ।
हरी काँच की चूड़ियाँ, खनकीं सारी रात ।।

आवेदन ये प्रेम का, प्रिये! किया स्वीकार ।
होठों के हस्ताक्षर, बाकी हैं सरकार ।।

मिले ओठ से ओठ यूँ, देह हुई झनकार ।
सहसा मिल जाएँ कभी, बिजली के दो तार ।।

आमंत्रण देता रहा, प्रिया तुम्हारा गाँव ।
सपनों में चलते रहे, रात-रात भर पाँव ।।

प्रिये तुम्हारा गाँव है, जादू का संसार ।
पलक झपकते बीततीं, सदियाँ कई हज़ार ।।

प्रिये तुम्हारे गाँव की, अजब-निराली रीत ।
हवा छेड़ती प्रेम-धुन, पत्थर गाते गीत ।।

तोड़ सको तो तोड़ लो, तुम हमसे सम्बंध ।
अंग-अंग पर लिख दिए, हमने प्रेम-निबंध ।।

कौन पहल पहले करे, चुप्पी तोड़े कौन ।
यूँ बिस्तर की सलवटें, रहीं रात-भर मौन ।।

धूल झाड़कर जब पढ़ीं, यादों जड़ी किताब ।
हर पन्ने पर मिल गए, सूखे हुए गुलाब ।।

बुधवार, 12 नवंबर 2014

राधेश्याम बन्धु के गीत



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



    कोलाहल हो या सन्नाटा



     कोलाहल हो
     या सन्नाटा, कविता सदा सृजन करती है,
 
     जब भी आंसू
     हुआ पराजित, कविता सदा जंग लड़ती है ।
 
     जब भी  कर्ता   हुआ  अकर्ता
     कविता  ने जीना सिखलाया,
     यात्रायें   जब  मौन  हो  गयीं
     कविता ने चलना सिखलाया ।
 
     जब भी तम का
     जुल्म बढ़ा है,कविता  नया  सूर्य गढ़ती है ।
 
     गीतों  की जब पफसलें  लुटतीं,
     शीलहरण होता कलियों का,
     शब्दहीन   जब  हुर्इ   चेतना -
     तब-तब चैन लुटा गलियों का ।
 
     जब  कुर्सी  का
     कन्श गरजता,कविता स्वयं कृष्ण बनती है ।
 
     अपने   भी  हो  गये  पराये,
     यूं  झूठे  अनुबन्ध हो गये,
     घर  में  ही  वनवास  हो रहा,
     यूं गूंगे सम्बन्ध हो गये ।
 
     जब  रिश्तों
     पतझड़  हंसता, कविता  मेघदूत  रचती है,
 
     कोलाहल हो या
     सन्नाटा, कविता  सदा  सृजन  करती है ।
                     

       

   बैठकर नेपथ्य में



     बैठकर
     नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
         जो नहीं
         हमदर्द हैं वे शब्द क्यों गढ़ते ?
 
     कभी पर्दे को उठा
     आकाश आने दो ।
     मौलश्री की गंध को
     भी गुनगुनाने दो ।
         कभी पंछी की
         चहक से, क्यों नहीं मिलते ?
     क्यों नयन की झील में है
     एक   सन्नाटा ?
     हर  कुहासे  को सुबह की
     हंसी ने छांटा ।
         क्यों सुनहले
         दिवस की मुस्कान से डरते ?
     प्यार  के   किरदार   को
     मिलती  सभी  खुशियां,
     सृजन  के   ही  मंच पर,
     मिलती सुखद छवियां ।
         क्यों न बादल
         बन किसी की तपन को हरते ?
     जो  कला  से  दूर  हैं
     वह  जिन्दगी से दूर,
     पंखुड़ी  के पास  जो  हैं
      गंध   से   भरपूर ।
         क्यों न अर्पण
         गंध  बन  हर  हृदय में बसते ?
     बैठकर
     नेपथ्य में क्यों स्वयं से लड़ते ?
                 



    अभी परिन्दों में धड्कन है


 
     अभी परिन्दों में
     धड़कन  है, पेड़   हरे  हैं  जिन्दा धरती,
 
     मत उदास हो
     छाले लखकर, ओ राही नदिया कब थकती ?
 
     चांद  भले  ही  बहुत  दूर   हो
     पथ में नित चांदनी बिछाता,
     हर  गतिमान  चरण की खातिर
     बादल खुद छाया बन जाता ।
 
     चाहे थके
     पर्वतारोही, दिन  की  धूप  नहीं  है  ती ।
 
     फिर-फिर समय का पीपल कहता
     बढ़ो हवा की लेकर हिम्मत,
     बरगद   का  आशीष   सिखाता
     खोना नहीं प्यार की दौलत ।
 
     पथ में रात
     भले घिर आये, दिन की यात्रा कभी न रुकती ।
 
     कितने  ही   पंछी   बेघर   हैं
     नीड़ों  में  बच्चे  बेहाल,
     तम  से   लड़ने  कौन  चलेगा
     रोज दिये का यही सवाल ?
 
     पग-पग है
     आंधी  की साजि़ाश,पर मशाल की जंग न थमती,
     मत उदास हो
     छाले  लखकर, ओ  राही  नदिया  कब  थकती ?
                   

 

 
    शब्दों के कंधों पर



     शब्दों के
     कंधों पर, बर्फ का जमाव,
     कैसे चल
     पायेगी, कागज की नाव ?
 
     केसर  की  क्यारी में
     बारूदी शोर,
     काना   फूसी   करते,
     बादल मुंहजोर ।
     कुहरे की
     साजि़ाश से उजड़ रहे गांव ।
 
     मौसम   है  आवारा
     हवा भी खिलाफ,
     किरने  भी  सोयी हैं
     ओढ़कर लिहाफ ।
     सठियाये
     सूरज के ठंढे प्रस्ताव ।
 
     बस्ती  को  धमकाती
     आतंकी    धूप,
     यौवन  को  बहकाता
     सिक्कों का रूप ।
     ठिठुरी
     चौपालों  में  उंफघते  अलाव ।
 
     झुग्गी  के  हिस्से  की
     धूप  का  सवाल,
     कौन  हल  करेगा  बन
     सत्य की  मशाल ?
     संशय के
     शिविरों में, धुन्ध का पड़ाव,
     कैसे चल पायेगी, कागज  की  नाव ?



                 

     मोरपंख सपनों का आहत



     जब-जब क्रौच
     हुआ है घायल, गीत बहुत रोया,
     हर बहेलिए
     की साजि़श में, नीड़ों  ने खोया ।
          जब महन्त आकाश ही करे
          बारूदी बौछार,
          पंछी कहां उड़ें फिर जाकर
          अपने पंख पसार ?
          हरियाली लुट गयी प्यार की
          टहनी सूख गयी,
          गूंगी हुर्इ  गांव  की कोयल
          खुशियां रूठ गयीं ।
     मोरपंख सपनों का
     आहत, डर किसने बोया ?
          चौपालों  की  चर्चा  में
          नपफरत की जंग छिड़ी
          खेतों  में  हथियार  उग रहे
          लुटती  फसल  खड़ी ।
          दाना  कौन  चुगायेगा
          गौरैया  सोच  रही ?
          बस कौवे का शोर, कबूतर
          कब  से  उड़ा  नहीं ।
     भूला राम-राम
     भी सुगना, लगता है सोया ।
          पग-पग  जहां  शिकारी घायल
           किससे  बात  करे ?
          महानगर   में  हमदर्दी  का
          मरहम  कौन  धरे ?
          बाजों की बस्ती में सच  की
           मैना   हार  गयी,
          अब  बेकार  हुयी ।
     शुतुरमुर्ग  ने  शीश  झुकाकर, जुल्मों  को  ढोया,
     जब-जब क्रौच हुआ  है  घायल, गीत बहुत रोया ।

       राधेश्याम बन्धु

      बी-3/163, यमुना विहार, दिल्ली-53




राधेश्याम बंधु



  • जन्म : 10 जुलाई 1940 को पडरौना उत्तर प्रदेश भारत में
  • लेखन : नवगीत, कविता, कहानी, उपन्यास, पटकथा, समीक्षा, निबंध
  • प्रकाशित कृतियाँ-
  • काव्य संग्रह : बरसो रे घन, प्यास के हिरन
  • खंडकाव्य : एक और तथागत
  • कथा संग्रह : शीतघर
  • संपादित :जनपथ, नवगीत, कानपुर की काव्ययात्रा, समकालीन कविता, समकालीन कहानियाँ, नवगीत और उसका युगबोध। इसके साथ ही आपकी रचनाएँ भारत की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं तथा आकाशवाणी व दूरदर्शन से प्रकाशित प्रसारित हो चुकी हैं। वे 'समग्र चेतना' नामक पत्रिका के संपादक भी है।
  • पुरस्कार : भारत के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 'एक और तथागत' के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के 'जयशंकर प्रसाद पुरस्कार' तथा हिन्दी अकादमी दिल्ली द्वारा पुरस्कृत व सम्मानित। 
  • टेली फ़िल्में : बन्धुजी अपनी कथा/पटकथा पर आधारित ३ टेली-फ़िल्में- 'रिश्ते', 'संकल्प' और 'कश्मीर एक शबक' तथा 'कश्मीर की बेटी' धारावाहिक बना चुके हैं। 
  • सम्प्रति : सहायक महाप्रबन्धक दूरसंचार किदवई भवन नई दिल्ली के पद से 2000 में सेवानिवृत्त।

शनिवार, 8 नवंबर 2014

लक्ष्मण रामानुज लडीवाला की कविता


विनोद शाही की कलाकृति


आग्रही नयी पीढ़ी



सामाजिक सुरक्षा को तरसे
एकल परिवारों में जो पले,
आर्थिक सुरक्षा और
स्नेह भाव मिले -
संयुक्त परिवार की ही
छाया तले |
घर परिवार में
हर सदस्य का सीर
बुजुर्ग भी होते भागीदार,
बच्चो की परवरिश हो,
संस्कार या व्यवहार |

अभिभावक माता पिता
समय का अभाव जताकर
नहीं बने अपराध बोध के शिकार,
संयुक्त परिवार
तभी रहे और चले |
प्रतिस्पर्था से भरी
सुरसा सामान दौड़ती
भागमभाग जिन्दगी,
अवसाद भरी तनाव के
भार से लदी
समयाभाव जताती
बेलगाम जिन्दगी |

जड़ों की ओर लोटने को मजबूर
आग्रही नयी पीढ़ी,
पाने को पारिवारिक स्नहे
और सुरक्षा की सौगात,
तभी संभव जब
हो ह्रदय विशाल,
बड़े भी समझे और देवे मान
छोटों की भावनाओ का हो भान |
छोड़कर अहम भाव
रिश्ते बने बेहतर
तभी सौहार्द बढे
यही जीवन तत्व है
जीवन का सार,
तभी बनेगा स्वर्ग सा
यह सुन्दर संसार ||



लक्ष्मण रामानुज लडीवाला 

                                                                     

  • जन्म तिथि- 19 नवंबर 1945 स्थान - जयपुर (राजस्थान) 
  • शिक्षा- M.Com. Dip cost & works accountancy, C.S (Inter)
  • राजस्थान विधानसभा में लेखाकार पद से 2003 में सेवा निवृत।
  • साहित्यिक गतिविधिया - राजस्थान पत्रिका,राष्ट्रदूत दैनिक,"बाबूजी का भारत मित्र"एवं कई वेब पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।अग्रगामी'(मासिक)जयपुर  
  • का 1975 से 1978 तक सह- संपादक,एवं निराला समाज (त्रैमासिक) का सम्पादन दायित्व निर्वहन |
  • सम्प्रति - openbooksonline,एवं कविता लोक के सदस्य के रूप में नियमितप्रस्तुतीकरण 
  • सम्पर्क-165, गंगोत्री नगर, गोपालपुरा बाईपास, टोंक रोड़, जयपुर (राज.) 302018
  • ई-मेल : lpladiwala@gmail.com  संपर्क : mob 09314249608


आमने-सामने: कविता को किसी साँचे में नहीं ढाला जा सकता-महेंद्र भटनागर









वरिष्ठ कवि महेन्द्र भटनागर से
डॉ.मनोज मोक्षेन्द्र की बातचीत

          ******************








  • यद्यपि आपने काव्य-विधा के अतिरिक्त गद्य-विधाओं में भी बहुत-कुछ लिखा है; तथापि आपने अपने रचना-कर्म के लिए काव्य-विधा को ही प्रमुखता से क्यों चुना?

  • काव्य-विधा अधिक कलात्मक होने के कारण अधिक प्रभावी होती है। काव्य-कला को संगीत-कला और आकर्षण और सौन्दर्य प्रदान करती है। इससे उसके प्रभाव में अत्यधिक वृद्धि होती है। संगीतबद्ध-स्वरबद्ध कविता पाठक-श्रोता को झकझोर देती है। जैसे, फ़कीरों-साधुओं द्वारा इकतारे पर गाये जाने वाले भजन हृदय को मथ देते हैं। कविता सहज ही कंठ में बस जाती है। उसमें चमत्कार का विशिष्ट गुण पाया जाता है। कविता की कथन-भंगी उसे भावों-विचारों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना देती है। ध्वनि उत्कृष्ट कविता की पहचान है। शब्द-शक्ति का काव्य में ही सर्वाधिक उपयोग होता है। लक्षणा-व्यंजना ही नहीं, अभिधा भी पाठकों-श्रोताओं को आनन्दित करती है। द्रष्टव्य: ‘खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी!’ (सुभद्रा कुमारी चौहान) तुकों का भी अपना महत्व है। छंद, अलंकार, वक्रोक्ति, औचित्य आदि से उसमें निखार आता है। कविता मुर्दा दिलों में भी प्राण फूँक देती है। वह हमें उद्वेलित करती है। जन-क्रांतियों में कविता की भूमिका सर्वविदित है। द्रष्टव्य: ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है!’ (रामधरीसिंह ‘दिनकर’) कवि को कला की उपेक्षा कदापि नहीं करनी चाहिए। माना बुनियादी तत्व भाव, विचार, कल्पना हैं।
  • मैंने कविता विधा के अतिरिक्त, गद्य विधाओं में भी लिखा ज़रूर है; किन्तु मेरा मन कविता में ही रमता है। वैसे मेरे द्वारा लिखित पर्याप्त आलोचना-साहित्य है। रूपक और लघुकथाएँ हैं।

  • आपने हिन्दी काव्य-साहित्य में आए सभी काव्यान्दोलनों के दौर में रचनाएँ की हैं; किन्तु मैं समझता हूँ कि आप उनसे प्रभावित हुए बिना स्वयं द्वारा निर्मित लीक पर चलते रहे। यही वजह है कि आपके रचना-सुलभ-कौशल का आकलन उनके दौर में आशाजनक रूप से नहीं किया गया; जबकि आपकी रचनाएँ तत्कालीन महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं और पाठकों को आकर्षित भी करती रहीं। अस्तु, प्रकारांतर से क्या आप कभी उनके या उनके प्रवर्तकों के प्रभाव में आए? और यदि आए तो उन्होंने आपकी रचनात्मकता को किस प्रकार प्रभावित किया?

  • हाँ, यह सही है। विभिन्न काव्यान्दोलनों से मैं लगभग अप्रभावित रहा हूँ। कविता कविता है। उसे किसी भी प्रकार के साँचे में नहीं ढाला जा सकता। शाश्वत तत्व के साथ, कविता का सामयिकता से भी अटूट संबंध है। लेकिन, सामयिकता को स्व-विवेक से देखा-परखा जाना चाहिए। किसी भी रंग का चश्मा लगाने की ज़रूरत नहीं। वाद-ग्रस्त लेखन की अभिव्यक्ति ईमानदार नहीं भी हो सकती है। मैंने जो अनुभव किया; लिखा। मेरा काव्य, चूँकि प्रमुख रूप से, समाजार्थिक यथार्थ का काव्य है; अतः उसे वाम विचार-धारा से सम्पृक्त कर देखा गया। मेरे विचारों और वाम विचार-धारा में पर्याप्त साम्य हो सकता है। लेकिन, वह पुस्तकीय नहीं है। स्वयं का भोगा और सहा हुआ है। मेरा बचपन और यौवन काल बड़ी ग़रीबी में बीता। अल्प वेतन-भोगी अध्यापक की ज़िन्दगी जी मैंने। क़दम-क़दम पर कटु अनुभव हुए। मेरे काव्य में अन्याय और शोषण के विरुद्ध जो स्वर हैं; वे आरोपित नहीं। किसी राजनीतिक दल से मैं कभी नहीं जुड़ा। विभिन्न ‘वादों’ का कभी सैद्धान्तिक अध्ययन तक मैंने नहीं किया। समाजार्थिक-रचना और शासन-व्यवस्था संबंधी वैचारिक साम्य के कारण, प्रगतिवादी-जनवादी साहित्य-धारा मेरे मन के अनुकूल रही। तटस्थ-निष्पक्ष आलोचकों ने भी इसी काव्यान्दोलन के अन्तर्गत मेरी चर्चा की। वाम-आन्दोलन का समर्थक मान कर, कट्टर विचारों वालों ने भी मेरा विरोध नहीं किया। प्रवर्तकों ने मुझे साथ रखा। प्रगतिशील पत्रिकाओं में लिखता रहा। स्वतंत्र चिन्तन को असंगति समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। मेरी रचनात्मकता का स्वरूप मेरा अपना है। वह किसी भी जड़वादी ‘दिग्गज’ की परवा नहीं करता।

  • आपकी रचनाओं में जिन ‘इम्प्रेशन्स’ की अदम्य बाढ़ उमड़ती है, उन्हें उस श्रेणी में तो नहीं रखा जा सकता, जिसमें रांमानी, छायावादी, रहस्यवादी, हालावादी कवि आते हैं। प्रयोगवादी काव्य-धारा में भी आप बहते हुए नहीं प्रतीत होते। वस्तुतः मानववाद को पोषित करते हुए आप सतत रचनाशील प्रगतिशील कवि हैं।  मात्र प्रगतिशील रचनाकार कहलाना अधिकांश कवियों  के लिए उतना संतोषप्रद नहीं होता, जितना अपने को किसी ख़ास आन्दोलन से जुड़ा रचनाकार मानने में। आप अपनी स्थिति से कितने संतुष्ट हैं?

  • हाँ, मानववाद की बात करना संगत है। रचनाकार का मात्र किसी विशेष आन्दोलन से जुड़ा होना — मुझे तो भाता नहीं। कोई विचार-धारा सदा एक-सी बनी भी नहीं रहती। समय और परिस्थितियों के अनुसार उसमें परिवर्तन होते रहते हैं। इसे विचार-धारा का विकास भी कहा गया है। लेकिन, देखने में कठमुल्लापन ही आता है। अतः, स्वतंत्र चिन्तन का विरोध करना युक्तियुक्त नहीं। प्रगतिशील चेतना मेरे काव्य का जीवन्त स्रोत है। इसी कारण, प्रगतिवादी-जनवादी काव्य-धारा के अन्तर्गत मेरे काव्य का अध्ययन अर्थवान है। कोई राजनीतिक दल रचनाकार को अपनी इच्छानुसार हाँक नहीं सकता। इस विवाद में मैं कभी पड़ा नहीं। श्रेय दो; चाहे न दो। साहित्य के डिक्टेटर-आलोचक ही नहीं; स्वयं रचनाकार अपने बारे में चाहे जो कहे; उसने जो लिखा है, वह बोलेगा।

  • स्वातंत्रयोत्तर रचना-काल में युग-प्रवर्तक साहित्यकारों का बोलबाला रहा। आपने किसी के भी प्रभाव में आना पसंद नहीं किया। क्या यह प्रवृत्ति आपके ‘कवि’ के उन्नयन-मार्ग में बाधक नहीं रही?

  • यह सही है, कुछ संकोच-वश तो कुछ स्वभाव-वश एवं कुछ पूर्व-परिचय न होने के कारण , मैं उन साहित्यकारों से दूर रहा; और आज भी दूर रहता हूँ, जो समय-समय पर, नाना प्रकार की प्रकाशन-योजनाओं का नेतृत्व व संचालन करते हैं। साहित्य के ऐसे ‘विशिष्ट विधाताओं’ की नज़र यदि मुझ पर भी पड़ी होती तो ज़रूर मैं इतना अनदेखा-अनजाना न रहता। मेरा नाम सर्वत्र छूटता रहा। अधिकतर ऐसी परियोजनाओं के बारे में, अक़्सर उनका कार्यान्वय हो जाने के बाद पता चलता है। पूर्व-परिचय एवं व्यक्तिगत संबंध न होने के कारण ( मैत्री का तो प्रश्न ही नहीं!) किसी का ध्यान मेरी ओर नहीं गया। मेरा कोई साहित्यिक वृत्त न था, न है। अधिकांश मुझे जानते नहीं। मेरी कृतियाँ उन्होंने पढ़ी क्या, देखी-तक नहीं! मेरा अता-पता भी उन्हें विदित नहीं। स्वाभाविक है, प्रभावी सूत्रधारों से कटे रहने का खामियाजा भुगतना पड़ा। भुगतता रहूंगा। पर, इसका कोई अफ़सोस नहीं। दुःख नहीं। दुनिया-भर के तमाम साहित्यकारों के साथ ऐसा हुआ है, होता रहेगा। क़सूर मेरा भी है; जो इतना बेख़बर रहता हूँ! प्रयत्न नहीं करता। इस दिशा में, ज़रा भी सक्रिय नहीं होता। अन्ततोगत्वा, इस प्रकार किसी का लुप्त रह जाना कोई मायने नहीं रखता। आपका लिखा तो लुप्त नहीं हुआ!

  • आप बच्चन, अज्ञेय, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, मुक्तिबोध, गिरिजाकुमार माथुर, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ आदि जैसे रचनाकारों के दौर में साहित्य-सृजन करते रहे। क्या आपका इनसे कभी तालमेल रहा?

  • यह मेरी अग्रज वरिष्ठ पीढ़ी है। उम्र का बहुत अन्तर है। ‘सुमन’ जी ने तो मुझे ‘विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर’ में बी.ए. में पढ़ाया। इस संदर्भ में, मेरी कृति ‘साहित्यकारों से आत्मीय संबंध’ द्रष्टव्य है। यह‘पत्रावली’ ‘महेंद्रभटनागर-समग्र’— खंड - 6 में भी शामिल है। इससे समकालीन अनेक साहित्यकारों से मेरे संबंधों की रोचक जानकारी उपलब्ध होगी।

  • आपकी रचनाओं में वह‘प्रिय’कौन है; जिसकी उपस्थिति की आहट आज भी आपके गीतों में आती है?

  • वस्तुतः, यह ‘प्रिय’ काल्पनिक है!! यौवन के प्रभाव के फलस्वरूप है। जो स्वाभाविक है। गुज़र गयी यह उम्र भी! भूल जाओ, यदि कहीं-कुछ आकर्षण रहा भी हो! आदमी जो चाहता है, वह उसे मिलता कहाँ है? स्मृति जीवन का बहुत बड़ा सम्बल है।

  • आप गीति-परम्परा के पोषक हैं। आपके गीतों में ध्वन्यात्मकता की जो तरल रसात्मकता आत्मा को आनन्द से सराबोर कर जाती है, वह आपके मनसे स्रवित हो, शब्दों में कैसे प्रतिबिम्बित हो पाती है?

  • गीति-रचना मेरे मनके निकट है। उल्लास और दर्द गीतों में स्वतः प्रस्पफुटित हो उठते हैं। गीत हों या नवगीत, संगीत के स्वरों पर थिरकते हैं। मन, न जाने इतनी ऊँची उड़ान कैसे भर लेता है! हृदय, न जाने इतनी गहराई कहाँ से पा लेता है! सब, अद्भुत है! कल्पनातीत है। गीत, जीवन है! आदमी की पहचान है। मैंने गीत लिखा-रचा: गाओ!
       
        गाओ कि जीवन गीत बन जाए !

       हर क़दम पर आदमी मजबूर है,
       हर रुपहला प्यार-सपना चूर है,
       आँसुओं के सिन्धु में डूबा हुआ
       आस-सूरज दूर, बेहद दूर है,
              गाओ कि कण-कण मीत बन जाए !
             
       हर तरफ़ छाया अँधेरा है घना,
       हर हृदय हत, वेदना से है सना,
       संकटों का मूक साया उम्र भर
       क्या रहेगा शीश पर यों ही बना ?
                गाओ, पराजय — जीत बन जाए !
             
       साँस पर छायी विवशता की घुटन
       जल रही है ज़िन्दगी भर कर जलन
       विष भरे घन-रज कणों से है भरा
       आदमी की चाहनाओं का गगन,
              गाओ कि दुख संगीत बन जाए !
  •                
  • हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में विरचित आपकी कविताओं में प्यास और क्षुधा पर तुप्ति का, निराशा-हताशा पर अदम्य आशा का, कुंठा पर श्रम के उत्साह-उल्लास का, रूढ़ियों पर युगान्तरकारी आचार-व्यवहार का, त्रासदियों एवं प्राकृतिक आपदाओं पर परिवर्तनकारी सुखद घटनाओं का, मुत्यु पर अमर्त्य जीवन का विजयोन्मुखी संचार रहा है। आशावाद का ऐसा भाव-प्रवाह शेली और ब्राउनिंग की कविताओं में ही देखा जा सकता है। आपकी कविताओं में इन दोनों का सम्मिलित रूप प्रदर्शित होता है। क्या आपका यह स्वरूप आज़ादी के बाद की दुःखद परिस्थितियों की उपज था या उनसे प्रभावित आपकी लेखनी से उद्भूत एक विद्रोही का नव-निर्माणी स्वरूप?

  • अंधकार पक्ष से जूझना ही, विषम चुनौतियों से टकराना ही, पराजय से हतोत्साहित न होकर उससे शक्ति ग्रहण करना ही, नियति-अनहोनी-अदृश्य को साहसिकता से झेलना ही — जीवन को सार्थक बनाता है। सकारात्मक दृष्टिकोण स्वयं में एक ऐसा अप्रतिहत-अविजित दर्शन है, जो जीवन ओर जगत की समस्त चिन्ताओं को समूल उखाड़ फेँकता है। आदमी को कष्ट-सहन का अभ्यासी बनाता है. क्योंकि जीवन में सब अच्छा ही घटित नहीं होता। त्रासदियाँ जीवन की एक हिस्सा हैं। शेली और ब्राउनिंग की मैंने कुछ ही कविताएँ पढ़ी हैं — जो पाठ्य-क्रमों में निर्धारित रहीं। मेरे काव्य के संदर्भ में इन कवियों का उल्लेख प्रायः किया जाता है; किन्तु मैं अपनी अनभिज्ञता सदैव बताता रहा हूँ। हाँ, स्वातंत्र्य-संग्राम और स्वतंत्रता-पश्चात के परिदृश्यों का मेरे काव्य से अटूट संबंध है। संघर्ष और विद्रोह मेरे काव्य की अन्तर्वस्तु प्रारम्भ से ही रही।

  • राजनेताओं के विरूप-विद्रूप चेहरों, उनकी छलपूर्ण नीतियों और उनके द्वारा विकसित तंत्रों व योजनाओं से आम आदमी को ठगने की उनकी कुप्रवृतियों का व्यापक रूप से भंडाफोड़ करने में आपने जिस निर्भीकता का परिचय दिया है; वह अन्यत्र दिखाई नहीं देता। आप इस देश में किस प्रकार की व्यवस्था की परिकल्पना करते हैं? क्या भविष्य में कोई बदलाव सम्भव है, जबकि आम आदमी कुंठा, अज्ञानता व रूढ़ियों से जकड़ा हुआ स्वयं के तुष्टीकरण से ख़ामोश है और दबंग व समर्थ उद्दंडता, वहशीपन, अनाचार, असभ्यता, तथा अपसंस्कृति के मध्ययुगीन जंगलों में लोलुप शिकारी की तरह कमज़ोर का शिकार कर रहे हैं।

  • शोषकों, पशुबल-समर्थकों और अत्याचारियों, पूँजीपतियों, धर्म और साम्प्रदायिकता के घिनौने चेहरों-रूपों पर पूरी ताक़त से प्रहार करने में, मैं कहीं नहीं चूका हूँ। मुझे इस बात से तोष है। नारी सशक्तीकरण की आवाज़ मेरी प्ररम्भिक रचनाओं तक में गूँज रही है। भविष्य में बदलाव आएगा; यदि युवा-शक्ति संगठित होकर जन-चेतना को उद्वेलित करे। देश में सच्चा जनतंत्र स्थापित होना चाहिए।

  • आज कविताओं के प्रति पाठकों का रुझान अत्यन्त निराशाजनक हो गया है। क्या कविता को अरुचिकर व अलोकप्रिय बनाने में कविगण ज़िम्मेदार हैं? यदि ऐसा है तो आप उन्हें क्या सबक़ देना चाहेंगे; जिससे कि कविता पुनः पाठकों के हृदय और कंठ में रच-बस सके।

  • साधरण पाठक कविता समझ सके, यह ज़रूरी है। कवियों द्वारा इस ओर ध्यान दिया जाए; कविता पुनः लोकप्रिय हो जाएगी।

  • आपने पतनोन्मुख राष्ट्रीय संस्कृति को लेकर चिन्ताएँ व्यक्त की हैं। आदर्श राष्ट्रीय संस्कृति को पुनरुज्जीवित-पुनर्स्थापित करने के लिए नव-रचनाकारों की भूमिका क्या होनी चाहिए?

  • नव-रचनाकारों को हम कोई उपदेश देना नहीं चाहते। वे स्वयं जागरूक हैं।


डॉ.महेन्द्र भटनागर

M- 8109730048 
E-Mail: drmahendra02@gmail.com


मंगलवार, 4 नवंबर 2014

कल्पना रामानी के गीत



विनोद शाही की कलाकृति


बेटियों नाव बचानी है..



खुद थामो पतवार,

बेटियों, नाव बचानी है।

मझधारे से तार,

तीर तक लेकर जानी है।


क्यों निर्भर हो तुम समाज पर।

जिसकी नज़रें सिर्फ राज पर।

तमगा उससे छीन बेटियों,

करो दस्तखत स्वयं आज पर।

पत्थर की इस बार

मिटे, जो रेख पुरानी है।


यह समाज बैठा है तत्पर।

गहराई तक घात लगाकर।

तुम्हें घेरकर चट कर लेगा,

मगरमच्छ ये पूर्ण निगलकर।



हो जाए लाचार,

इस तरह, जुगत भिड़ानी है।



हों वज़ीर के ध्वस्त इरादे।

कुटिल चाल चल सकें न प्यादे।

इस बिसात का हर चौख़ाना,

एक सुरक्षित कोट बना दे।



निकट न फटके हार,

हरिक यूँ गोट जमानी है।




खुशबू के पल भीने से..



खुशबू के पल भीने से
 
रंग चले निज गेह, सिखाकर

मत घबराना जीने से।

जंग छेड़नी है देहों को,

सूरज, धूप, पसीने से।



शीत विदा हो गई पलटकर।

लू लपटें हँस रहीं झपटकर।

वनचर कैद हुए खोहों में,

पाखी बैठे नीड़ सिमटकर।



सुबह शाम जन लिपट रहे हैं,

तरण ताल के सीने से।



तले भुने पकवान दंग हैं।

शायद इनसे लोग तंग हैं।

देख रहे हैं टुकुर-टुकुर वे,

फल, सलाद, रस के प्रसंग हैं।



मात मिली भारी वस्त्रों को,

गात सज रहे झीने से।



गोद प्रकृति की हर मन भाई।

दुपहर एसी कूलर लाई।

बतियाती है रात देर तक,

सुबह गीत गाती पुरवाई।



बाँट रहे गुल बाग-बाग में,

खुशबू के पल भीने से।



गीत कोकिला गाती रहना..


 
बने रहें ये दिन बसंत के,

गीत कोकिला गाती

रहना।



मंथर होती गति जीवन की,

नई उमंगों से भर जाती।

कुंद जड़ें भी होतीं स्पंदित,

वसुधा मंद-मंद मुसकाती।



देखो जोग न ले अमराई,

उससे प्रीत जताती

रहना।



बोल तुम्हारे सखी घोलते,

जग में अमृत-रस की धारा।

प्रेम-नगर बन जाती जगती,

समय ठहर जाता बंजारा।



झाँक सकें ना ज्यों अँधियारे,

तुम प्रकाश बन आती

रहना।



जब फागुन के रंग उतरकर,

होली जन-जन संग मनाएँ।

मिलकर सारे सुमन प्राणियों

के मन स्नेहिल भाव जगाएँ।



तब तुम अपनी कूक-कूक से

जय उद्घोष गुँजाती

रहना।



गुलमोहर की छाँव..



गुलमोहर की छाँव, गाँव में

काट रही है दिन एकाकी।


ढूँढ रही है उन अपनों को,

शहर गए जो उसे भुलाकर।

उजियारों को पीठ दिखाई,

अँधियारों में साँस बसाकर।



जड़ पिंजड़ों से प्रीत जोड़ ली,

खोकर रसमय जीवन-झाँकी।



फल वृक्षों को छोड़ उन्होंने,

गमलों में बोन्साई सींचे।

अमराई आँगन कर सूने,

इमारतों में पर्दे खींचे।



भाग दौड़ आपाधापी में,

बिसरा दीं बातें पुरवा की।



बंद बड़ों की हुई चटाई,

खुली हुई है केवल खिड़की।

किसको वे आवाज़ लगाएँ,

किसे सुनाएँ मीठी झिड़की।



खबरें कौन सुनाए उनको,

खेल-खेल में अब दुनिया की।



फिर से उनको याद दिलाने,

छाया ने भेजी है पाती।

गुलमोहर की शाख-शाख को

उनकी याद बहुत है आती।



कल्प-वृक्ष है यहीं उसे,

पहचानें और न कहना बाकी।



पंछी उदास हैं..



गाँवों के पंछी उदास हैं

देख-देख सन्नाटा भारी।



जब से नई हवा ने अपना,

रुख मोड़ा शहरों की ओर।

बंद किवाड़ों से टकराकर,

वापस जाती है हर भोर।



नहीं बुलाते चुग्गा लेकर,

अब उनको मुंडेर, अटारी।



हर आँगन के हरे पेड़ पर,

पतझड़ बैठा डेरा डाल।

भीत हो रहा तुलसी चौरा,

देख सन्निकट अपना काल।



बदल रहा है अब तो हर घर,

वृद्धाश्रम में बारी-बारी।



बतियाते दिन मूक खड़े हैं।

फीकी हुई सुरमई शाम।

घूम-घूम कर ऋतु बसंत की,

हो निराश जाती निज धाम।



गाँवों के सुख राख़ कर गई,

शहरों की जगमग चिंगारी।