गुरुवार, 30 अक्तूबर 2014

आशुतोष द्विवेदी की दो नज़में..



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


धुँआ 

(मीर के नाम)


मैं घिरा हूँ धुँए के घेरे में                          
और धुँआ है कि बढ़ता जाता है                    
मेरे सीने पे लोटता है कभी                      
मेरे सिर चढ़ के बोलता है कभी                  
मेरी आँखों से निकलता है कभी                    
मेरे होठों से फिसलता है कभी                    
मेरे कानों में कभी घुसता है                      
हाथ-पावों में कभी चुभता है                      
मेरी रगों में कभी जम जाता
मेरी साँसों में कभी थम जाता
मेरे गालों को चूमता है कभी
छेड़कर मुझको झूमता है कभी
कोई चिढ़ है जो तड़पती है कहीं
कोई मजबूरी झिड़कती है कहीं
एक टूटन सी है बिखरी रहती
एक तन्हाई सी पसरी रहती
एक ऊबन सी ऊँघती रहती
एक उलझन सी सिसकती रहती
क्या करूँ? कुछ न समझ पाता हूँ
धुँए में और घिरता जाता हूँ
न कोई शै दिखाई देती है
सिर्फ आहट सुनाई देती है
ऐसा लगता है कोई और भी है
धुँए की पर्त के उस पार कहीं
कोई तो है कि जिसके होने का
मुझको अहसास हुआ करता है
और ऐसा भी लगा करता है
जैसे मैं बोलूँ तो वो सुन लेगा
मैं पुकारूँगा तो उत्तर देगा
इसी अहसास को भीतर जकड़े
इसी भरोसे की डोरी पकड़े
अपनी हिम्मत समेटता हूँ मैं
फैली ताक़त लपेटता हूँ मैं
अपने जज़्बात तो लफ्जों में ढाल
चीख कर पूछता हूँ एक सवाल –
“देख तो, दिल के जाँ से उठता है
ये धुँआ सा कहाँ से उठता है?”
     
                                         

दिल 

(ग़ालिब के नाम)

दिल मेरा कुछ दिनों से रूठा है
मुझसे ऐसे कि बोलता ही नहीं
मेरे कुछ राज़ छिपाए बैठा
जिनकी पर्तों को खोलता ही नहीं
मेरी यादों के बंद डिब्बे में,
मेरे बचपन के चन्द कैसेट हैं
एक सीडी भी है जवानी की
लेकिन, इनको मैं चलाऊँ कैसे
वीसीपी, टीवी औ’ सीडी प्लेयर
सब मशीनें हैं दिल के कमरे में
औ’ वो कमरा है बंद मेरे लिए
कुछ दिनों पहले नहीं था ऐसा
वो दिल का कमरा जैसे मेरा था
बैठकर जिसमें काफ़ी देर तलक
हाथ में वक़्त का रिमोट लिए
वीडिओ में पुरानी यादों के
ढूँढता खोये हुए ख़ुद को मैं
सिलसिला टूट गया है तब से
दिल मेरा रूठ गया है जब से
क्यों हुआ, कैसे हुआ, क्या मालूम ?
सोचता हूँ तो सिर्फ उलझन ही
हाथ आती है और कुछ भी नहीं
बुझा-बुझा सा है हर एक ख़याल
उठता रह-रह के यही एक सवाल –
“दिले-नादाँ तुझे हुआ क्या है?
आखिर इस दर्द की दवा क्या है?”

रविवार, 26 अक्तूबर 2014

पुस्तक समीक्षा: परिन्दे क्यों नहीं लौटे-ग़ज़ल संग्रह/पं.कृष्णानंद चौबे






एक लम्हा, एक सदी जैसा बना देगा तुझे – विवेक मिश्र



कृष्णानन्द चौबे जी के अन्दर का शायर कोई रहबर या नासेह नहीं है। वह एक आम आदमी है और उसी की ही ज़ुबान में एक आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख और चुनौतियों को बेबाकी से बयाँ करता है और यही बात उनकी शायरी को ख़ास बना देती है। उनकी शायरी में इंसानियत सबसे बड़ा मज़हब है। उनकी ग़ज़लें वक़्त की नब्ज़ टटोलती चलती हैं। वे बेहद शाइस्तगी से कही गईं ऐसी ग़ज़लें हैं जो एक मुश्किलों से घिरे समय में उस इंसान की ज़ुबान बनती हैं, जिससे बोलने का हक़ छिन चुका है। कृष्णानन्द जी की शायरी किताबों से सीखी गई शायरी नहीं, उनकी शायरी ज़िंदगी के बाग़ - बग़ीचों से चुने गए गुलों और ख़ारों के मिलने से बनी है। उन्होंने मज़ाहिया, तन्ज़िया, गीत एवं गद्य लेखन आदि के बाद ग़ज़ल को साधा, पर ग़ज़ल से मिलने के बाद वे उसी के हो गए। वह इसको कुछ यूँ इज़हार करते हैं:-

कुछ देर तक तो मैं सभी को देखता रहा
देखा उसे तो फिर उसी को देखता रहा

उनकी शायरी ज़िंदगी की दुश्वारियों, उससे जद्दो-जहद की शायरी तो है पर उस में शिकस्त नहीं है बल्कि एक उम्मीद है, आम आदमी के जीतने की उम्मीद:-

आप जब भी कभी दिल को बहलायेंगे
सिर्फ़ मेरी कहानी दोहरायेंगे
ख़्वाब रूठे हुए हैं मगर हम उन्हें
नींद के घर से इक दिन मना लायेंगे

कायमगंज, फ़र्रुख़ाबाद में एक ब्राह्मण ख़ानदान में पैदाईश, बनारस और इलाहाबाद में परवरिश व कानपुर में आकर बसने वाले कृष्णानन्द चौबे जी ने कट्टर मज़हबी माहौल के बीच से गुज़रते हुए, पुराने जर्जर हो चुके रस्मों-रिवाज़ों की दीवारों को तोड़ा व ज़ात-पात और मज़हब से ऊपर उठकर फ़िरकापरस्त ताक़तों के ख़िलाफ़ लिखा:-

दिन में वो दोस्त सा लगता है, रात दुश्मन सा
हरेक शख़्स अब दो-दो नक़ाब रखता है
हमें दिखाता है मज़हब की नई तस्वीरें
वो अपने दिल में पुरानी किताब रखता है

कृष्णानन्द चौबे जी का यह ग़ज़लों का मजमुआँ सालों-साल उनके चाहने वालों को उनकी मौजूदगी का एहसास दिलाता रहेगा। उन्होंने अपना जीवन एक फ़क़ीराना अंदाज़ से जिया, बहुतों को बहुत कुछ सिखाया, बेशुमार दोस्त बनाए और जाते-जाते अपनों को ही अपनी ग़ज़लें सौंप कर रुख़सत हुए। शायद उनका यह शेर उन्हीं एहबाबों के लिए हो:-

तुम्हारा फ़र्ज़ बनता हो तो इसको तो इसको ले चलो आगे
हमारा काम था हम आ गए हैं कारवाँ लेकर

वाक़ई यह हमारा, हम जैसे उनके बहुत से चाहने वालों का फ़र्ज़ बनता है कि यह कारवाँ कहीं भी, कभी भी न रूके। शायद उन्हें भी शायरी की यह विरासत अपनों को सौंपते हुए यह एतमाद् था, जब उन्होंने कहा:-

उड़ानों से तो लगता है कि ये छोटे परिंदे भी
ज़मीं पर लौट आएंगे किसी दिन आसमाँ लेकर

आज उनका कलाम छपना, वाक़ई, उनकी यादों का, उनकी ग़ज़लों का आसमाँ से ज़मीं पर उतरने जैसा है और यह हमारे और उनके दोनों के लिए हमेशा याद रह जाने वाला पल है। यक़ीनन उनके अशआर, उनकी शायरी अदब की दुनिया में एक पुख़्ता मयार और मक़ाम हासिल करेगें। इस से आगे की बात अगर उनके ही शेर में कहें तो यूँ होगी:-

इस यक़ीं के साथ में लड़ता रहूँगा वक़्त से
कोई लम्हा एक सदी जैसा बनाएगा मुझे

और इन मिसरों के बाद सिर्फ़ एक ही शब्द कहा जा सकता है, और वह है ‘आमीन’।


  • परिन्दे क्यों नहीं लौटे - ग़ज़ल संग्रह
  • कवि - पं. कृष्णानंद चौबे
  • प्रकाशक - पाँखी प्रकाशन, दिल्ली
  • मूल्य - रू 120/-

-विवेक मिश्र

दो कविताएं-संगीता सिंह 'भावना'



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वादा 



आने का वादा किया था उसने
अंधेरों से छंटकर उजालों के बाद
हवाओं में फैलेगी जब भीनी खुश्बू
फिर आऊंगा मैं .....
मन का हर कोना सुवासित है
तुम्हारे आगमन के महक से
सारी दिशाएं जाग गई हैं
पक्षियों का झुण्ड उड़ चला है
अनजान प्रदेश ....
पर  अब भी तुम न आये लौटकर
अपने देश .......
चमकीले लाल आसमान को नशे में
मदमस्त करके सूर्य भी चला है
अब अपने वापसी के सफ़र में
वक्त का हर लम्हा गया है
अब ठहर .........
तेरे इन्तजार की मधुर एहसास भी
लगे हैं अब सिमटने .....
पर अब भी तुम न आये लौटकर
अपने देश .....



फिर भी हर पल..



भूल जाना कितना अच्छा होता है
पर भूल पाना इतना आसान भी तो नहीं
वर्षों बीत गए , फिर भी हर पल
याद आती है तुम्हारी .....
सावन के बूंदों से होकर तुम्हारी हर याद
छोड़ जाती है अंतहीन वेदना
और मैं निर्निमेष देखती हूँ एक और दिन का अंत
आकाश में गोधूली बेला में रंगों की शहनाई
बढती जा रही है .....
रात्री के मध्य पहर में सोचती हूँ मैं
कुछ भी तो जाहिर नहीं कर पाई ...
झींगुरों के शोर के बिच भी अकेला है मन
निर्वाक मौन की अनुभूति अब संग है मेरे
वक्त का अंधकार घटता ही नहीं
और मानो हल्का-हल्का सा सब याद आता है
वर्षों बीत गए ,फिर भी हर पल
याद आती है तुम्हारी .......


संगीता सिंह 'भावना'

सह - संपादिका,
''करुणावती साहित्य धारा '' (त्रैमासिक)

गुरुवार, 23 अक्तूबर 2014

डा. कुंअर बेचैन की ग़ज़लें




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



  • डा. कुँअर बेचैन ग़ज़ल लिखने वालों में ताज़े और सजग रचनाकारों में से हैं। उन्होंने आधुनिक ग़ज़ल को समकालीन जामा पहनाते हुए आम आदमी के दैनिक जीवन से जोड़ा है। यही कारण है कि वे नीरज के बाद मंच पर सराहे जाने वाले कवियों में अग्रगण्य हैं। उन्होंने गीतों में भी इसी परंपरा को कायम रखा है। वे न केवल पढ़े और सुने जाते हैं वरन कैसेटों की दुनिया में भी खूब लोकप्रिय हैं। सात गीत संग्रह, बारह ग़ज़ल संग्रह, दो कविता संग्रह, एक महाकाव्य तथा एक उपन्यास के रचयिता कुँवर बेचैन ने ग़ज़ल का व्याकरण नामक ग़ज़ल की संरचना समझाने वाली एक अति महत्वपूर्ण पुस्तक भी लिखी है।
                                                                             .....


(एक)


बड़ा उदास सफ़र है हमारे साथ रहो.
बस एक तुम पे नज़र है हमारे साथ रहो

हम आज ऐसे किसी ज़िंदगी के मोड़ पे हैं
न कोई राह न घर है हमारे साथ रहो

तुम्हें ही छाँव समझकर हम आ गए हैं इधर
तुम्हारी गोद में सर है हमारे साथ रहो

ये नाव दिल की अभी डूब ही न जाए कहीं
हरेक सांस भंवर है हमारे साथ रहो

ज़माना जिसको मुहब्बत का नाम देता रहा
अभी अजानी डगर है हमारे साथ रहो

इधर चराग़ धुएँ में घिरे-घिरे हैं 'कुँअर '
उधर ये रात का डर है हमारे साथ रहो



(दो) 


दिलों में नफरतें हैं अब, मुहब्बतों का क्या हुआ
जो थीं तेरे ज़मीर की अब उन छतों का क्या हुआ

बगल में फाइलें लिए कहाँ चले किधर चले
छुपे थे जो किताब में अब उन खतों का क्या हुआ

ज़रा ज़रा सी बात पे फफक पड़े या रो पड़े
वो बात-बात में हँसी की आदतों का क्या हुआ

लिखे थे अपने हाथ से जो डायरी में आपने
नई-नई-सी खुशबुओं के उन पतों का क्या हुआ

कि जिनमें सिर्फ प्यार की हिदायतें थीं ऐ 'कुँअर'
वो मन्त्र सब कहाँ गए उन आयतों का क्या हुआ



 (तीन) 


फूल को ख़ार बनाने पे तुली है दुनिया
सबको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया

मैं महकती हुई मिटटी हूँ किसी आँगन की
मुझको दीवार बनाने पे तुली है दुनिया

हमने लोहे को गलाकर जो खिलौने ढाले
उनको हथियार बनाने पे तुली है दुनिया

जिन पे लफ़्ज़ों की नुमाइश के सिवा कुछ भी नहीं
उनको फ़नकार बनाने पे तुली है दुनिया

क्या मुझे ज़ख्म नए दे के अभी जी न भरा
क्यों मुझे यार बनाने पे तुली है दुनिया

मैं किसी फूल की पंखुरी पे पड़ी शबनम हूँ
मुझको अंगार बनाने पे तुली है दुनिया

नन्हे बच्चों से 'कुँअर ' छीन के भोला बचपन
उनको हुशियार बनाने पे तुली है दुनिया



(चार) 


हम कहाँ रुस्वा हुए रुसवाइयों को क्या खबर
डूबकर उबरे न क्यूँ गहराइयों को क्या खबर

ज़ख्म क्यों गहरे हुए होते रहे होते गए
जिस्म से बिछुड़ी हुई परछाइयों को क्या खबर

क्यों तड़पती ही रहीं दिल में हमारे बिजलियाँ
क्यों ये दिल बादल बना अंगड़ाइयों को क्या खबर

कौन सी पागल धुनें पागल बनातीं हैं हमें
होठ से लिपटी हुई शहनाइयों को क्या खबर

किस क़दर तन्हा हुए हम शहर की इस भीड़ में
यह भटकती भीड़ की तन्हाइयों को क्या खबर

कब कहाँ घायल हुईं पागल नदी की उंगलियाँ
बर्फ़ में ठहरी हुई ऊँचाइयों को क्या ख़बर

क्यों पुराना दर्द उठ्ठा है किसी दिल में कुँअर
यह ग़ज़ल गाती हुई पुरवाइयों को क्या खबर



(पांच) 


हम बहुत रोये किसी त्यौहार से रहकर अलग
जी सका है कौन अपने प्यार से रहकर अलग

चाहे कोई हो उसे कुछ तो सहारा चाहिए
सज सकी तस्वीर कब दीवार से रहकर अलग

क़त्ल केवल क़त्ल और इसके सिवा कुछ भी नहीं
आप कुछ तो सोचिये तलवार से रहकर अलग

हाथ में आते ही बन जाते हैं मूरत प्यार की
शब्द मिटटी हैं किसी फ़नकाार से रहकर अलग
वो यही कुछ सोचकर बाज़ार में खुद आ गया
क़द्र हीरे की है कब बाज़ार से रहकर अलग

काम करने वाले अपने नाम की भी फ़िक्र कर
सुर्खियां बेकार हैं अखबार से रहकर अलग

स्वर्ण-मुद्राएं तुम्हारी भी हथेली चूमतीं
तुम ग़ज़ल कहते रहे दरबार से रहकर अलग

सिर्फ वे ही लोग पिछड़े ज़िंदगी की दौड़ में
वो जो दौड़े वक़्त की रफ़्तार से रहकर अलग

हो रुकावट सामने तो और ऊंचा उठ 'कुँअर'
सीढ़ियाँ बनतीं नहीं दीवार से रहकर अलग


 (छह) 


गलियों गलियों सिर्फ घुटन है बंजारा दम तोड़ न दे
बहरों के घर गाते गाते इकतारा दम तोड़ न दे

ऊंचे पर्वत से उतरी है प्यास बुझाने धरती की
अंगारों पर चलते चलते जलधारा दम तोड़ न दे

चंदा का क्या वह तो अपनी राहें रोज़ बदलता है
अपने वचनों पर दृढ रहकर ध्रुवतारा दम तोड़ न दे

मुमकिन हो तो दूर ही रखना दिल की आग को आंसू से
पानी की बाँहों में आकर अंगारा दम तोड़ न दे

अंधी आंधी में अब फिर से भेज न मन के पंछी को
माना पहले बच आया है दोबारा दम तोड़ न दे

केवल उजियारा रहता तो नींद न मिलती आँखों को
मेरे बचपन का साथी ये अंधियारा दम तोड़ न दे

घर घर जाकर बाँट रहा है चिट्ठी जो मुस्कानों की
देखो मेरे आंसूं का यह हरकारा दम तोड़ न दे

कितनी मुश्किल से बच पाया आंधी से ये नीड 'कुँअर '
अब तो बिजली की बारिश हैं बेचारा दम तोड़ न दे

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

अंसार क़म्बरी के दोहे




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



अधरों पर मुस्कान..



मन से जो भी भेंट दे, उसको करो कबूल |
काँटा मिले बबूल का, या गूलर का फूल ||

सागर से रखती नहीं, सींपी कोई आस |
एक स्वाति की बूँद से, बुझ जाती है प्यास ||

गिरा हुआ आकाश से, संभव है उठ जाये |
नजरों से गिर जाये जो, उसको कौन उठाये ||

सूरज बोला चाँद से, कभी किया है ग़ौर |
तेरा जलना और है, मेरा जलना और ||

प्यासे के जब आ गयी, अधरों पर मुस्कान |
पानी-पानी हो गया, सारा रेगिस्तान ||

रातों को दिन कह रहा, दिन को कहता रात |
जितना ऊँचा आदमी, उतनी नींची बात ||

जब तक अच्छा भाग्य है, ढके हुये है पाप |
भेद खुला हो जायेंगे, पल में नंगे आप ||

बहुदा छोटी वस्तु भी, संकट का हल होय |
डूबन हारे के लिये, तिनका सम्बल होय ||

ढाई आखर छोड़ जब, पढ़ते रहे किताब |
मन में उठे सवाल का, कैसे मिले जवाब ||

तुम्हें मुबारक हो महल, तुम्हें मुबारक ताज |
हम फ़क़ीर हैं ‘क़म्बरी’, करें दिलों पर राज ||


मंगलवार, 14 अक्तूबर 2014

मौन होते शब्द व अन्य कविताएं-मंजुल भटनागर




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



मौन होते शब्द


कविता बुनना ,एकांत है
मन खोजता है
मौन होते हुए अहसास को
विरक्ति को
रूह में छिपे दर्द को
अनंत तक नदी हो बह जाने तक .

तथागत का एकांत
तपस्या का बोधिसत्व होना
गांधी का करघा
कबीर का जुलहिन सा बुनकर
जितनी बुनी सूत कपास
प्रेम की चदरिया बन
मौन रंग हो अमर हो जाना .

प्रेम का एकांत
सूने जंगल पगडंडियां
दो एकांत मिल
एक सघन एकांत रचते हैं
खोते हैं नभ के बादलों में
फूलो के खिलने में
हवाओं से दिग्भर्मित होते हैं
मौन होते शब्द
कुछ नही बोलते हैं.

नदी का एकांत किनारा
सागर का जैसे धुर्व तारा
दिन की थकन को ,स्वप्न
प्रेम का चिर मौन
शब्द देते,रंग देते चोला
प्रेम की भाषा अनन्त
रह जाते पर्वत जंगल तारें
प्रभु ईश या मौला।



स्वप्न


स्वप्न मरकत से डिब्बे से
दिवस आगमन पर
खुल जाते हैं
जी उठते हैं कंटीली झाड़ियों में
पनप  जाते हैं सहरा के
रेतीलें जंगलों में
केक्टस के दरख्तों पर
ओस की बूंदों से
झिलमिलाते .

किसी आंधी तूफानों से
भिड़ जाते
झंझावतों से बिखरते नही
कुछ और निखर जाते
स्वप्न उस दूब के त्रिन पर
सांस लें जी जाते हैं .

स्वप्न बीजते नही
खामोश सोते हैं
किसी एकांत विजन में
प्रेम की बूंद सींच देती हैं
स्वाति नक्षत्र सी कोई इच्छा
ढुल जाती है दिवा स्वप्न बन

स्वप्न में खलल न पड़े
स्वप्न ले रहा अजन्मा शिशु
विहंस रहा माँ कि कोख में
नीदं में ही नही
जागते हुए भी देख रहा
सृष्टी के अद्भुत दिवा स्वप्न.


प्रश्न


चेहरे की हंसी से
किसी के दिल का हाल
मत पूछो
बादल क्यों बरसता रहा रात भर
बिजलियों से जा के पूछो

आसमा छू सको तो
शौक से
चले आओ उड़ने
पर मंजिल कहाँ मिलेगी
यह रास्तों से  पूछो

घर के जख्मो को
छिपा लेते हैं जग मगाते फानूस
इन दीवारों में क्या दफ़न है
घर के झरोखों से  पूछो

आँधियाँ कितनी बेरहम थी उन दिनों
यह बात पंछियों से मत पूंछो
कौन सा परिंदा बेघर हुआ
पेड़ की टूटी डालियों से पूछो

मटमैला सा आलम है
आसमानों में धुआं धुआं क्यों है
फूलों को खिला रहने दो बागवानों में
तितलियाँ कहाँ खो गयो
यह पिछली सदी से पूछो  .


सूना नीड़



चिड़ियों ने क्यों
शहर है छोड़ा
ढूँढ रहा अविलम्ब सवेरा.

पढ़ लो आकर नीड़ सुनहरा
घने कुहस में बादल पानी
चिकनी रेत गज दो थाती
तुम्हीं  बता दो देश की माटी
भेज सुना दो ,लिख दो पाती.

लिख दो जब भी
बरखा आती या लिख दो
जब हवा सरसराती
कम्पन सी जब सर्दी आती .

सरसों ने बिरवे महकाए
आकर मनुवा शोर मचाय
रंग हीन सब बिन तुम्हारें
सूना नीड़ तुम्हें बुलाय .


इदी का मौसम


मौसमों सा मन
महसूसता तन
कल बारिश थी सोंधी सी
आज पूरा बसंत
पेड़ो पर पत्तों का हुजूम
बादलो के घर से उतरती ख़ामोशी
मौसम सा मन .

वो स्याह घेरो से उतरती चांदनी
जैसे खिड़की से उचकता
सोया सा गुलाब
महकता भी है रोज
पर ये रिश्ते समान से क्यों हो जाते हैं
जितना भी संभालूं
बस खो जाते हैं क्यों ?

सुबह मिलने जाती हूँ
हँसते चेहरों से
बीन लाती हूँ
चंपा की पंखुडियां
पलाश के बन
वो नागार्जुन की मानसरोवर झील
ढूँढना चाहती हूँ इस शहर में
न जाने क्यों .

दिन निकल रहा है
अखबार की सुर्ख़ियों सा
स्कूल बसें हॉर्न दे रही हैं
दूर मस्जिद से नमाज़ की रिवायते
बुन रही है ,इदी का मौसम .

मंजुल भटनागर 

o/503, third floor, Tarapor Towers
New Link Rd ,Oshiwara
Andheri West Mumbai 53.
phone 09892601105
022-42646045,022-26311877.

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

जय प्रकाश त्रिपाठी की रचनाएँ




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


















कायर-कायर अंगड़ाई है..



कायर-कायर अंगड़ाई है, गूंगे-गूंगे बोल,
नारे, जैसे कूबड़-कूबड़ गाली गोल-मटोल ।
बिना पांव के पंख पसारे भांति-भांति के मोर,
पागल-पागल सच्चाई है, गठरी-गठरी चोर ।
कंठ-कंठ बैठा हुआ, सांय-सांय सुर-ताल,
उल्लू-उल्लू आंख, पेड़ के डाल-डाल बैताल ।
कुर्सी-कुर्सी पालथी, चंदन-चंदन सांप,
बातफरोशों में छिड़ी बहस अनाप-शनाप ।
चौखट-चौखट चुप्पियां, आंगन-आंगन शोर,
घुटी-घुटी सी चीख का मौसम चारो ओर ।


हो रही हरदम बड़ाई आप की..


हो रही हरदम बड़ाई आप की।
ठन गई फिर से लड़ाई आप की ।
देखकर कुछ लोग खुश-हैरान हैं,
शिखर तक पहली चढ़ाई आप की ।
दूर तक अंधेरगर्दी की नजर,
आंख ऐसी फड़फड़ाई आप की ।
आपने जो पाठशाला खोल दी,
पढ़ रहे हैं सब पढ़ाई आप की ।
खुल गये गुलजार मयखाने सभी,
चाल जब से लड़खड़ाई आपकी ।


किसको-किसको सुख पहुंचाया..


प्रायः याद किया करता हूं, किसको-किसको सुख पहुंचाया ।
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

पूरा घर खंडहर हो गया, गांव रह गया पूर्व जन्म-सा,
छिन्न-भिन्न रिश्ते-नातों में वक्त बह गया पूर्व जन्म-सा,
डूब गये सीवान, जिन्हें हर दम थी दुलराती पगडंडी
सुनता हूं कि नहीं रही वो खेत-खेत जाती पगडंडी,
पोखर, कुआं, घाट, पिछवारे, जिनके संग था नाचा-गाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

शेष रह गयी राम-कहानी इनकी-उनकी, यहां-वहां की,
मित्र-मित्र दिन गुजर गये, दुश्मन-दुश्मन दिन जैसे बाकी,
जिसके बिना न जी सकता था, कैसी-कैसी बात कह गया,
उतना अपनापन देकर भी खाली-खाली हाथ रह गया,
फूल और अक्षत की गठरी वाला गीत नहीं फिर गाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

सफर कहां थम गया, कहां से भरीं उड़ानें जीवन ने,
कहां सुबह से शाम हो गयी, कहां बुने सपने मन ने,
लोरी-लोरी रातों वाले वे सारे दिन कहां गये,
बार-बार वे चेहरे आंखों की गंगा में नहा गये,
कितने कोस, गये युग कितने, गिनते-गिनते याद न आया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

हर दिन, एक-एक दिन लगती थीं जो सौ-सौ सदी किताबें,
जब वर्षों ढोया करता था माथ-पीठ पर लदी किताबें,
पत्ती-पत्ती, फूल-फूल से हर पल बोझिल ऊपर-नीचे,
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द से हरे-भरे अनगिनत बगीचे,
गिरते-पड़ते, गिरते-पड़ते सबको साथ नहीं रख पाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

ऐसे ही सबके दिन होंगे, रही-सही स्मृतियां होंगी,
सौ-सौ बातों वाली बातें मन में तन्हा-तन्हा होंगी
जिनके अपने साथ न होंगे, जो खुद नैया खेते होंगे
चोरी से हंस लेते होंगे, चोरी से रो लेते होंगे,
जब भी कुछ कहने-सुनने को चाहा तो क्यों मन भर आया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

मेरा मन व अन्य कविताएं-जयन्ती प्रसाद शर्मा



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


मेरा मन..


मेरा मन एक आस का पंछी-
स्वयं भी भटकता है
मुझे भी भटकाता है।
वह चलता है आगे आगे
और मै बंधा किसी अदृश्य डोर से-
उसके पीछे दौड़ता चला जाता हूँ।
मै कभी थक कर रुक जाता हूँ,
वह देखता है मुड़ कर, करता है
मेरा उत्साह्बर्धन
और मै पुन: उसका
अनुसरण करने लगता हूँ।
अति उत्साहित हो
वह कभी उड़ जाता है ऊँचे आकाश में,
पड़ कर कभी नैराश्य के गर्त में-
गहरे सागर में डूबने उतराने लगता है।
छिप कर किसी बदली की ओट में
 करके आँख मिचोली-
मुझे बहलाने, भरमाने लगता है।
पता नहीं उसके यों
भटकने, भटकाने से-
कभी मिल भी पायेगा अभीष्ट।


कुहरा


वातावरण में फैला घना कुहरा-
लगता है मनुष्य के
अन्तस में भी छा गया है।
पास खड़े स्वजनों के चेहरे भी उसे-
दिखाई देते हैं काले धब्बे से।
असहनीय शीत से उसकी जड़ हो गई है-
भावना, संचेतना।
अपनों की भावों की गर्माहट भी-
नहीं कर पाती है कोई स्पंदन।
प्रतीक्षा है किसी
बासंतिक बयार के झोंके की,
एक टुकड़ा गुनगुनी धुप की,
जो छांट देगी पसरे कुहासे को-
तन की सर्द जड़ता को।
वह देख सकेगा ठीक से हर आकृति,
अनुभव कर सकेगा
हर मन की भावना की-
उष्णता।


बड़े प्यार से मिलते हैं


वे जब भी मिलते हैं
बड़े प्यार से मिलते हैं।
में भी उन्हें सम्मान देता हूँ-
बड़े भाई सा।
लेकिन उन्होंने किया है
मेरा उपयोग सदैव-
एक मोहरे की तरह।
वे जब मेरा जैसा उपयोग चाहते हैं,
मुझे इंगित कर देते हैं और मैं
उनकी चाहत जैसा-
व्यवहार करने लगता हूँ।
भीड़ में कर लेता हूँ
उनके चरण स्पर्श।
मेरे चरण स्पर्श करते ही
लोगों का लग जाता है ताँता-
उनके चरण स्पर्श करने को।
उनके इशारे पर,
जब वे उचित समझते हैं,
में उन्हें पहना देता हूँ फूलों का हार-
और वहाँ फूलों के हारों का ढेर लग जाता है।
आवश्यकता पड़ने पर
मै उनका नाम लेकर-
जोर जोर से जिंदाबाद के
नारे भी लगा देता हूँ।
प्रत्युतर में उनके जिंदाबाद के नारों से-
परिसर गुंजायमान हो जाता है।


जयन्ती प्रसाद शर्मा 


  • नाम : जयन्ती प्रसाद शर्मा
  • पिता का नाम : स्व: श्री छेदा लाल शर्मा
  • माता का नाम : स्व: श्री मती हरप्यारी देवी
  • जन्म तिथि : 15 अप्रैल 1940
  • जन्म स्थान : अलीगढ
  • कार्य : सेवानिवृत वरिष्ठ सहायक (एन सी सी विभाग) 
  • प्रकाशित कृतियाँ : मन के वातायन (कविता संग्रह), सूर्पणखा (खंडकाव्य),सुभाष चन्द बोस (अप्रकाशित 
  • खंडकाव्य) 
  • पता : 11/183, सराय कुतुब, अलीगढ़-202001 (उत्तर प्रदेश)
  • संपर्क: jpsharma183@rediffmail.com 
  • मोबाइल: 0888142335 

गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

दस्तक: दो कविताएं-निधि जैन



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


चाहत मे..


तेरा होने की चाहत मे
किसी के ना हो सके हम
ना खुल के हंस सके
ना खुल के रो सके हम
जिसको हमने चाहा था
वो किसी और का था पहले ही
ना उसको पा सके
ना उसको खो सके हम
कर्मों ने खेला
ज़िन्दगी का खेल ये निराला
जिसमे हारे ही हारे हैं
पर कभी ना जीत सके हम
अपना अपना कहते कहते जिनको
हमने ये जीवन गुजारा
उन अपनों के कभी
"अपने" ना हो सके हम
गालियां ही पाना था शायद
नसीब में हमारे
पर कभी किसी की
दुआ ना पा सके हम
आँख खुली तो हर तरफ
तन्हाई थी, उदासी थी
चाह कर भी कभी
मुस्कुरा ना सके हम
देखे थे कुछ ख्वाब
सजाये कुछ सपने थे हमने भी
सपने सपने ही रह गए
उन्हें हकीक़त ना कर सके हम
दिल के जख्म धीरे धीरे
नासूर हो गए
चाह कर भी कभी उन पे
मलहम ना लगा सके हम
सोचा था कुछ ऐसा
कहेंगे हम भी अपना हाल सबसे
सुना बहुत कुछ सबसे
पर कभी किसी से कुछ कह ना सके हम
ज़िन्दगी की कविता
अधूरी की अधूरी ही रह गयी
कोशिश तो बहुत की
पर उसे पूरा ना कर सके हम
ना खुल के हंस सके
ना खुल के रो सके हम

जरूरत है जागने की


खुश हुए ये जानकर एक दंपत्ति
अब मिलेगी उनको भी संतान रुपी संपत्ति
खिलेगा आँगन में एक प्यारा सा फूल
भर देगा जीवन में खुशियाँ भरपूर
एक प्यारा सा राजकुमार आएगा
हर कोई जिसे देखकर खिलखिलाएगा
घर आँगन गूंजेगी जिसकी किलकारी
लुभाएगी सबको मोहिनी सूरत प्यारी
वो हंसेगा तो दुनिया हंसती हुई लगेगी
गर वो रोएगा तो दिल की धड़कन रुकेगी
वो कुल का दीपक कहलायेगा
पूरा घर उसकी रौशनी से जगमगाएगा
वंश की बेल को आगे बढाकर
पुरखों का वह मान बढाएगा
सजाते सपने, बुनते ख्वाब,
 बीत गए महीने नौ
जिसका सबको था इन्तजार,
फट गई एक दिन वो पौ
आई घर में लक्ष्मी थी,
जन्म हुआ था तनया का
स्वागत होना था बेटे का,
पर ना हुआ था कन्या का
माँ ने मुँह फेरा उससे फिर
पिता ने गोदी में ना लिया
उसने पैदा होकर जैसे,
सबके सपनों को चकनाचूर कर दिया
दादी ने मारे ताने थे फिर
बुआ ने नाक चिडाई थी
सबने मिलकर के फिर
करी ईश्वर से लड़ाई थी
मन्नत जब मांगी बेटे की,
कैसे हो गई ये लड़की
सपने तो बुने थे उन्नति के हमने,
 आ गई है अब ये कडकी
सोच रही थी पड़े-पड़े वो,
भूल गए जो वो सब भी
माँ भी तो एक लड़की ही हैं,
दादी-बुआ भी हैं लड़की
गर लड़की ही ना होती तो,
क्या पुरुष जन्म ले पाता फिर
कौन सा वंश, कैसी विरासत,
क्या दुनिया पैदा होती फिर
जिस घर में लड़की का जन्म नहीं होता
वहाँ पर खुशियों का आगमन नहीं होता
दिवाली पर होते ना ही ख़ुशी,
ना ही उमंग
होली पर नहीं उड़ते,
हर्षोल्लास के रंग
ना मनाया जाता फिर रक्षा-बंधन
ना लगता माथे पर भैया-दूज का चन्दन
गर ना होती लक्ष्मी तो,
कैसे मिलती सुख-संपत्ति हमें
सरस्वती से ही तो होती है,
विद्याओं की प्राप्ति हमें
दुर्गा ना होती गर तो,
शक्तियां कहाँ से हम पाते
चंडी का महारूप ना होता
तो राक्षसों का नाश कभी ना कर पाते
लड़की में
ना जाने कितने ही रूप समाए हैं
उसकी शक्ति और मर्यादा के आगे तो
ईश्वर ने भी शीश झुकाए हैं
लड़का एक कुल की आन है,
लड़की दो कुलों का मान है
लड़की कोई बोझ नहीं है,
वो तो ईश्वर का वरदान है
लड़की बेटी है, बहिन है,
 मौसी-बुआ, दादी-नानी,
और ना जाने क्या-क्या है
एवं इन सबसे बढकर, वो एक माँ है
जो जनती है आज को
और पालती है कल को
लड़की के बिना हर रिश्ता अधूरा है
लड़की से ही सबका जीवन पूरा-पूरा है
सोचो
दिल से सोचो
क्या लड़की के बिना
हो सकती है स्रष्टि की रचना ?
क्या उसके बिना पूरा हो सकता है
भविष्य का कोई सपना ?
क्यों पैदा होने से पहले ही
लड़की को मार रहे हो ?
क्यों जानते बूझते
अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हो ?
इसलिए
जरूरत है जागने की
मिलकर इन कुरीतियों को मिटाने की
वक़्त है अभी भी
ईश्वर की दी इस अमूल्य " निधि " का
करेंगे जब मिलकर हम सब सम्मान
तब ही कहलाएंगे हम सब एक सच्चे इंसान..!