रविवार, 31 अगस्त 2014

दो गीत-कृष्ण नन्दन मौर्य


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



हमको प्यारी है..

       
इकतारा के स्वर–संग
धुन–निर्गुण गाते दरवेश की।
हमको प्यारी है
सोंधी सी माटी अपने देश की।


गंगा–जमुना के संगम सी
मेल–मिलापों की
यह धरती है
उत्सव, उल्लासों, अपनापों की
पढ़कर देखो
यह है पावन पाती नेह–संदेश की।


रधिया की सौरी में
सोहर गाती है कुलसुम
रामजोहारी का उत्तर है
अस्सलाम अलैकुम
हमें अजेय बनाती एका
जुदा–जुदा परिवेश की।

सरहद के भी पार
शांति का दिया जलाते हैं
धोखा करते नहीं
भले हम धोखे खाते हैं
लुट जायें
पर रख लेते हैं लाज साधु के भेष की।


रहो वही माँ जैसी, माँ..


पाला था जिसको फूलों सा
उसको काँटे क्यों बोती हो।
पुन:–पुन: प्रिय राम के लिये
तुम कैकेयी क्यों होती हो।

हिरन हुआ मन का भोलापन
घुली हुई है तल्खी स्वर में
मन की साधें आज हो रहीं मुखर
मन्थरा के आखर में
हँसी–खुशी के हर अवसर पर
कोप–भवन में क्यों रोती हो।


नजर उसी की खुशियों पर है
जिसके माथे धरी दिठौनी
अधिकारों की चाह बढ़ी
अब दीख रही है ममता बौनी
फलता गेह देख बच्चों का
जली–भुनी सी क्यों होती हो।

देहरी, दरवाजों, छज्जों पर चहक रही
चिड़िया जैसी हैं
सोच बदलकर देख सको
तो बहुयें भी बिटिया जैसी हैं
भेदभाव की चकिया पर
रोटियाँ कलह की क्यों पोती हो।

क्षमा, दया का खेत लहकता
बदला कटुता के बंजर में
सूख गया अपनेपन का घट
एक बहू आने से घर में
रहो वही माँ जैसी, माँ
यह सासू का पद क्यों ढोती हो।



बुधवार, 27 अगस्त 2014

गोपालदास 'नीरज' के दोहे


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार



 जग का रंग अनूप


वाणी के सौन्दर्य का शब्दरूप है काव्य
किसी व्यक्ति के लिए है कवि होना सौभाग्य।

जिसने सारस की तरह नभ में भरी उड़ान
उसको ही बस हो सका सही दिशा का ज्ञान।

जिसमें खुद भगवान ने खेले खेल विचित्र
माँ की गोदी से अधिक तीरथ कौन पवित्र।

दिखे नहीं फिर भी रहे खुशबू जैसे साथ
उसी तरह परमात्मा संग रहे दिन रात।

जब तक पर्दा खुदी का कैसे हो दीदार
पहले खुद को मार फिर हो उसका दीदार।

मिटे राष्ट्र कोई नहीं हो कर के धनहीन
मिटता जिसका विश्व में गौरव होता क्षीण।

कैंची लेकर हाथ में वाणी में विष घोल
पूछ रहे हैं फूल से वो सुगंध का मोल।

इंद्रधनुष के रंग-सा जग का रंग अनूप
बाहर से दीखे अलग भीतर एक स्वरूप।



शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

कमरों वाला मकान व अन्य कविताएं- वन्दना गुप्ता




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


कमरों वाला मकान


इस मकान के
कमरों में
बिखरा अस्तित्व
घर नही कहूँगी
घर में कोई
अपना होता है
मगर मकान में
सिर्फ कमरे होते हैं
और उन कमरों में
खुद को
खोजता अस्तित्व
टूट -टूट कर
बिखरता वजूद

कभी किसी
कमरे की
शोभा बनती
दिखावटी मुस्कान
यूँ एक कमरा
जिंदा लाश का था
तो किसी कमरे में
बिस्तर बन जाती
और मन पर
पड़ी सिलवटें
गहरा जाती
यूँ एक कमरा
सिसकती सिलवटों का था

किसी कमरे में
ममता का
सागर लहराता
मगर दामन में
सिर्फ बिखराव आता
यूँ एक कमरा
आँचल में सिसकते
दूध का था

किसी कमरे में
आकांक्षाओं , उम्मीदों
आशाओं की
बलि चढ़ता वजूद
यूँ एक कमरा
फ़र्ज़ की कब्रगाह का था

कभी रोटियों में ढलता
कभी बर्तनों में मंजता
कभी कपड़ों में सिमटता
तो कभी झाड़ू में बिखरता
कभी नेह के दिखावटी
मेह में भीगता
कभी अपशब्दों की
मार सहता
हर तरफ
हर कोने में
टुकड़े - टुकड़े
बिखरे अस्तित्व
को घर कब
मिला करते हैं
ऐसे अस्तित्व तो सिर्फ कमरों में ही सिमटा करते हैं.



वहाँ दहशत के आसमानों में..


अपने समय की विडंबनाओं को लिखते हुए
कवि खुद से हुआ निर्वासित
आखिर कैसे करे व्यक्त
दिल दहलाते खौफनाक मंजरों को
बच्चों की चीखों को
अबलाओं की करुण पुकारों को
अधजली लाशों की शिनाख्त करते
बच्चों बड़ों के दहशतजर्द
पीले पड़े पत्तों से चेहरों को
रक्तपात और तबाही की दस्तानों को
किस शब्दकोष से ढूँढे
शब्दों की शहतीरों को
जो कर दे व्यक्त
अपने समय की नोक पर रखी
मानसिकता को

एक भयावह समय में जीते
खुद से ही डरते मानव के भयों को
आखिर कैसे किया जा सकता है व्यक्त
जहाँ सत्ता और शासन का बोलबाला हो
मानवता और इंसानियत से
न कोई सरोकार हो
मानवता और इंसानियत के
जिस्मों को तार तार कर
स्वार्थ की रोटियाँ सेंकी जा रही हों
वहाँ खोज और खनन को
न बचते हथियार हैं
फिर कैसे संभव है
कर दे कोई व्यक्त अपने समय को

मुल्ला की बांग सा आह्वान है
जलती चिताओं से उठाते
जो मांस का टुकड़ा
गिद्धों के छद्मवेश में
करते व्यापार हों
कहो उनके लिए कैसे संभव है
हाथ में माला पकड़ राम राम जपना
स्वार्थ की वेदी पर
मचा हर ओर हाहाकार है
बच्चों का बचपन से विस्थापन
बड़ों का शहर नगर देश से विस्थापन
बुजुर्गों का हर शोर की आहट से विस्थापन
मगर फिर भी चल रहा है समय
फिर भी चल रहा है संसार
फिर भी चल रही है धड़कन
जाने बिना ये सत्य
वो जो ज़िंदा दिखती इमारतें हैं
वहां शमशानी ख़ामोशी हुंकार भरा करती है
मरघट के प्रेतों का वास हुआ हो जहाँ
सुकूँ ,अपनेपन , प्यार मोहब्बत की
जड़ों में नफरत के मट्ठे ठूंस दिए गए हो जहाँ
कहो कैसे व्यक्त कर सकता है
कोई कवि अपने समय की वीभत्सता को महज शब्दों के मकड़जाल में

कैसे संभव है मासूमों के दिल पर पड़ी
दहशत की छाप को अक्षरक्षः लिखना
जाने कल उसमे क्या तब्दीली ले आये
काली छाया से वो मुक्त हो भी न पाये
जाने किसका जन्म हो जाए
एक और आतंक के पर्याय का
या दफ़न हो जाए एक पूरी सभ्यता डर के वजूद में
फिर कैसे संभव है
कवि कर सके व्यक्त
अपने समय के चीरहरण को
जहाँ निर्वसना धरा व्याकुल है
रक्त की कीच में सनी उसकी देह है

ओह ! मत माँगो कवि से प्रमाण
मत करो कवि का आह्वान
नहीं नहीं नहीं
नहीं कर सकता वो शिनाख्त
वक्त की जुम्बिश पर
थरथरायी आहों की
जहाँ स्त्रियों की अस्मत महज खिलवाड़ बन रह गयी हो
नहीं मिला सकता निगाह खुद से भी
फिर भला कैसे कर सकता है
व्यक्त अपने समय की कलुषता को
खिलखिलाती किलकारियों का स्वप्न
धराशायी हुआ हो जहाँ
सिर्फ मौत का तांडव
अबलाओं बच्चों का रुदन
छलनी हृदय और शमशानी खामोशी
अट्टहास करती हो जहाँ
वहां कैसे संभव है
व्यक्त कर सके कवि
अपने समय को कलम की नोक पर

रुक जाती है कवि की कलम
समय की नोक पर
जहाँ रक्त की नदियाँ
तोड़कर सारे बाँध बहा ले जा रही हैं
एक पूरी सभ्यता को
जहाँ नही दिख रहा मार्ग
सिर्फ क्षत विक्षत लाशों के अम्बार से पटी
सड़कों के कराहने का स्वर भी
डूब चुका है स्वार्थपरता की दुन्दुभियों में
स्त्री पुरुष बाल बच्चे बुजुर्ग
नहीं होती गिनती जिनकी इंसान होने में
मवेशियों से दड़बों में कैद हों जैसे
वहाँ कैसे संभव है
बन्दूक की नोक पर संवेदना का जन्म
जहाँ सिर्फ लोहा ही लोहा पिघले सीसे सा सीने में दफ़न हो
फिर बोको हरम  हो , ईराक हो , फिलिस्तीन , गाज़ा या नाइजीरिया
दहशत के आसमानों में सुराख नहीं हुआ करते
फिर कैसे संभव है
व्यक्त कर सके कवि अपने समय को अक्षरक्षः

वीभत्स सत्यों को
उजागर करने का हुनर
अभी सीख नहीं पायी है कवि की कलम
आखिर कैसे
इंसानियत के लहू में डूबकर कलम
लिखे दहशतगर्दी की काली दास्ताँ

एक ऐसे समय में जीते तुम
नहीं हो सकते मनचाहे मुखरित ....   ओ कवि !!!



और 12 घंटे के बाद 


12 घंटे का युद्धविराम
और 12 घंटे के बाद
एक बार फिर
मौत अपने तमाम हथियारों के साथ
तांडव करती खौफ़ का साम्राज्य स्थापित करती
ज़िन्दगी पर अट्टहास करती मिलेगी
ज़िन्दगी से हाथ मिलाती मिलेगी
जहाँ ज़िन्दगी खुद के होने पर शर्मसार होगी
और मौत एक अटल सत्य बन
फिर से लील लेगी एक सभ्यता ……जाने अमानुषों से परहेज क्यों है मौत को ?

काश 12 घंटे की ज़िन्दगी में जी पाते एक तमाम उम्र



जाने कितनी बार तलाक लिया


जाने कितनी बार तलाक लिया
और फिर
जाने कितनी बार समझौते की बैसाखी पकड़ी
अपने अहम को खाद पानी न देकर
बस निर्झर नीर सी बही
युद्ध के सिपाही सी
मुस्तैद हो बस
खुद से ही एक युद्ध करती रही
ये जानते हुए
हारे हुए युद्ध की धराशायी योद्धा है वो
आखिर किसलिए ?
किसलिए हर बार
हर दांव को
आखिरी दांव कह खुद को ठगती रही
कौन जानना चाहता है
किसे फुर्सत है
बस एक बंधी बंधाई दिनचर्या
और बिस्तर एक नित्यकर्म की सलीब
इससे इतर कौन करे आकलन ?
आखिर क्या अलग करती हो तुम

वो भी तो जाने
कितनी परेशानियों से लड़ता झगड़ता है
आखिर किसलिए
कभी सोचना इस पर भी
वो भी तो एक सपना संजोता है
अपने सुखमय घर का
आखिर किसलिए
सबके लिए
फिर एकतरफा युद्ध क्यों ?
क्या वो किसी योद्धा से कम होता है
जो सारी गोलियां दाग दी जाती हैं उसके सीने में

आम ज़िन्दगी का आम आदमी तो कभी
जान ही नहीं पाता
रोटी पानी की चिंता से इतर भी होती है कोई ज़िन्दगी
जैसे तुम एक दिन में लेती हो ३६ बार तलाक
और डाल देती हो सारे हथियार समर्पण के
सिर्फ परिवार के लिए
तो बताओ भला
दोनों में से कौन है जो
ज़िंदगी की जदोजहद से हो परे
मन के तलाक रेत के महल से जाने कब धराशायी हो जाते हैं
जब भी दोनों अपने अहम के कोटरों से बाहर निकलते हैं

आम आदमी हैं , आम ज़िन्दगी है , आम ही रिश्तों की धनक है
यहाँ टूटता कुछ नहीं है ज़िन्दगी के टूटने तक
बस बाहरी आवरण कुछ पलों को
ढांप लेते हैं हकीकतों के लिबास
तलाक लेने की परम्परा नहीं होती अपने यहाँ
ये तो वक्ती फितूर कहो या उबलता लावा या निकलती भड़ास
तारी कर देती है मदिरा का नशा
दिल दिमाग और आँखों से बहते अश्कों पर
वरना
न तुम न वो कभी छाँट पाओगे एक - दूजे में से खुद को
अहसासों के चश्मों में बहुत पानी बचा होता है
फिर चाहे कितना ही सूरज का ताप बढ़ता रहे
शुष्क करने की कूवत उसमे भी कहाँ होती है रिसते नेह के पानी को



इक अरसे बाद 


बिना पटकथा के संवाद कर गया कोई
दिल धड़कन रूह तक उत्तर गया कोई
अब धमकती है मिटटी मेरे आँगन की
जब से नज़रों से जिरह कर गया कोई

मैं ही लक्ष्य
मैं ही अर्जुन
कहो
कौन किस पर निशाना साधे अब ?

उल्लास के पंखों पर सवार हुआ करती थी
वो जो चिडिया मेरे आँगन में उतरा करती थी
इस दिल की राज़दार हुआ करती थी                      
नरगिसी अंदाज़ में जब आवाज़ दिया करती थी

मुझसे मैं खो गयी
क्या से क्या हो गयी
ज़िंदा थी जो कल तलक
आज जाने कहाँ खो गयी

दर्द जब भी पास आया
दिल ने इक गीत गाया
नैनो ने अश्रु जब भी ढलकाया
रात ने इक जश्न मनाया

जाने कहाँ खो गयी इक दुनिया
अब खुद को ढूँढ रही हूँ मैं
न शब्द बचे न अर्थ
वाक्यों में खो गयी हूँ मैं

चुप्पी का कैनवस जब गहराता है
अक्स अपना ही कोई उभर आता है
खुद के पहलू से जब भी दूर जा बैठे
कोई मुझे ही मुझसे मिला जाता है

बूँद बूँद रिसती ज़िन्दगी
फिर किस पर करूँ गुमान

बस इंसाँ में इंसानियत बाकी रहे
लम्हा एक ही काफ़ी है जीने के लिए

कोशिशों के पुल तुम चढते रहो
बचने की तजवीजें मैं करती रहूँ

इसी बेख्याली में गुजरती रहेगी ज़िन्दगी

जाने कौन से कैल ,चीड, देवदार हैं
चीरे जाती हूँ मगर कटते ही नहीं
मौन के सुलगते अस्थिपंजरों के
अवशेष तक अब मिलते ही नहीं

जरूरी नहीं
धधकते लावे ही कारण बनें
शून्य से नीचे जाते
तापमाप पर भी
पड जाते हैं फ़फ़ोले .........

**
   


रविवार, 17 अगस्त 2014

आशुतोष द्विवेदी की रचनाएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

तुमसे मिलन की आस तो है..



बहुत गहरे में कहीं तुमसे मिलन की आस तो है |
अधर गर्वीले नकारें लाख फिर भी प्यास तो है ||

शून्यता तो है कहीं जो बिन तुम्हारे भर न पाती,
इक चुभन भी है कि जो पीछे पड़ी दिन-रात मेरे |
दो नयन जादू भरे इस भाँति भीतर बस गए हैं,
भूल पाना अब जिन्हें, बस की नहीं है बात मेरे |
सौ बहाने मैं बना लूँ, झूम लूँ या गुनगुना लूँ ;
चित्त को अपनी अधूरी नियति का आभास तो है |

भूल जाऊँ किस तरह बेबाक होठों की शरारत ?
सेब जैसे रंग वाले गाल कैसे भूल जाऊँ ?
तारकों की पंक्तियों को मात करती मुस्कुराहट,
और चंदा को लजाता भाल कैसे भूल जाऊँ ?
आवरण मैं लाख डालूँ, स्वयं को खुद से छिपा लूँ;
पर जहां 'मैं' तक नहीं वह भी तुम्हारा वास तो है |

महकता आँचल कि जिसमें खिल उठे थे स्वप्न मेरे,
बिखरती अलकें कि जिनमें खो गयी मेरी जवानी |
थिरकते सब अंग, पुलकित रोम, गदरायी उमर वो;
बहकती जिनमें दिवानी हो गयी मेरी जवानी |
यम-नियम के ढोंग सारे, हर जतन के बाद हारे;
और मेरी इस पराजय का तुम्हें अहसास तो है |

देह की मधु-गंध नंदन को अकिंचन सिद्ध करती,
स्नेह-भीना स्पर्श मेरे प्राण में पीयूष भरता |
वत्सला चितवन सिखाती अप्सराओं को समर्पण,
और आलिंगन तुम्हारा मृत्यु का उपहास करता |
वे मधुर सुधियाँ बुलातीं, विरह की दूरी घटातीं;
गहनतम अँधियार में यह झलकता विश्वास तो है |
                                                                       


प्रश्न



आज फिर कुछ तप्त-लोहित प्रश्न मेरे सामने हैं
और ये अंगार मुझको कर-तलों में थामने हैं

प्रश्न - मैं क्यों जी रहा हूँ ?                           क्या बचाना चाहता हूँ?
रक्त सा क्या पी रहा हूँ?                             क्या मिटाना चाहता हूँ ?
ज़िन्दगी सन्यास जैसी;                               क्या  छिपाना चाहता हूँ ?
कल्पना मधुमास जैसी ?                             क्या  दिखाना चाहता हूँ?
संस्कृति के गीत गाता;                               पल रहा प्रतिशोध कैसा?
कंठ में गाँठें लगाता ?                               एक सतत विरोध कैसा?
काइयाँपन खून में है?                                बेहया मुस्कान मुख पर !
सभ्यता पतलून में है ?                              शराफत की शान मुख पर !
फोन पर रिश्ते निभाता;                              क्रांति के उपदेश घर पर;  
प्यार पर कविता सुनाता ?                            और दफ़्तर - सिर्फ "यस सर" ?
भीड़ का हो चुका जीवन;                              नौकरी क्यों कर रहा हूँ ?
भीड़ से भयभीत है मन ?                            रोज़ घुट-घुट मर रहा हूँ ?
कुछ नहीं अपनी खबर है;                             मोह है परिवार से भी;
खो न जाँऊ, मगर, डर है ?                           ऊबता इस भार से भी?
भटकता भ्रम के धुएं में?                             मुक्ति की दरकार भी है;
या कि मेंढक सा कुएं में?                            बन्धनों से प्यार भी है ?
कवच में खुद को लपेटे?                             वृद्ध संयम जूझता, फिर उलझता
किसी कछुए सा समेटे ?                             है जटिलता में,
                                                                संशयों के सूत्र सारे पकड़ रखे
                                                                काम ने हैं..........
                                                                आज फिर……...
                                                                             


 हाँ! मैं जीवित हूँ


बालकनी पर शाम उतरती है तो मैं फिर जी उठता हूँ |
शाम पांच चालीस होते ही ऑफिस के उस मुर्दा घर से,
बीस-इकीस लाशों को लेकर,
एम्बुलेंस के जैसी छोटी बस (जिसको 'चार्टर्ड' कहते हैं)
आ जाती है छः चालीस तक,
और छोड़ जाती है सब लाशों को अपने-अपने घर तक |
घर, जिनमे 'घर' का प्रतिशत कितना है - यह मालूम नहीं है |
हाँ, दीवारें हैं, छत है और छोटी बालकनी भी |

मरे हुए इन लोगों में ही एक लाश मेरी भी है जो,
लिफ्ट पकड़कर चढ़ जाती है सबसे ऊपर की मंजिल पर |
चारदिवारी घिरी हुई है, छत भी है और बालकनी भी |
'घर' का प्रतिशत कितना है? शायद कुछ भी तो नहीं; और क्या?
दिन भर के उन कसे हुए कपड़ों के बंधन ढीले करके,
बालकनी पर आ जाता हूँ;
और बुझी आँखों से देखा करता हूँ ढलते सूरज को |

सिन्दूरी वह शाम अचानक जादू जैसे कर देती है;
भीतर बिखरे अंधियारे पर एक उजाला छा जाता है;
जाते-जाते सूरज कोई नयी प्रेरणा दे जाता है;
कुछ आशाएं भर जाता है, कुछ विश्वास बंधा जाता है;
इस उमंग में पागल होकर धड़कन थिरक-थिरक उठती है;
रोम-रोम अंतर-वीणा की झंकृति से पुलकित होता है;
और श्वास जो अब तक ठहरी थी, फिर से चलने लगती है;
कहीं दूर, गहरे भावों के स्वर गुंजित होने लगते हैं --
"हाँ! मैं जीवित हूँ, मैं मरा नहीं हूँ;  हाँ! हाँ! मैं जीवित हूँ |"


आशुतोष द्विवेदी

भारतीय राजदूतावास,
अद्दिस अबाबा,
इथियोपिया


बुधवार, 13 अगस्त 2014

अशोक अंजुम की ग़ज़लें



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार
















(एक)


खाना- पीना, हंसी-ठिठोली , सारा कारोबार अलग !
जाने क्या-क्या कर देती है आँगन की दीवार  अलग !

पहले इक छत के ही नीचे  कितने उत्सव होते थे,
सारी खुशियाँ पता न था यूँ कर देगा बाज़ार  अलग !

पत्नी, बहन, भाभियाँ, ताई, चाची, बुआ, मौसीजी
सारे रिश्ते एक तरफ हैं लेकिन माँ का प्यार  अलग !

कैसे तेरे - मेरे रिश्ते को मंजिल मिल सकती थी
कुछ तेरी रफ़्तार अलग थी, कुछ मेरी रफ़्तार अलग !

जाने कितनी देर तलक दिल बदहवास-सा रहता है
तेरे सब इकरार अलग हैं, लेकिन इक इनकार  अलग !

अब पलटेंगे,  अब पलटेंगे, जब-जब ऐसा सोचा है
'अंजुम जी' अपना अन्दाज़ा हो जाता हर बार  अलग !


(दो) 


झिलमिल-झिलमिल जादू-टोना पारा-पारा आँख में है
बाहर कैसे धूप खिलेगी जो अँधियारा आँख में है

यहाँ-वहाँ हर ओर जहाँ में दिलकश खूब नज़ारे हैं
कहाँ जगह है किसी और को कोई प्यारा आँख में है

एक समन्दर मन के अन्दर उनके भी और मेरे भी
मंज़िल नहीं असंभव यारो अगर किनारा आँख में है

परवत-परवत, नदिया-नदिया, उड़ते पंछी, खिलते फूल
बाहर कहाँ ढूँढते हो तुम हर इक नज़ारा आँख में है

चैन कहाँ है, भटक रहे हैं कभी इधर तो कभी उधर
पाँव नहीं थमते हैं ‘अंजुम’ इक बंजारा आँख में है


(तीन)


बड़ी मासूमियत से सादगी से बात करता है
मेरा किरदार जब भी ज़िंदगी से बात करता है

बताया है किसी ने जल्द ही ये सूख जाएगी
तभी से मन मेरा घण्टों नदी से बात करता है

कभी जो तीरगी मन को हमारे घेर लेती है
तो उठ के हौसला तब रौशनी से बात करता है

नसीहत देर तक देती है माँ उसको ज़माने की
कोई बच्चा कभी जो अजनबी से बात करता है

मैं कोशिश तो बहुत करता हूँ उसको जान लूँ लेकिन
वो मिलने पर बड़ी कारीगरी से बात करता है

शरारत देखती है शक्ल बचपन की उदासी से
ये बचपन जब कभी संजीदगी से बात करता है


(चार)


सबको चुभती रही मेरी आवारगी
मुझमें सबसे भली मेरी आवारगी

रंग सारे सजाकर विधाता ने तब
रफ़्ता-रफ़्ता रची मेरी आवारगी

वक़्त ने यूँ तो मुझसे बहुत कुछ लिया
जाने क्यों छोड़ दी मेरी आवारगी

ज़ुल्मतें-जु़ल्मतं हर तरफ ज़ुल्मतें
चाँदनी-चाँदनी मेरी आवारगी

ज़िन्दगी की डगर में जो काँटे चुभे
बन गई मखमली मेरी आवारगी

हादसों ने कसर कोई छोड़ी नहीं
मेरी रहबर बनी मेरी आवारगी

धूप में, धुन्ध में, तेज बरसात में
कब थमी, कब रुकी मेरी आवारगी


(पांच) 


कोई राजा नहीं, कोई रानी नहीं
ये कहानी भी कोई कहानी नहीं

आम जनता के सपनों का मक़तल है ये
दोस्तो ये कोई राजधानी नहीं

ये जो ख़ैरात है इसको रह ने ही दो
हमको हक़ चाहिए मेहरबानी नहीं

अश्क हों आह हों जिसमें मज़लूम की
ऐसी दौलत हमें तो कमानी नहीं

कंकरीटों की फसलें उगीं चारसू
रंग धरती का पहले सा धानी नहीं

जिनमें हो न ज़रा भी जिगर का लहू
ऐसे  शेरों के कोई भी मानी नहीं

एक बेदम नदी पूछती है मुझे
तेरी आँखों में क्यूँ आज पानी नहीं

डूबना लाज़मी था तेरी नाव का
बात पतवार की तूने मानी नहीं


(छह) 


ये सारा आलम महक रहा है, चला ये किसके हुनर का जादू
कि रफ़्ता-रफ़्ता शबाब पर है, किसी की खिलती उमर का जादू

मैं कौन हूँ, कुछ पता नहीं है, कि होश  मेरे उड़े हुए हैं
चलाया किसने ये मुस्कुराकर यूँ अपनी तिरछी नज़र का जादू

धरा जले है, गगन जले है, सुलग रहा है समूचा आलम
कि ऐसे में भी बिखर रहा है ये खूब इक गुलमुहर का जादू

ये मन में हलचल-सी हो रही है, खनक रहे हैं किसी के कंगन
नशे में मुझको डुबोता जाये वो कँपकँपाते अधर का जादू

अशोक अंजुम 

संपादक : अभिनव प्रयास ( त्रेमासिक )
स्ट्रीट २, चन्द्र विहार कॉलोनी (नगला डालचंद),
क्वार्सी बाई पास,अलीगढ 202001 (उ -प्र.)
मो. ०९२५८७७९७४४,०९३५८२१८९०७




अशोक ‘अंजुम’

(अशोक कुमार शर्मा)


  • पिताजी - श्री जगदीश प्रसाद शर्मा माताजी - श्रीमती रामवती
  • जन्मदिन- 15 दिसम्बर 1966 (माँ ने बताया), 
  • 25 सितम्बर 1966 (काग़ज़ों पर)
  • काग़ज़ी शिक्षा - बी.एससी.,एम.ए.(अर्थशास्त्र, हिन्दी),बी.एड.
  • लेखन-विधाएँ - मुख्यतया गज़ल, दोहा, गीत, हास्य-व्यंग्य,साथ ही लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, लेख, समीक्षा, भूमिका, साक्षात्कार, नाटक आदि
  • प्रकाशित पुस्तके-
  • 1. भानुमति का पिटारा (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 2.खुल्लम खुल्ला (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 3.मेरी प्रिय ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत /4.मुस्कानें हैं ऊपर-ऊपर (ग़ज़ल संग्रह) पुरस्कृत / 5.दुग्गी, चैके, छक्के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) / 6.अशोक अंजुम की प्रतिनिधि ग़ज़लें /7.तुम्हारे लिए ग़ज़ल (ग़ज़ल संग्रह) / 8.एक नदी प्यासी (गीत संग्रह) पुरस्कृत/ 9. जाल के अन्दर जाल मियाँ (व्यंग्य ग़ज़लें) पुरस्कृत/10. क्या करें कन्ट्रोल नहीं होता (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /11 . प्रिया तुम्हारा गाँव (दोहा-संग्रह) पुरस्कृत/ 12. यमराज आॅन अर्थ (नाटक संग्रह)/13. पढ़ना है (नाटक )/14. चम्बल में सत्संग(दोहा-संग्रह)/ 15.यूँ ही...(ग़ज़ल संग्रह) 
  • सम्पादित पुस्तकें:-
  • 1.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /2.अंजुरी भर ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/3.हास्य-व्यंग्य में डूबे, 136 अजूबे (हास्य-व्यंग्य कविताएँ)/4. हास्य भी, व्यंग्य भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /5. ग़ज़ल से ग़ज़ल तक (ग़ज़ल संग्रह) /6. रंगारंग हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य)/7. आह भी वाह भी (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /8. लोकप्रिय हास्य-व्यंग्य कविताएँ (हास्य-व्यंग्य कविता संक.) /9. लोकप्रिय हिन्दी ग़ज़लें (ग़ज़ल संकलन)/10. दोहे समकालीन (दोहा संकलन) /11. रंगारंग दोहे (दोहा संकलन) /12. दोहा दशक (दोहा संकलन) /13. दोहा दशक-2(दोहा संकलन) /14. दोहा दशक-3 (दोहा संकलन)/15. हँसता खिलखिलाता हास्य कवि सम्मेलन (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /16. व्यंग्य भरे कटाक्ष (व्यंग्य लघुकथाएँ) /17. हँसो बत्तीसी फाड़ के (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /18. नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकार (ग़ज़ल संकलन) /19. हँसी के रंग कवियों के संग (हास्य-व्यंग्य कविताएँ) /20.ग़ज़लें रंगबिरंगी (हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल संग्रह) /21. व्यंग्य कथाओं का संसार (व्यंग्य लघुकथाएँ) /22. नीरज के प्रेम गीत (गीत संग्रह) /23. नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार (दोहा संकलन) /24.श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य गीत (गीत संकलन) /25. हास्य एवं व्यंग्य ग़ज़लें (हास्य व्यंग्य ग़ज़ल संकलन)/26.नए युग के बीरबल (व्यंग्य लघुकथाएँ)/27. हास्य कवि दंगल (हास्य व्यंग्य कविताएँ)/28. हिंदी के लोकप्रिय ग़ज़लकार (पद्मभूषण नीरज के साथ संपादित)/ 29.नए दौर की ग़ज़लें (ग़ज़ल संग्रह)/30.आनन्द आ गया (आनन्द गौतम की व्यंग्य कविताओं का संपादन)/31.आधुनिक कवयित्रियाँ (काव्य संकलन)/32.आधुनिक लोकप्रिय दोहाकार (दोहा संकलन) /33. शेर ग़ज़ब के ( अश्आर संकलन)
  • अशोक अंजुम: व्यक्ति एवं अभिव्यक्ति ( श्री जितेन्द्र जौहर द्वारा संपादित ) 
  • सम्पादक - अभिनव प्रयास (कविता को समर्पित त्रैमा.) 
  • सलाहकार सम्पादक- हमारी धरती (पर्यावरण द्वैमासिक)
  • अतिथि संपा -1. प्रताप शोभा (त्रैमा.) (सुल्तानपुर) का दोहा विशेषाक/ 2. खिलखिलाहट (अनि.) (सुतानपुर) का हास्य-व्यंग्य ग़ज़ल विषेशांक/ 3.सरस्वती सुमन (त्रैमा0) देहरादून का दोहा विशेषांक/ 4. हमारी धरती (द्वै0मा0) के दो जल विशेषांक तथा एक प्राकृतिक आपदा विशेषांक का अतिथि संपादन
  • अध्यक्ष-दृष्टि नाट्य मंच , अलीगढ़ / सचिव - संवेदना साहित्य मंच, अलीगढ़/पूर्व सचिव- हरीतिमा पर्यावरण सुरक्षा मंच, अलीगढ़/ सदस्य- बोर्ड आॅफ एडवाइजर्स-1999(अमेरिकन बायोग्राफिक्स इंस्टी. अमेरिका) 
  • सम्मानोपधियाँ- विशिष्ट नागरिक, राष्ट्र भाषा गौरव, हास्य-व्यंग्य अवतार, श्रेष्ठ कवि, लेखकश्री, काव्यश्री, साहित्यश्री, समाज रत्न, हास्यावतार, मेन आफ द इयर, साहित्य शिरोमणि......आदि दर्जनों सम्मानोपाधियाँ 
  • पंकज उधास (चर्चित गायक), श्री साहब सिंह वर्मा (तत्कालीन मुख्यमंत्री ),ज्ञानी जैलसिंह (भू.पू.राष्ट्र पति) श्री मुलायम सिंह यादव (त.मुख्यमंत्री, उ.प्र.), सांसद शीला गौतम (अलीगढ़),श्री आई.एस.पर्सवाल (महाप्रबंधक एन.टी.पी.सी. दादरी), श्री कन्हैयालाल सर्राफ(चर्चित उद्योगपति, मुम्बई), महामहिम के.एम.सेठ.(राज्यपाल छ.ग.),श्री रवेन्द्र पाठक (महापौर,कानपुर ) लेफ्टि.कर्नल श्री एस.एन.सिन्हा (पूर्व राज्यपाल असाम, जम्मू-कश्मीर) श्री टी. वेंकटेश ( कमिश्नर , अलीगढ ) इत्यादि गणमान्य हस्तियों द्वारा विशिष्ट समारोहों में सम्मानित।
  • पुरस्कार-श्रीमती मुलादेवी काव्य-पुरस्कार (भारत भारती साहित्य संस्थान) द्वारा ‘मेरी प्रिय ग़ज़लें’ पुस्तक पर 1995/- स्व. रुदौलवी पुरस्कार (मित्र संगम पत्रिका, दिल्ली) /-दुश्यंत कुमार स्मृति सम्मान-1999 (युवा साहित्य मंडल, गाज़ियाबाद )-सरस्वती अरोड़ा स्मृति काव्य पुरस्कार-2000 (भारत-एषिआई साहित्य अका., दिल्ली )/- डाॅ0 परमेश्वर गोयल व्यंग्य षिखर सम्मान-2001 ( अखिल भारतीय साहित्य कला मंच , मुरादाबाद )/-रज़ा हैदरी ग़ज़ल सम्मान-2005 ( सृजनमंच, रायपुर (छ.ग.)/- साहित्यश्री पुरस्कार-2009, डाॅ.राकेशगुप्त, ग्रन्थायन प्रकाशन, अलीगढ़/- स्व. प्रभात शंकर स्मृति सम्मान-2010, नमन प्रकाशन तथा माध्यम संस्था, लखनऊ/- विशाल सहाय स्मृति सम्मान-2010, मानस संगम, कानपुर/- मालती देवी-विलसन प्रसाद सम्मान-2010,अतरौली /.फणीश्वरनाथ रेएाु स्मृति सम्मान-2011, वाग्वैचित्र्य मंच,अररिया (बिहार)से ‘जाल के अन्दर जाल मियाँ’ पुस्तक पर/- राष्ट्रधर्म गौरव सम्मान -2012, राष्ट्रधर्म प्रकाशन, लखनऊ,‘प्रिया तुम्हारा गाँव’ पुस्तक पर/-सेवक स्मृति सम्मान-2012, साहित्यिक संघ, वाराणसी /-हिन्दी सेवी सम्मान-2013, हिन्दी साहित्य विकास परिषद्, धनबाद (झारखण्ड)/- दुश्यंत स्मृति सम्मान-2013 एअन्तर्राष्ट्रीय साहित्य कला मंच, मेरठ/स्व.सरस्वती सिंह हिन्दी विभूति सम्मान-2013,कादम्बरी, जबलपुर/नीरज पुरस्कार-2014ए (1 लाख 1 हज़ार रुपए) अलीगढ़ कृषि प्रदार्शनी द्वारा
  • अन्य. अलीगढ़ एंथम के रचयिता - अनेक गायकों द्वारा ग़ज़ल, गीत गायन/विभिन्न नाटकों में अभिनय व गीत तथा स्क्रिप्ट लेखन/कवि सम्मेलनों में हास्य-व्यंग्य तथा गीत, ग़ज़ल, दोहों के लिए चर्चित / संयोजन व संचालन भी/- दूरदर्षन के राष्ट्रीय प्रसारण के साथ ही सब टी.वी,एन.डी टी.वी, ई.टी.वी, लाइव इण्डिया,तरंग चैनल आदि अनेक चैनल्स के साथ ही आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से प्रसारण/ ई.टी.वी के एक लोकप्रिय हास्य कार्यक्रम में जज/ अनेक षोध ग्रन्थों में प्रमुखता से उल्लेख/सैकड़ों समवेत संकलनों में तथा देष की अधिकांष चर्चित पत्रिकाओं व समाचार पत्रों में सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित/विभिन्न रेखांकन पुस्तकों व पत्रिकाओं के आवरण पर प्रकाशित
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बुधवार, 6 अगस्त 2014

महेंद्र भटनागर के गीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार














गाओ कि जीवन..

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गाओ कि जीवन - गीत बन जाये !
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हर क़दम पर  आदमी  मजबूर है,
हर  रुपहला  प्यार-सपना  चूर है,
आँसुओं के सिन्धु में   डूबा  हुआ
आस-सूरज   दूर,  बेहद  दूर है !
                   गाओ कि कण-कण मीत बन जाये !
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हर तरफ़  छाया अँधेरा  है  घना,
हर हृदय हत,  वेदना  से है सना,
संकटों का  मूक  साया  उम्र भर
क्या रहेगा  शीश पर  यों ही बना ?
                   गाओ,  पराजय - जीत बन जाये !
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साँस पर  छायी विवशता  की घुटन,
जल रही है  ज़िन्दगी भर कर जलन,
विष भरे   घन-रज कणों से है भरा
आदमी की   चाहनाओं   का गगन,
                   गाओ कि दुख - संगीत बन जाये !


मोह-माया..

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सोनचंपा-सी तुम्हारी याद  साँसों में  समायी है !
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          हो किधर तुम मल्लिका-सी रम्य तन्वंगी,
          रे कहाँ अब  झलमलाता रूप  सतरंगी,
मधुमती-मद-सी तुम्हारी मोहिनी रमनीय छायी है !
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          मानवी प्रति कल्पना की कल्प-लतिका बन,
          कर गयीं जीवन जवा-कुसुमों  भरा उपवन,
खो सभी, बस, मौन मन-मंदाकिनी हमने बहायी है !
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          हो किधर तुम , सत्य मेरी मोह-माया री,
          प्राण की आसावरी,  सुख धूप-छाया  री,
राह जीवन की  तुम्हारी चित्रसारी  से सजायी  है !



रात बीती..

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याद रह-रह आ रही है,
रात  बीती जा रही है !
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ज़िन्दगी के आज इस  सुनसान में
जागता हूँ   मैं   तुम्हारे ध्यान में
          सृष्टि सारी सो गयी है,
          भूमि लोरी गा रही है !
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झूमते हैं चित्र  नयनों में  कयी
गत तुम्हारी बात हर लगती नयी
          आज तो गुज़रे दिनों की
          बेरुख़ी भी  भा रही  है !
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बह रहे हैं हम  समय की धार में,
प्राण ! रखना, पर भरोसा प्यार में,
          कल खिलेगी उर-लता जो
          किस  क़दर मुरझा रही है !
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भोर होती है..

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और अब आँसू बहाओ मत
                   भोर होती है !
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दीप सारे  बुझ  गये
                   आया  प्रभंजन,
सब सहारे  ढह गये
                   बरसा प्रलय-घन,
हार, पंथी ! लड़खड़ाओ मत
                    भोर होती है !
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बह रही बेबस  उमड़
                   धारा विपथगा,
घोर अँधियारी  घिरी
                   स्वच्छंद  प्रमदा,
आस सूरज की मिटाओ मत
                   भोर होती है !



कौन हो तुम..

                                                                                 
कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत,
आधी अँधेरी रात में ?
.
उड़ रहे हैं घन तिमिर के
सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक,
मूक इस  वातावरण को
देखते  नभ के सितारे एकटक,
कौन हो तुम, जागतीं जो इन सितारों के घने संघात में ?
.
जल रहा यह दीप किसका
ज्योति अभिनव ले कुटी के द्वार पर,
पंथ पर  आलोक  अपना
दूर तक बिखरा रहा विस्तार भर,
कौन है यह दीप,जलता जो अकेला,तीव्र गतिमय वात में ?
.
कर रहा है आज कोई
बार-बार प्रहार मन की बीन पर,
स्नेह काले लोचनों से
युग-कपोलों पर रहा रह-रह बिखर,
कौन-सी ऐसी व्यथा है, रात में जगते हुए जलजात में ?
.


यह न समझो..


यह न समझो कूल मुझको मिल गया
आज भी जीवन-सरित मँझधार में हूँ !
.
          प्यार मुझको धार से
          धार के  हर वार से
          प्यार है  बजते  हुए
          हर लहर के तार से,
यह न समझो घर सुरक्षित मिल गया
आज भी  उघरे हुए  संसार में  हूँ !
.
          प्यार भूले  गान से
          प्यार हत अरमान से
          ज़िन्दगी में हर क़दम
          हर  नये  तूफ़ान से,
यह न समझो इंद्र - उपवन मिल गया
आज भी  वीरान में, पतझार  में हूँ !
.
          खोजता हूँ नव-किरन
          रुपहला जगमग गगन,
          चाहता  हूँ   देखना  
          एक प्यारा-सा  सपन,
यह न समझो चाँद मुझको मिल गया
आज भी चारों तरफ़ अँधियार में हूँ !



जिजीविषा


जी रहा है  आदमी
प्यार ही की चाह में !
.
पास उसके गिर रही हैं बिजलियाँ,
घोर गह-गह कर घहरती आँधियाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          सो रहा है  आदमी
          कल्पना की छाँह में !
.
पर्वतों की सामने ऊँचाइयाँ,
खाइयों की घूमती गहराइयाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          चल रहा है  आदमी
          साथ पाने  राह में !
.
बज रही हैं मौत की शहनाइयाँ,
कूकती  वीरान हैं  अमराइयाँ,
          पर, अजब विश्वास ले
          हँस  रहा है  आदमी
          आँसुओं में, आह में !


महेंद्रभटनागर


Retd. Professor
110, BalwantNagar, Gandhi Road,GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA
M - 81 097 30048
Ph.-0751- 4092908
E-Mail : drmahendra02@gmail.com




शनिवार, 2 अगस्त 2014

आह्वान/ जितेन्द्र 'जौहर'



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार





आह्वान


ऐ रात की स्याही,
आ...
आ कि तुझे अपनी लेखनी की
रौशनाई बनाकर
उकेर दूँ कुछ शब्द-चित्र
मुहब्बत के कैनवस पर!

आ...
कि प्रेम की चाँदनी रात
वैधव्य का श्वेताम्बर ओढ़कर
'स्याह सुदर्शन' जीवन का
श्रृंगार करना चाहती है!

आ...
कि हठधर्मी पीड़ा
घुटने मोड़कर बैठ गयी है
एक अलिखित प्रेमपत्र की
इबारत बनने को!

आ...
कि शब्द का 'बैजू'
बाबरा हुआ जाता है-
अपनी मुहब्बत के
निर्मम हश्र से उपजे
आँसुओं की सौग़ात पर!

आ...
कि बेरहम मौसम के कहर से
अनुभूतियाँ कराह उठी हैं...!

आ...
कि धुँधुँआकर
सुलगता अन्तर्मन
अदम्य विकलता को
'शब्द-ब्रह्म' की
शरण देने को आतुर है!


कि प्रेम-देवी की आराधना में थके
आरती के आर्त स्वर
काग़ज़ पर उतरकर
कुछ पल को
विश्राम करना चाहते हैं!

आ...
ऐ रात की स्याही,
आ, तरल होकर...
कि तुझे अमरत्व का
दान देना है
असह्य वेदना को
अमरता का
वरदान देना है!

जितेन्द्र 'जौहर'

आई आर- 13/3, रेणुसागर,
सोनभद्र (उप्र)-231218.
मोबाइल-9450320472