सोमवार, 28 जुलाई 2014

आज का शिल्पकार व अन्य कविताएं-सुशीला शिवराण


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


आज का शिल्पकार


आज का शिल्पकार
जानता है बेचने का हुनर
गुणवत्ता को घटा
लगाता है फ़िनिशिंग में
पैकिंग में रक़म
आवरण का चटक सौन्दर्य
खींच लेता है दृष्‍टि को
आँखों का लोभ
चौंधिया देता है विवेक को !



शिल्प का पुजारी
उम्रभर साधनारत
गढ़ता है एक से एक मूरत
अद्‍भुत भंगिमाएँ
मोहक वक्र
नैसर्गिक सौंदर्य
सादगी से भरपूर
उसकी साधना
उसकी कला
नहीं बन पाई
किसी की नज़र का नूर
पड़ी ही नहीं
किसी की नज़र|

बिकती रही तड़क-भड़क
ठेलती रही सादगी को
मूक खड़ा रहा शिल्पी
मज़बूती से थामे अना को ।



कब आओगे मेरे पावस?


तुम्हारे प्रेम ने
पुरवा बन
जब-जब छुआ मुझे
झंकृत हुए मन के तार
झूम उठा अंग-प्रत्यंग
गा उठा मन
प्रीत के गीत  ।

तुम्हारे प्रेम ने
पावस बन
जब-जब भिगोया मुझे
जी उठी मैं
ज्यों तपती रेत
हो जाती है तृप्त
रिमझम बारिश में
आनंद से विभोर
हुलस उठा मन
नाचा बन मोर।

तुम्हारा प्रेम
मानता है सब नियम
नहीं रहता स्थायी
बदलता है प्रकृति-सा
हो जाता है पतझर
झर जाते हैं अहसास
जड़ हो जाते हैं
मन-आत्मा।

नहीं पोसता तुम्हारा प्रेम
हो जाती हूँ ठूँठ
सहती हूँ मौसम की मार
निर्विकार
दग्ध अंतस लिए
खड़ी हूँ उन्मन
थिर आँधियों में
चिर-प्रतीक्षा में
कब आओगे मेरे पावस?



टूटे सपने 


कुछ टूटे हुए सपने
मन के तहख़ाने में
रख दिए हैं महफ़ूज़
गाहे-ब-गाहे
चली जाती हूँ सँभालने
सहलाती हूँ
छाती से लगाती हूँ
सील गए हैं मेरे सपने
उनकी सीलन
दिमाग की नस-नस में फैलने लगी है
घुट रहे हैं मेरे सपने
जिनकी घुटन से
घुटने लगा है मेरा दम
और मैं घबराकर
तहख़ाने से भाग आती हूँ
खुली हवा, धूप में
और पुकारती हूँ तुम्हें
कब करोगे आज़ाद
सीलन भरे तहख़ाने से
दम तोड़ते हुए मेरे सपनों को
कब दोगे इन्हें
इनके हिस्से की धूप
मुझे ज़िंदगी ।


प्रेम


अनजानी राहों से
दरिया, पर्वतों को लांघ
चला ही आया
तुम्हारा प्रेम।

चुपके-से अँधेरे को चीर
नींद से कर वफ़ा के वादे
आ बैठा सिरहाने
सहलाता रहा केश
चूम ही लिया
मुँदी पलकों को
बिखरी अलकों में
उलझ गए तुम्हारे नयन।

होठों की जुंबिश
बुलाती रही तुम्हें
और तुम
निहारते ही रहे
मेरे चेहरे के दर्पण में
अपनी ही छवि !

सुशीला शिवराण


बदरीनाथ – 813
जलवायु टॉवर्स सेक्‍टर-५६
गुड़गाँव – 122011
दूरभाष – 09873172784
email – sushilashivran@gmail.com




श्रीकांत वर्मा की कविताएँ


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

हस्तिनापुर का रिवाज


मै फिर कहता हूं
धर्म नहीं रहेगा तो कुछ नहीं रहेगा
मगर मेरी कोई नहीं सुनता
हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियो! होशियार
हस्तिनापुर में/तुम्हारा
एक शत्रु पल रहा है विचार
और याद रक्खो
आजकल महामारी की तरह फैल जाता है
विचार


प्रजापति


इस भयानक समय
में कैसे लिखूं
और कैसे नहीं लिखूं?
सैकड़ों वर्षों से सुनता आ रहा हूं
घृणा नहीं प्रेम करो-
किससे करूं प्रेम?
मेरे चारों ओर हत्यारे हैं
मुकुटहीन
इस नग्न शरीर पर
मुकुट प्रतिष्ठा का
यदि कभी नहीं आया
तो कारण है
यह किसी
शक्ति कुल के सिक्कों पर
बिका नहीं।
युद्धनायक
यूरोप
बडबडा रहा है बुखार में
अमेरिका
पूरी तरह भटक चुका है
अंधकार में
एशिया पर
बोझ है गोरे इंसान का
संभव नहीं है
कविता में वह सब कह पाना
जो घटा है बीसवीं शताब्दी में
मनुष्य के साथ
कांपते हैं हाथ
पृथ्वी की एक-एक सड़क पर
भाग रहा है मनुष्य
युद्ध पीछा कर रहा है

बुधवार, 23 जुलाई 2014

मुकम्मल घर व अन्य कविताएं- डॉ सुधा उपाध्याय

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार

















            

मुकम्मल घर


                बहुत सी उम्मीदों का असबाब बांधकर ,
                अम्मा मैंने एक घर बनाया है ...........
                रहूंगी मैं वहां तुम्हारे साथ ,
                रहेगी मेरी बिटिया वहीं मेरे साथ
                घर के बाहर लगी होगी तख्ती तुम्हारी नातिन की
                अम्मा मैंने एक घर सजाया है ..............
                सजेगी फर्श तुम्हारी निश्छल मुस्कराहट से
                रंगेगी हर दीवार हमारे कहकहों से
                लगाउंगी घर के कोनों में बड़ा सा आइना
                जहाँ दिखेंगे हमें हमारे पुरुष
                अम्मा मैंने एक घर बसाया है ...........
                आसमान की अलगनी पर सुखाउंगी तुम्हारी धोती
                अपनी सलवार कमीज़ और बिटिया की शर्ट पैंट
                आँगन में बिराजेंगे तुम्हारे शालिग्राम भगवान्
                रंसोयी में महकेगा सालन तुम्हारे हाँथ का
                छत पर सुखायेंगे हम अपने अपने आंसू
                बस तुम लौट आवो अम्मा ,...
                हम भी बना सकती हैं
                सजा सकती हैं
                बसा सकती हैं
                एक मुकम्मल घर
                       

             बुरा हुआ,...जो,...सो हुआ


                अब इस से बुरा और क्या होगा ???
                कि नन्हीं चिर्रैया अपने ही रंग रूप से
                है इन दिनों परेशान
                अपने हर हाव भाव पर ,
                फुदक चहक पर हो रही है सावधान
                उसने ,खुदने अपने दाने चुगने ,
                आँगन आँगन ,फुर्र फुर्र
                उड़ने पर लगा ली है पाबंदी
                समेट ली है अपनी हर मोहक अदा.....
                बेपरवाह पंखों को समेट
                उड़ जाना चाहती है नन्हीं चिर्रैया....
                तिनके तिनके जोड़ कर
                नहीं बसना चाहती कोई घोंसला
                आंधी तूफ़ान ,तेज़ बारिश से भी
                ज्यादा डरने लगी है
                उन बहेलियों से जो पुचकार कर दाना खिलते हैं
                रंग बिरंगी बर्ड हाउस तंग देते हैं रेलिंगों पर
                वहां कोई आशियाना नहीं बसना चाहती
                नन्हीं चिर्रैया
                फुसलाने ,बहलाने के सम्मोहन से
               आज़ाद होना चाहती है नन्हीं चिर्रैया
                डरने लगी है बेहिसाब अपने ही रंग रूप
                घाव भाव फुदक चहक...
                हर अदा पर अब नन्हीं चिर्रैया ...
                     

             

             आखिर कब


                एक ही सपना देखती हूँ आजकल
                मैं एक नन्हे बच्चे में तब्दील हो चुकी हूँ
                हाँथ में कूची और रंग लिए
                हंस हंस कर मैंने नीले नीले
                पहाड़ रंग डाले
                आकाश पर समुद्र और धरती पर
                सूरज उतार लायी

                सारे पंछी ज़मीन पर रेंगने लगे
                हांथी घोड़े ऊंट उड़ने लगे
                चंदा मामा नदी में नहा रहे थे
                सूरज चाचू कपडे धोने लगे
                आकाश में हरी हरी दूब उग आई
                वहां रेत थी, ईंटें भी, झोपड़ियाँ भी
                बहुत उड़ने वालों को अपनी औकात समझ में आरही थी
                सारे बच्चों की गेंदें आकाश में उछाल रही थीं
                चलो मैदान ना सही आकाश तो था खेलने की खातिर
                पर नींद यहीं आकर खुल जाती है ....
                आखिर कब सपना पूरा होगा?.....

  .

क्या आप जानते हैं ?


पिंजरा भर देता है मन में अनंत आकाश ,
हर बंधन से मु क्ति की छट पटा हट
जड़ता और रिवायतों से विरोध भाव ,
समस्त सुकुमार कोमल समझौतों के प्रति घृणा
यह तो पिंजरे में बंद चिरिया से पूछो ,
क्यूंकि वही जानती है आज़ादी के सही मायने
वो तरस खाती है उस आज़ाद चिरिया पर
जो कोमल घास पर फुदक फुदक कर
छोटे छोटे कीड़े मकौडों को आहार बनाती है
आज़ादी के सच्चे अर्थ नही जानती
और लम्बी तान गाती है ,
अपने में मशगूल
अपना आस पास भुला  देती है
उसके गीत में राग अधिक है वेदना कम
वह अपनी मोहक आवाज़ से
मूल मंत्र भी बिसरा देती है
यहाँ पिंजरे में बंद चिरिया की तान
दूर दूर चट्टानी पहाड़ों को भी
दरका सकती है
उसके गीत में दर्द से बढ़कर कुछ है
जिसे समझ सकती है
केवल पिंजरे की चिरिया...


अम्मा


मेरी हर वो जिद नाकाम ही रही
जो तुम्हारे बिना सोने जागने उगने डूबने
बुनने बनाने बड़े होने या....  
सब कुछ हो जाने की थी
अब जैसे के तुम नहीं हो कहीं नहीं हो
कुछ नहीं हो पाता तुम्हारे बगैर
नींदों में सपनो का आना जाना
जागते हुए नयी आफत को न्योता देना
चुनौतियों को ललकारना
अब मुनासिब नहीं .


सहेज कर रखा है..


मैंने आज भी सहेज कर रखा है
वह सबकुछ जो अम्मा ने थमाई थी
घर छोड़ कर आते हुए
तुम्हारे लिए अगाध विश्वास
सच्ची चाहत ,धुले पूछे विचार
संवेदनशील गीत ,कोयल की कुहुक
बुलबुलों की उड़ान ,ताज़े फूलों की महक
तितली के रंग ,इतर की शीशी
कुछ कढाई वाले रुमाल
सोचती हूँ हवाई उड़ान भरते भरते
जब तुम थक जाओगे
मैं इसी खुरदुरी ज़मीन पर तुम्हे फिर मिल जाउंगी
जहाँ हम घंटों पसरे रहते थे मन गीला किये हुए
वे सब धरोहर दे दूँगी ख़ुशी से वे तुम्हारे ही थे
अक्षत तुम्हारे ही रहेंगे ....

डॉ सुधा उपाध्याय

बी-3, स्टाफ क्वार्टर्स,
जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज (दि.वि.वि),
सर गंगाराम अस्पताल मार्ग,
ओल्ड राजेंद्र नगर,
नई दिल्ली-110060
फोन # 9971816506


रविवार, 20 जुलाई 2014

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा की रचनाएँ..


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


ताँका कविताएँ..


 (एक)

निशा ने कहा
भोर द्वारे सजाए
निराशा नहीं
तारक आशा के हैं
चाँद आये न आए ।

(दो) 

सूरज कहे
ऐसा कर दिखाओ
व्याकुल -मना
वीथियाँ हों व्यथित
कभी तुम ना आओ ।

(तीन) 

कविता मेरी
बस तेरा वन्दन
तप्त पन्थ हों
तप्त पथिक मन
सुखदायी चन्दन |

(चार) 

मैं मृण्मयी हूँ
नेह से गूँथ कर
तुमने रचा
अपना या पराया
अब क्या मेरा बचा |

(पांच) 

तुम भी जानो
ईर्ष्या विष की ज्वाला
फिर क्यूँ भला
नफ़रत को पाला
प्यार को न सँभाला |

(छह) 

चाहें न चाहें
हम कहें न कहें
नियति -नटी
बस यूँ ही नचाए
रंग सारे दिखाए ।



सेदोका कविताएँ ...


(एक)

उड़ो परिंदे !
पा लो ऊँचे शिखर
छू लो चाँद -सितारे,
अर्ज़ हमारी-
इतना याद रहे
बस मर्याद रहे !

(दो) 

जो तुम दोगे
वही मैं लौटाऊँगी
रो दूँगी या गाऊँगी ,
तुम्हीं कहो न
बिन रस ,गागर
कैसे छलकाऊँगी ?

(तीन) 

सज़ा दी मुझे
मेरा क्या था गुनाह
फिर मुझसे कहा
अरी कविता
गीत आशा के ही गा
तू भरना न आह !

(चार) 

आई जो भोर
बुझा दिए नभ ने
तारों के सारे दिए
संचित स्नेह
लुटाया धरा पर
किरणों से छूकर।

(पांच) 

मन -देहरी
आहट सी होती है
देखूँ, कौन बोलें हैं ?
आए हैं भाव
संग लिये कविता
मैंनें द्वार खोले हैं ।

(छह)

अकेली चली
हवा मन उदास
कितनी दुखी हुई
साथी जो बने
चन्दन औ' सुमन
सुगंध सखी हुई ।

(सात) 

मन से छुआ
अहसास से जाना
यूँ मैंने पहचाना
मिलोगे कभी
इसी आस जीकर
मुझको मिट जाना ।

(आठ)

बूँद-बूँद को
समेट कर देखा
सागर मिल गया
मैं सींच कर
खिला रही कलियाँ
चमन खिल गया।

(नौ)

जीवन-रथ
विश्वास प्यार संग
चलते दो पहिये
समय -पथ
है सुगम ,दुखों की
बात ही क्या कहिए।

(दस)

मेरे मोहना
उस पार ले चल
चलूँगी सँभलके
दे  ज्ञान दृष्टि
मिटे अज्ञान सारा
ऐसे मुझे मोह ना ।

कुण्डलियाँ 


दिन ने खोले नयन जब ,बड़ा विकट था हाल ,
पवन,पुष्प,तरु ,ताल ,भू ,सबके सब बेहाल |
सबके सब बेहाल ,कुपित कुछ लगते ज्यादा ,
ले आँखों अंगार , खड़े थे सूरज दादा |

घोल रहा विष कौन .गरज कर जब वह बोले ,
लज्जित मन हैं मौन , नयन जब दिन ने खोले || (एक)
                                                                                     

नन्हीं बूँदें नाचतीं , ले हाथों में हाथ ,                              
पुलकित है कितनी धरा ,मेघ सजन के साथ |
मेघ सजन के साथ ,सरस हैं सभी दिशाएँ ,                              
पवन पत्तियों संग , मगन मन मंगल गाएँ |
अब अँगना के फूल , ठुमक कर नाचें कूदें ,
भिगो गईं मन आज , धरा संग नन्हीं बूँदें ||

जीवन में उत्साह से, सदा रहे भरपूर .
निर्मलता मन में रहे ,रहें कलुष से दूर . (दो)

डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा 

एच -604 , प्रमुख हिल्स ,छरवाडा रोड
वापी ,जिला - वलसाड
गुजरात (भारत )
पिन - 396191
ईमेल:jyotsna.asharma@yahoo.co.in
sharmajyotsna766@gmail.com





गुरुवार, 17 जुलाई 2014

वीनस केसरी की पांच ग़ज़लें

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


 (एक)


 इन्तिहा-ए-ज़ुल्म ये है, इन्तिहा कोई नहीं!
घुट गई है हर सदा या बोलता कोई नहीं ?

बाद-ए- मुद्दत आइना देखा तो उसमें मैं न था,
जो दिखा, बोला वो मुझसे मैं तेरा कोई नहीं |

हर कोई अच्छे दिनों के ख़ाब में डूबा तो है,
पर बुरे दिन के मुक़ाबिल ख़ुद खड़ा कोई नहीं |

हम अगर चुप हैं तो हम भी बुज़दिलों में हैं शुमार,
हम अगर बोलें तो हम सा बेहया कोई नहीं |

बरगला रक्खा है हमने खुद को उस सच्चाई से,
अस्ल में दुनिया का जिससे वास्ता कोई नहीं

अपनी बाबत क्या है उनकी राय, फरमाते हैं जो,
राहजन चारों तरफ हैं रहनुमा कोई नहीं |


 (दो) 


 पत्थरों में खौफ़ का मंज़र भरे बैठे हैं हम |
आईना हैं, खुद में अब पत्थर भरे बैठे हैं हम |

हम अकेले ही सफ़र में चल पड़ें तो फ़िक्र क्या,
अपनी नज़रों में कई लश्कर भेरे बैठे हैं हम |

जौहरी होने की ख़ुशफ़हमी का ये अंजाम है,
अपनी मुट्ठी में फ़कत पत्थर भरे बैठे हैं हम |

लाडला तो चाहता है जेब में टॉफी मिले,
अपनी सारी जेबों में दफ़्तर भरे बैठे हैं हम |

हमने अपनी शख्सियत बाहर से चमकाई मगर,
इक अँधेरा आज भी अन्दर भरे बैठे हैं हम |


(तीन) 


 उलझनों में गुम हुआ फिरता है दर-दर आइना |
झूठ को लेकिन दिखा सकता है ख़ंजर आइना |

शाम तक खुद को सलामत पा के अब हैरान है,
पत्थरों के शहर में घूमा था दिन भर आइना |

गमज़दा हैं, खौफ़ में हैं, हुस्न की सब देवियाँ,
कौन पागल बाँट आया है ये घर-घर आइना |

आइनों ने खुदकुशी कर ली ये चर्चा आम है,
जब ये जाना था की बन बैठे हैं पत्थर, आइना |

मैंने पल भर झूठ-सच पर तब्सिरा क्या कर दिया,
रख गए हैं लोग मेरे घर के बाहर आइना |

अपना अपना हौसला है, अपना अपना फ़ैसला,
कोई पत्थर बन के खुश है कोई बन कर आइना |


 (चार) 


 अब हो रहे हैं देश में बदलाव व्यापक देखिये
शीशे के घर में लग रहे लोहे के फाटक देखिये

जो ढो चुके हैं इल्म की गठरी, अदब की बोरियां
वह आ रहे हैं मंच पर बन कर विदूषक देखिये

जिनके सहारे जीत ली हारी हुई सब बाजियां
उस सत्य के बदले हुए प्रारूप भ्रामक देखिये

जब आप नें रोका नहीं खुद को पतन की राह पर
तो इस गिरावट के नतीजे भी भयानक देखिये

इक उम्र जो गंदी सियासत से लड़ा, लड़ता रहा
वह पा के गद्दी खुद बना है क्रूर शासक देखिये

किसने कहा था क्या विमोचन के समय, सब याद है
पर खा रही हैं वह किताबें, कब से दीमक देखिये

जनता के सेवक थे जो कल तक, आज राजा हो गए
अब उनकी ताकत देखिये उनके समर्थक देखिये


(पांच) 

छीन लेगा मेरा .गुमान भी क्या
इल्म लेगा ये इम्तेहान भी क्या

ख़ुद से कर देगा बदगुमान भी क्या
कोई ठहरेगा मेह्रबान भी क्या

है मुकद्दर में कुछ उड़ान भी क्या
इस ज़मीं पर है आसमान भी क्या

मेरा लहजा ज़रा सा तल्ख़ जो है
काट ली जायेगी ज़बान भी क्या

धूप से लुट चुके मुसाफ़िर को
लूट लेंगे ये सायबान भी क्या

इस क़दर जीतने की बेचैनी
दाँव पर लग चुकी है जान भी क्या

अब के दावा जो है मुहब्बत का
झूठ ठहरेगा ये बयान भी क्या

मेरी नज़रें तो पर्वतों पर हैं
मुझको ललचायेंगी ढलान भी क्या




बुधवार, 16 जुलाई 2014

पंकज त्रिवेदी की कविताएं

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




मिट्टी और माँ 


घर के आँगन में
गाय है और उसका बछड़ा
बच्चे गाँव के तालाब से
काली मिट्टी ले आये हैं
खिलौने बना रहे हैं है....

मिट्टी की को देखते ही में अंदर
सालों से निस्तेज हुई  गज़ब की चेतना
सतेज होती हैं ...

शायद मेरा पुनर्जन्म देख रहा हूँ मैं
उन्हीं बच्चों में
अपने गाँव के कुम्हार के घर हर शाम को
उसके ही बेटे के साथ मिलकर खेलना
उनके गरीब माता-पिता की थकान की
रेखाओं को आनंद में परिवर्तित करते हुए
उनके ही  बेटे के साथ उस काली मिट्टी में

पानी डालकर अपने पैरों से गोंदना ...

आज बड़ों से सुनता हूँ, खुद सोचता हूँ
मिट्टी और इंसान की फिलसूफी को
क्या फर्क हैं दोनों में....?
शरीर की ईस मिट्टी में क्या हैं?
देह तो नश्वर है, गंदकी से भरा
हाड, मांस और चरम का पिटारा
जिसे खोलते ही दुर्गंध....

तो फिर-
इस शरीर से इतना मोह क्यूं?
सुंदरता और भोग का आनंद क्यूं?

शरीर हैं तो सबकुछ हैं
शरीर सुगंध, अस्तित्त्व और पहचान है
शरीर से मन है,  विचार, व्यवहार और जीवन का आनंद
शरीर भोग है तो आध्यात्म भी हैं

तो शरीर अपवित्र क्यूं हैं?.....

मिट्टी पवित्र है
मिट्टी पार्थेश्वर है, अंतिम विराम है
मिट्टी से आत्मिक लगाव है
और मिट्टी हमारी माँ हैं !
और
माँ से पवित्र ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है !!


मैं देखना चाहता हूँ..


मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारी उन आँखों को
जो तरसती थी मुझे देखने के लिए
और फैलती रहती थी दूर दूर तक से आती हुई
पगदंडी पर...

मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारे कानों को
जो उस पगदंडी से आते हुए मेरे कदमों की
आहट सुनकर खड़े हो जाते थे..........

मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारे उन हाथों को, जिस पर
चूडियाँ आपस में टकराकर भी खनकती हुई
छेड़ती हो प्यार के मधुर संगीत को...
जिस पर हम दोनों कभी गाते थे प्यार के तराने......

मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारे मन को
जो हमेशा सोचता रहता था मेरी खुशियों के लिए
आसपास के लोगों के लिए, दुखियों के लिए

मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारे उस धड़कते हुए ह्रदय को
जो हरपल खुद को छोड़कर भी धड़कता था मेरे लिए
परिवार और बच्चों के लिए.....

मैं
देखना चाहता हूँ उन साँसों को
जो दौड़ी आती हैं अंदर-बाहर
जैसे तुम दौड़ी आती थी मेरे घर आने के
इन्तजार में बावरी होकर.....

मैं
देखना चाहता हूँ तुम्हारे पैरों को
जो उम्र को भी थकाते हुए दौड़ते रहते थे
मेरी हर आवाज़ पर.......

मैं
तुम्हें देखना चाहता हूँ तुम्हें
जिसने कुछ न कहकर भी सबकुछ किया था
खुद के सपनों को दफ़न करते हुए समर्पित करती थी
अपने अरमानों को.......

मैं
तुम्हें देखना चाहता हूँ
ईसी घर में, खानाती चूड़ियों और पायल के साथ
उस मन की सोच और धड़कते दिल के साथ
उन खड़े कानों और फ़ैली हुई आँखों के साथ.....

क्योंकि-
मैं जनता हूँ, तुम अब भी चाहती हो मुझे
मेरी प्रत्येक मर्दाना हरकतों की मर्यादाओं के साथ
मगर मैं कुछ नहीं कर सकता दूर से तुम्हें चाहकर भी
मर्द हूँ मैं, तुम औरत...

इतना जरूर कहूंगा कि-
मैं तुम्हें अब भी बहुत चाहता हूँ ....!


कैसे छूट पाओगे तुम..?  


रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते हैं
रिश्तों के नाम बदल सकते हैं
छल का नकाब उतर जाता है कभी
तो जीने का मज़ा ही ओर होता है

अपनी भावनाओं से कटुता नहीं होती
मन की बेरुखी से कड़वाहट होती है
दिल तो आखिर दिल है, जो सोचता नहीं
वो खिलता हैं फूलों सा, बहता हैं झरनों सा

कुछ पल होते हैं
अपने नीजीत्व से संवाद करने के
पता नहीं क्यूं बेहाल हो जाते हैं हम !
दायरा बढ़ता है वक्त का, संबंधों का
बात सिर्फ इतनी हैं...

आओ प्यार करें, संवाद करें
कहने को तो बहौत कुछ है मगर
हर पल ऐसे बीत जाता है,
तुम कौन, मैं कौन..?

कैसे काटोगे तुम रिश्ते की जड़ को
जितनी काटोगे, दुगनी चुभेगी तुम्हें
बेचैन दिल धकन से उठती सिसकियाँ
कौन सुनता है भला... !

यह रिश्ता है अजर-अमर, अनमोल
कैसे छूट पाओगे तुम ?

पंकज त्रिवेदी

संपादक - विश्वगाथा (त्रैमासिक हिन्दी साहित्यिक-शैक्षिक पत्रिका)
vishwagatha@gmail.com
(M) 09662514007




शनिवार, 12 जुलाई 2014

मायामृग की कविताएं

                                                                                                           
चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


समन्‍दर की शुभकामनाएं


सीपियों और घोंघों में रख दी
समन्‍दर ने अपनी आवाज
लहरों का शोर अपनी जगह
घूमती दीवारों में गूंजते सन्‍नाटे अपनी जगह...।

तुम्‍हारी कश्‍ती में लगे ढेर में
एक घोंघा अब भी है चुपचाप
तुम बेि‍फकर बढ़े जा रहे हो लहरों पर
समन्‍दर को जीत लेने के दावे करते हुए...।

शौर तुम्‍हारी आवाज में आकर ढूंढ लेता है एक कोना
समन्‍दर की आवाज
तुम्‍हारी आवाज के शोर में घुल जाती है
आवाज को गाढ़ा करती हुई...।
तुम्‍हारे कान कब अभ्‍यस्‍त हो गए
तुम नहीं जान पाआगे...।

दूर किनारे पर, बहकर आया ठहरा वह कटा पेड़
हंसता है
जैसे जैसे तुम पहुंच रहे हो उस पार
उसे पता है तुम भी भूल गए हो रास्‍ता
यूं ही चल दिए उनीदे से, जाने किस धुन में...।

कहा था तुमसे बचना
शोर संक्रामक होता है
एक बार उठाकर लगा लेते एक घोंघे को कान से
आवाज़ों में भी होते हैं रास्‍तों के नक्‍शे...।

लहरों से जूझने की थकान व्‍यर्थ होती
सीपियों की मुस्‍कुराहट पढ़ लेते
उस पार की रेत निहारने से पहले...।

तुम्‍हारा जयघोष बहुत ऊंचा रहे शुभकामनाएं
हां
समन्‍दर तुमसे अब कुछ नहीं कहेगा....
उम्र भर समन्‍दर की आवाज़ ना सुन पाओगे तुम...।

जाओ किनारे तुम्‍हारा इंतजार कर रहे हैं....।


तुम्‍हें ढूंढते हुए


जाने कौनसा गर्व लेकर चला आया
तुम्‍हें ढूंढने...!

जरा सा छू सकता था हवा को
जरा सा ताक सकता था आसमान
पानी की नाप में नहीं नाप सकता था तुम्‍हें
डुबो लेता पैर सांझ ढलते ढलते
जरा सा भिगो लेता हथेलियां...
लहर पर लहर आकर गिरी
मैं भीगा नहीं....।

पेड़ हिलाते रहे हाथ
खोले रहे बाहें,
फुनगियों पर नाचती रही मुस्‍कुराहट
पत्तियां खड़खड़ाती रहीं
सुन ना सका....।

तनी हुई गर्दन का ऐंठना भी
तय ना कर सका ऊंचाई...
पहाड़ की सबसे छोटी चोटी
मुझसे कितनी ऊंची है
इतना सा ही तो जानना था मुझे...।

बस मेरी ही जिद थी
सूरज से आंख मिलाने की
वरना उजाले में दिखता था सब साफ साफ
कुछ था ही नहीं जो छिपाया तुमने
तब किसे ढूंढता रहा...?

जाने कौनसा गर्व लेकर चला आया तुम्‍हें ढूंढने...!

झूठ बोलती स्‍त्री 


बहुत सारे सच जमा होते जाने पर
जरुरी हो जाता है जब उन्‍हें कह देना
तब झूठ बोलती है स्‍त्री....।

झूठ बोलती है स्‍त्री
कि हां सब ठीक है, मां से बात करते हुए
पिता को आश्‍वस्‍त करते हुए
कि उन्‍हें जरुरत नहीं है यहां आने की
कि जैसे उन्‍हें सिर्फ वहीं जाना चाहिए
जहां सब ठीक ना हो...।

झूठ बोलती है
कि उसने तो पहले ही खा लिया था
बनाते बनाते, ये जो कम रहा है शेष
इससे चल जाएगा उसका काम
वैसे भी उसे भूख कम लगती है इन दिनों
तुम संतुष्‍ट होते हो जाते हो झूठ से
क्‍योंकि तुम जानते हो सच...।

रात भर के सफर में
बहुत पीछे छूट गई स्‍त्री
आवाज देने के लिए तलाशती रही अपनी आवाज
सुबह होने तक...जहां तुम्‍हारा दिन शुरु होता है
और उसकी यात्रा...।
शेष देह को संभालते हुए
झूठ बोलती है स्‍त्री प्रेम की आड़ लेकर
नहीं बताती कि हाथ छूट गए थे
पहले कदम के साथ ही
कि बिस्‍तर पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ गया था....प्रेम।

चेहरे पर आंख के ठीक नीचे की चोट
कितनी भी सच हो
नहीं टिक पाती स्‍त्री के झूठ के सामने
कहीं भी तो गिर सकता है कोई,
गिरने को कहां चाहिए कोई बहाना
होठों को जरा सा खींचकर मुस्‍कुराते हुए
सच को गिरा देती है आंख से, आंख छिपाकर
जब झूठ बोलती है स्‍त्री....।

झूठ बोलती है स्‍त्री कि बचा रहे तुम्‍हारा सच
तुम्‍हारे कमजोर सच
जाने कब कसे जाएं संदेह के पंजों में
स्‍त्री बनाती है तुम्‍हारे लिए रक्षा कवच
झूठ की ध्‍वनियां मंत्रों से बिंधी हैं
ये समझते समझते ही समझ आएगा तुम्‍हें...।

रहने दो, तुम सच की जीत के ये आख्‍यान
स्‍त्री के झूठ
शास्‍त्रों की मदद से नहीं पढ़े जा सकते
अपने ही सच नहीं सुन सकते स्‍त्री के मुंह से
स्‍त्री के सच जानने की बात जाने दो...

कविता की तरह नहीं बांचे जाते स्‍त्री के सच
तुम्‍हारी कल्‍पना में बहुत सुंदर है स्‍त्री
उसे उतना ही समझो
सत्‍यं और शिवम जप-तप-पाठ के लिए छोड़ दो....।


चांद-रातें


चांदनी के झूले में झूलती है स्‍त्री
चांद-रातों में जब वह होती है चांद के साथ अकेली...।

घर भर के लोगों को नींद में भरमाकर
सबसे आंख बचाकर
सिर्फ उसे देखता है चांद
जब वह लगाती है बाहर लोहे के गेट पर
रात का ताला
सुनसान गली में उसके साथ
अकेला होता है चांद....।

उसी के लिए ठहरता है चांद
अलसुबह सबके उठने से पहले
बताकर जाता है उसे
रात भर की कहानी
उसे जाते हुए देखकर हाथ हिलाती है स्‍त्री
हाथ हिलते हैं और आंगन में बिखरी चांदनी
बुहारी जाती है...।

दिन खुलते-खुलते खुलती है सबकी आंख
सब चढ़ता सूरज देखते हैं तब
चुपके से मैले कपड़ों के ढेर में जा छुपता है चांद
स्‍त्री गट्ठर उठाती है और चल देती है
इधर रसोईघर से उठता है धुआं
उधर चांद चमकता है अलगनी पर...।

सफेद चीनी मिट्टी की प्‍लेटों पर
हल्‍दी के दाग
चांद के धब्‍बे हैं, जानती है स्‍त्री
उसके सधे हाथ लौटा लाते हैं चमक
चांद उतर आता है सिंक में
और ठंडे पानी में चुपचाप बह जाती है मैली चांदनी...।

उसके चेहरे में चांद है
पहली बार कहा था उसके प्रेमी ने
तब से चांद उसके सपनों में था
चांद रातें अमावस नहीं जानतीं थीं...।

गरम पानी से रगड़ रगड़ कर चमकाती है फटी एडि़यां
चेहरे पर लगाती है मुस्‍कुराहट की गाचनी
और दिन ढलते ढलते उसकी आंखों में उतर आता है चांद...।

कट जाता है जब दिन कटते कटते
कल सुबह के लिए सब्‍जी काटकर रखते हुए
बतियाती है स्‍त्री पड़ोस की स्त्रियों से
चमकते हैं स्त्रियों के चेहरे
सब की सब बात करती हैं चांद रातों की
कभी चांद की...कभी रातों की...।

चांदनी के झूले में झूलती है स्‍त्री
सुबह के चांद से रात के चांद तक
जितना आगे जाती है...उतना पीछे लौट आती है
वह अकेली झूलती है झूला चांदनी का
उसके साथ झूलती हैं चांद-रातें....।


छौंकी गई कविता


सच...
कोई जादू नहीं जानती है वह
जो करती है उसमें जादू जैसा नहीं है कुछ भी
उसे बस अच्‍छा लगता है कविता लिखना
वह लिखती है....।

धुंधली सुबह में होता है कविता का पहला पाठ
जब आखिरी तारा उसे देखते ही मूंद लेता है आंख
ठीक वैसे जैसे उसका बेटा
करता है शरारत, अक्‍सर...।

वह जानती है शरारती तारे को उठते ही
चाहिए गरम दूध
ि‍फ्रज से निकालती है
और गैस के चूल्‍हे पर गरम करती है कविता
उफनने से पहले उसके सधे हाथ
संभाल लेते हैं और कविता अपनी लय से बाहर नहीं जाती....।

आंगन भर फैले शब्‍दों को बुहारकर
डाल आती है आलोचना के खाते में
और पानी की बाल्‍टी लेकर पौंछ डालती है भेद-मतभेद
जरा से गीलेपन में बार बार ि‍फसलने से बच जाती है कविता....।

उसे याद रहते हैं कविता के सारे संस्‍कार..सारे कर्म
भले ही भूल जाए कविता का गणित...।

कल के ठंडे विचारों को निकाल कर छीलती है
काटती है शब्‍द दर शब्‍द..कभी गोल, कभी लंबाई में
गरम करती है कड़ाही में वैयाकरण
छौंकती है काव्‍यशास्‍त्र के सिद्धांत
और कविता की खुशबू
दूर तक फैल जाती है, कवियो के उठने से पहले...।

नहीं, सच में जादू नहीं जानती है वह
कविता भी नहीं जानती है वह
जानने का काम तो तुम्‍हारा है....वह तो रचती है बस...
तुम चाहो तो इसे जादू कह लो....।



गुरुवार, 10 जुलाई 2014

दिविक रमेश की कविताएं

चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार




गुलाम देश का मजदूर गीत

(खुली आँखों में आकाश से)


एक और दिन बीता
बीत क्या
जीता है पहाड़-सा

अब
सो जाएँगे
थककर।

टूटी देह की
यह फूटी बीन-सी
कोई और बजाए
तो बजा ले
हम क्या गाएँ ?

हम तो
सो जाएँगे
थककर।

कल फिर चढ़ना है
कल फिर जीना है
जाने कैसा हो पहाड़ ?

फिर उतरेंगे

बस यूँ ही
अपने तो
दिन बीतेंगे।

सच में तो
ज़िन्दगी भर हम
अपना या औरों का
पहाड़ ही ढोते हैं।

बस
ढोते
रहते हैं।

सुना है
हमारी मेहनत के गीत
कुछ निठल्ले तक गाते हैं।

सुना है
हमारे भविष्य की कल्पना में
कुछ जन
कराहते हैं।

कुछ तो
जाने किस उत्साह में
हमारे वर्तमान ही को
हमसे झुठलाते हैं।

हमारा भविष्य तो
खुद
हमारा बच्चा भी नहीं होता।

पेट में ही जो
ढोने लगता हो ईंटें।
पेट में ही जो
मथने लगता हो गारा।
पेट में ही जिसको
सिखा दिया हो
सलाम बजाना।
पहले ही दिन से
खुद जिसने
शुरू कर दिया हो
कमाना।

कोई स्वप्न गुनगुनाए
तो गुनगुना ले
वर्ना
हमारा बच्चा भी
हमारा भविष्य
नहीं होता।

होता होगा
होगा किसी का भविष्य
किसी के देश का
किसी के समाज का
लेकिन
हमारा नहीं होता।

होगा भी कैसे
हमारी परम्परा में
खुद हम कभी
अपना
भविष्य नहीं हुए।

हम तो बस
सीने पर रख
महान उपदेशों को
सो जाते हैं
थककर।

इतना ही क्या
काफी नहीं
कि एक दिन और
बीत गया

पहाड़-सा।

अब रात आयी है
सुख भरी रात
कौन गंवाए इसे।

सुबह तो ससुरी
रोज
भूख ही लगाती है
क्यों करें प्यार
फिर ऐसी सुबह से ?

कैसे थिरक उठे पाँव
कैसे गाएँ ये कंठ
कैसे मनाएँ खुशियाँ
सरकारी उत्सवों में
नाचते

नचभैयों-से।

कहाँ है आजाद
यह गुलाम देश
और कहाँ हैं आजाद

ये हम?

आजादी की परख
देश की सुबह से होती है
और सुबह तो हर रोज
काम पर

भूखा ही भगाती है।

पर चलो
एक दिन और बीता
बीता क्या
जीता है पहाड़-सा

अब
सो जाएँगे
थककर।



हर कहीं सब कहीं



देख लीजिए न नरेन्द्र जी को
हैं न ’कहीं‘।
और राजेश जी को भी
कैसे तो विराजमान हैं वे भी ’कहीं‘।
इन्हें ही देख लीजिए
और उन्हें भी
तभी तो छाए हैं न अखबार के कॉलम से।

देखिए तो इनके चेहरे
इन्हें क्या परवाह उनकी
और अब देख लीजिए उनके भी चेहरे
उन्हीं का कौन बाँध सकता है घर घाम में।

अपनी अपनी हवा है
अपना अपना बदन
अपना अपना आकार है
अपना अपना समाचार

खबरदार
खबरदार
खबरदार

जान लेना चाहिए
कि हर बड़ा है वही
जो दिखता है ’कहीं‘।
और एक आप हैं मियाँ दिविक
जो हैं ही नहीं कहीं

न कोई अपनी हवा है
न बदन ही
न कोई अपना आकार है
न समाचार ही।



हक की तहकीकात

(खुली आँखों में आकाश से)


यही है वह लड़का

आवारा

जाने कैसे हैं माँ-बाप
जना और छोड़ दिया।
यही है
खतरनाक निशान को
छूकर भी
ज़िन्दा है।

तहकीकात हुई,
लोगों ने पाया
कि यह लड़का
’अनपढ और गंवार है‘
या यूँ कह लें
’नथिया का बेटा चमार है।‘

तहकीकात हुई
लोगों ने पाया
कि इसके खानदान में
जो भी
खतरों से खेला
नहीं बचा
यह पहला है।

तहकीकात हुई
लोगों ने पाया
यह वही लड़का है
चौधरी के खेत में
जो जबरन घुसा था।

यह वही लड़का है
जो गांव के कुएँ की
जगत पर चढ़ा थ।

यह वही लड़का है
जिसने
हरीराम पंडत की
लांगड़ खोल
मखौल उड़ाया था

घोषणा हुई
’यह लड़का खतरनाक है।‘

तहकीकात
एक और भी हुई

पता चला
कि बहुत से खतरनाक निशान
खेत में गड़े डरावों से
महज निशान होते हैं।



उसने कहा था


मेरे निकट आओ, मेरी महक से महको
और सूँघो
यह किसी फूल या खुशबू ने नहीं
उसने कहा था।

मेरे निकट आओ, मेरा ताप तापो
और सेंको
यह किसी अग्नि या सूर्य ने नहीं
उसने कहा था।

मेरे निकट आओ, मेरी ठंड से शीतल हो जाओ
और ठंडाओ
यह किसी जल या पर्वती हवा ने नहीं
उसने कहा था।

वह कोई रहस्य भी नहीं था
एक मिलना भर था
कुछ ईमानदार क्षणों में खुद से
जो था असल में
रहस्य ही।

वह जो बहुत उजागर है
गठरियों में बाँध उसे
कितना रहस्य बनाए रखते हैं हम।

शायद सोचना चाहिए मुझे
कि उसे
कहना क्यों पड़ा?



जाइये-आइये



हाँ हमीं ने बुलाया था न आपको
आपके मुद्दों पर विचार के लिए
पर अब हम नहीं करेंगे न
नहीं करेंगे माने नहीं करेंगे, जाइये।

ऐ न्यायप्रिय जी
सब हमारी मर्जी पर ही चलता है न
कारण-फारण जानकर क्या कीजिएगा
क्या उखाड़ लेंगे आप हमारा
कह दिया न हमारी मर्जी! जाइये।

अरे हे पी.ए. साहिब, तनिक सुनो तो
समझाओ इन्हें। आहाहाहाहाहाहा......
कल प्रैस में मर्जी
और अगले दिन छपवा दीजिएगा न मजबूरी।
आहाहाहाहाहाहा......

अरे! अरे! आप!
आप यहाँ
बुला लिया होता न दास को।

ऐ पी.ए. साहब!

’माफ कीजिए
यह ससुर लांगड़ भी
तैयार रहती है खुलने को
खोले रहूँ
या बाँध लूँ।
हमारी चरण वन्दना तो लीजिए न!
आप हैं तो हम हैं न! आइये।

देखिए न
कितना कुछ तो कह रही हैं आपकी आँखें
हमारे पक्ष में। आइये।

ऐ पी.ए. साहिब
भेजिए न। तनिक जल्दी कीजिए भाई।’

आइये!


रविवार, 6 जुलाई 2014

ऋषभ देव शर्मा की तेवरियाँ



(एक) 

रो रही है बाँझ धरती , मेह बरसो रे
प्रात ऊसर, साँझ परती, मेह बरसो रे

सूर्य की सारी बही में धूपिया अक्षर
अब दुपहरी है अखरती , मेह बरसो रे

नागफनियाँ हैं सिपाही , खींच लें आँचल
लाजवंती आज डरती , मेह बरसो रे

राजधानी भी दिखाती रेत का दर्पण
हिरनिया ले प्यास मरती , मेह बरसो रे

रावणों की वाटिका में भूमिजा सीता
शीश अपने आग धरती , मेह बरसो रे

(दो) 

गाँव, घर, नगर-नगर भूमि की पुकार
ताल, सर, लहर-लहर भूमि की पुकार

सींचें जो खेत में बूँद - बूँद गात
और ना पिएँ ज़हर भूमि की पुकार

नींव में ग़रीब-रक्त और ना चुए
साँझ प्रात दोपहर भूमि की पुकार

भूख के उरोज पर सेठ या मुनीम
और ना धरें नज़र भूमि की पुकार

और की हरे न धूप, छाँव बरगदी
दूर-दूर फैल कर , भूमि की पुकार

नींद की ग़ज़ल नहीं आज मित्रवर!
जागृति के छंद भर भूमि की पुकार

(तीन) 

बाँस का झुरमुट बजाता सीटियाँ
यह हवा सुलगा रही अंगीठियाँ

बुर्ज पर जो चढ़ गए, अंधे हुए
हैं हमारे खून से तर सीढ़ियाँ

कुछ, सिगारों-सिगरटों से पूछतीं
कान में खोंसी हुईं ये बीड़ियाँ

आपने बंजर बनाई जो धरा
जन्मती वह कीकरों की पीढ़ियाँ

पर्वतों पर है धमाकों का समाँ
घाटियों में घनघनाती घंटियाँ

(चार) 

चौराहों पर पिटी डौंड़ियाँ, गली-गली विज्ञापन है
कफ़न-खसोटों की बस्ती में ‘शैव्या’ का अभिनंदन है

आज आदमी से नागों ने यारी करने की ठानी
सँभल परीक्षित ! उपहारों में ज़हरी तक्षक का फन है

आश्वासन की राजनीति ने लोकरीति से ब्याह रचा
मित्र ! श्वेत टोपी वालों का स्याही में डूबा मन है

ये बिछुए, पाजेब, झाँझरें और चूड़ियाँ लाल-हरी
दुलहिन का शृंगार नहीं है, परंपरागत बंधन है

सड़कों के घोषणापत्र में बटिया का उल्लेख हुआ
लगता है, कुछ षड्यंत्रों में व्यस्त हुआ सिंहासन है

(पांच) 

नाग की बाँबी खुली है आइए साहब
भर कटोरा दूध का भी लाइए साहब

रोटियों की फ़िक्र क्या है ? कुर्सियों से लो
गोलियाँ बँटने लगी हैं खाइए साहब

टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं
और झुककर और झुककर जाइए साहब

मानते हैं उम्र सारी हो गई रोते
गीत उनके ही करम के गाइए साहब

बिछ नहीं सकते अगर तुम पायदानों में
फिर क़यामत आज बनकर छाइए साहब

(छह) 

ईंट, ढेले, गोलियाँ, पत्थर, गुलेलें हैं
अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं

आपकी ड्योढी रही, दुत्कारती जिनको
स्पर्शवर्जित झोंपड़ी, महतर गुलेलें हैं

यह इलाक़ा छोड़कर, जाना पड़ेगा ही
टिडिडयों में शोर है, घर-घर गुलेलें हैं

बन गए मालिक उठा, तुम हाथ में हंटर
अब न कहना चौंककर, नौकर गुलेलें हैं

इस कचहरी का यही, आदेश है तुमको
खाइए, अब भाग्य में, ठोकर गुलेलें हैं

क्या पता क्या दंड दे, यह आज क़ातिल को
भीड़ पर तलवार हैं, ख़ंजर गुलेलें हैं

रोटियाँ लटकी हुई हैं बुर्ज के ऊपर
प्रश्न- ‘कैसे पाइए’ उत्तर गुलेलें हैं

है चटोरी जीभ ख़ूनी आपकी सुनिए,
इस बिमारी में उचित नश्तर गुलेलें हैं

ये निशाने के लिए, हैं सध चुके बाज़ू
दृष्टि के हर छोर पर, तत्पर गुलेलें हैं

तार आया गाँव से, यह राजधानी में
शब्द के तेवर नए, अक्षर गुलेलें हैं


शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

नीलम चंद्रा की कवितायें


अनूठी प्रेम कहानी

धरती बंधी है
सूरज की सीमाओं से
और जैसा जैसा वो चाहता है
धरती वैसे वैसे अपने आप को ढाल लेती है

सावन के महीने में
भिजवाता है वो बादलों से प्यार की मनुहार
और धरती उसकी प्यार भरा संदेसा सुन
करने लगती है सोलह श्रृंगार
हरियाली का घूँघट ओढ़े
फूलों से अपनी मांग सज़ा
पिया मिलन को चल देती है...

जब सूरज आराम करना चाहता है
और खो जाता है दूर कहीं
हर तरफ धुंध ही धुंध छा जाती है
धरती भी ठण्ड से ठिठुरने लगती है
क्षण भर को निराश भी होती है
पर फिर इसी इंतज़ार में
कि कभी तो वो मुड़कर उसे देखेगा
सारे गम अपने जिरह में छुपा जाती है...

जब गुस्से में सूरज लाल हो उठता है
और अपने तेज से
हर तरफ हाहाकार मचने लगता है
धरती भी मुरझा जाती है
उसके सिंगार सारे
एक एक कर झड़ने लगते हैं
पर वो जानती है
कि एक दिन उसका प्रियतम
जरूर आएगा उसके पास
और वो झुलस झुलस कर भी
यही कहती है,
“पिया, मैं तेरी वंदिनी!

धरती की प्रेम कहानी की
नहीं कोई मिसाल
चलती रहेगी ये तो
सालों साल

परिंदे

परिंदों के पंख
नाज़ुक होते हैं
और वो अपनी यह कमजोरी
बखूबी जानते हैं
और शायद इसीलिए
अपने मन को बना लेते हैं
सुदृढ़ और प्रबल...

परिंदे
अपने जीवन की डोर
कभी नियति के हाथ में
नहीं सौंपते
बल्कि
उसे थामे रहते हैं
अपने उस प्रबल मन के
छोर से...

तभी ये परिंदे
कभी आसानी से
हार नहीं मानते,
रो रो आंसू नहीं बहाते,
न ही किसी कोप भवन में
रुष्ट होकर बैठते हैं;
क्योंकि ये जानते हैं
कि जिंदगी में
और भी बहुत कुछ है
आगे बढ़ने के लिए...

कल्पना

मुझे जाना है वहाँ
खुशी ही खुशी हो जहां
ना हो आंसू ना कोई गम
सिर्फ साज़ गुनगुनाएं जहां

मुझे जाना है वहाँ
मैं पतंग सी फिरती रहूं जहां
मस्तानी सी हो मेरी चाल
आसमानों में डोलती रहूं यहाँ वहाँ

मुझे जाना है वहाँ
क्षितिज धरा से मिलती हो जहां
मन मेरा लहरों सा मचले
और मैं देखती रहूं खूबसूरत समां

जानती हूँ मैं
कल्पित हैं मेरे सपने
पर ना जाने क्यूँ मुझे
ये लगते हैं अपने!!!


मज़ा कुछ और ही है..

जिंदगी का लुत्फ़ बूंदबूंद लेने का मज़ा कुछ और ही है
अपनी राह खुद खोजने का मज़ा कुछ और ही है...

ना जाने कश्तियाँ क्यूँ ढूँढती हैं किनारा
भयानक तूफानों से लड़ने का मज़ा कुछ और ही है...

ना जाने यह बेलें क्यूँ ढूँढती हैं सहारा
खुद पर विश्वास करने का मज़ा कुछ और ही है...

ना जाने चाँद क्यूँ माँगता फिरता है रौशनी
रौशन खुद के पथ करने का मज़ा कुछ और ही है...

ना जाने समंदर क्यूँ जा मिलता है क्षितिज से
लहरों को अंक में समेटने का मज़ा कुछ और ही है...


अरमान कभी झूठ नहीं बोलते..


अरमान कभी झूठ नहीं बोलते

वो नित आगे बढ़ना सिखाते हैं
ना रुकने की सीख देते जाते हैं
कभी उड़ते हुए, कभी लडखडाते हुए
वो तो प्रेरित ही करते जाते हैं

अरमान कभी झूठ नहीं बोलते

वो तो हमें मंजिल दिखलाते हैं
ध्येय हमारे होठों पर लाते हैं
नाकामी के लिए जगह ही नहीं होती
सदा प्रगति और उन्नति चाहते हैं

अरमान कभी झूठ नहीं बोलते

ना ही अरमान कभी गलत होते हैं
ना ही मंजिलें, ना ध्येय हमारे
हम कभी कभी गलत राह अपना लेते हैं
और सोचते हैं अरमान गलत थे हमारे

 पर...
अरमान कभी झूठ नहीं बोलते

नीलम चंद्रा

Director (Computers)
RDSO, C-164, RDSO,
Manak Nagar, Lucknow-226011


बुधवार, 2 जुलाई 2014

कल्पना रामानी की ग़ज़लें




जब वनों में गुनगुनातीं..


जब वनों में गुनगुनातीं गरमियाँ फूलों भरी।
पेड़ चम्पा की लुभातीं, डालियाँ फूलों भरी।

शुष्क भू पर, ये कतारों, में खड़े दरबान से,
दृष्ट होते सिर धरे ज्यों, टोपियाँ फूलों भरी।

पीत स्वर्णिम पुष्प खिलते, सब्ज़ रंगी पात सँग,
मन चमन को मोह लेतीं, झलकियाँ फूलों भरी।

बाल बच्चों को सुहाता, नाम चम्पक-वन बहुत,
जब कथाएँ कह सुनातीं, नानियाँ फूलों भरी।

मुग्ध कवियों ने युगों से, जान महिमा पेड़ की,
काव्य ग्रन्थों में रचाईं, पंक्तियाँ फूलों भरी।

पेड़ का हर अंग करता, मुफ्त रोगों का निदान,
याद आती हैं पुरातन, सूक्तियाँ फूलों भरी।

सूख जाते पुष्प लेकिन, फैलकर इनकी सुगंध,
घूम आती विश्व में, भर झोलियाँ फूलों भरी।

मित्र ये पर्यावरण के, लहलहाते साल भर,
कटु हवाओं को सिखाते, बोलियाँ फूलों भरी।

यह धरोहर देश की, खोने न पाए साथियों,
युग युगों फलती रहें, नव पीढ़ियाँ फूलों भरी।


 गगन में छाए हैं बादल..


गगन में छाए हैं बादल, निकल के देखते हैं।
उड़ी सुगंध फिज़ाओं में चल के देखते हैं।

सुदूर गोद में वादी की, गुल परी उतरी,
प्रियम! हो साथ तुम्हारा, तो चल के देखते हैं।

उतर के आई है आँगन, बरात बूँदों की,
बुला रहा है लड़कपन, मचल के देखते हैं।

अगन ये प्यार की कैसी, कोई बताए ज़रा,
मिला है क्या, जो पतंगे यूँ जल के देखते हैं।

नज़र में जिन को बसाया था मानकर अपना,
फरेबी आज वे नज़रें, बदल के देखते हैं।

चले तो आए हैं, महफिल में शायरों की सखी,
“अभी कुछ और करिश्में, ग़ज़ल के देखते हैं।

विगत को भूल ही जाएँ, तो ‘कल्पना’ अच्छा,
सुखी वही जो सहारे, नवल के देखते हैं।


 बदलती ऋतु की रागिनी..


बदलती ऋतु की रागिनी, सुना रही फुहार है।
उड़ी सुगंध बाग में, बुला रही फुहार है।

कहीं घटा घनी-घनी, कहीं पे धूप है खिली,
लुका-छुपी के खेल से, रिझा रही फुहार है।

अमा है चाँद रात भी, है साँवली प्रभात भी,
अनूप रूप सृष्टि का, दिखा रही फुहार है।

वनों में पेड़-पेड़ पर, पखेरुओं को  छेड़कर,
कि मंद छंद कान में, सुना रही फुहार है।

चमन के पात-पात पर, कली-कली के गात पर,
बिसात बूँद-बूँद से, बिछा रही फुहार है।

पहाड़ पर कछार में, नदी-नदीश धार में,
जहाँ-तहाँ बहार में, नहा रही फुहार है।

सहर्ष होगी बोवनी, भरेगी गोद भूमि की,
किसान संग-संग हल, चला रही फुहार है।

मयूर नृत्य में मगन, कुहुक रही है कोकिला,
सुरों में सुर मिलाके गीत, गा रही फुहार है।

झुला रही है शाख पे, सहेलियों को झूलना,
घरों में पर्व प्यार से, मना रही फुहार है।


 देखकर सपने.. 


देखकर सपने, छलावों से भरे बाज़ार में।
लुट रही जनता, दलालों से भरे बाज़ार में।

चील बन महँगाई ले जाती झपट्टा मारकर,
जो कमाते लोग, चीलों से भरे बाज़ार में।

लॉटरी, सट्टा, जुआ, शेयर सभी परवान पर,
बढ़ रही लालच, भुलावों से भरे बाज़ार में।

खल, कुटिल, काले मुखौटों पर सफेदी देखकर,
जन ठगे जाते, नकाबों से भरे बाज़ार में।

जोंक बन चिपके हुए हैं तख्त से रक्षक सभी,
दे सुरक्षा कौन, जोंकों से भरे बाज़ार में।

हारते सर्वस्व फिर भी नित्य लगती बोलियाँ,
दाँव है जीवन, बिसातों से भरे बाज़ार में।


 रिश्तों में सबसे प्यारी..


रिश्तों में सबसे प्यारी, लगती है दोस्ती।
 मजबूत रिश्ते सारे करती है दोस्ती।

 जीवन को अर्थ देती, बिन स्वार्थ के सदा,
 बेदाम प्रेम का दम, भरती है दोस्ती।

जब घेरता अँधेरा, चहुँ ओर से हमें,
बुझते हृदय को रोशन करती है दोस्ती।

 कितने हों झूठ जग में, यह सत्य है अहम,
 हर उम्र का सहारा, बनती है दोस्ती।

 यदि मित्र साथ हों तो, हर गम अजीज है,
 हर हाल में हरिक गम, हरती है दोस्ती।

 मासूम मन चमन का, यह फूल जानिए,
 पाकर के स्पर्श स्नेहिल, खिलती है दोस्ती।

 सदमित्र बनके मित्रों, पर नाज़ कीजिये
 किस्मत से ज़िंदगी में, मिलती है दोस्ती।


कल्पना रामानी

  • जन्म तिथि-६ जून १९५१ (उज्जैन-मध्य प्रदेश) 
  • निवास-मुंबई महाराष्ट्र  
  • शिक्षा-हाईस्कूल तक
  • रुचि- गीत, गजल, दोहे कुण्डलिया आदि छंद-रचनाओं में विशेष रुचि।
  • वर्तमान में वेब की सर्वाधिक प्रतिष्ठित पत्रिका ‘अभिव्यक्ति-अनुभूति’की सह संपादक।
  • प्रकाशित कृतियाँ-नवगीत संग्रह-‘हौसलों के पंख’
  • ईमेल- kalpanasramani@gmail.com