रविवार, 26 अक्तूबर 2014

दो कविताएं-संगीता सिंह 'भावना'



चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


वादा 



आने का वादा किया था उसने
अंधेरों से छंटकर उजालों के बाद
हवाओं में फैलेगी जब भीनी खुश्बू
फिर आऊंगा मैं .....
मन का हर कोना सुवासित है
तुम्हारे आगमन के महक से
सारी दिशाएं जाग गई हैं
पक्षियों का झुण्ड उड़ चला है
अनजान प्रदेश ....
पर  अब भी तुम न आये लौटकर
अपने देश .......
चमकीले लाल आसमान को नशे में
मदमस्त करके सूर्य भी चला है
अब अपने वापसी के सफ़र में
वक्त का हर लम्हा गया है
अब ठहर .........
तेरे इन्तजार की मधुर एहसास भी
लगे हैं अब सिमटने .....
पर अब भी तुम न आये लौटकर
अपने देश .....



फिर भी हर पल..



भूल जाना कितना अच्छा होता है
पर भूल पाना इतना आसान भी तो नहीं
वर्षों बीत गए , फिर भी हर पल
याद आती है तुम्हारी .....
सावन के बूंदों से होकर तुम्हारी हर याद
छोड़ जाती है अंतहीन वेदना
और मैं निर्निमेष देखती हूँ एक और दिन का अंत
आकाश में गोधूली बेला में रंगों की शहनाई
बढती जा रही है .....
रात्री के मध्य पहर में सोचती हूँ मैं
कुछ भी तो जाहिर नहीं कर पाई ...
झींगुरों के शोर के बिच भी अकेला है मन
निर्वाक मौन की अनुभूति अब संग है मेरे
वक्त का अंधकार घटता ही नहीं
और मानो हल्का-हल्का सा सब याद आता है
वर्षों बीत गए ,फिर भी हर पल
याद आती है तुम्हारी .......


संगीता सिंह 'भावना'

सह - संपादिका,
''करुणावती साहित्य धारा '' (त्रैमासिक)

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