शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

जय प्रकाश त्रिपाठी की रचनाएँ




चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


















कायर-कायर अंगड़ाई है..



कायर-कायर अंगड़ाई है, गूंगे-गूंगे बोल,
नारे, जैसे कूबड़-कूबड़ गाली गोल-मटोल ।
बिना पांव के पंख पसारे भांति-भांति के मोर,
पागल-पागल सच्चाई है, गठरी-गठरी चोर ।
कंठ-कंठ बैठा हुआ, सांय-सांय सुर-ताल,
उल्लू-उल्लू आंख, पेड़ के डाल-डाल बैताल ।
कुर्सी-कुर्सी पालथी, चंदन-चंदन सांप,
बातफरोशों में छिड़ी बहस अनाप-शनाप ।
चौखट-चौखट चुप्पियां, आंगन-आंगन शोर,
घुटी-घुटी सी चीख का मौसम चारो ओर ।


हो रही हरदम बड़ाई आप की..


हो रही हरदम बड़ाई आप की।
ठन गई फिर से लड़ाई आप की ।
देखकर कुछ लोग खुश-हैरान हैं,
शिखर तक पहली चढ़ाई आप की ।
दूर तक अंधेरगर्दी की नजर,
आंख ऐसी फड़फड़ाई आप की ।
आपने जो पाठशाला खोल दी,
पढ़ रहे हैं सब पढ़ाई आप की ।
खुल गये गुलजार मयखाने सभी,
चाल जब से लड़खड़ाई आपकी ।


किसको-किसको सुख पहुंचाया..


प्रायः याद किया करता हूं, किसको-किसको सुख पहुंचाया ।
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

पूरा घर खंडहर हो गया, गांव रह गया पूर्व जन्म-सा,
छिन्न-भिन्न रिश्ते-नातों में वक्त बह गया पूर्व जन्म-सा,
डूब गये सीवान, जिन्हें हर दम थी दुलराती पगडंडी
सुनता हूं कि नहीं रही वो खेत-खेत जाती पगडंडी,
पोखर, कुआं, घाट, पिछवारे, जिनके संग था नाचा-गाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

शेष रह गयी राम-कहानी इनकी-उनकी, यहां-वहां की,
मित्र-मित्र दिन गुजर गये, दुश्मन-दुश्मन दिन जैसे बाकी,
जिसके बिना न जी सकता था, कैसी-कैसी बात कह गया,
उतना अपनापन देकर भी खाली-खाली हाथ रह गया,
फूल और अक्षत की गठरी वाला गीत नहीं फिर गाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

सफर कहां थम गया, कहां से भरीं उड़ानें जीवन ने,
कहां सुबह से शाम हो गयी, कहां बुने सपने मन ने,
लोरी-लोरी रातों वाले वे सारे दिन कहां गये,
बार-बार वे चेहरे आंखों की गंगा में नहा गये,
कितने कोस, गये युग कितने, गिनते-गिनते याद न आया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

हर दिन, एक-एक दिन लगती थीं जो सौ-सौ सदी किताबें,
जब वर्षों ढोया करता था माथ-पीठ पर लदी किताबें,
पत्ती-पत्ती, फूल-फूल से हर पल बोझिल ऊपर-नीचे,
अक्षर-अक्षर, शब्द-शब्द से हरे-भरे अनगिनत बगीचे,
गिरते-पड़ते, गिरते-पड़ते सबको साथ नहीं रख पाया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

ऐसे ही सबके दिन होंगे, रही-सही स्मृतियां होंगी,
सौ-सौ बातों वाली बातें मन में तन्हा-तन्हा होंगी
जिनके अपने साथ न होंगे, जो खुद नैया खेते होंगे
चोरी से हंस लेते होंगे, चोरी से रो लेते होंगे,
जब भी कुछ कहने-सुनने को चाहा तो क्यों मन भर आया,
किसे-किसे, क्यों भूल गया, किसको पल भर भी भूल न पाया ।

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