मंगलवार, 27 जून 2017

संजीव वर्मा 'सलिल' के नवगीत


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


चलो मिल सूरज उगायें..


चलो मिल सूरज उगायें 

सघनतम तिमिर हो जब 
उज्ज्वलतम कल हो तब 
जब निराश अंतर्मन-
नव आशा फल हो तब 

विघ्न-बाधा मिल भगायें 
चलो मिल सूरज उगायें 

पत्थर का वक्ष फोड़ 
भूतल को दें झिंझोड़ 
अमिय धार प्रवहित हो 
कालकूट जाल तोड़ 

मरकर भी जी जाएँ 
चलो मिल सूरज उगायें 

अपनापन अपनों का 
धंधा हो सपनों का 
बंधन मत तोड़ 'सलिल' 
अपने ही नपनों का 

भूसुर-भुसुत बनायें 
चलो मिल सूरज उगायें 


तुमको देखा तो..


तुमको देखा 
तो मरुथल मन 
हरा हो गया। 

चंचल चितवन मृगया करती 

मीठी वाणी थकन मिटाती। 
रूप माधुरी मन ललचाकर -
संतों से वैराग छुड़ाती। 

खोटा सिक्का 

दरस-परस पा 
खरा हो गया। 
तुमको देखा 
तो मरुथल मन 
हरा हो गया। 

उषा गाल पर, माथे सूरज 

अधर कमल-दल, रद मणि-मुक्ता। 
चिबुक चंदनी, व्याल केश-लट 
शारद-रमा-उमा संयुक्ता। 

ध्यान किया तो 

रीता मन-घट 
भरा हो गया। 
तुमको देखा 
तो मरुथल मन 
हरा हो गया। 

सदा सुहागन, तुलसी चौरा 

बिना तुम्हारे आँगन सूना। 
तुम जितना हो मुझे सुमिरतीं 
तुम्हें सुमिरता है मन दूना। 

साथ तुम्हारे गगन 

हुआ मन, दूर हुईं तो 
धरा हो गया। 
तुमको देखा 
तो मरुथल मन 
हरा हो गया। 


सच हर झूठ..


सच हर झूठ
झूठ हर सच है

तू-तू, मैं-मैं कर हम हारे
हम न मगर हो सके बेचारे
तारणहार कह रहे उनको
मत दे जिनके भाग्य सँवारे

ठगित देवयानी
भ्रम कच है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है

काश आँख से चश्मा उतरे
रट्टू तोता यादें बिसरे
खुली आँख देखे क्या-कैसा?
छोड़ झुनझुना रोटी कस रे!

राग न त्याज्य
विराग न शुभ है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है

'खुला' न खुला बंद है तब तक
तीन तलाक मिल रहे जब तक
एसिड डालो तो प्रचार हो
दूध मिले नागों को कब तक?

पत्थरबाज
न अपना कुछ है
सच हर झूठ
झूठ हर सच है


मुस्कानें विष बुझी..


मुस्कानें विष बुझी 
निगाहें पैनी तीर हुईं 

कौए मन्दिर में बैठे हैं 
गीध सिंहासन पा ऐंठे हैं 
मन्त्र पढ़ रहे गर्दभगण मिल 
करतल ध्वनि करते जेठे हैं. 

पुस्तक लिख-छपते उलूक नित 
चीलें पीर भईं 
मुस्कानें विष बुझी 
निगाहें पैनी तीर हुईं 

चूहे खलिहानों के रक्षक 
हैं सियार शेरों के भक्षक
दूध पिलाकर पाल रहे हैं 
अगिन नेवले वासुकि तक्षक 

आश्वासन हैं खंबे 
वादों की शहतीर नईं 

न्याय तौलते हैं परजीवी 
रट्टू तोते हुए मनीषी 
कामशास्त्र पढ़ रहीं साध्वियाँ 
सुन प्रवचन वैताल पचीसी

धुल धूसरित संयम 
भोगों की प्राचीर मुईं 


ध्वस्त हुए विश्वास किले..


ध्वस्त हुए विश्वास किले 

जूही-चमेली 
बगिया तजकर 
वन-वन भटकें 
गोदी खेली 
कलियाँ ही 
फूलों को खटकें 

भँवरे करते मौज 

समय के अधर सिले 
ध्वस्त हुए विश्वास किले 

चटक-मटक पर
ठहरें नज़रें 
फिर फिर अटकें 
श्रम के दर की 
चढ़ें न सीढ़ी 
युव मन ठिठकें

शाखों से क्यों 
वल्लरियों के वदन छिले
ध्वस्त हुए विश्वास किले 


संजीव वर्मा 'सलिल'


204, विजय अपार्टमेंट, 
नेपियर टाउन, जबलपुर-482001
मोबाइल: 9425183244 
ई-मेल: salil.sanjiv@gmail.com



संजीव वर्मा 'सलिल'


  • जन्म: २०-८-१९५२, मंडला मध्य प्रदेश।  
  • माता-पिता: स्व. शांति देवी - स्व. राज बहादुर वर्मा। 
  • प्रेरणास्रोत: बुआश्री महीयसी महादेवी वर्मा।  
  • शिक्षा: त्रिवर्षीय डिप्लोमा सिविल अभियांत्रिकी, बी.ई., एम. आई. ई., विशारद, एम. ए. (अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र), एलएल. बी., डिप्लोमा पत्रकारिता, डी. सी. ए.। 
  • प्रकाशित कृतियाँ: १. कलम के देव (भक्ति गीत संग्रह १९९७), २. भूकंप के साथ जीना सीखें (जनोपयोगी तकनीकी १९९७), ३. लोकतंत्र का मक़बरा (कविताएँ २००१) विमोचन शायरे अजं कृष्ण बिहारी 'नूर', ४. मीत मेरे (कविताएँ २००२) विमोचन आचार्य विष्णुकांत शास्त्री तत्कालीन राज्यपाल उत्तर प्रदेश, ५. काल है संक्रांति का नवगीत संग्रह २०१६ विमोचन ज़ाहिर कुरैशी-योगराज प्रभाकर, ६. कुरुक्षेत्र गाथा प्रबंध काव्य २०१६ विमोचन रामकृष्ण कुसुमारिया मंत्री म. प्र. शासन।  
  • संपादन: (क) कृतियाँ: १. निर्माण के नूपुर (अभियंता कवियों का संकलन १९८३),२. नींव के पत्थर (अभियंता कवियों का संकलन १९८५),  ३. राम नाम सुखदाई १९९९ तथा २००९, ४. तिनका-तिनका नीड़ २०००, ५. सौरभः  (संस्कृत श्लोकों का दोहानुवाद) २००३, ६. ऑफ़ एंड ओन (अंग्रेजी ग़ज़ल संग्रह) २००१, ७. यदा-कदा  (ऑफ़ एंड ओं का हिंदी काव्यानुवाद) २००४, ८. द्वार खड़े इतिहास के २००६, ९. समयजयी साहित्यशिल्पी प्रो. भागवतप्रसाद मिश्र 'नियाज़' (विवेचना) २००६, १०-११. काव्य मंदाकिनी २००८ व २०१०। (ख) स्मारिकाएँ: १. शिल्पांजलि १९८३, २. लेखनी १९८४, ३. इंजीनियर्स टाइम्स १९८४, ४. शिल्पा १९८६, ५. लेखनी-२ १९८९, ६. संकल्प  १९९४,७. दिव्याशीष १९९६, ८. शाकाहार की खोज १९९९, ९. वास्तुदीप २००२ (विमोचन स्व. कुप. सी. सुदर्शन सरसंघ चालक तथा भाई महावीर राज्यपाल मध्य प्रदेश), १०. इंडियन जिओलॉजिकल सोसाइटी सम्मेलन २००४, ११. दूरभाषिका लोक निर्माण विभाग २००६, (विमोचन श्री नागेन्द्र सिंह तत्कालीन मंत्री लोक निर्माण विभाग म. प्र.) १२. निर्माण दूरभाषिका २००७, १३. विनायक दर्शन २००७, १४. मार्ग (IGS) २००९, १५. भवनांजलि (२०१३), १६. अभियंता बंधु (IEI) २०१३। (ग) पत्रिकाएँ: १. चित्राशीष १९८० से १९९४, २. एम.पी. सबॉर्डिनेट इंजीनियर्स मंथली जर्नल १९८२ - १९८७, ३. यांत्रिकी समय १९८९-१९९०, ४. इंजीनियर्स टाइम्स १९९६-१९९८, ५. एफोड मंथली जर्नल १९८८-९०, ६. नर्मदा साहित्यिक पत्रिका २००२-२००४। (घ). भूमिका लेखन: ३६ पुस्तकें। (च). तकनीकी लेख: १५। 
  • रचनायें प्रकाशित: मुक्तक मंजरी (४० मुक्तक), कन्टेम्परेरी हिंदी पोएट्री (८ रचनाएँ परिचय), ७५ गद्य-पद्य संकलन, लगभग ४०० पत्रिकाएँ। मेकलसुता पत्रिका में २ वर्ष तक लेखमाला 'दोहा गाथा सनातन' प्रकाशित, पत्रिका शिकार वार्ता में भूकंप पर आमुख कथा।
  • परिचय प्रकाशित ७ कोश।
  • अंतरजाल पर- १९९८ से सक्रिय, हिन्द युग्म पर छंद-शिक्षण २ वर्ष तक, साहित्य शिल्पी पर 'काव्य का रचनाशास्त्र' ८० अलंकारों पर लेखमाला, छंदों पर लेखमाला जारी ८० छंद हो चुके हैं।
  • सम्मान- १० राज्यों (मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, हरयाणा, दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़, असम, बंगाल) की विविध संस्थाओं द्वारा शताधिक सम्मान तथा अलंकरण। प्रमुख सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञान रत्न, २० वीं शताब्दी रत्न, आचार्य, वाग्विदाम्बर, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, वास्तु गौरव, मानस हंस, साहित्य गौरव, साहित्य श्री(३), काव्य श्री, भाषा भूषण, कायस्थ कीर्तिध्वज, चित्रांश गौरव, कायस्थ भूषण, हरि ठाकुर स्मृति सम्मान, सारस्वत साहित्य सम्मान, कविगुरु रवीन्द्रनाथ सारस्वत सम्मान, युगपुरुष विवेकानंद पत्रकार रत्न सम्मान, साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान, भारत गौरव सारस्वत सम्मान, कामता प्रसाद गुरु वर्तिका अलंकरण, उत्कृष्टता प्रमाणपत्र, सर्टिफिकेट ऑफ़ मेरिट आदि।     
  • संप्रति: पूर्व कार्यपालन यंत्री लोक निर्माण विभाग म. प्र., अधिवक्ता म. प्र. उच्च न्यायालय, अध्यक्ष अभियान जबलपुर, पूर्व वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष / महामंत्री राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद,  पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अखिल भारतीय कायस्थ महासभा, संरक्षक राजकुमारी बाई बाल निकेतन, संयोजक विश्ववाणी हिंदी परिषद, संयोजक समन्वय संस्था प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय भोपाल। 

बुधवार, 14 जून 2017

नवल शुक्ल की कविताएं


विनोद शाही की कलाकृति


घरों में प्रवेश के लिए


बहुत दिनों से कोई मेरे घर नहीं आया
तो मैं सबके घर गया
सबने कहा, कोई नहीं आता अब
कोई नहीं।
कुछ समय से बदल रही थी यह जगह
और साथ-साथ घर
बहुत सारी उपयोगी चीज़ें पड़ी थीं बदलने के लिए
बहुत सारी अनपेक्षित वस्तुएँ इन्तज़ार में थीं
घरों में प्रवेश के लिए।
हम किसी घर की जगह बाज़ार जाते
और वापस अपने घर लौट आते
फिर बहुत दिनों बाद
जब नहीं आता कोई
तो कुछ इसी तरह की बातें करते।



बहुत दिनों से


वह बहुत दिनों से प्रेम नहीं कर पा रही थी
मैं बहुत दिनों से झगड़ नहीं पा रहा था
मै बहुत दिनों से प्रेम करना चाहता था
वह बहुत दिनों से झगड़ना चाहती थी
इन दिनों हमारे लिए सबकी कमी का
रोज़ ध्यान आता था
आकांक्षाएँ हमारे चाहने पर भी नहीं मिलती थीं।
हम इतने शिथिल और सुस्त थे कि
थामे हुए एक कमज़ोर धागे को, देखते
अपने-अपने सिर पर बचे, झूलते खड़े थे।
दिनों-दिन बड़े होते शहर
और छोटे होते घर में
न रोते, न हँसते
आँखें खोले
सुबह के स्वप्न की तरह थे दुनिया को देखते।



प्यार चाहिए


प्यार चाहिए
कुछ नहीं चाहिए और।
स्वस्थ हैं कमाने-खाने के लिए हाथ
पचाने के लिए पेट
चलने के लिए पाँव
देखने-सुनने के लिए
खुली आँखें कान।
सहने, सतर्क रहने के लिए दोस्त
पढ़ने-सुनने के लिए
रेडियो,अख़बार
भांड
रखने के लिए मन--
बजाने के लिए पैसे।
रहने के लिए नहीं कोई मकान
अपन कतई नहीं महान।



आदमी की सुगंध


यह जो उथल-पुथल हो रही है
बाज़ार को छूट दी जा रही है
कम किए जा रहे हैं आग्नेयास्त्र
शान्ति के शब्द बोले जा रहे हैं
वह सांत्वना है सिर्फ़
थोड़े समय की राहत
बहुत अधिक दिखावट।
इस समय सबसे अधिक
बदहाल है दुनिया
सबसे अधिक खाली है पेट।
तमाम उन्नत तकनीक
और विश्व की विकास रपटों के
ये अभी भी, एक ही पल में
धूल, धुएँ और विकिरण से भर देंगे पृथ्वी
पृथ्वी अभी भी खाली है जल से
हरियाली से, अन्न से
आदमी की सुगन्ध से।

परिक्रमा: स्नेह मिलन समारोह संपन्न


       आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के गगन विहार, हैदराबाद स्थित सभाकक्ष में संपन्न सम्मान समारोह
          में मास्को स्थित रूसी-भारतीय मैत्री संघ ‘दिशा’ के संस्थापक डॉ. रामेश्वर सिंह को ‘साहित्य मंथन
          संस्कृति-सेतु सम्मान’ प्रदान करते हुए तेलुगु विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. एन. गोपि








‘’हिंदी केवल भारत की ही नहीं विश्व की बेहद शक्तिशाली भाषा है जो बहुत बड़े जन-समुदाय को तरह-तरह की भिन्नताओं के बावजूद जोड़ने का काम करती है मैंने देश-विदेश की अपनी साहित्यिक यात्राओं में कभी भी अकेलापन अनुभव नहीं किया है क्योंकि हिंदी मेरे साथ हमेशा रहती है. आज जब विश्व-पटल पर भारत और रूस के मैत्री संबंध नई दिशा की ओर बढ़ रहे हैं, ऐसे समय भारतीय-रूसी मैत्री संघ ‘दिशा’ के संस्थापक डॉ. रामेश्वर सिंह का हैदराबाद में सम्मान तथा उनकी संस्था की ओर से भारत के कुछ हिंदी सेवियों का सम्मान हिंदी के माध्यम से परस्पर मैत्री को मजबूत बनाने की खातिर एक सराहनीय कदम है.’’
ये विचार अग्रणी तेलुगु साहित्यकार प्रो. एन. गोपि ने रूसी-भारतीय मैत्री संघ 'दिशा' (मास्को), साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था (मुंबई) तथा 'साहित्य मंथन' (हैदराबाद) के संयुक्त तत्वावधान में पिछले दिनों आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के सभाकक्ष में संपन्न 'स्नेह मिलन एवं सम्मान समारोह' की अध्यक्षता करते हुए प्रकट किए। इस अवसर पर मास्को से आए डॉ. रामेश्वर सिंह को श्रीमती लाड़ो देवी शास्त्री की पावन स्मृति में प्रवर्तित ''साहित्य मंथन संस्कृति-सेतु सम्मान : 2016'' प्रदान किया गया अपने कृतज्ञता भाषण में डॉ. रामेश्वर सिंह ने कहा कि कोई भी भाषा अपने बोलने वालों के दम पर विकसित होती है और विश्व भर में हिंदी अपने प्रयोक्ताओं की बड़ी संख्या तथा अपनी सर्व-समावेशी प्रकृति के कारण निरंतर विकसित हो रही है, अतः आने वाले समय में सांस्कृतिक से लेकर कूटनैतिक संबंधों तक के लिए हिंदी को बड़ी भूमिका अदा करनी है
‘दिशा’ और ‘शोध संस्था’ की ओर से डॉ. आर. जयचंद्रन (कोचिन) और डॉ.मुकेश डी. पटेल (गुजरात) को ''हिंदी रत्नाकर अंतरराष्ट्रीय सम्मान'' से तथा डॉ. बाबू जोसेफ (कोट्टायम), डॉ. एम. वेंकटेश्वर (हैदराबाद), डॉ. अनिल सिंह (मुंबई), डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा (हैदराबाद), डॉ. वंदना पी. पावसकर (मुंबई), डॉ. सुरेंद्र नारायण यादव (कटिहार) और डॉ. कांतिलाल चोटलिया (गुजरात) को ''हिंदी भास्कर अंतरराष्ट्रीय सम्मान'' से अलंकृत किया गया. पुरस्कृत साहित्यकारों ने हिंदी भाषा के प्रति अपने पूर्ण समर्पण का संकल्प जताया
कार्यक्रम के प्रथम चरण में आगंतुक और स्थानीय साहित्यकारों के परस्पर परिचय के साथ ‘चाय पर चर्चा’ का अनौपचारिक दौर चला तथा दूसरे चरण में सम्मान समारोह संपन्न हुआ आरंभ में स्वस्ति-दीप प्रज्वलित किया गया तथा कवयित्री ज्योति नारायण ने वंदना प्रस्तुत की. साहित्यिक-सांस्कृतिक शोध संस्था के सचिव डॉ. प्रदीप कुमार  सिंह ने अतिथियों का स्वागत किया और विश्व-मैत्री के लिए हिंदी की संभावित भूमिका पर विचार प्रकट किए
अपनी सक्रिय भागीदारी और उपस्थिति से चर्चा-परिचर्चा को जीवंत बनाने में डॉ. बी. सत्यनारायण, डॉ. अहिल्या मिश्र, डॉ. रोहिताश्व, डॉ. करण सिंह ऊटवाल, वुल्ली कृष्णा राव, डॉ. बी, बालाजी, डॉ. मंजु शर्मा, डॉ. बनवारी लाल मीणा, प्रभा कुमारी, मो. आसिफ अली, प्रवीण प्रणव, शशि राय, भंवर लाल उपाध्याय, जी. परमेश्वर, पवित्रा अग्रवाल, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल, डॉ. राजेश कुमार, संपत देवी मुरारका, डॉ. मोनिका शर्मा, वर्षा, डॉ. सुनीला सूद, डॉ. राजकुमारी सिंह, टी. सुभाषिणी, संतोष विजय, अशोक तिवारी, आलोक राज, शरद राज, श्रीधर सक्सेना, श्रीनिवास सावरीकर, डॉ. रियाज़ अंसारी, मदन सिंह चारण और डॉ. पूर्णिमा शर्मा आदि ने महत्वपूर्ण योगदान किया

प्रस्तुति : डॉ. ऋषभ देव शर्मा


पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, हैदराबाद
ईमेल-rishabhadsharma@gmail.com 
फोन- 08121435033

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

शोर एवं अन्य कविताएं-आशुतोष द्विवेदी


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


शोर


मैं अकेला हूँ,
मगर ये शोर कैसा है,
मुझे घेरे हुए है जो !
यहाँ कोई नहीं फिर भी
न जाने कौन हैं वे लोग,
मुझसे बोलते ही जा रहे हैं जो !
कोई चिल्ला रहा मुझ पर,
कोई है लड़ रहा मुझसे,
कोई पुचकारता है और
कोई व्यंग्य करता है |
कोई करता हँसी मुझसे,
कोई है हँस रहा मुझ पर |
कोई धकिया रहा है औ’
शिकायत कर रहा है –
ध्यान क्यों देता नहीं मैं,
उसकी बातों पर?
कोई रूठा हुआ है -
देर तक बोला नहीं मैं इसलिए,
उत्तर नहीं सूझा मुझे जल्दी कोई,
मैं और करता क्या ?

मेरे भीतर लगी है भीड़ सी,
अनगिनत चेहरों की,
कई परिचित, अपरिचित भी,
कई देखे हुए से पर कहीं बिसरे हुए
यादों के अँधियारे, घने वन में,
उभरते, झाँकते, संकोच करते
अजनबी मन में |
मुझे बाँटा गया जैसे,
बड़े अनगढ़, बड़े बेडौल टुकड़ों में,
उछाला फिर गया उस शोर करती भीड़ के आगे
कि लूटें जाएँ वे टुकड़े मेरे अस्तित्व,
मेरे भाव के; उन धारणाओं के कि मैं एग्ज़िस्ट (exist) करता हूँ |
मेरे टुकड़े ये मेरे चाहने पर भी,
न जुड़ पायेंगे ऐसा लग रहा मुझको |
अगर जुड़ भी गए तो
क्या मेरा अस्तित्व वापस जी उठेगा,
और जीवित रह सकेगा स्वयं के एकत्व में, अद्वैत में ?

यहाँ देकार्त का वह कथन सहसा गूँज उठता है,
सुना मैंने कहीं –
“मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
मगर ये हाल अपना देख कर है लग रहा मुझको –
“मैं सोचा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं देखा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं जाना जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
“मैं समझा जा रहा हूँ, इसलिए मैं हूँ |”
यहाँ पर बर्कले की याद आती है, बहुत ज्यादा,
अरे, प्लेटो के मानस-पुत्र,
शायद देखते होगे कहीं से तुम
कि जो अनुभव किये तुमने
वही अनुभव मुझे भी हो रहे हैं,
क्यों अचानक?
दार्शनिक तो हूँ नहीं कोई,
विचारक भी नहीं मैं,
बल्कि डरता हूँ विचारों के जटिल जंजाल से
फिर भी मुझे वे निठुर, कपटी घेर लेते हैं |

अभी कुछ थम गया हो शोर,
ऐसा कुछ नहीं हैं |
कहीं कोलाहलों में कुछ कमी आयी नहीं है |
मगर जैसा कि पहले कह चुका हूँ मैं,
पुराने गीत के ज़रिये कभी यूँ –
“कलरवों की हाट में हर क्षण,
मौन का अभ्यास करता मन”
उसी संकल्प को पकड़े,
मेरे अस्तित्व का है अंश कोई,
डुबकियाँ लेने लगा जो दर्शनों की तीव्र धारा में |
वहाँ शंकर मिले मुझको, कपिल भी साथ में थे,
एक-दूजे के गले में डालकर बाहें, पुराने साथियों से,
मस्त, परमानन्द की मुस्कान होठों पर सजाए |
और मैं चकरा रहा था –
कह गए आचार्य ‘मल्ल प्रधान’ जिन मुनि को,
उन्हींके साथ गल-बहियाँ खड़े हैं |
मगर शंका उन्होंने ही मिटा दी
और उत्तर दे दिया मेरे अ-पूछे प्रश्न का ऐसे कि
‘माया’ ही प्रकृति है औ’ ‘पुरुष’ ही ‘जीव’ है
एवं अवस्था ‘ब्रह्म’ है वह जबकि
प्रकृति पर पुरुष की विजय होती है;
पुरुष की विजय क्या है -
जान भर लेना प्रकृति को पूर्णता से |
“ऋते ज्ञानान्नमुक्तिः” का यही तात्पर्य है |
अलग हैं ढंग कहने के मगर
सिद्धांत तो है एक ही,
शायद मज़ा भी तो इसी में है कि
अगणित हों तरीके वह अनोखी बात कहने के,
कि जो संभव नहीं कहनी, बहुत खुल के,
मगर, हाँ, कुछ इशारों में बताई जो गयी अब तक,
बतायी जा रही अब भी, बताई जा सकेगी और आगे भी |

कहाँ पर मैं निकल आया,
नहीं यह डगर वह, जिसपर
शुरू चलना किया था |
छुड़ाकर, जान शायद भाग निकला भीड़ से मैं |
मगर जाऊँ कहाँ तक !
मेरे हिस्से अधिकतर तो उन्हीं के बीच में हैं,
जिनसे बचकर भागता था |
खड़ा हूँ मैं पुनः कोलाहलों के बीच आकर |
फिर कोई है खीझता मुझ पर,
कोई है झगड़ता मुझसे,
कोई दुलरा रहा है और
कोई दे रहा ताने |
कोई करता ठिठोली,
औ’ कोई उपहास करता है |
मुझे महसूस होता है कभी यूँ भी,
कि जैसे इन सभी के प्रति मेरा दायित्त्व है कुछ,
जो निभाना है मुझे हर हाल में,
पर क्या सरल है यह?
नहीं, बिलकुल नहीं |
कभी लगता है ऐसा भी,
कि जैसे सब भरम है यह,
कि जैसे एक सपना है,
अभी यह टूट जायेगा,
खुलेगी आँख तो कुछ और सच होगा;
मगर सपनों के भीतर भी
तहें सपनों की होती हैं कई,
ऐसे कि जैसे प्याज के छिलके |
खुली आँखें हों, टूटी नींद हो
फिर भी वो सपने जागते हैं,
साथ चलते हैं,
उसी अंदाज़ में,
जैसे कि वो बिंदास रहते थे,
हसीना नींद की मरमरी बाहों में |

वहीँ पर प्रश्न अटका है अभी भी,
सत्य क्या है –
खिलखिलाता शोर या फिर कँपकँपाती शांति,
आखिर मैं चुनूँ किसको?
सही थे आप हे सुकरात, हे परिपूर्ण यूनानी,
कि कहते थे –
“मुझे बस ज्ञात है इतना कि मुझको ज्ञात है कुछ भी नहीं”
सही थे आप हे सिद्धार्थ गौतम, बुद्ध थे सच में,
कि सारे प्रश्न वे जग के कि जो हल हो नहीं सकते,
धरा बस मौन उन पर और ‘अव्याकृत’ कहा उनको |
मगर उस पार थे दोनों,
नदी की धार के उस दूसरे तट पर,
जहाँ से दशा और दिशा नदी की स्पष्टतर दिखती |
फँसा हूँ मैं नदी के वेग में औ’ बह रहा हूँ,
चाहता हूँ समझना मैं भी तटों की बात,
लेकिन कर नहीं सकता
कि मेरी स्थिति बहुत विपरीत है इसके |
मगर मैं चार्वाकों की शरण में जा नहीं सकता,
मुझे जँचते नहीं वे,
जब बताते हैं कि “केवल देह सच है,
मर गई जब देह तो कुछ भी न बचता |”
देखता हूँ मैं कि मैं फिर भी बचा हूँ,
बँट गयी है देह, मन भी बँट चुका है,
श्वास की सब डोरियाँ उलझी हुई हैं,
धडकनों के तार सब टूटे पड़े हैं,
और मैं बिखरा हुआ सा,
दूर तक फैला हुआ सा
देखता असहाय सा निस्तब्ध होकर
मैं स्वयं को |
ओ मेरे विटगेन्सटाइन, सच बताना
किस मनःस्थिति में बनायीं तुमने
सीमाएं विचारों की |
हुए नाराज़ क्यों इतने कि माने ही नहीं आखिर,
रसेल के, मूर के, सबके मनाने पर ?


हम अकेले 


मैं अकेला, तू अकेला, वो अकेला,
साथ बैठे रहे काफी देर तक तीनों अकेले । 
मैं गिनाता खर्च, बच्चों की पढ़ाई पर किये जो,
तू बताता - आजकल है लाभ का व्यवसाय शिक्षा,
और वो चिंता जताता एजुकेशन माफिया पर । 
मैं दुखी हूँ, कर्ज़ चुकता ही नहीं, है सूद इतना,
तू सिखाता कर्ज़ लेने, कर्ज़ देने के तरीके,
और वो चुप है कि वो खुद सूद खाकर जी रहा है । 
मैं ये कहता - बेटियों की शादियाँ कितनी कठिन हैं,
तू सुनाता शादियों की दावतों के चंद किस्से,
और वो देता दलीलें शादियों की व्यर्थता पर । 
इस तरह एक-दूसरे की समस्याओं से अपरिचित,
एक-दूजे की परिस्थिति से परस्पर अनछुए हम,
भावना के द्वार पर यूँ स्वार्थ के ताले लगाकर,
साथ बैठे भी रहे यदि उम्र भर तो क्या मिलेगा?
अंत में हम सभी पाए जायेंगे बिल्कुल अकेले । 


बहाव 


शब्दों को चूने दो,
अब धरती छूने दो
भावों की शाखों,
विचारों की डाली से;
हैं  पक चुके अब ये,
हैं भर चुके अब ये
जीवन के रस से,
अनुभव की हुलस से;
अब अधरों पर छाने दो,
भीतर तक जाने दो
आनंद कविता का,
गीतों की सरिता का
संगम हो जाएगा
सपनों की नदिया से,
भीतर की दुनिया से
आवाज़ें आती हैं,
अब तक बुलाती हैं,
ना जाने किसको वे !
अब चाहे जिसको, वे
संतृप्ति पायेंगी, 
जब गुनगुनायेंगी,
रस पी पी जायेंगी
उन पक्के शब्दों का
जिनमें मधुरता है
भीनी मादकता है
उन्मत्त करती जो
वो उड़ान भरती जो – 
तिरता रहता है मन
नभ में करता क्रीड़न
बादल के  टुकड़ों से,
चिड़ियों की टोली से,
तारों की झिलमिल से,
चंदा की महफ़िल से
चीज़ें चुरा लेता
जिनको छुपा लेता
यादों के झोले में,

मुस्कानें, उम्मीदें,

फुरसत, सुकूँ, नींदें;
सूरज से बचता है,
जलने से डरता है,
फिर भी कभी
छेड़ आता है धीरे से;
ऐसी आज़ादी है
अवसर जो देती है
अपनी हर सीमा से
बाहर निकलने का,
खुलकर मचलने का,
जीने का, मरने का,
या फिर सच्चे अर्थों में
प्यार करने का |


आशुतोष द्विवेदी


  • जन्म : 2 जून 1982  कानपुर (उत्तर प्रदेश)
  • शिक्षा : परास्नातक, गणित, इलाहाबाद विश्वविद्यालय 
  • व्यवसाय : भारतीय विदेश सेवा (ब), विदेश मंत्रालय, नई दिल्ली
  • रचना-कर्म : 1994 से काव्य-रचना - विभिन्न विधाओं में, जैसे- छंद (घनाक्षरी, सवैया, दोहा, संस्कृत-वर्णवृत्त), गीत, ग़ज़ल, मुक्तक | कुछ मंचों पर एवं कई गोष्ठियों में काव्य-पाठ | 
  • प्रकाशन: विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं में फुटकर प्रकाशन | इन्टरनेट पर kavyanchal.com, kavitakosh.com, geeta-kavita.com, anubhuti-hindi.org, सुबोध-सृजन आदि वेब-पत्रिकाओं पर कुछ रचनाओं का संकलन |  एक निजी ब्लॉग "संवेदना" पर भी कुछ रचनायें उपलब्ध | पिछले वर्ष एक काव्य संकलन "इतना तो मैं कह सकता हूँ" नाम से प्रकाशित | 
  • सम्पर्क : मकान सं. 311, विदेश मंत्रालय आवासीय परिसर, गोल मार्किट, नई दिल्ली 
  • ईमेल:ashutoshdwivedi1982@gmail.com

परिक्रमा: लेखक और पाठक के बीच एक सार्थक पुल बना रहा है स्‍टोरीमिरर-राजेंद्र गुप्ता


मुंबई में वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव को सम्मानित
करते प्रसिद्ध अभिनेता
राजेंद्र गुप्ता

                     वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव का सम्मान


                मुंबई के मणिबेन नानावटी महाविद्यालय में 16 जुलाई 2016 की शाम एक भव्य आयोजन में प्रसिद्ध अभिनेता राजेंद्र गुप्ता ने वरिष्ठ कहानीकार संतोष श्रीवास्तव को हिंदी कहानी प्रतियोगिता में प्रथम स्थान पाने के उपलक्ष्य में 50000 रुपये और प्रतीक चिह्न दे कर सम्मानित किया। इस अवसर पर राजेंद्र गुप्ता ने स्‍टोरीमिरर परिवार को बधाई देते हुए कहा कि  स्‍टोरीमिरर एक बहुत अच्छा काम कर रहा है कि वह गिफ्ट ऑफ नॉलेज के जरिए कहानी और कविता को घर-घर में पहुंचा रहा है। हमारे देश में एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग है जिस तक किताबें नहीं पहुंच पातीं। किताबें उन तक पहुंचाने के लिए नये तरीके अपना कर स्‍टोरीमिरर लेखक और पाठक के बीच एक सार्थक पुल बना रहा है।

              स्‍टोरीमिरर के सीईओ बिभु राउत ने इस अवसर पर कंपनी के विजन और मिशन की बात की और कहा कि हम चाहते हैं कि हर घर में कम से कम एक पाठक तैयार करें और जो किताबें लिखी जा रही हैं उन्हें अपने प्रयासों से उन तक पहुंचाएं। 

              संतोष श्रीवास्तव ने किताबें खरीदकर पढ्ने की आदत पर बल देते हुए कहा कि पाठक और लेखक के बीच का सेतु किताबें ही होती हैं। स्टोरी मिरर.कॉम इस दिशा में बेहतरीन काम कर रहा है।सबसे बडी बात यह है कि ईमेल द्वारा ये बताये बिना कि कोई इस प्रकार की कहानी प्रतियोगिता भी वे आयोजित करते है वे लेखकों से रचनाएँ आमंत्रित करते हैं। उन्होने अपनी कहानी “शहतूत पक गये हैं” का भावपूर्ण पाठ किया। कार्यक्रम में महानगर के लेखक, पत्रकार तथा महाविद्यालय के छात्र भारी संख्या में मौजूद थे।

प्रस्तुति: स्टोरीमिरर.कॉम


मंगलवार, 12 जुलाई 2016

सपना मांगलिक की ग़ज़लें


चित्र गूगल सर्च इंजन से साभार


(एक)


गली मोहब्बतों की जाके ,क्या भला मिला
मिला राह में जो भी वो ही दिलजला मिला

कहा इश्कजादे ले खुशियों की लूट दौलतें
ख़ुशी दूर हमको अश्कों का सिलसिला मिला

जहाँ पूछ ना तू ,करके मुहब्बत क्या मिला ?
खलिश थी नहीं लेकिन ,दिल में कुछ खला मिला

उठा है यकीं दुनिया से ,उसपे यकीन कर
मठा फूंककर पीता लोगों ,दूधों से जला मिला

तड़प दीद के उसकी ,है ख्वाईश आखिरी
झलक बेवफा की करने दर ये खुला मिला



(दो)


डुबायें क्यूँ न ,खुद को हम ,शराब में
मिली नफरत ,हमें इश्के-जवाव में

पढ़ी थीं मोहब्बतें आयतें समझ
मिलेगा लफ्ज ना अब ये किताब में

परखने से जियादा हम निरखा किये
कमी कुछ रह गयी शायद हिसाब में

भरा गोदाम खाली आज कर दिया
बिकी जागीर दिल की कोड़ी भाव में

न महकेगा कभी ये गुले दोस्त सुन
लगा कीड़ा कि अब खिलते गुलाब में



(तीन)


बारिशों में गमों को डुबाकर चले
अश्क हम इस जहाँ से छुपाकर चले

है डरे रूसबाई मगर क्या करें
दिल गली यार की हम बताकर चले

पूछते हो लहू रिस रहा क्यूँ भला
तीर दिल में मिरे वो चुभाकर चले

सीं लिए होंठ आया जिक्र जब तिरा
नाम तेरा लवों पे दबाकर चले

इश्क अरमान  ईमान सब दे दिया
पास था दिल उसे भी लुटाकर चले

सर उठा चल रहे थे जहां में कभी
शोहरत ख़ाक में अब मिलाकर चले



(चार)


गले की प्यास होंठों से छुपानी आ गई
हमें यूँ धूल बातों पर उडानी आ गई

भुला डाला जिसे कबका कभी सोचा न था
हमें फिर याद भूली वो कहानी आ गई

कि उछली मौज जज्बों की गया दरिया सहम
गया था जम लहू रग में रवानी आ गई

किया उर्दू उसे खुद रोशनाई बन गए
कि गजलों में मिरी जबसे जवानी आ गई

गया सीने मिरे कुछ आज शीशे सा दरक
उभर के चोट ज्यादा यूँ पुरानी आ गई



(पांच)


झाड़ियाँ नफरत की ,बोते हैं बो जाने दो
डूबना गर किस्मत है तो ये भी हो जाने दो

जान भी ले ले देते हैं ये हक भी तुमको
दिल अगर रोता भी है तो क्या ,रो जाने दो

जिन्दगी ने दुत्कारा हमको बेदर्दी से
मौत की बाहों में खोना है खो जाने दो

धडकनें वो सब चलती हैं जो देख तुझको
खींच ले सीने से उन्हें ,मुझको जाने दे

मैं बयां करती भी हूँ तो क्या हासिल होगा
गम मिरा चीखें सन्नाटों की हो जाने दे



(छह)


दुश्मनों से कहाँ डर मुझे है
इल्म इंसान का गर मुझे है

क्यूँ जरूरत तुझे हो हमारी

चाह तेरी सनम पर मुझे है

दर्द कैसे तुझे दूँ भला मैं

है तुझे गम असर कर मुझे है

क्या हुनर वो करे बेवफाई

बेखबर सब खबर पर मुझे है

इल्तजा ये करूँ आखिरी अब

बेवफा कर न दर  दर मुझे है



(सात)


फेरकर मुंह तू जो खड़ी है
बेखबर सुन ग़ज़ल आखिरी है

लुट गए जो नज़ारे नज़र थे
दिल तुझे मगर अपनी पड़ी है

उस खता की मिल रही सजायें
जो कि मैंने करी ही नहीं है

घूमते सब लगाकर मुखौटे
भेड़ीया नस्ल पर आदमी है

यूँ करम रव तिरे हैं बहुत से
जिन्दगी उस बिना बेबसी है

दिल मिरे जगह तेरी वही है
बेवफा तू जुबाँ से फिरी हैं

है बड़ी कशमकश दिल करूँ क्या
कल तलक थी ख़ुशी अब गमी है

फासले दरमियाँ कम न होते
दूर जैसे फ़लक से जमीं है

गोद मे में मरुँ बस तिरी ही
ये तमन्ना मिरी आखिरी है



सपना मांगलिक 


  • जन्म: 17 फरवरी-1981 भरतपुर (राजस्थान)। 
  • शिक्षा: एम.ए.; बी.एड.; एक्सपोर्ट मैनेजमेंट डिप्लोमा।
  • प्रकाशन : पापा कब आओगे, नौकी बहू (कहानी संग्रह), सफलता रास्तों से मंज़िल तक, ढाई आखर प्रेम का (प्रेरक गद्द्य संग्रह), कमसिन बाला, कल क्या होगा, बगावत (काव्य संग्रह), जज़्बा-ए-दिल भाग -प्रथम, द्वितीय, तृतीय (ग़ज़ल संग्रह), टिमटिम तारे, गुनगुनाते अक्षर, होटल जंगल ट्रीट (बाल साहित्य)
  • प्रसारण : आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर निरंतर रचनाओं का प्रसारण
  • संपादन : तुम को ना भूल पायेंगे (संस्मरण संग्रह) स्वर्ण जयंती स्मारिका (समानांतर साहित्य संस्थान)
  • संस्थापक : जीवन सारांश समाज सेवा समिति, बज़्म-ए-सारांश (उर्दू हिंदी साहित्य समिति)
  • सदस्य : ऑथर गिल्ड ऑफ़ इंडिया, अखिल भारतीय गंगा समिति जलगांव, महानगर लेखिका समिति आगरा, साहित्य साधिका समिति आगरा, सामानांतर साहित्य समिति आगरा, आगमन साहित्य परिषद हापुड़, इंटेलिजेंस मिडिया एसोशिसन, दिल्ली
  • सम्मान : विभिन्न राजकीय एवं प्रादेशिक मंचों से सम्मानित
  • रचना कर्म : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
  • सम्पर्क : एफ-659, कमला नगर, आगरा-282005
  • फोन-9548509508
  • ईमेल –sapna8manglik@gmail.com

परिक्रमा: ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ‘संकल्पना’ लोकार्पित


       ‘वृद्धावस्था विमर्श’ का लोकार्पण प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने किया। पुस्तक की प्रथम प्रति
       स्वीकार करते हुए प्रो. आनंद राज वर्मा। साथ में, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा, डॉ. अहिल्या
मिश्र, राजेश प्रसाद, प्रो.ऋषभ देव शर्मा एवं अन्य।


‘संकल्पना’ का लोकार्पण करते हुए डॉ. अहिल्या मिश्र। साथ में, डॉ.
मंजु शर्मा, डॉ. एम. वेंकटेश्वर, डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा।
               

                 साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था ‘साहित्य मंथन’ के तत्वावधान में पिछले दिनों आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी, हैदराबाद के नामपल्ली स्थित सभाकक्ष में स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद कृत ‘वृद्धावस्था विमर्श’ तथा ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा संपादित ‘संकल्पना’ शीर्षक  दो पुस्तकों का लोकार्पण समारोह भव्यतापूर्वक संपन्न हुआ जिसमें उपस्थित विद्वानों ने हिंदी साहित्य और विमोचित पुस्तकों पर विचार व्यक्त किए। अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय  के भारत अध्ययन विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. वेंकटेश्वर ने समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए  निरंतर बढ़ती जा रही वृद्धों की आबादी के पुनर्वास को इक्कीसवीं शताब्दी की एक प्रमुख चुनौती बताया और विमोचित कृति ‘वृद्धावस्था  विमर्श’ को सामयिक तथा प्रासंगिक पुस्तक माना. उन्होंने अनुसंधान के स्तर की गिरावट पर चिंता जताते हुए इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि ‘संकल्पना’ में प्रकाशित ज़्यादातर शोधपत्र अभिनव, मौलिक और उच्च कोटि के हैं।

               स्त्रीविमर्श की पैरोकार और  आथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के हैदराबाद अध्याय की संयोजक डॉ. अहिल्या मिश्र ने अध्यक्षीय भाषण में प्राचीन भारतीय समाज में वृद्धों की सम्मानजनक स्थिति की तुलना उनकी वर्तमान हीन दशा से करते हुए विश्वास प्रकट किया कि चंद्रमौलेश्वर प्रसाद की पुस्तक समाज को इस दिशा में नए चिंतन और वृद्धावस्था-नीति के निर्माण की प्रेरणा दे सकती है। दूसरी लोकार्पित पुस्तक ‘संकल्पना’ को उन्होंने शोधार्थियों और शोध निर्देशकों के लिए उपयोगी प्रतिमान की संज्ञा दी. ‘वृद्धावस्था विमर्श’ की प्रथम प्रति स्व. चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के पुत्र राजेश प्रसाद तथा वरिष्ठ शिक्षाविद आनंद राज वर्मा ने स्वीकार की। इस अवसर पर डॉ. वर्मा ने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के व्यक्तिगत गुणों और साहित्यिक देन की चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने उर्दू साहित्यकारों पर केंद्रित समीक्षात्मक लेखन के अलावा विश्व साहित्य की अनेक अमर कहानियों का अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद किया था।

               समारोह की समन्वयक डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने अतिथियों और विमोच्य कृतियों का परिचय देते हुए बताया कि ‘वृद्धावस्था विमर्श’ विश्वविख्यात अस्तित्ववादी स्त्रीविमर्शकार सिमोन द बुवा के ग्रंथ ‘द ओल्ड एज’ का हिंदी सारानुवाद है तथा ‘संकल्पना’ में दक्षिण भारत के 39 शोधार्थियों के शोधपरक आलेख सम्मिलित हैं जिनका सबंध विविध समकालीन विमर्शों से है। डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने यह जानकारी भी दी कि यथाशीघ्र चंद्रमौलेश्वर प्रसाद द्वारा अनूदित कहानियों को भी पुस्तकाकार प्रकाशित किया जाएगा और ‘संकल्पना’ की अगली कड़ी के रूप में शोधपत्रों का दूसरा संकलन ‘अन्वेषी’ शीर्षक से प्रस्तुत किया जाएगा।  

              आरंभ में टी. सुभाषिणी ने सरस्वती-वंदना की और डॉ. पूर्णिमा शर्मा, वर्षा कुमारी, मोनिका शर्मा एवं वी. कृष्णा राव ने उत्तरीय प्रदान कर अतिथियों का स्वागत किया। संतोष विजय मुनेश्वर ने स्वागत-गीत और अर्चना पांडेय ने वर्षा-गीत सुनाकर समां बाँध दिया। संचालन डॉ. मंजु शर्मा ने किया.समारोह में नाट्यकर्मी विनय वर्मा, वैज्ञानिक डॉ. बुधप्रकाश सागर, राजभाषा अधिकारी लक्ष्मण शिवहरे, सामाजिक कार्यकर्ता द्वारका प्रसाद मायछ, रोहित जायसवाल, राजेंद्र परशाद, गुरु दयाल अग्रवाल, विनीता शर्मा, नरेंद्र राय, कुमार लव, संपत देवी मुरारका, डॉ. करन सिंह ऊटवाल,  डॉ. सीमा मिश्र, डॉ. बनवारी लाल मीणा, डॉ. जी. प्रवीणा, डॉ. रमा द्विवेदी, डॉ. वेमूरि हरि नारायण शर्मा, डॉ. बी. सत्य नारायण, डॉ. मिथलेश सागर, डॉ. रियाज़ अंसारी, डॉ. सुमन सिंह, डॉ. श्री ज्ञानमोटे, डॉ. महादेव एम. बासुतकर, डॉ. अर्पणा दीप्ति, डॉ. बी. बालाजी, वी. देवीधर, मोहम्मद आबिद अली,  पी. पावनी, अशोक कुमार तिवारी, पूनम जोधपुरी, भंवर लाल उपाध्याय, जी. परमेश्वर, सरिता सुराणा, सुस्मिता घोष और गौसिया सुल्ताना  सहित विविध विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े शताधिक विद्वान, लेखक, शोधार्थी और हिंदीसेवी  सम्मिलित हुए। अंत में प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने ‘प्रेम बना रहे!’ कहते हुए आयोजन में सहयोग के लिए सबका आभार व्यक्त किया।

प्रस्तुति : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा


सह-संपादक ‘स्रवंति’, 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,
हैदराबाद -500004 (तेलंगाना)